सुप्रीम कोर्ट के अबतक के सबसे दयालु और ईमानदार मुख्य न्यायाधीश के नाम (डायरी, 31 जुलाई, 2022)

नवल किशोर कुमार

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 उर्दू बड़ी प्यारी भाषा है और इसके शब्द एकदम से शानदार। हालांकि उर्दू के संबंध में मेरी समझ पहले ऐसी नहीं थी। मुझे तो खड़ी हिंदी के तद्भव शब्द ही अच्छे लगते थे। सामान्य तौर पर हिंदी पत्रकारिता में इनका उपयोग ही किया जाता है। हालांकि कुछ लोग जमकर तत्सम शब्दों का भी इस्तेमाल करते हैं। लेकिन यह पत्रकार पर निर्भर करता है और उसकी जाति और साेच पर भी। मसलन, मैं पिछड़े समुदाय से आता हूं तो मुझे तद्भव शब्द इसलिए अच्छे लगते हैं क्योंकि इससे मेरे इस लक्ष्य की प्राप्ति होती है कि मेरा लिखा जन-सामान्य भी पढ़ सकें। मैं नहीं चाहता कि मेरा लिखा केवल कोई एक खास वर्ग तक सीमित रहे।
तो मैं उर्दू की बात कर रहा था। उर्दू में एक अलग तरह की मिठास है। इसके शब्दों के उपयोग से वाक्यों को बेहतरीन बनाया जा सकता है, यह समझ तब आयी जब बिहार की पत्रकारिता से बाहर निकला। तब मेरे सामने केवल बिहार के लोग नहीं थे। पूरा देश था। फिर अचानक से हम चाहें भी तो अपनी भाषा और शैली नहीं बदल सकते। लेकिन बदलाव तो किया ही जा सकता है। मैंने अपने शब्दों अंग्रेजी और उर्दू के शब्दों का उपयोग करना शुरू किया जो कि मैं बिहार में अपवाद के रूप में ही करता था।

मुझे लगता है कि मुख्य न्यायाधीश महोदय को अपने सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों में याचिकाकर्ताओं की जातिवार सूची प्रकाशित करवानी चाहिए। इससे यह भी पता लगेगा कि कितने दलित, पिछड़े और आदिवासी सुप्रीम कोर्ट तक अबतक पहुंच सके हैं और शायद इससे सुप्रीम कोर्ट का तंत्र उनके प्रति संवेदनशील भी होगा।

आज उर्दू की बात इसलिए कि मैं एक शब्द को लेकर सोच रहा हूं। यह शब्द है– मुलाज़िम। इसका मतलब है सेवा करनेवाला या फिर सेवा के लिए हाजिर रहनेवाला। थोड़ा और विस्तार से समझने की कोशिश करें तो वह व्यक्ति जिसे कोई कार्य विशेष करने के लिए रखा गया है और उसके बदले उसे मजदूरी दी जाती है। पहले बेगार प्रथा भी थी, जिसके तहत ऊंची जातियों के लोग दलितों और पिछड़ों से काम तो करवाते थे, लेकिन मजदूरी नहीं देते थे। अंग्रेजों इस देश में एक क्रांतिकारी काम यह भी किया कि उन्होंने श्रमिकों के लिए कानून बनाए।
तो मुलाजिम शब्द के दायरे में बहुत कुछ शामिल है। मसलन, इस देश की प्रथम नागरिक द्रौपदी मुर्मू भी मुलाजिम ही हैं, क्योंकि उन्हें कार्य विशेष के लिए इस देश की विधायिका ने चुना है और इस कार्य के बदले उन्हें पगार के अलावा तमाम तरह की सुविधाएं दी जा रही हैं। ऐसे ही प्रधानमंत्री पद भी मुलाजिम के दायरे में ही आता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशगण भी मुलाजिम ही हैं। ठीक वैसे ही जैसे देश के अन्य तरह के मुलाजिम। यहां तक कि मुझ जैसे पत्रकार भी।

