‘आत्मा’ के भंवरजाल से बाहर निकले देश  डायरी (1 अगस्त, 2021)

नवल किशोर कुमार

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शब्द बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। बाजदफा तो कोई एक शब्द ऐसा होता है जिसका असर आदमी के पूरे जीवन पर रहता है। असर कहने का मतलब यह कि सकारात्मक भी और नकारात्मक भी। जाहिर तौर पर यह बहुत महत्वपूर्ण है कि जब हम कभी कोई शब्द का उपयोग करें तो सावधान रहें कि हमारे शब्द का नकारात्मक असर ना हो। वजह यह कि एक बार जब नुकसान हो जाता है तब उसकी भरपाई में वर्षों का समय लग जाता है।

दरअसल, कल मेरी बेटी साक्षी ने सवाल किया। उसका कहना था कि आखिर ऐसा क्यों है कि भारत ओलंपिक में फिसड्डी है? उसने मुझे जानकारी दी कि सबसे ऊपर चीन है जिसने 21 स्वर्ण जीते हैं। दूसरे स्थान पर 17 स्वर्ण पदकों के साथ जापान और तीसरे स्थान पर अमेरिका 16 स्वर्ण पदकों के साथ काबिज है। हालांकि वह इस बात से खुश थी कि तालिका में प्रथम दो स्थानों पर एशियाई देश हैं।

जब हमारे देश में इतने सारे भगवान हैं, जिनकी हम पूजा करते हैं, फिर हमारे देश का हाल ऐसा क्यों है। हमारे यहां हनुमान हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि एक छलांग में उन्होंने समंदर को पार कर लिया था। वह इतने बलशाली थे कि पूरे पर्वत को उठा लिया था। तो जो हनुमान को मानता है उसके लिए ऊंची छलांग की प्रतिस्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतना ही चाहिए था। भारोत्तोलन में भारत की दावेदारी सबसे अधिक है क्योंकि यह देश हनुमान को पूजता है जो पहाड़ उठा लेते हैं। कृष्ण को मानने वालों को भी भारोत्तोलन में सबसे आगे रहना चाहिए क्योंकि कृष्ण ने एक पहाड़ को अपनी कानी (सबसे छोटी) उंगली पर उठा लिया था।

साक्षी का सवाल बेहद सामान्य सवाल है और मैं यह मानता हूं कि हर भारतीय के मन में उठती रही है। यह सवाल मेरे मन में भी आया था लेकिन साक्षी के जैसे नहीं। साक्षी तो अभी बहुत छोटी है। मेरे मन में इस सवाल को आने में बहुत समय लगा था। तब मैं सेकेंड इयर का स्टूडेंट था। लेकिन तब कोई बताने वाला नहीं था। आखिर किससे पूछता मैं।

मेरी बेटी ने सवाल पूछने के क्रम में कुछ और टिप्पणियां की। उन्हें भी दर्ज कर रहा हूं और इसका उद्देश्य यह दर्ज करना है कि आजकल के बच्चों में तार्किकता का विकास कैसे हुआ है। उसने मुझे कहा कि जब हमारे देश में इतने सारे भगवान हैं, जिनकी हम पूजा करते हैं, फिर हमारे देश का हाल ऐसा क्यों है। हमारे यहां हनुमान हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि एक छलांग में उन्होंने समंदर को पार कर लिया था। वह इतने बलशाली थे कि पूरे पर्वत को उठा लिया था। तो जो हनुमान को मानता है उसके लिए ऊंची छलांग की प्रतिस्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतना ही चाहिए था। भारोत्तोलन में भारत की दावेदारी सबसे अधिक है क्योंकि यह देश हनुमान को पूजता है जो पहाड़ उठा लेते हैं। कृष्ण को मानने वालों को भी भारोत्तोलन में सबसे आगे रहना चाहिए क्योंकि कृष्ण ने एक पहाड़ को अपनी कानी (सबसे छोटी) उंगली पर उठा लिया था।

जाहिर तौर पर मैं बहुत खुश था। वजह यह कि मेरी बेटी बहुत तार्किक तरीके से बोल रही थी और मैं शब्दों को लेकर बहुत सजग था। मुझे उसके सवालों का जवाब देना था। मेरी जेहन में मेरे बचपन की एक घटना का स्मरण हो आया। उस वक्त शायद में छह या सात साल का रहा होऊंगा। घर में छठ पूजा हो रहा था। मम्मी और पापा दोनों ने निर्जला उपवास रखा था। यह शायद  इसलिए भी था कि मेरी पांचवीं दीदी की शादी हो गयी थी। मम्मी और पापा उस साल छठ जरूर करते थे जब मेरे घर में शादी होती थी। शायद वे ऐसा ईश्वर के प्रति आभार प्रकट करने के लिए करते थे।

