भूटान में प्रकृति और जीवन मन को मोह लेते है

सुभाष चंद्र कुशवाहा

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चीन के तिब्बत और भारत के पूर्वोत्तर राज्यों से सटा भूटान, मूलतः भोटांत अर्थात भोट (तिब्बत) का अन्त, यानी अंतिम छोर है। यहां के निवासी भूटान को ड्रुक-युल (ड्रैगन का देश) तथा इसके निवासियों को ड्रुपका कहते हैं। भूटान कभी भी किसी के अधीन नहीं रहा। अंग्रेजों ने भी इसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया। इस का प्राचीन इतिहास मिथकों के रूप में दर्ज है। अनुमानतः भूटान में 2000 ईसापूर्व बस्तियाँ बसनीं शुरू हुईं। दन्थकथाओं के अनुसार इस पर 7वीं शती ईसापूर्व में कूच बिहार के राजा का अधिकार था। किन्तु 9वीं शताब्दीं में यहाँ बौद्ध धर्म आने के पूर्व का इतिहास अधिकांशतः अज्ञात ही है। इस काल में तिब्बत में अशान्ति होने के कारण बहुत से बौद्ध भिक्षु यहाँ आ गये। 12वीं शताब्दी में स्थापित ड्रुक्पा कग्युपा सम्प्रदाय आज भी यहाँ का प्रमुख सम्प्रदाय है। इस देश का राजनीतिक इतिहास इसके धार्मिक इतिहास से निकट सम्बन्ध रखता है। एक स्वतंत्र राज्य के रूप में पूर्व में इसको विभिन्न नामों से पुकारा जाता रहा है।

भूटान एक बेहद खूबसूरत, शांत, सुरक्षित, प्रकृति में रचा-बसा दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र है। उत्तर में हिमालय और चीन के पहाड़ बर्फ से सदा ढ़के रहते हैं। पर्वतों की चोटियाँ कहीं-कहीं 7000 मीटर से भी ऊँची हैं। सबसे ऊँची चोटी कुला कांगरी 7553 मीटर है। गांगखर पुएनसुम की ऊँचाई 6896 मीटर है, जिस पर अभी तक मानव के कदम नहीं पहुँचे हैं। दक्षिणी भाग में ब्रह्मपुत्र नदी की थोड़ी-सी समतल भूमि है।

सरकारी दफ्तरों में काम आसानी से हो जाता है। पनबिजली उत्पादन भरपूर है और भारत को निर्यात किया जाता है फिर भी पानी और बिजली का दुररुपयोग नहीं दिखता। शिक्षा पर जोर है। भूटान में परम्परागत पहनावे के प्रति बेहद लगाव है। सरकारी दफ्तरों में सूचना लगी है कि कृपया परम्परागत ड्रेस में आयें लेकिन कोई रोक-टोक नहीं। आपसे केवल अनुरोध किया गया है।

भूटान की संस्कृति, कला, धर्म, सब कुछ तिब्बत से संपृक्त है। इसकी भौगोलिक सीमाएं भारत से ज्यादा सटी हैं इसलिए यह आर्थिक रूप से भारत पर ज्यादा निर्भर है। कोलकाता से मात्र छह घंटे की यात्रा के बाद सड़क मार्ग से थिम्पू पहुंचा जा सकता है। दिल्ली, कोलकाता और बैंकाक से सप्ताह में दो दिन वायुयान की उड़ानें हैं । पारो यहां का एकमात्र अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है जो पहाडों के बीच पारो घाटी में बनाया गया है। ड्रुकएअर और भूटान एअरलाइन्स के कुशल पायलट ही दुर्गम पहाड़ी हवाई अड्डे पर विमानों को उड़ाते-उतारते हैं। पारो से थिम्पू की आनन्दायक यात्रा एक घंटे में सड़क मार्ग से तय की जा सकती है। सड़क के साथ-साथ बहती नदी, ऊंचे पहाड़, शांत घाटी और प्रकृति के मनभावन दृश्य रोमांचकारी लगते हैं। थिम्पू से पुनाखा का रास्ता बेहतर नहीं है और निर्माण कार्य जारी है । भूटान के कुल बीस जिलों में से कुछ की ही यात्रा संभव है । सत्तर प्रतिशत भू-भाग वनों से आच्छादित है।

