जैसी घटनाएँ हो रही हैं वैसे में संगीत सुनकर लगता है जैसे कोई मुझे गालियां दे रहा हैं

प्रख्यात दलित चिंतक और गज़लकार मूलचन्द सोनकर से अपर्णा की बातचीत

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आपकी ग़ज़लें एक दिन मैं पढ़ रही थी। उनमें घर को लेकर और शहर को लेकर आपकी तकलीफ दिखती है। क्या यह तकलीफ इन हालात को लेकर ही है ?

घर मेरा एक सपना था जहां मैं सुकून की चंद सांसें लेना चाहता था। जहां सभी एक दूसरे को समझते और एक दूसरे से प्यार करते। मैं चाहता था कि सभी आजाद और बौद्धिक लोग हों। सबके पास अपनी आजीविका हो और जब मैं बाबा साहब की परंपरा को आगे बढ़ाने में लगा तब तो मुझे और भी यह जरूरत महसूस हुई कि बच्चे कम से कम थोड़े अनुकूल विचार के हों लेकिन यह सोच ही मेरे लिए एक दु:स्वप्न बनकर रह गई। मैं पूजा-पाठ, धर्म और पाखंड को नहीं मानता लेकिन मेरे घरवाले तो इसमें आकंठ डूबे हुये हैं। चलो यह भी बर्दाश्त कर लिया लेकिन वे लोग मुझे चिढ़ाने के लिए फोन पर धार्मिक विमर्श करते हैं जोर-जोर से चिल्लाकर। उनको पता है कि इससे मुझे तकलीफ होती है। और सच कहूँ तो इससे मेरा खून जलता है। मैं राख हो जाता हूँ। मैं अपने कमरे में बैठा हूँ और भीतर से फोन पर बात करने की तेज आवाज आ रही है कि मुझे माता रानी बुला रही हैं। इस बार माता रानी के दरबार में जाऊँगा ही। मेरा बीपी बढ़ जाता है। जी करता है कि घर छोड़कर भाग जाऊँ। लेकिन दो बच्चे पाले हैं मैंने। उनके खयाल से रुक जाता हूँ। मेरी बेटी का क्या होगा। वह थोड़ी जिद्दी है लेकिन इन्नोसेंट है। बिलकुल अकेली पड़ जाएगी।

कौन बच्चे ? वे दोनों कुत्ते ?

कुत्ते न कहो। उनका नाम चेरी और फेथ है। मृत्युंजय भी  था एक और एक टफी भी था लेकिन वे दोनों अब नहीं हैं। एक को तो मैंने अशोक आनंद के खेत में दफनाया लेकिन टफी बेचारे को बढ़ी हुई नदी में बहाना पड़ा था। उन सबको मैंने जी जान से चाहा है। उनकी साफ-सफाई की है नहलाया-धुलाया है। जब वे खाना नहीं खाते तो उनको पुचकारकर गाना गाकर खिलाया है। वे बीमार पड़ते हैं तो मेरी आँखों की नींद गायब हो जाती है। दोनों जब मेरे पास रहते हैं तो मैं सब तकलीफें भूल जाता हूँ। मैं जब चंडीगढ़ गया था तो एक हफ्ते लग गए। उतने दिन तक चेरी ने कुछ भी नहीं खाया। मेरे कमरे में ही बैठी रहती। जब मैं लौटा तो पप्पू ने बताया कि वह मुझे कितना मिस कर रही थी। जब मैं आया तभी वह खाना खाई।

आपके घर जब भी गई हूँ आपके टेबल पर आपकी ही कद काठी का गिलास रखा रहता है।

देखो, मैं जब लिखने या पढ़ने बैठता हूँ तो चाहता नहीं हूँ कि कोई डिस्टर्बेन्स हो। बीच में प्यास लगती है तो खुद ही उठकर जाना पड़ता है। किसको आवाज दूँ। सभी अपने काम में बिजी होते हैं। सबकी अपनी दुनिया है। इसलिए बार-बार आवाज देने या उठकर जाने से अच्छा है कि पानी एक बार बड़े गिलास में रख लूँ और जब प्यास लगे पी लूँ।

आपके शौक क्या-क्या हैं? कौन सी चीज है जो आपको सख़्त नापसंद है?

