छोटे किसान क्यों लगातार बनते जा रहे हैं मजदूर

दीपक शर्मा

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शहरों में बैठे जिन लोगों को लगता है कि खेती करना बहुत आसान है, ऐसे लोगों को प्रेमचंद की कहानी पूस की रात जरूर पढ़नी चाहिए। किसान जाड़ा, गर्मी और बरसात की मार झेलते हुए आजीवन संघर्ष करता है, खेतों में दिन-रात पसीना बहाता है, खेत में रात भर जागकर आवारा पशुओं से फसल की रक्षा करता है तब जाकर उसे उपज की प्राप्ति होती है। छोटे किसान दिन-रात परिश्रम करने के बावजूद अपनी उपज का लागत मूल्य नहीं पा पाते और हमेशा सूदखोरों का कर्ज भरते हैं।

प्रेमचंद द्वारा 1921 में लिखी गई कहानी पूस की रात में हल्कू की जो समस्याएं हैं वे आज भी हैं। इस कहानी के 100 वर्ष बाद भी किसान भारी संख्या में कृषि छोड़कर मजदूर बनते जा रहे हैं। खाद, बीज और डीजल के दाम लगातार बढ़ने के कारण किसान अत्यधिक परेशान हैं। परिवार के भरण-पोषण के लिए अपनी आय में वह पाई-पाई जोड़ता है, फिर भी हमेशा कर्ज में डूबा रहता है। हल्कू की तरह ठंड में रात गुजारने के लिए एक कंबल तक नहीं खरीद पाता। उसके द्वार पर अनेक सोहना आते हैं और उधार का तगादा करते हैं तथा कर्ज न चुका पाने की एवज में किसानों को साहूकारों की गाली खानी पड़ती है। इस तरह की रोज-रोज की समस्या को देखते हुए हल्कू की पत्नी को एक दिन कहना ही पड़ जाता है, “तुम क्यों नहीं खेती छोड़ देते? मर-मर के काम करो, उपज हो तो बाकी दे दो, चलो छुट्टी हुई। बाकी चुकाने के लिए ही तो हमारा जनम हुआ है। पेट के लिए मजूरी करो। ऐसी खेती से बाज आये।”

हल्कू को खेत में इस तरह परेशान देखकर आज अनेक मुनियों को यही सलाह देना पड़ता है। किसानों की आत्महत्या के आंकड़े काफी बढ़ गए हैं। किसानों की आय दुगनी करने का वादा करके सत्ता में आई सरकार का उन पर कोई विशेष ध्यान नहीं है। इसके विपरीत वह ऐन-केन-प्रकारेण किसानों की जमीन हड़प कर पूँजीपतियों को दे देना चाहती है। निरस्त हुए कृषि कानून में कांट्रेक्ट पर खेती का ऐसा ही प्रावधान था। उसके लागू हो जाने के बाद किसान अपने ही खेतों में मजदूर हो जाता। एक वर्ष तक दिल्ली की सीमा पर किसानों के लगातार धरना-प्रदर्शन के बाद सरकार को झुकना पड़ा था लेकिन वादा करने के बावजूद सरकार उनके लिए अब तक न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी या कोई विशेष लाभकारी योजनाएं नहीं ला सकी।

वर्ष 2022 में हम लोग आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं। देश आजाद होने के बाद से कर्मचारियों का वेतन ढाई से तीन सौ गुना बढ़ गया है। किंतु किसानों की स्थिति में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ है। खद्दरधारी लोग हमेशा से किसानों को ठगते आए हैं। वे किसानों को हमेशा निक्कर और बनियान में ही देखना पसंद करते हैं। उन्हें किसानों के बदन पर जींस से भी आपत्ति है। सवा सेर गेहूँ कहानी में किसान साधू को गेहूं की रोटी खिलाता है किंतु खुद जौ की रोटी से काम चलाता है। ऐसे ही कुछ तथाकथित बड़े लोगों को किसान के पिज्जा खाने से भी आपत्ति है।

नील गायों के अतिरिक्त किसानों को सांड़ों से भी फसल बचाना पड़ता है। 30 से 40% किसानों की फसल आवारा मवेशी ही चर जाते हैं इसीलिए इस परिस्थिति में हल्कू को लगने लगता है कि खेती से अच्छा तो मजदूरी ही है। इसीलिए ठंड में कराहते हुए हल्कू को कहना पड़ता है, “और एक-एक भागवान ऐसे पड़े हैं जिनके पास जाड़ा जाए तो गर्मी से घबराकर भागे। मोटे-मोटे गद्दे, लिहाफ-कम्मल। मजाल है कि जाड़े का गुजर हो जाए। तकदीर की खूबी है। मजूरी हम करें, मजा दूसरे लूटें।”

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वास्तव में किसानों की मजदूरी का लाभ सेठ और पूँजीपति ही उठाते हैं, जिन्हें जाड़े, गर्मी और बरसात की मार से कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता है। किसान स्वयं की मेहनत का दसवां हिस्सा भी लाभ नहीं ले पाता। छोटे किसान हमेशा इसी सोच में रहते हैं कि खेती सही है या मजदूरी। रोज-रोज पूस की रात की ठंड झेलते-झेलते हल्कू इस कदर परेशान उठा कि वह एक दिन अचानक निर्णय ले लेता है कि मजदूरी ही करेगा। नीलगाय द्वारा खेत के चरे जाने की जानकारी होते हुए भी वह उसे हाँकने नहीं गया। “फिर खेत के चरे जाने की आहट मिली। अब अपने को धोखा ना दे सका। उसे अपनी जगह से हिलना जहर लग रहा था। कैसा दंदाया हुआ बैठा था। इस जाड़े-पाले में खेत में जाना, जानवरों के पीछे-पीछे दौड़ना असूझ जान पड़ा। वह अपनी जगह से न हिला। …जबरा अपना गला फाड़े डालता था। नीलगायें खेतों का सफाया किए डालती थीं और हल्कू गर्म राख के पास शांत बैठा था। अकर्मण्यता ने रस्सियों की भांति उसे चारों तरफ से पकड़ रखा था।”

सुबह जब मुन्नी खेत में गई तो देखा कि सारी फसल नीलगाएं चर गई थीं। उसने पूछा- “तुम्हारे यहां मड़ैया डालने से क्या हुआ? इसके उत्तर में हल्कू ने पेट में दर्द होने का बहाना कर दिया‌।

उस दिन मुन्नी के मुख पर उदासी छाई हुई थी, पर हल्कू खुश था। मुन्नी ने चिंतित होकर कहा- “मजूरी करके मालगुजारी भरनी पड़ेगी।”

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हल्कू ने प्रसन्न मुख से कहा- “रात को ठंड में यहां सोना तो न पड़ेगा।”

इस प्रकार पूस की रात कहानी छोटे किसानों के जीवन और दशा को बखूबी चित्रित करती है। इस कहानी में किसानों की ऋणग्रस्तता, मौसम की मार, कर्ज चुकाने की असमर्थता, कृषि से हताशा और ऊबन, महिलाओं का ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चलाने में योगदान जैसे विषयों को समझा जा सकता है।

 

दीपक शर्मा युवा कहानीकार हैं।

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