भूटान की लगभग सत्तर प्रतिशत आबादी मूलनिवासियों की है जिन्हें गांलोप कहा जाता है और इनका निकट संबंध तिब्बत की कुछ प्रजातियों से है। शेष आबादी हिंदू धर्मी भूटानी नेपालियों की है, जिनका सम्बन्ध नेपाल से है। नेपाली मूल के लोगों को ल्होत्साम्पा भी कहा जाता है। यहाँ की आधिकारिक भाषा जोंगखा है । इसके साथ ही यहाँ कई अन्य भाषाएँ बोली जाती हैं, जिनमें कुछ तो विलुप्त होने के कगार पर हैं।

सुभाषजी और आशाजी भूटान यात्रा पर

 

भूटान में आधिकारिक धर्म, बौद्ध धर्म की महायान शाखा है जिसका अनुपालन देश की लगभग तीन चौथाई जनता करती है। हिन्दू भूटानी नेपाली भी बौद्ध मतावलम्बियों का अनुकरण करते हैं क्योंकि यहां कोई मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे या चर्च की स्थापना नहीं की गई है । भूटान की आबादी मात्र सात लाख है। सबसे बड़ा शहर थिम्पू है, जो देश की राजधानी भी है । इसकी आबादी लगभग 50 हजार  है । यहां दूसरे देशों के निवासियों को अचल सम्पत्ति खरीदने का अधिकार नहीं है। इसके लिए पहले भूटानी लड़की या लड़के से शादी कर घर बसाना अनिवार्य है। इसलिए नेपाल की तरह भूटान में भारतीय व्यापारियों द्वारा संचालित होटल या व्यवसाय नहीं दिखाई देते। घर, होटल, दफ्तर, सड़क, पुल, सभी पर बौद्ध धर्म की छाप झलकती है। आबादी कम होने के नाते ज्यादातर भूटानियों को नौकरी या रोजगार मिल जाता है। जातिवाद का नामोनिशान नहीं है। जब बंगाल में गोरखालैंड की मांग ने जोर पकड़ा था तब भूटान के नेपाली समुदाय को भी लगा था कि उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जा रहा है, उन पर भूटानी संस्कृति लादी जा रही है । इसी के चलते कुछ उग्रवादी घटनाएं प्रकाश में आईं। व्यवस्था विरोध के कारण नेपाली भूटानियों को नेपाल तथा भारत के विभिन्न हिस्सों में शरणार्थी बनने को विवश होना पड़ा। मगर अब शान्ति दिख रही है।

दूसरे पहाड़ी देशों की तरह भूटान भी स्त्री प्रधान देश है। यहां स्त्रियां बाहर के काम संभालती हैं। लड़के-लड़कियों को पूरी स्वतंत्रता है। होटलों और घरों में काम करती लड़कियों ने, भूटानी पुरुषों की तुलना में अर्थव्यवस्था की बागडोर अपने हाथों में ले रखा है । पुरुष अपेक्षाकृत्य कम परिश्रमी और शान्त दिखते हैं । शादी लड़की-लड़के की पसंद पर निर्भर करती है। अलग होते समय भी विवाद की गुंजाइश कम रहती है। लड़कियों से छेड़खानी की घटनाएं नहीं होतीं। धूम्रपान पर पूरी तरह पाबन्दी है। शराब की बहुत कम दुकानें दिखती हैं। अपने घर और होटलों में पीने की आजादी है।

भूटान भ्रमण के दौरान बड़ी सहजता का आभास होता है । थिम्पू और पारो के संग्रहालयों को छोड़, पूरे राज्य में कहीं कोई शुल्क नहीं लगता। प्रकृति की गोद में विचरण करने के अलावा देखने को द नेशनल मेमोरियल चोरटेन, शाक्यमुनि बुद्धा, चांग्खा लाखांग (Changangkha Lhakhang), टॉकिन जू, नेशनल लाइब्रेरी, जोरिग चुसुम (Zorig Chusum), द रॉयल टेक्सटाइल म्यूजियम, तासी छो जोंग (Trashi Chhoe Dzong), दाचू ला पास (Dochu La Pass), पुनाखा जोंग, (Punakha Dzong) जहां से भूटान नरेश के परिवार ने स्थानान्तरित होकर, थिम्पू को अपनी नई राजधानी बनाया, सिमटोखा जोंग (Simtokha Dzong), नेशनल म्यूजियम ऑफ भूटान, डु्रकग्याल जोंग (Drukgyal Dzong), ता जोंग(Ta Dzong), रिंपुंग जोंग (Rinpung Dzong), क्यिचू लाखांग (Kyichu Lhakhang), चेला-ला पास, टाइगर नेस्ट या ताकसांग मोनेस्ट्री (Taktsang Monastery) हैं । जोंग और बौद्ध मठों की स्थापत्य कला समान है । पारो में स्थित क्यिचू लाखांग सबसे पुराना बौद्ध मंदिर है जिसे सातवीं सदी में तिब्बती राजा सोंगस्टेन गैम्पो (Songsten Gampo) ने बनवाया था । इससे यह भी सिद्ध होता है कि भूटान वास्तव में तिब्बत का ही भाग रहा है । यहां के बौद्ध मठों की भव्यता देखते ही बनती है ।