किताबें खरीदना और पढ़ना मेरा शौक है और अब तक कई लाख की किताबें मैंने खरीदी। ज्यादातर को मैंने पढ़ लिया है। लिखना भी एक शौक है लेकिन मुझे किसी जमाने में संगीत का बहुत शौक था। बहुत ज्यादा। शास्त्रीय संगीत से लेकर फिल्मी गीतों तक। मन्ना डे और सचिन देव बर्मन, सुरैय्या और नूरजहाँ को मैं घंटों सुनता। बाद में आशा भोंसले की लरजती हुई आवाज़ का भी मैं दीवाना था। मेरे पास सन्दूक भरकर कैसेट थे। रेडियो भी सुनता था लेकिन अब नहीं। पता नहीं क्यों अब मन उचट गया है। देश के जैसे हालात हैं। महिलाओं और बच्चों के प्रति जैसे अपराध हो रहे हैं और दलित उत्पीड़न की जैसी घटनाएँ हो रही हैं वैसे मैं संगीत सुनना बड़ा अजीब हो गया है। लगता है जैसे कोई मुझे गालियां दे रहा है। अब तो विविध भारती भी सुने हुये बरसों हो गए। लगातार अकेला होता जा रहा हूँ। जहां तक मुझे नापसंद चीजों का सवाल है तो चापलूसी मुझे सख़्त नापसंद है। कोई भी ठंडा पेय मुझे सख्त नापसंद है क्योंकि उसके एक बोतल में नौ लीटर पानी खर्च होता है जो गरीबों का हिस्से का होता है। मैंने जिंदगी में  कभी शराब नहीं पी न पान खाया और न सिगरेट पी और सुर्ती खाई। ये सब मुझे सख़्त नापसंद हैं।

आपकी पहली किताब कौन सी है?

ग़ालिब मेरी नज़र से  मेरी पहली किताब है जिसमें गालिब को अलग संदर्भों में देखने की कोशिश की है।

उस पर उर्दू का बहुत प्रभाव है। खासकर भाषा पर। कैसे?

उर्दू के प्रति मेरा बहुत गहरा लगाव रहा है। लेकिन जानता नहीं था। बचपन से ही मैं गणित में बहुत अच्छा था। मेरे पड़ोस में एक लड़की थी जिसे उर्दू आती थी लेकिन गणित में कमजोर थी। बाद में शर्त यह बनी कि मैं तुम्हें गणित सिखा दूँगा तुम मुझे उर्दू सिखा दो। इस तरह हमने एक दूसरे को उर्दू और गणित सिखाया। लेकिन उर्दू बिना अभ्यास और प्रयोग के नहीं आती। इसलिए मैंने लगातार अभ्यास किया और जब ग़ालिब पर काम किया तो उनको ओरिजिनल पढ़ा। इसलिए भाषा पर वह प्रभाव है। ग़ज़लें भी मेरी उर्दू से अनुप्राणित हैं। हालांकि मैं स्वयं मानता हूँ कि ग़ालिब मेरी नज़र से मुझे फिर लिखना हो तो वैसी भाषा में अब नहीं लिख सकता।

आपने लिखना कब शुरू किया ?

बहुत बाद में। हाँ पढ़ने के शौक बहुत था। मेरा सौभाग्य है कि मैंने फ़िराक़ को देखा था। उनके व्यक्तित्व से भी काफी प्रभावित रहा हूँ। लेकिन लिखने की प्रेरणा मुझे उनसे नहीं मिली। जब मैं रोडवेज़ की नौकरी में आया तो कई जगहों पर तैनात हुआ और उन जगहों के अनेक लोगों से भेंट-मुलाकात हुई तो कभी-कभार गोष्ठियों में भी जाना होने लगा। ऐसे में लिखने का एक स्रोत मेरे अंदर से भी फूटा। लेकिन जब मैंने बाबा साहब अंबेडकर को पढ़ा तो मेरे भीतर एक भूचाल आ गया। लगा कि इस दुनिया को लेकर जो असहमति मेरे अंदर है उसका तो पूरा पहाड़ ही बाबा साहब के लेखन में है। मैंने धीरे-धीरे उनका सारा लेखन ओरिजिनल पढ़ लिया। और फिर तो जो यात्रा शुरू हुई आज तक नहीं थमी है। मुझे लगता है कि हर दलित पिछड़े लेखक को बाबा साहब की रचनाएँ ओरिजिनल पढ़नी चाहिए।

