Wednesday, July 15, 2026
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पूर्वांचल का चेहरा - पूर्वांचल की आवाज़

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सवाल से भागता मुखिया, जवाब से कतराती सत्ता

ओस्लो की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उठे सवाल आज पूरे देश के लोकतंत्र का आईना बन गए हैं। एक अकेली विदेशी पत्रकार ने 1.45 अरब लोगों के प्रतिनिधि से पूछा — अभिव्यक्ति की आज़ादी कहाँ है? अल्पसंख्यक क्यों डरे हुए हैं? चुनाव आयोग कितना निष्पक्ष है? जवाब के बजाय खामोशी मिली। ये खामोशी 12 सालों से संसद, सड़क और मीडिया में गूँज रही है। जब 'विश्व लोकतंत्र की जननी' का दावा करने वाला देश सवाल से भागता है, तो 5,000 साल पुरानी सभ्यता भी सिर झुका लेती है। आपातकाल के 21 महीनों को कोसने वाले, बिना घोषणा के 12 साल से प्रेस का गला घोंट रहे हैं। सवाल सिर्फ एक पत्रकार का नहीं - हर उस आवाज़ का है जिसे दबाया जा रहा है। लोकतंत्र पूछ रहा है - डर किसे है?

तेईस मार्च को भगत सिंह और लोहिया को याद करने के मायने

डॉ. राम मनोहर लोहिया फ़ासीवाद, पूँजीवाद और साम्राज्यवाद-विरोधी थे लेकिन समाजवाद के समर्थक थे। डॉ लोहिया का जर्मनी की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ एक गहरा बौद्धिक और वैचारिक जुड़ाव था। इसी प्रभाव के चलते, 1934 में जर्मनी से लौटने के बाद, उन्होंने (24 वर्ष की आयु में) 'कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी' की स्थापना में सक्रिय योगदान दिया। वे इसकी कार्यकारिणी समिति के सदस्य बने और पार्टी के मुखपत्र, 'कांग्रेस सोशलिस्ट' के संपादक नियुक्त किए गए। आज उनकी 116 वीं जयंती पर उन्हें याद करते हुए पढ़िए डॉ सुरेश खैरनार का यह लेख। 

क्या भारत के पहले आदिवासी राष्ट्रपति संविधान की रक्षा करेंगे या चुप्पी साध लेंगे?

माननीय राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, आपके होम स्टेट ओडिशा में – नियमगिरी, गोपालपुर और पूरे दंडकारण्य में – आदिवासी कितने सालों से नुकसान पहुंचाने वाले डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स का विरोध कर रहे हैं। भारत की आबादी में आदिवासी सिर्फ़ 8-9% हैं, लेकिन आज़ादी के बाद से डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स की वजह से बेघर हुए लोगों में वे 75% हैं। उनके विरोध को नक्सलवाद का लेबल लगाकर कुचला जा रहा है। आपके साइन लेने और संविधान बनाने वालों द्वारा आदिवासियों को दिए गए खास अधिकारों को खत्म करने के लिए आदिवासी समुदाय की एक महिला को सबसे ऊंचे पद पर बिठाने की साज़िश है। मैं यह खुला खत खास तौर पर, श्रीमती द्रौपदी मुर्मू, इस साज़िश से सावधान करने के लिए लिख रहा हूं।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस : एपिस्टन फाइल के शिकारियों के देश में महिलाओं के सामने अभी भी कई पहाड़

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 115 साल पहले शुरू हुआ था, लेकिन दुनिया भर में पुरुष-प्रधान सोच अभी भी कायम है। ताकतवर नेताओं और उद्योगपतियों से जुड़े एपस्टीन के खुलासे हमें याद दिलाते हैं कि कितनी आसानी से महिलाओं के साथ आज भी मज़े की चीज़ जैसा बर्ताव किया जाता है। जब तक महिलाओं को मर्दों की खुशी के लिए सामान समझा जाता रहेगा, तब तक असली आज़ादी नामुमकिन रहेगी। पढ़िए डॉ सुरेश खैरनार का यह लेख।

अंध भक्त ही नहीं, अपशब्द और नफरती भाषण देने में सर्वोच्च नेता भी पीछे नहीं

देश में नफरत फैलाने वालों को राज्य का संरक्षण प्राप्त है, यहां तक ​​कि केंद्र सरकार ने हाल ही में भारत मंडपम में सनातन राष्ट्र शंखनाद की बैठक के लिए 63 लाख रुपए दिए। इस कार्यक्रम में मुसलमानों के खिलाफ भाषण दिए गए, जिनका मुख्य विषय हिंदू राष्ट्र की मांग था। मुंबई स्थित सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड सेक्युलरिज्म द्वारा प्रस्तुत एक हालिया अध्ययन में घृणास्पद भाषणों के प्रकारों और विवरणों का गहन विश्लेषण किया गया है। इस अध्ययन के अनुसार, 2024 से 2025 के बीच घृणास्पद भाषणों की संख्या में कमी आई है। रिपोर्ट में सामने आया है कि सबसे अधिक घृणास्पद भाषण महाराष्ट्र सरकार में मत्स्य एवं बंदरगाह विकास मंत्री नितेश राणे (10) ने दिए, उसके बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (6), असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पांच-पांच भाषण दिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन घृणास्पद भाषण दिए।