थिम्पू साफ-सुथरा शहर है। यहां के फुटपाथों पर कोई ठेले-खोमचे की दुकानें नहीं लगतीं। सभी दुकानें घरों के अन्दर सजी हुई हैं। सड़क पर खुले में कोई खाद्य पदार्थ या सामानों की बिक्री नहीं होती। सब्जी और फलों की दुकानें एक जगह और मुख्य बाजार से हटकर लगी होती हैं। सरकारी दफ्तरों में काम आसानी से हो जाता है। पनबिजली उत्पादन भरपूर है और भारत को निर्यात किया जाता है फिर भी पानी और बिजली का दुररुपयोग नहीं दिखता। शिक्षा पर जोर है। भूटान में परम्परागत पहनावे के प्रति बेहद लगाव है। सरकारी दफ्तरों में सूचना लगी है कि कृपया परम्परागत ड्रेस में आयें लेकिन कोई रोक-टोक नहीं। आपसे केवल अनुरोध किया गया है।

सत्रहवीं सदी के अंत में भूटान ने बौद्ध धर्म को अंगीकार किया था। 1865 मे ब्रिटेन और भूटान के बीच सिनचुलु संधि पर हस्ताक्षर हुआ, जिसके तहत भूटान के कुछ सीमावर्ती भूभाग के बदले वार्षिक अनुदान के करार किए गए। ब्रिटिश प्रभाव के तहत 1907 में वहाँ राजशाही की स्थापना हुई। तीन साल बाद एक और समझौता हुआ, जिसके तहत ब्रिटिश इस बात पर राजी हुए कि वे भूटान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे लेकिन भूटान की विदेश नीति इंग्लैंड द्वारा तय की जाएगी। बाद में 1947 के पश्चात यही भूमिका भारत को मिली। दो साल बाद 1949 में भारत-भूटान समझौते के तहत भारत ने भूटान की वो सारी जमीन लौटा दी, जो अंग्रेजों के अधीन थी।

थिम्पू जैसे बड़े शहर में भी शोर नाममात्र को है। कोई ऊँची आवाज में नहीं बोलता। राजधानी की सड़कों पर चिल्लो-पों नहीं। बिना हार्न बजाये, एक के पीछे एक रेंगती गाड़ियां, गति सीमा का पूरी तरह पालन करती हैं। पार्किंग के लिए निर्धारित स्थान पर ही गाड़ियां पार्क की जाती हैं। कोलकाता या दूसरे भारतीय शहरों की तरह विपरीत लेन में चलने की कुप्रथा नहीं है। सड़क के बीच में यू टर्न लेना मना है। सड़कों पर कहीं भी जाम की स्थिति नहीं रहती। एकमात्र मुख्य चौराहे को छोड़ कहीं ट्रेफिक पुलिस नहीं दिखाई देती फिर भी यातायात नियंत्रित रहता है। थिम्पू में लोग खुशहाल नजर आते हैं। दुनिया की एक से एक महँगी गाड़ियां आसान किश्तों पर मिल जाती हैं। आधी रकम चुकाने पर बैंक अनुदान मिल जाता है। जापान और भारत से भरपूर विदेशी सहायता मिलती है। गाड़ियों के नम्बर प्लेट मुख्यतः लाल और सुनहरे पीले रंग के होते हैं। निजी गाड़ियां लाल रंग के प्लेट की होती हैं और बी.पी ( भूटान प्राइवेट) श्रेणी में उनके नम्बर लिखे होते हैं। टैक्सी गाड़ियों के नम्बर प्लेट भारत की तरह सुनहरे पीले रंग की होती है और बी.टी (भूटान टैक्सी) श्रेणी में लिखे होते हैं। अपने यहाँ की तरह ऑटो, रिक्शा नहीं दिखते। मुझे बाइक भी दो-चार ही दिखीं जो  पश्चिम बंगाल के टूरिस्टों की थीं।