सुल्तानपुर में जाहिल सुल्तानपुरी ने बहुत रचनात्मक प्रेरणा दी। बनारस में जवाहर लाल कौल ‘व्यग्र’ ने मुझे मंचों की ओर ले जाने में भूमिका निभाई। वे हैं तो बहुत संवेदनशील आदमी लेकिन आलोचना बर्दाश्त नहीं कर सकते। उनकी किसी गलती की याद दिलाओ तो बुरा मान जाते हैं और उनका बस एक पेट शब्द है – भक्खड़ में जाये। अनेक रचनाकारों का सान्निध्य मिला। दानिश, अलकबीर, मेयार सनेही, कमल नयन पांडेय, संजय श्रीवास्तव, अशोक आनंद, बीआर विप्लवी, केशव शरण, संगम लाल विद्रोही, नंदकिशोर आदि का। लेकिन जिस आदमी की रचनात्मक ताकत, जिद और जुनून का मैं मुरीद हूँ उसका नाम रामजी यादव है। मैंने इस आदमी से बहुत कुछ सीखा है। इसकी याददाश्त और संदर्भों के साथ लेखकीय निर्भीकता और कमिटमेंट का तो मैं कायल हूँ। पहली बार इसका उपन्यास तूफानी सरदार का घोड़ा  पढ़ते हुये कई बार मेरी आँखें भींगीं।

आपकी किताब ग़ालिब मेरी नज़र से  बिलकुल नफ़ीस उर्दू की किताब लगती है। उसमें आपने उनकी कविता को दलित संदर्भों  से जोड़ा है। क्या ग़ालिब में यह खूबी है?

क्या बताऊँ अपर्णा! मुझे लगता है कि बेजुबानों को जबान देने के लिए ग़ालिब को इस जमीन पर उतारा गया था। यह मेरी भावना है। बेशक हर कवि, शायर, रचनाकार, कलाकार अपने जमाने की पैदाइश होता है और बिना दुखों और चुनौतियों का पहाड़ काटे वह अपने भीतर वह खूबी नहीं पैदा कर सकता। बिना ज़िंदगी और निजाम से दो-दो हाथ किये वह कद्दावर हो ही नहीं सकता। ग़ालिब को देखो तो वे ऐसे ही लगते हैं। किसी की कोई परवाह ही नहीं और किसी के आगे झुकने का तो सवाल नहीं। बहुत से लोगों का दावा है कि ग़ालिब वज़ीफे के लिए झुके। न सिर्फ बहादुर शाह ज़फर बल्कि मलिका विक्टोरिया के दरबार तक हाजिरी दी। तो इसमें बुराई क्या है। लोग नौकरियों के लिए क्या-क्या नहीं करते। पुरस्कारों और फेलोशिप के लिए क्या जुगत नहीं बिठाते। जिनका ढंका रह गया वे महान बने रहे। जिनका उघड़ गया वे हिकारत के विषय होकर रह गए । लेकिन  ग़ालिब तो स्वयं भी  मुँहफट थे और अपनी आलोचना में अपने आप को भी नहीं बख़्शा। ग़ालिब वजीफाख़्वार हो दो शाह को दुआ। वो दिन गए जब कहते थे नौकर नहीं हूँ मैं।  तो आप कर लीजिये जो करना हो उनका। ऐसे थे ग़ालिब। मुझे थोड़ी-बहुत उर्दू तो आती ही है लेकिन ग़ालिब की शायरी ऐसी चीज है कि दिमाग आपसे आप उर्दूमय हो जाता है। तो तुम जिस नफ़ीस उर्दू की बात कर रही हो वह दरअसल ग़ालिब का असर है। ग़ालिब तेरे कलाम में क्योंकर मजा न हो। पीता है धोके खुसरवे शीरीं सुखन के पाँव।

अब बात ग़ालिब की शायरी में दलित मुद्दे की बात तो इसे मैं एक दूसरे ही संदर्भों में देखता हूँ। ग़ालिब की शायरी में फाकामस्ती भी है पस्ती और गिरानी भी लेकिन दयनीयता नहीं है। वे शिकायत करते हैं। मुंह फुलाते हैं और पूरे सिस्टम को ख़ारिज करते हैं। बस इसी बात को मैंने पकड़ा। ग़ालिब टूटे हुये सामंती परिवेश के किरदार थे। उनके दुख साधारण आदमी के दुख हैं। संतानों की मौत और परिवार की बदहाली है और गरीबी तो बेहिसाब है – दिरमो-दाम अपने पास कहाँ  चील के घोंसले में मांस कहाँ। इसके बावजूद ग़ालिब व्यवस्था के अन्याय से कभी  बेरुख नहीं हुये । उन्होंने शिकायत करने में कभी कोताही नहीं की और जुल्म के खिलाफ मुखर होकर बोले। अपने ऊपर किसी की दया के मुस्तहक नहीं हुये । यहीं मुझे लगा कि वे अपने बहाने उन वंचितों और बहिष्कृतों की भी बात कर रहे हैं। वे व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं तो यह सवाल महज उनका अपना सवाल नहीं है बल्कि वह उन बेज़ुबान दलितों का भी सवाल है। जब वे इब्न-ए-मरियम की कसौटी अपने दुख की दवा से तय करते हैं तो मुझे लगता है कि इस देश की दो तिहाई आबादी उसमें भी एक चौथाई से ज्यादा दलित अपनी बात कह रहे हैं। ऐसे ही सैकड़ों अशआर हैं ग़ालिब के । जो असल में दलितों की पीड़ा की तजुर्मानी करते हैं ।