भोपाल गैस त्रासदी : विकास के नाम पर खोले गए कारखाने हमेशा पर्यावरण और जनसाधारण को खत्म करते हैं

भोपाल गैस त्रासदी में मौत के खौफनाक मंजर के बाद आज भी उस त्रासदी से गुजरे हुए लोग जब अपने अनुभव साझा करते हैं, तो उनके चेहरे पर वही डर और दुःख के साथ आवाज़ में वही दर्द मिलता है, जिस मंज़र से आज से 40 वर्ष पहले गुजरे थे। तब से लेकर आज तक वह कारखाना बंद है, लेकिन हर रोज ज़िंदा बचे लोग उस रात हुए हादसे को याद कर तकलीफ से भर जाते हैं। सवाल यह उठता है कि कारखाना बंद हो चुका है लेकिन त्रासदी से पीड़ित लोग आज भी न्याय की उम्मीद में कब तक भटकते रहेंगे?

भोपाल गैस कांड : मानवीयता कभी खत्म नहीं हुई, पीड़ित लोगों के संघर्ष के साथ हैं ये लोग

भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड प्लांट में 2 दिसंबर 1984 को आधी रात में मिथाइल आइसोनेट (एमआईसी) के रिसाव के कारण लगभग दस हजार लोगों की मौत हो गई थी। इस हादसे को आज 40 वर्ष हो जाने के बाद भी बचे हुए लोगों के स्वास्थ्य पर इसका असर देखा जा रहा है। हादसे के बाद भोपाल की जो स्थिति थी, उसे संभालने के लिए अनेक संस्थाओं और व्यक्तियों ने लगातार गैस पीड़ितों के लिए काम किया।

75 की दहलीज पर हमारा संविधान

भारत एक अभूतपूर्व स्थिति का सामना कर रहा है, जहां संविधान के नाम पर सत्ता में चुने गए और पद ग्रहण करने वाले लोग ऐसी नीतियों का पालन कर रहे हैं, जिससे धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और संघवाद के स्तंभों पर टिका संविधान का बुनियादी ढांचा धीरे-धीरे कमजोर हो रहा है।

संविधान दिवस : देश में संविधान की किताब तो है लेकिन लोग पढ़ नहीं रहे हैं

ऐसे समय में जबकि हिन्दू राष्ट्र के सपने को साकार करने के लिए चैम्पियन संविधान विरोधी मोदी भारत के संविधान की जगह मनु लॉ को स्थापित करने में सर्वशक्ति लगाते दिख रहे हैं। आंबेडकर के संविधान में आस्था रखने बुद्धिजीवियों/ एक्टिविस्टों के ऊपर संविधान के उद्देश्यों को सफल बनाने की विशेष जिम्मेवारी आन पड़ी है। यह जिम्मेवारी इसलिए और आन पड़ी है क्योंकि संविधान में गहरी आस्था जताने वाले खुद सामाजिक न्यायवादी दल तक मोदी सरकार की संविधान विरोधी साजिशों से आँखें मूंदे हुए हैं। बहरहाल संविधान समर्थक जागरूक लोग अगर संविधान के उद्देश्यों को सफल बनाना चाहते हैं तो उन्हें सबसे पहले संविधान के उद्देश्यों की पूर्ति लायक एजेंडा तय करना पड़ेगा।

सौ साल की यात्रा में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियां बिखर क्यों गईं

एक समय था जब कम्युनिस्ट पार्टियों का राजनीति में इतना बोलबाला था कि सत्ता में बैठी सरकार को निर्णय लेने से पहले सोचना होता था क्योंकि इनका उन दबाव होता था। इनका एक सुनहरा काल था, जब मजदूरों, किसानों  के लिए आवाज़ उठाते थे। लाल झंडा देखकर बड़े-बड़े पूँजीपतियों के पसीने छूट जाते थे। पश्चिम बंगाल  में 35 वर्ष  शासन किये।अब केवल केरल में इनकी सत्ता बची हुई है। पार्टी के अंदर भी खालीपन आ चुका है, इनकी अनेक गलतियों के कारण भी अगली लाइन अच्छी तरह से तैयार नहीं हो पाई। स्थिति सुधरने में बरसों लगेंगे, वह तब जब इसके लिए ज़मीनी स्तर पर लगातार ठोस काम करें। 

मणिपुर : लगातार उलझती जा रही समस्या का कब निकलेगा समाधान

मैतई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने के विरोध में पिछले डेढ़ वर्षों से लगातार आदिवासी समूहों में संघर्ष चल रहा है, जिसमें सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी आज तक मणिपुर नहीं गए, न ही समस्या के हल के लिए कभी कोई चर्चा ही की। इस प्रदेश में नागा एवं कुकी मैतेई द्वारा अनुसूचित जनजाति के दर्जे की मांग के खिलाफ हैं। मैतेई एवं नागा कुकी के अलग प्रशासन की मांग के खिलाफ हैं। मैतेई वृहत्तर नागालिम की मांग के खिलाफ हैं। सवाल उठता है कि कैसे और कब इस समस्या का कोई हल निकलेगा। 
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