यहां की मुद्रा नोंग्त्रुम (छहनसजतनउ) है, जिसका मूल्य भारतीय रुपये के बराबर है। यहां हर कहीं भारतीय रुपया स्वीकार किया जाता है। पहले यहां एक हजार और पांच सौ के भारतीय नोट स्वीकार नहीं किए जाते थे मगर अब ऐसा नहीं है। नोंग्त्रुम पर राजाओं, जोंग, सचिवालय, विधान सभा के चित्र हैं।

रिंगपोंग डांग ,भूटान

दूसरे पहाड़ी देशों की तरह भूटान भी स्त्री प्रधान देश है। यहां स्त्रियां बाहर के काम संभालती हैं। लड़के-लड़कियों को पूरी स्वतंत्रता है। होटलों और घरों में काम करती लड़कियों ने, भूटानी पुरुषों की तुलना में अर्थव्यवस्था की बागडोर अपने हाथों में ले रखा है । पुरुष अपेक्षाकृत्य कम परिश्रमी और शान्त दिखते हैं । शादी लड़की-लड़के की पसंद पर निर्भर करती है। अलग होते समय भी विवाद की गुंजाइश कम रहती है। लड़कियों से छेड़खानी की घटनाएं नहीं होतीं। धूम्रपान पर पूरी तरह पाबन्दी है।  शराब की बहुत कम दुकानें दिखती हैं। अपने घर और होटलों में पीने की आजादी है।

भूटानी लोगों का अपनी लोक कलाओं से बेहद लगाव है । लोकनृत्यों के आयोजन की सरकारी तिथियाँ पहले से घोषित रहती हैं। जगह-जगह मुखौटों की बिक्री होती है। लोकनृत्यों में मुखौटों का बड़ा महत्व है। नृत्यों के प्रकार को मुखौटों से समझा जा सकता है। पर्यटकों के प्रति सम्मान है। हवाई हड्डे पर पर्यटन सुविधाओं को बेहतर बनाने संबंधी राय ली जाती है। टैक्सी या होटल वाले छल-कपट नहीं करते। कोई आप से टिप  के लिए इंतजार नहीं करता। आप देंगे तो वे दोनों हथेलियों से स्वीकार करेंगे । कोई भी सामान दोनों हथेलियों से देने की परंपरा है।

हिन्दू पुरोहितों की तरह यहां कोई आखेट करने वाला नहीं है लेकिन भक्तों का जमीन पर लेट-लेट कर बुद्ध प्रतिमाओं के सामने प्रणाम करना, बुद्ध द्वारा स्थापित नास्तिक धर्म की मूल भावना के विपरीत है। पहाड़ों पर गड़े कपड़ों के झंडे, जिन पर लामाओं ने मन्त्र लिखकर फहरा रखा है, उन्हें अन्धविश्वास की ही श्रेणी में रखा जा सकता है और पर्यावरण के लिए अनुकूल भी नहीं कहा जा सकता। हिन्दू धर्म की लक्ष्मी, दुर्गा और काली, थोड़ी बहुत भिन्न रूप में ही सही, बौद्ध धर्म में समाहित करा दी गयी हैं। हाथों में विशेष प्रकार के बने घिर्री से मन्त्र डुलाते अनुयायी, बौद्ध धर्म की सरलता को छोड़ तमाम पाखंडों की गिरफ्त में हैं। माला फेरना या घिर्री नचाना, कबीर के कथन-‘माला फेरत जग मुआ’ से किस रूप में भिन्न है?