यह तो परंपरागत दृष्टि से अलग है ।

बिला शक । मुझे लगता है कि चाहे आपके भले का साहित्य हो चाहे बुरे का। आप उसे बार-बार देखिये तो नए-नए अर्थ और संदर्भ मिलेंगे।

क्या आपकी कविताओं में भी इसीलिए सामान्य दलित दृष्टिकोण से अलग बातें मिलती हैं। आपने दलितों की पीड़ा के साथ ही पर्यावरण और रोजमर्रा के जीवन के सवालों को भी बड़ी शिद्दत से उठाया है। सॉनेट में तो आप बांधों के विरोध तक भी  चले गए हैं। जबकि आम दलित रचनाकार और चिंतक सामाजिक सांस्कृतिक मसले तक ही सिमटे हुये हैं।

हाँ, शायद तुम ठीक कह रही हो। मैं एक कवि के रूप में बहुत बिखरा हुआ हूँ और कई बार तो लगता है कोई भी  जीवन के सूत्रों को पकड़ेगा तो उसे भी बिखरना पड़ेगा। मैंने कभी रूढ़ होकर एक ही सवाल को सिंबलाइज नहीं किया बल्कि वह जितने आयामों तक है उस तक पहुँचने की कोशिश करता रहा हूँ। जब मैं पर्यावरण की बात करता हूँ तो मुझे पता है कि इसका सबसे बुरा असर उन वंचित दलितों पर ही पड़ता है जो देश के सबसे बुरे पर्यावरण में रहने को अभिशप्त हैं। न उनके पास साफ पानी है न साफ हवा। खेल का मैदान, अस्पताल और स्कूल भी नहीं हैं। जबकि यह सब साधारण जीवन की जरूरी चीजें हैं। इसके उलट सरकारी नीतियाँ बेमतलब की परियोजनाओं में उलझी हैं। बड़े बांध लगातार जनविरोधी साबित हुये हैं। मैं एक दलित लेखक के रूप में न केवल प्राकृतिक पर्यावरण बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक और सबसे ऊपर आर्थिक और राजनीतिक पर्यावरण को सही और दुरुस्त करने का पक्षधर है।

क्या आपकी किताबें इसी रूप में पढ़ी गईं ?

यह मैं कह नहीं सकता क्योंकि उन पर कोई बहस नहीं हुई। किसी का फीडबैक नहीं मिला।

आपकी ग़ज़लों को पढ़ते हुये लगता है कि आप कोई दूसरे आदमी हैं जिसकी चिंता में घर है, संबंध हैं और सामाजिक गैरबराबरी के प्रति गुस्सा है और नई पीढ़ी के प्रति शंका है जबकि आपका गद्य पढ़ते हुये लगता है कि आप बिलकुल डिफरेंट आदमी हैं जो जाति व्यवस्था को बिलकुल छील देना चाहता है। ग़ज़लों में संवेदना और गद्य में आक्रोश। ऐसा क्यों?