अब यहीं पर अंतर है हिंदी और उर्दू में। मुलाजिम को हिंदी में नौकर भी कह सकते हैं। इस तरह से राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशगण नौकर कहे जाने चाहिए। लेकिन कोई उन्हें नौकर नहीं लिखता। राष्ट्रपति के लिए महामहिम, प्रधानमंत्री के लिए माननीय और सुप्रीम कोर्ट के जजों के लिए न्यायमूर्ति जैसे अलंकार इस्तेमाल किये जाते हैं। भूल से भी इन्हें कोई नौकर नहीं लिखता। वैसे लिखा तो मुलाजिम भी नहीं जाता। लेकिन यदि लिखना चाहें तो मुलाजिम लिखना कम से कम मुझे अच्छा लगता है। देश के शीर्ष पदों पर आसीन लोगों को नौकर कहना ठीक बात नहीं।
खैर, मैं यह सोच रहा हूं कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशगण किसके मुलाजिम हैं? उनका नियोक्ता कौन है? विधायिका की इसमें कोई भूमिका नहीं होती। कार्यपालिका का हस्तक्षेप सीमित होता है। हां, न्यायपालिका का तंत्र जरूर काम करता है, जिसे कॉलेजियम सिस्टम कहा जाता है। लेकिन यह सिस्टम उनका नियोक्ता नहीं है। उनका नियोक्ता तो इस देश की जनता है और जिसके लिए उन्हें एकाउंटेबुल होना चाहिए। लेकिन ऐसा माननेवाले बहुत ही हुए हैं। अभी के मुख्य न्यायाधीश एन. वी. रमन बाजदफा इसकी कोशिश करते दिखते हैं। लेकिन उनकी यह कोशिश भी केंद्र की सत्ता के सापेक्ष ही होती है। अभी हाल ही में जब महराष्ट्र में सियासती उठापटक चल रही थी तब सुप्रीम कोर्ट ने एक दिन के अंदर ही मामले की सुनवाई कर दी और उद्धव ठाकरे के विरोधी गुट को राहत देते हुए उन्हें विधायक बरकरार रखा और नतीजा यह हुआ कि उद्धव ठाकरे की सरकार गिर गयी तथा वहां भाजपा-शिवसेना की सरकार अस्तित्व में आ गई।

मुलाजिम को हिंदी में नौकर भी कह सकते हैं। इस तरह से राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशगण नौकर कहे जाने चाहिए। लेकिन कोई उन्हें नौकर नहीं लिखता। राष्ट्रपति के लिए महामहिम, प्रधानमंत्री के लिए माननीय और सुप्रीम कोर्ट के जजों के लिए न्यायमूर्ति जैसे अलंकार इस्तेमाल किये जाते हैं। भूल से भी इन्हें कोई नौकर नहीं लिखता। वैसे लिखा तो मुलाजिम भी नहीं जाता। लेकिन यदि लिखना चाहें तो मुलाजिम लिखना कम से कम मुझे अच्छा लगता है।.