भारत की असफलता के पीछे भारत का दर्शनशास्त्र है जो कि आत्मा पर केंद्रित है। इसका त्याग करना होगा। तभी भारत वैज्ञानिक दृष्टिकोण के जरिए न केवल खेलों में बल्कि हर क्षेत्र में आगे बढ़ेगा।

 

मैं एकदम छोटा था। मुझे तो उपवास से कोई लेना-देना था नहीं। मुझे तो छठ का उत्सव अच्छा लगता था। घर में खुशियां रहती थीं। मेरे लिए चार नये कपड़े थे। एक तो मम्मी-पापा ने खरीदा था। एक बड़की दीदी, एक मंझली दीदी और एक पांचवी दीदी (जिनकी उसी साल शादी हुई थी) लेकर आयी थीं। एक बच्चे को और क्या चाहिए होता है। तो हुआ यह कि पहली अर्घ्य के दिन हम सपरिवार गांव के दक्षिण में बादशाही पईन (बघरा नहर) के पास गए थे। वहां उत्सव का माहौल था। वहां एक पुल अभी भी है। इसे बघरा पुल कहते हैं। उसके आगे एक और पुल था। उसके बारहभोंवारी पुल कहते थे। मतलब यह कि उस पुल में पानी निकासी के लिए बारह रास्ते थे। हह..हह करती हुई पानी जब उस पुल से गुजरती तब नजारा देखने लायक होता था।

तो हुआ यह कि बारहभोंवारी पुल के पास गुब्बारे आदि बिक रहे थे। मुझे एक बांसुरी खरीदनी थी। मां पहले ही मुझपर कृपा कर चुकी थीं। इसलिए मैं धनवान था। जरूरत थी तो किसी एक के साथ की जो मुझे बारहभोंवारी पुल तक ले जाय। भैया को यह कहकर पटाया कि वह मेरे पैसे से एक बांसुरी खरीद सकता है। फिर हम दोनों भाई बारहभोंवारी पुल पहुंचे। वहां आतिशबाजी हो रही थी। बांसुरी वाला पुल के किनारे था। मैं  बांसुरी खरीद ही रहा था कि अचानक से किसी ने तेज ध्वनि पैदा करने वाला पटाखा फोड़ दिया और मैं दहशत के कारण नहर में कूद गया। परंतु, मैं नहर में गिरा नहीं। मेरे हाथ में पुल पर बनी लोहे की सीढ़ी आ गयी। अब मैं लटक रहा था। हाथ छूटने का मतलब डूबना तय था। नीचे पानी में धामिन सांप साफ-साफ दिख रहा था। डर के मारे मैं रो भी नहीं रहा था। मेरे बदले भैया रो रहा था। लेकिन उस समय भीड़ बहुत थी। शायद किसी ने भैया के रोने की वजह नहीं समझी होगी। उसने खुद प्रयास किया और मुझे खींच लिया।

आहार कैसा हो, यह तय करने का काम राज्य न करे। लोगों को वह खाने दे जो वह खाना चाहते हैं। इस देश में विविध तरह के लोग हैं। सभी की अपनी खाद्य संस्कृति है। परंतु खाना ऐसा हो जो लोगों को स्वस्थ रखे। मजबूत बनाए। मैं तो एनएसएसओ के आंकड़ों को देखकर हैरान रहा जाता हूं जब यह जानकारी मिलती है कि 60 फीसदी से अधिक भारतीय महिलाएं एनीमिया यानी रक्त की कमी की शिकार हैं।

इस घटना का असर मुझपर आज भी है। भैया के कारण यह विश्वास होता है कि जब किसी गाढ़ (मुसीबत) में फंसा तो एक आदमी है जो मुझे बाहर निकाल सकता है। मैंने इसका फायदा भी खूब उठाया है। लेकिन वह शब्द जिसने मुझे अंधविश्वास की अंधी गली में धकेल दिया, वह मां ने कहे। हुआ यह कि घाट पर से लौटने के बाद भैया ने सबको यह जानकारी दी। मां ने इसका श्रेय ईश्वर को दिया। बस तभी से मेरी जेहन में ईश्वर बैठ गया। हर बात में भगवान।