क्या कहूँ? असल में तो आक्रोश भी संवेदना का ही बदला हुआ रूप है। फिर भी तुम्हारी बात गौर करने लायक है। और तुम सच कह रही हो। मुझे भी  लगता है कि मेरे भीतर कई आदमी हैं। जैसे दुष्यंत ने कहा है कि हर आदमी में रहते हैं दस बीस आदमी। जिसको भी देखना हो कई बार देखना। तो मैं अपने आपको भी कई बार देखता हूँ। ज़िंदगी की हजार घटनाएँ और परिस्थितियाँ होती हैं। अच्छे बुरे फैसले होते हैं। कोई भी अपने को सौ परसेंट सही नहीं कह सकता। सौ परसेंट शुद्ध सोने से कोई चीज बनाई ही नहीं जा सकती इसलिए उसमें मिलावट की जाती है। कितनी मिलावट की गई है यह उसके कैरेट से मालूम होता है। इसलिए आदमी भी आगे बढ़ता है तो तात्कालिक परिस्थितियों के अनुसार फैसले लेता है। बाद में वह समीक्षा करता है। तो बाद में ही पता लगता है कि कौन सी बात कुरेद रही है कौन सी बात खुशी दे रही है। यह कसक लाजिमी है। अपनी कविताओं में बार-बार मैं अकेलेपन और उदासी की ओर चला जाता हूँ। असल में घर मेरे लिए बहुत बड़ा सपना रहा है और मैंने घर को बड़े मन से बनाया। मैं नहीं समझता कि रुपए-पैसे के मामले में हमारे परिवार को कोई तंगी रही है। सम्मान से खाने की कोई कमी नहीं फिर भी मेरा घर मेरा नहीं रहा। जिसको मौका मिला उसने ही मुझे चोट पहुंचाई और मौके का फायदा उठाया। लेकिन सब कुछ लेकर भी उसने मुझे नहीं समझा। मेरे मन के खिलाफ काम करना लोगों का शगल है और घर में मैं बिलकुल अकेला रह गया हूँ। मेरे पास बस मेरी किताबें हैं जिनका मेरे बाद क्या होगा नहीं पता। तो घर मेरे लिए भावुकता का ठिकाना भर है। ग़ालिब कहते हैं कि घर हमारा हम न रोते भी  तो वीराना होता। लेकिन आदमी कैसे चुप रह सकता है। खुद  ग़ालिब ही कहते हैं कि रोएँगे हम हज़ार बार कोई हमें सताये क्यों। मैं अपनी तकलीफों को कभी-कभी ग़ज़लों और कविताओं में कह देता रहा हूँ। हालांकि मेरी ग़ज़लों के दायरे में पूरा दौर आता है। पढ़ो तो सही। जिसको कहते हैं गम-ए-दौराँ । बस ये है कि ग़ज़लों की भाषा मुलायम है लेकिन मुद्दों की तल्ख़ी कहीं नहीं गई ।

अब दूसरी बात। गद्य में मेरे सामने बेशुमार मुद्दे हैं जिन पर आज के साहित्यकार को आवाज उठानी चाहिए लेकिन वह चुप है। हमारे वामपंथी बंधु धर्म को अफीम मानते हैं लेकिन पौराणिक झूठ के खिलाफ कभी खड़े नहीं होते। मिथकों की कभी आलोचना नहीं करते। लेकिन मैं क्यों चुप रहूँ ? बिना लिखे नहीं रह सकता। लेकिन जो लिखता हूँ उसको गुस्से की अभिव्यक्ति मत समझो। वह तार्किक अभिव्यक्ति है। और गुस्सा भी तार्किक होता है। मेरे लेखन में जो तल्ख़ी दिखती है वह मेरे कमिटमेंट के कारण है। शायद मुंहदेखी बातें करना मेरी फितरत में नहीं है इसलिए सबको लगता है कि मैं कड़वा बोलता हूँ। लेकिन सच यह है कि डॉ. अंबेडकर का व्यक्तित्व मुझे प्रभावित करता है तो उनका लेखन मुझे अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक भूमिका के लिए प्रेरित करता है। वही मुझे इस बात की प्रेरणा देता है बाबा साहब ने जो सपने देखे थे उनको साकार करने में कम से कम अपनी भूमिका तो निभाऊँ ही। और जब दलित आंदोलन, राजनीति और साहित्य में भटकाव देखता हूँ तो तल्ख़ हो जाता हूँ। यह तल्ख़ी मेरी भाषा में उतर आती है। लोग इसको नहीं समझ पाते तो मैं क्या करूँ। कहाँ से उनके लायक लेखन करूँ। बकौल ग़ालिब या रब न समझे हैं न समझेंगे मेरी बात। दे और दिल उनको जो न दे मुझको जुबां और।

भले ही यह सीमित हो। लेकिन मेरा लेखन अगर दलित आंदोलन के काम नहीं आ रहा है तो इसका मतलब यह भी है कि दलित आंदोलन अपने रास्ते से भटक गया है। वह बाबा साहब की उस परंपरा का वाहक नहीं है जो अंतिम तौर पर दलित मुक्ति का निर्णायक संघर्ष करता है। अब जो भी हो लेकिन मुझे नकारना क्या किसी के लिए इतना आसान है? और जिस कार्यक्रम में मेरी जगह न हो उसकी तरफ देखना भी क्या?