देश भर में किसी ने यह सवाल नहीं उठाया कि क्या सुप्रीम कोर्ट में यह संभव है किसी आम आदमी के लिए कि वह जिस दिन याचिका दायर करे, और अगले ही दिन उसकी याचिका पर सुनवाई हो जाय? मैं तो बिहार में रणवीर सेना के गुंडों द्वारा किये गये नरसंहारों के मामलों में दायर याचिकाओं के बारे में सोच रहा हूं, जिनके बारे में अंतिम सुनवाई अगस्त, 2012 में सुप्रीम कोर्ट में हुई। तबसे लेकर आजतक सुप्रीम कोर्ट के पास जजों की खंडपीठ नहीं है। जाने सुप्रीम कोर्ट में यह मामला कब सुनवाई के लिए लाया जाएगा और जो पीड़ित हैं, उन्हें इंसाफ मिलेगा।
लेकिन मुख्य न्यायाधीश एन. वी. रमन सच बहुत बोलते हैं। कल ही दिल्ली में उन्होंने अखिल भारतीय जिला विधिक प्राधिकरणों की बैठक में बहुत ही ईमानदारी और मासूमियत से कहा कि अभी भी बहुत थोड़े लोगों की पहुंच न्यायपालिका तक हो पाती है। जाहिर तौर पर यह एकदम सच्ची बात है। मुख्य न्यायाधीश महोदय ने इसके दो कारण बताए हैं। पहला तो जानकारी का अभाव और दूसरा संसाधनों का अभाव। ये दोनों बातें भी बिल्कुल वाजिब हैं। लेकिन कारण केवल ये दो ही नहीं हैं। कारण है पूरा का पूरा न्यायतंत्र, जिसकी शुरूआत पुलिस थाने से होती है, जहां कोई फरियादी अपनी अपनी फरियाद लेकर पहुंचता है। वहीं से शुरू हो जाता है न्याय को अन्याय में बदलने का खेल। कई बार तो हत्या और बलात्कार जैसे मामलों को थाने में ही निपटा दिया जाता है। ऐसा उन मामलों में अधिक होता है, जिनके फरियादी दलित, पिछड़े और आदिवासी होते हैं।
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मुझे लगता है कि मुख्य न्यायाधीश महोदय को अपने सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों में याचिकाकर्ताओं की जातिवार सूची प्रकाशित करवानी चाहिए। इससे यह भी पता लगेगा कि कितने दलित, पिछड़े और आदिवासी सुप्रीम कोर्ट तक अबतक  पहुंच सके हैं और शायद इससे सुप्रीम कोर्ट का तंत्र उनके प्रति संवेदनशील भी होगा।
बहरहाल, मैं भी एकदम उलटी बात कह रहा हूं। सुप्रीम कोर्ट के जजों के पास कितना सारा काम है और मैं हूं कि उन्हें याचिकाकर्ताओं की जाति का पता लगाने की सलाह दे रहा हूं। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि सुप्रीम कोर्ट का काम इस देश के तमाम नागरिकों के संविधान प्रदत्त अधिकारों की हिफाजत करना है। वैसे हिफाजत शब्द को लेकर कल रात ही मैंने यह लिखा था–
मैं हड़प्पा के सबसे ऊंचे महल पर खड़े
उस शख्स के बारे में सोच रहा हूं
जिसने कहा था 
वह सर्वशक्तिशाली है और
उसके जैसा बेबीलोन ओर मेसोपोटामिया में भी नहीं
और खुद को सर्वशक्तिशाली कहनेवाले
हर काल में होते रहे हैं
निरीहों को कुचलते रहे हैं
और हर जंग के बाद 
जमींदोज भी होते रहे हैं।
बाजदफा मैं उन राजाओं के बारे में सोचता हूं
जिनके राज में असंख्य बच्चे अनाथ हो गए
और मारे भूख के रोते-रोते 
सैनिक हो गए
और फिर शुरू हुआ कत्लेआम का नया दौर
और यह कोई एक बार की बात नहीं
बार-बार यही होता आया है
पराजितों की बहन-बेटियां
जीतनेवाले उठा ले गए
जमीन पर अपने क्रूर निशान छोड़ गए।
हर बार कोई शासक नहीं सोचता कि
वह अपनी हिफाजत कैसे करेगा
जब खंजर हाथ में लिये निगाहें उसे घूरेंगीं
और जब हर चीख उसके जहन में पहुंचेंगी
तब उसकी चीख से 
उसका झंडा नहीं झूकेगा
फिर कोई उसकी लाश पर
बनाएगा अपना तख्त।
लेकिन ऐसा कब तक चलेगा
पूरी दुनिया के बुतपरस्तों और गैर-बुतपरस्तों
क्या है कोई तरकीब कि
हो सके हिफाजत उसकी
जिसे नोंचकर बीच चौराहे पर फेंक दिया गया है
या फिर नक्सली के नाम पर जिसकी देह में
गोलियों के निशान अब भी जिंदा हैं?

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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