भूटान ने अपने जल-जमीन, जंगल को बचा कर रखा है। मकानों में पहले लकड़ी का प्रयोग बहुतायत मात्रा में होता था। अब सीमेंट और ईंटों का प्रयोग शुरू हो गया है मगर छतें और चौड़ी खिड़कियां लकड़ी की ही बनाई जाती हैं। सभी घर एक ही डिजाइन और चौकोर आकार में बने हैं। रंगीन दीवालें, जातक बौद्ध कथाओं से सजीं लकड़ी की छतें, खिड़कियाँ और दीवारों पर सुन्दर चित्रकारी मन को भाती हैं । हर कहीं ड्रैगन (अजगरनुमा काल्पनिक जीव, जिसे ड्रुक कहा जाता है) की चित्रकारी देखने को मिल जाती है। छतें शंकुनुमा हैं । छतों और दिवारों के बीच शहतीरें, हवा और रोशनी के लिए जगह छोड़ती हैं। लिंग से जीवन उत्पत्ति पर तमाम मिथकों की रचनाएँ की गई हैं । दीवारों पर कहीं, कहीं लिंग की चित्रकारी की गई है जिनमें से फुहार के रूप में  वीर्य का निकलना दर्शाया गया है । बाजारों में लकड़ी के लिंगों की बिक्री होती है । चाभी के छल्ले भी लिंगनुमा लकड़ी में बने बिकते हैं । जंगलों की कटाई हुई है मगर नए पेड़ लगा दिए गए हैं। पुनाखा और चेला-ला पास के रास्ते में घने जंगलों को देख मन मुग्ध हो जाता है । कहीं-कहीं याक समूह में चरते दिख जायेंगे । गुलाब के बड़े आकर के पौधे और फूल मन को मोह लेते हैं ।

भूटान के जंगलों में घास चरते याक

भोजन में विविधता नहीं है। किवा दात्शी (आलू और चीज ), ईवा दात्शी ( मिर्ची और चीज) और साग दात्शी खाने की मुख्य सब्जियां हैं। याक के दूध का बना सूखा पनीर भी बिकता दिखता है । लाल चावल, अपने यहाँ के उसिना भात की याद दिलाता है। होटलों में भारतीय भोजन भी मिल जाता है। ज्यादातर सामानों की आपूर्ति भारत से ही होती है। इंडियन ऑयल और पंजाब नेशनल बैंक ऑफ भूटान की शाखाएं दिख जायेंगी । सरकारी भवनों और मठों में भी टोपी पहनकर जाने की इजाजत नहीं है।

प्लास्टिक पर प्रतिबन्ध है और पानी की बोतलों को इकट्ठा करने के लिए कुछ मुख्य स्थानों पर जालीनुमा बक्से रखे गये हैं। नदियां साफ सुथरी हैं। स्थानीय भाषा के आलावा इंग्लिश मुख्य रूप से बोली जाती है मगर कामचलाऊ हिंदी बोलने और समझने वाले कम नहीं हैं। लोग सरल और सहयोगी हैं। सुबह-सुबह स्कूल जाते बच्चे हाथों में मूंज जैसी घास की बनी टोकरियों में दोपहर का खाना और पानी लेकर निकलते हैं जो अपने यहाँ के टिफिन और बोतल संस्कृति से एकदम भिन्न हैं। पारो यहां का दूसरा महत्वपूर्ण शहर है जहाँ हवाई अड्डा है। पारो में टाइगर नेस्ट की कठिन ट्रेकिंग आप को थका देगी । तीन घंटे में पहाड़ पर चढ़ने के बाद आता है टाइगर नेस्ट। उतरते समय मात्र 2 घंटे में नीचे । उसके बाद तीन दिन तक पैरों में दर्द। मगर यहां रहने वाले लामा तो 1.3 घंटे में रोज चढ़ जाते हैं और 1 घंटे में उतर आते हैं । यहाँ के म्यूजियम में लोकनृत्यों की रिकार्डिंग चलती रहती है। बाजार छोटा और शांत है। हाँ, यहाँ बिकने वाले पत्थर के गहने काफी महंगे हैं। इनमें से कुछ गहने कम दाम में टाइगर नेस्ट के नीचे लगने वाली स्थानीय दुकानों में मिल जायेंगे। प्रकृति ने इस जमीन की संस्कृति को अपने अनुकूल पाया है और अपने दिल में बसाया है। हर दुकान में राजा-रानी के चित्र लगे हैं। वातावरण इतना शांत है कि बीच में बहती नदी का शोर ही सुबह सुनाई देगा । यहाँ के कुत्ते, दिन में बेहद शांत दिखते हैं मगर रात में अपनी मुस्तैदी दिखाते हैं। बिल्लियाँ भी आप से चिपकी रहेंगी। गौरैया आराम से मचलती रहती हैं। नदी, झरने गीत गाते रहते हैं। घूमते समय स्थानीय गाइड हो तो वहां की संस्कृति और चित्रकारी  को समझना आसान हो जाता है। सत्रहवीं सदी के अंत में भूटान ने बौद्ध धर्म को अंगीकार किया था। 1865 मे ब्रिटेन और भूटान के बीच सिनचुलु संधि पर हस्ताक्षर हुआ, जिसके तहत भूटान के कुछ सीमावर्ती भूभाग के बदले वार्षिक अनुदान के करार किए गए। ब्रिटिश प्रभाव के तहत 1907 में वहाँ राजशाही की स्थापना हुई। तीन साल बाद एक और समझौता हुआ, जिसके तहत ब्रिटिश इस बात पर राजी हुए कि वे भूटान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे लेकिन भूटान की विदेश नीति इंग्लैंड द्वारा तय की जाएगी। बाद में 1947 के पश्चात यही भूमिका भारत को मिली। दो साल बाद 1949 में भारत-भूटान समझौते के तहत भारत ने भूटान की वो सारी जमीन लौटा दी, जो अंग्रेजों के अधीन थी। इस समझौते के तहत भारत को भूटान की विदेश नीति एवं रक्षा नीति में महत्वपूर्ण भूमिका दी गई।