आपके लेख बहुत लंबे होते हैं और कई बार तो पाठक ऊब जाता है। कई लोगों के फोन आते हैं कि आप बात को ज्यादा फैला देते हैं। क्या आप छोटे लेख नहीं लिख सकते?

यही बात एक बार रामजी यादव ने कही और छोटे लेख लिखने को कहा। तब मैंने उनसे निवेदन किया कि आप मुझे छोटा लिखना सिखा दीजिये मैं लिखा करूँगा। लेकिन मजा देखो उसी आदमी ने मेरी कुछ टिप्पणियाँ पढ़कर कहा कि आप गहरे नहीं उतर पाये। अब मैं क्या करूँ। राजेंद्र यादव ने तो इसीलिए मेरा कोई लेख नहीं छापा कि मेरे लेख हंस  के ज्यादा पन्ने घेरेंगे। फिर मैंने भेजना ही बंद कर दिया। लेकिन लिखना कम नहीं हुआ। मुझे नहीं लगता कि किसी विषय पर आधी-अधूरी बात होनी चाहिए। किसी कभी जेनुइन लेखक को अपने विषय पर सभी उपलब्ध प्राथमिक स्रोतों के माध्यम से अपनी बात को कहना चाहिए। इस मामले में डॉ. धर्मवीर का कोई जोड़ नहीं है। उस आदमी ने बिना किसी राग-द्वेष के छोटी से छोटी बात की नोटिस ली। आश्चर्य होता है कि इतने बड़े कद का लेखक अपने विषय को लेकर कितना कमिटेड है। शायद ही हिन्दी साहित्य में लंबे समय तक वैसा कोई दूसरा हो। जहां तक मेरी बात है तो लंबे लेख लिखना मेरी मजबूरी है। क्योंकि मैं जिस विषय को उठाता हूँ उस पर पूरी शिद्दत से अपनी बात रखना चाहता हूँ। उदाहरण के रूप में देखो कि प्रगतिशील लेखक संघ की पचहत्तरवीं सालगिरह के मौके पर नामवर सिंह तुलसीराम की किताब पर धर्मवीर की समीक्षा में उठाए गए सवालों पर अपनी बौखलाहट और दलितों के प्रति अपने विद्वेष को रोक नहीं पाये। उन्होंने अपने मन की भड़ास बल्कि ज़हर आखिर निकाल ही दिया कि ‘ये सब बहुत आगे बढ़ गए हैं और ऐसा ही रहा तो ठाकुर बाभनों के लड़के भीख मांगेंगे।’ इस पंक्ति ने मुझे बहुत विचलित किया और मैंने इसके विरोध में न केवल लिखा बल्कि एक किताब ही संपादित की प्रगतिशील लेखक संघ के पचहत्तर साल और नामवर सिंह का आरक्षण विरोध। इसी तरह उदारीकरण के पक्ष को लेकर जब मृणाल पांडे ने हिंदुस्तान में लिखा तब मैंने लिखित प्रतिवाद किया लेकिन लेख को उन लोगों ने छापा नहीं। राम के दलित प्रेम पर भी हिंदुस्तान समूह की पत्रिका कादंबिनी  में हिमांशु शेखर ने लिखा तब भी  मैंने तथ्यों के आईने में प्रतिवाद किया। इन विषयों पर चुटकी नहीं ली जा सकती न ही चुटकी में लिखा जा सकता है। रही बात पाठकों की ऊब की तो यही कह सकता हूँ कि मेरे लेख हलुआ नहीं हैं कि प्रेम से गटक गए और डकार भी  न लिया। मेरे लेख बेचैनी पैदा करते हैं यदि आप में धैर्य है उन्हें पढ़ने का।

आप किन लेखकों से बहुत प्रभावित रहे हैं?