हालांकि अब डेढ़ दशक से अधिक समय बीत गया है जब मेरे जीवन में ईश्वर की कोई भूमिका नहीं। लेकिन करीब ढाई दशक तक मैं अंधविश्वासी बना रहा। यह नुकसान तो मुझे हुआ ही।

खैर मैं वापस अपनी बेटी के सवाल पर आता हूं। मैंने उससे कहा कि भारत की असफलता के पीछे भारत का दर्शनशास्त्र है जो कि आत्मा पर केंद्रित है। इसका त्याग करना होगा। तभी भारत वैज्ञानिक दृष्टिकोण के जरिए न केवल खेलों में बल्कि हर क्षेत्र में आगे बढ़ेगा।

साक्षी ने कहा कि क्या इसमें खान-पान की भी भूमिका है?

हां, बिल्कुल। जो आदमी अच्छा खाना खाता है, वह आगे बढ़ता है। हर काम के लिए शरीर का स्वस्थ होना जरूरी है। भारत में लोग मांसाहार से परहेज करते हैं। कुछ खाते भी हैं तो यह सोचकर खाते हैं कि इससे कहीं उनका धर्म तो भ्रष्ट नहीं हो रहा। अभी हाल ही में बकरीद के दिन मुझे यह जानकारी मिली कि इस्लाम में शाकाहारी जानवरों की कुर्बानी जायज है। मतलब गाय, भैंस, बकरी, हिरण, नीलगाय, ऊंट और भेड़ आदि की कुर्बानी उनके अल्लाह को पसंद आती है। परंतु शेर, बाध, चीता, कुत्ता और यहां तक कि बिल्ली आदि की कुर्बानी अल्लाह स्वीकार नहीं करता। हिंदू धर्म में भी जो बलि की प्रथा है, उसमें भी कुछ ऐसी ही मान्यता है।

इस बारे में डॉ. आंबेडकर ने अपनी किताब हिंदू धर्म की पहेलियां के ब्राह्मणों ने एक अहिंसक देवता का रक्त-पिपासु देवी से विवाह कैसे किया? शीर्षक पहेली में रुधिर अध्याय के हवाले से उल्लेख किया है। मैंने अपनी बेटी को कहा कि जब तुम्हारी इच्छा हो तब इस किताब का अध्ययन करना और मनन करना। फिलहाल बस इतना ही कि हिंदुओं के देवताओं को पक्षी, कच्छप, घड़ियाल, मछली, वन्य जन्तुओं की नौ प्रजातियों, भैंसा, बैल, बकरा, नेवला, जंगली सुअर, गेंडा, मृग, बारहसिंगा, सिंह, बाघ, मनुष्य और यज्ञकर्ता का स्वयं का रक्त,पसंद आता है।

खैर, यह तो धार्मिक मान्यता की बात है। आज मेरे सामने दिल्ली से प्रकाशित जनसत्ता का पहला पन्ना है। इसमें एक खबर है – मुर्गा, बकरा या मछली के बजाय बीफ ज्यादा खाएं। यह भाजपा के एक नेता का बयान है। नेता का नाम है सनबोर शुलई। वे मेघालय में भाजपा सरकार में मंत्री हैं। उन्होंने यह बयान दिया है। उन्होंने साफ कहा है कि उनकी पार्टी भाजपा बीफ खाने के खिलाफ नहीं है।

बहरहाल, कुल मिलाकर यह कि आहार कैसा हो, यह तय करने का काम राज्य न करे। लोगों को वह खाने दे जो वह खाना चाहते हैं। इस देश में विविध तरह के लोग हैं। सभी की अपनी खाद्य संस्कृति है। परंतु खाना ऐसा हो जो लोगों को स्वस्थ रखे। मजबूत बनाए। मैं तो एनएसएसओ के आंकड़ों को देखकर हैरान रहा जाता हूं जब यह जानकारी मिलती है कि 60 फीसदी से अधिक भारतीय महिलाएं एनीमिया यानी रक्त की कमी की शिकार हैं। मुझे लगता है कि 40 फीसदी के आसपास पुरुष भी जरूर होंगे जिनके शरीर में पर्याप्त खून नहीं होगा। ऐसे में हम ओलंपिक की तालिका में सम्मानजनक स्थान बनाने से रहे।

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं

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