दाचुला पास

भूटान का राजप्रमुख, राजा अर्थात ड्रुक ग्यालपो होता है, जो वर्तमान में जिग्मे खेसर नामग्याल वांग्चुक हैं। हालांकि यह पद वंशानुगत है लेकिन भूटान की संसद शोगडू के दो तिहाई बहुमत द्वारा हटाया जा सकता है। शोगडू में 154 सीटे होती हैं, जिनमें स्थानीय रूप से चुने गए प्रतिनिधि (105), धार्मिक प्रतिनिधि (12) और राजा द्वारा नामांकित प्रतिनिधि (37) हैं और इन सभी का कार्यकाल तीन वर्ष का होता है। राजा की कार्यकारी शक्तियाँ शोगडू के माध्यम से चुने गए मंत्रिपरिषद में निहित होती हैं। मंत्रिपरिषद के सदस्यों का चुनाव राजा करता है और इनका कार्यकाल पाँच वर्ष का होता है। सरकार की नीतियों का निर्धारण इस बात को ध्यान में रखकर किया जाता है कि इससे पारंपरिक संस्कृति और मूल्यों का संरक्षण हो सके। भूटान दुनिया के उन कुछ देशों में है, जो खुद को शेष संसार से अलग-थलग रखता चला आ रहा है और आज भी काफी हद तक यहाँ विदेशियों का प्रवेश नियंत्रित है।

भूटान का राष्ट्रीय पशु ताकिन

भूटान का आर्थिक ढाँचा मुख्य रूप से कृषि, वन क्षेत्रों और पनबिजली उत्पादन पर निर्भर है। ऐसा माना जाता है कि इन तीन चीजों से भूटान की सरकारी आय का 75 प्रतिशत प्राप्त होता है। शेष हिस्सा पर्यटन से आता है। भूटान का मुख्य आर्थिक सहयोगी भारत है क्योंकि तिब्बत से लगने वाली भूटान सीमा बंद है। औद्योगिक उत्पादन लगभग नगण्य है और जो कुछ भी है, वह कुटीर उद्योग की श्रेणी में आता है। ज्यादातर विकास परियोजनाएँ जैसे सड़कों का विकास इत्यादि भारतीय सहयोग से ही होता है। देश की ज्यादातर आबादी छोटे गाँव में रहती है और कृषि पर निर्भर है। पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्र होने के नाते, खेती किसानी घाटियों में ही संभव है । भूटान के दक्षिणी हिस्से में ही कुछ सपाट क्षेत्र मिलता है।  पुनाखा घाटी और पारो घाटी में सीढ़ीनुमा खेत दिखेंगे । पारो घाटी के खेतों में मई माह में आलू की फसल तैयार होने को है, धान की रोपाई चल रही है । हाथ से चलाये जाने वाले छोटे ट्रेक्टर हर कहीं दिख जाते हैं । मसूर की दाल की उपलब्धता है। गेहूं , चना, मटर की पैदावार होती है। शहरों से दूर, सड़क किनारे कहीं-कहीं स्थानीय साग बेचती महिलाएं दिखा जायेंगी । पूरी पुनाखा घाटी में नागफनी के फूल मन को भाते हैं। पशुपालन बहुत सीमित है । यहाँ याक, पहाड़ी गायें और बकरियों के अलावा लेपर्ड दिख जायेंगे. जहाँ-तहां सेब के बाग लगे हैं मगर मुझे बहुत विकसित दशा में फलों की खेती नहीं दिखी ।