बहुत से लेखक हैं जिनको पढ़कर मैंने अपनी समझ मजबूत की। सच कहूँ तो वे न होते तो मूलचन्द सोनकर का भी वजूद न होता। सबसे पहले मैं ज्योतिबा फुले की बात करूँगा। उनकी एक ही पुस्तक से मैं गुजरा जिसका नाम है गुलामगीरी । लेकिन यह पुस्तक कम पन्नों की होते हुये भी बड़े-बड़े पोथों से बहुत महान है। समझ लो कि यह ब्राह्मणवाद की अयोध्या में आग लगा देती है। उसे तहस-नहस कर डालती है। उस दौर के पूना में इतना बड़ा तर्कशास्त्री होना दुनिया के आठवें आश्चर्य से कम नहीं था जहां चितपावन ब्राह्मणों की साजिशें इस देश को खंड-खंड करने के लिए दिन रात रची जाती थीं। तब ज्योतिबा फुले और माता सावित्रीबाई का उनके गढ़ में उनके खिलाफ खड़े होना आज हमें बहुत ताकत देता है । इसके बाद बाबा साहब अंबेडकर का लेखन जिन्होंने फुले को अपना गुरु माना । बाबा साहब का लेखन दलित साहित्य का आधार स्तंभ है। सच कहूँ तो कोई भी दलित लेखक बाबा साहब को पूरा पढ़े बिना दलित साहित्यकार कहलाने का अधिकारी हो ही नहीं सकता। आज बाबा साहब की कृतियाँ खतरे में हैं। लोगों को उनकी सुरक्षा के लिए आगे आना चाहिए। भारत में पेरियार का लेखन अद्भुत तौर पर हमें दैवीय गुलामी के खिलाफ खड़ा करता है। असल में सारा आधुनिक लेखन इन्हीं तीनों महान लेखकों के कृतित्व पर टिका हुआ है। सबसे बड़ी बात है कि ये तीनों महान विभूतियाँ केवल लेखक नहीं थीं बल्कि तत्कालीन समाज और राजनीति में बहुत गहरे हस्तक्षेप कर रही थीं। तीनों आंदोलनधर्मी लेखक रहे हैं । तीनों ने कोई समझौता नहीं किया था और आज जब मैं दलित लेखन को ड्राइंगरूम लेखन में बदलते हुये देख रहा हूँ तो लगता है इन तीनों की परंपरा जहां तक पहुंची थी वहीं कहीं रुकी हुई है।

मैंने भारतीय समाज की आलोचना के लिए तमाम ऐसे लेखकों को भी शौक से पढ़ा जो कम चर्चित थे लेकिन जिनका लेखन माइलस्टोन है । काशीनाथ विश्वनाथ राजवाड़े, रजनीकान्त शास्त्री और एनके बसु जैसे लेखकों ने मुझे बहुत प्रभावित किया। दक्षिण की रंगनायकम्मा की मैंने सख़्त आलोचना की है लेकिन मुझे उन्होंने प्रभावित किया। मार्क्स के लेखों का भी, खासकर एशियाटिक मोड आॅफ प्रोडक्शन और भारत के गाँवों के बारे में लेखन का मैं मुरीद हूँ कि भारत से बहुत दूर रहकर भी कोई विचारक अपने दौर की दुनिया में घट रही घटनाओं का कैसे प्रॉपर आकलन कर सकता है। राहुल सांकृत्यायन और प्रेमचंद को मैंने बहुत शौक से पढ़ा। बेशक प्रेमचंद के दलित जीवन के चित्रण से मुझे सख़्त ऐतराज है और मौका आने पर मैंने उनकी आलोचना की है। मंटो और हरिशंकर परसाई दोनों ही मेरे बहुत प्रिय लेखक हैं। नई कहानी की त्रयी मोहन राकेश, राजेंद्र यादव और कमलेश्वर को भी काफी पढ़ा लेकिन राजेंद्र यादव की संपादकीयों के माध्यम से जो उनका वैचारिक लेखन सामने आया उसने बाकी सबको बहुत पीछे छोड़ दिया। राजेंद्र यादव इस दौर में हमारी सबसे बड़ी आवाज़ थे और उनके न रहने पर लगता है हमारी तरफदारी करनेवाला अब कोई नहीं रहा। अनेक मुस्लिमों लेखकों पर मैंने लिखा है । राही मासूम रजा, शानी, असगर वज़ाहत, अब्दुल बिस्मिल्लाह, बदीउज्जमा, नासिरा शर्मा, मंजूर एहतेशाम सभी को मैंने पढ़ा है। लेकिन अब्दुल बिस्मिल्लाह के झीनी-झीनी बीनी चदरिया को मैं अपना सबसे पसंदीदा उपन्यास कह सकता हूँ। इधर बीच रत्नकुमार सांभरिया की कहानियों का भी मैं कायल हुआ हूँ । मैं असल में नाम गिनाऊँगा तो फेहरिस्त बहुत लंबी हो जाएगी। लेकिन हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी के दर्जनों लेखकों ने मुझे अलग अलग कारणों से प्रभावित किया। जॉर्ज आरवेल के उपन्यास हैं।  ग़ालिब का तो कोई जवाब ही नहीं ।

अपने दौर के किन लेखकों को आपने पढ़ा ?

धर्मवीर, तुलसीराम, ओमप्रकाश बाल्मीकि, मोहनदास नेमिशराय, रत्नकुमार सांभारिया आदि को पढ़ते हुये मैं इनके दौर का चित्रण और ईमानदारी आँकने की कोशिश करता रहा हूँ। बहुत से लोग हैं जो वैचारिक तल्ख़ी के कारण मुझे प्रिय हैं और बहुत से लोग अपनी पठनीयता के कारण। लेकिन ढेरों लोग मुझे इसलिए नापसंद भी हैं कि न केवल उनका लेखन बहुत नकली है बल्कि अपने को स्थापित करने की उनकी जुगत दयनीय लगती है। लेकिन कुछ लोगों से मुझे बहुत उम्मीदें हैं मसलन सुभाषचंद्र कुशवाहा से, रामजी यादव से, एमपी अहिरवार से, मनीष शर्मा, वीरेंद्र यादव, चौथीराम यादव, प्रेमकुमार मणि जैसे अपने दौर के लोगों को पढ़कर लगता है कि ये लोग ब्राह्मणवाद और जाति व्यवस्था पर खुलकर प्रहार करेंगे। एक नए सौंदर्यशास्त्र का विकास करेंगे। लेकिन इन लोगों को सुविधाजीवी और सेलेक्टिव तरीके से आलोचना करते देखकर निराशा भी होती है। बड़ा एजेंडा नहीं है। इसलिए आपसी भाईचारा भी  गायब है। वैचारिक बेईमानी यहीं से शुरू होती है !

इतनी किताबें हैं आपकी। एक दर्जन से अधिक लेकिन आपको लेखकीय महत्व नहीं मिला। क्या आपको नहीं लगता कि आपकी चर्चा जानबूझकर नहीं की गई ?

किससे करूँ मैं यह शिकायत ? चर्चा नहीं हुई तो क्या हुआ। लोगों ने यही तो साबित किया कि मेरी चर्चा उनके तेज को कहीं न कहीं धूमिल करता । इसलिए मेरे लेखन की महत्ता अपने आप सिद्ध हो जाती है। और जो छपे शब्द हैं वे कहीं न कहीं तो रहेंगे ही। दूसरे यह कि मैंने जो भी किया जितना भी लिखा उसकी प्रेरणा कहीं न कहीं व्यवस्था परिवर्तन है। भले ही यह सीमित हो। लेकिन मेरा लेखन अगर दलित आंदोलन के काम नहीं आ रहा है तो इसका मतलब यह भी है कि दलित आंदोलन अपने रास्ते से भटक गया है। वह बाबा साहब की उस परंपरा का वाहक नहीं है जो अंतिम तौर पर दलित मुक्ति का निर्णायक संघर्ष करता है। अब जो भी हो लेकिन मुझे नकारना क्या किसी के लिए इतना आसान है? और जिस कार्यक्रम में मेरी जगह न हो उसकी तरफ देखना भी क्या?

आप अपने लेखन से संतुष्ट हैं?

कतई नहीं। लेकिन निराश भी नहीं हूँ।

भविष्य में आपकी क्या योजनाएँ हैं ?

यह रामजी से पूछना ज्यादा सही रहेगा कि वे मुझे कहाँ-कहाँ ले जाते हैं। दो साल से हम लोगों की बातचीत चल रही है कि हम लोग पूर्वांचल के गाँव-गाँव जाकर सांप्रदायिकता विरोधी वर्कशॉप और फुले-अंबेडकर के विचारों पर गोष्ठियाँ करेंगे ताकि ब्राह्मणवाद और फासिज़्म के खिलाफ जनजागरण अभियान चलाया जा सके। कुछ इलाकों से रामजी ने शुरुआत की भी है। पुस्तकों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचायें। इधर बीच बाबा साहब के कुछ लेखों का अनुवाद कर रहा हूँ जो पुस्तिकाओं के रूप में छपेंगी। अब ग़ज़ल की कोई किताब नहीं आएगी। छिटपुट लेखों को संकलित कर रहा हूँ। जीवन का कोई भरोसा नहीं कि कब तक चले। अभी हाल ही में मैंने राहुल सांकृत्यायन का लिखा मध्य एशिया का इतिहास मंगाया है। उसको पढ़ना है। रजनीकान्त शास्त्री की एक किताब पढ़ चुका हूँ और उस पर एक लेख लिखना है।

अपर्णा रंगकर्मी और गाँव के लोग की कार्यकारी संपादक हैं।

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