भूटान भ्रमण के बाद सहजता से कहा जा सकता है कि बौद्ध मठों की भव्यता, सोने के पानी की पेंटिंग, सजावट, तामझाम, सादगी से दूर हो चली है। बेशक हिन्दू पुरोहितों की तरह यहां कोई आखेट करने वाला नहीं है लेकिन भक्तों का जमीन पर लेट-लेट कर बुद्ध प्रतिमाओं के सामने प्रणाम करना, बुद्ध द्वारा स्थापित नास्तिक धर्म की मूल भावना के विपरीत है। पहाड़ों पर गड़े कपड़ों के झंडे, जिन पर लामाओं ने मन्त्र लिखकर फहरा रखा है, उन्हें अन्धविश्वास की ही श्रेणी में रखा जा सकता है और पर्यावरण के लिए अनुकूल भी नहीं कहा जा सकता। हिन्दू धर्म की लक्ष्मी, दुर्गा और काली, थोड़ी बहुत भिन्न रूप में ही सही, बौद्ध धर्म में समाहित करा दी गयी हैं। हाथों में विशेष प्रकार के बने घिर्री से मन्त्र डुलाते अनुयायी, बौद्ध धर्म की सरलता को छोड़ तमाम पाखंडों की गिरफ्त में हैं। माला फेरना या घिर्री नचाना, कबीर के कथन-‘माला फेरत जग मुआ से किस रूप में भिन्न है? तमाम मठों के बावजूद, थिम्पू की एक पहाड़ी को समतल कर दुनिया की सबसे ऊँची और बड़ी मूर्ति (179 फीट) लगाना, पर्यावरण के साथ खिलवाड़ नहीं तो क्या है? कुल मिलाकर धर्म पर अतिशय आशक्ति कई बुराइयों को जन्म देती है। भूटानी नेपालियों के मन में शायद इसके कारण ही भेदभाव की भावना जन्मी है।  गाड़ियों की बढ़ती संख्या भी पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही है। भारतीय मजदूरों पर अति निर्भरता भी भूटान की संस्कृति के अनुकूल नहीं कहा जा सकता। मठों की पढाई को सीमित करने और समाज को वैज्ञानिक क्षेत्रों में ज्यादा से ज्यादा ले जाना ही बेहतर उपाय होगा।

लोगों की शारीरिक संरचना, कद-काठी चीन के करीब ले जाती है। वैसो तो सिक्किम, नागालैंड जैसे हमारे उत्तर-पूरब के निवासियों का आकर प्रकार, रंग-रूप मंगोलियन नस्ल का लगता है और इस दृष्टि से भी वे भारत की तुलना में चीन के ज्यादा करीब जान पड़ते हैं। शहरीकरण धीरे-धीरे अपने पाँव जमा रहा है। तीरंदाजी यहाँ का राष्ट्रीय खेल है। भूटान की ज्यादातर आवश्यकताएं आयातित हैं। परंपरागत पहनावे के बावजूद अब भूटानी नेपाली टी शर्ट-जींस में भी दिखने लगे हैं। दुकानों में पाश्चात्य कपड़े पहुँच चुके हैं। स्थानीय फिल्मों और गानों के अलावा मुम्बइया फिल्मों और गानों को भी देखा-सुना जाता है। कुलमिलाकर भूटान में परम्परागत और आधुनिकता की कशमकश शुरू हो चुकी है।

सुभाष चन्द्र कुशवाहा जाने-माने कथाकार और इतिहासकार हैं।

 

1 Comment
  1. Yogesh Nath Yadav says

    भूटान के सामाजिक आर्थिक राजनीतिक सहित तमाम पहलुओं पर बेहतरीन प्रकाश।

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