केरल और उत्तराखंड के योजनाकारों को प्रकृति का संदेश

विद्या भूषण रावत

3 867

भारत के दो सबसे खूबसूरत क्षेत्र जहां हजारों लोग प्रकृति के चमत्कारों को देखने और महसूस करने जाते हैं, आज मौसम की बेहद विनाशकारी मार के कारण पीड़ित हैं।  बारिश, भूस्खलन, बादल फटने की घटनाएं और फिर प्रलयकारी बाढ़ ने पहले केरल और अब उत्तराखंड में जो तबाही मचाई है, वह हम सभी के लिए चेतावनी है,कि सुधर जाओ। प्रकृति हमें अपने तरीके सुधरने की चेतावनी देती है और यदि हम फिर भी नहीं चेतते तो बड़ी से बड़ी शक्ति प्रकति की मार के आगे बेबस नजर आती है।

नदी किनारे बढ़ते कंक्रीट के जंगल

अगर मानसून का मौसम होता तो बारिश और बाढ़ के कहर पर किसी को शक नहीं होता। हम सभी जानते हैं कि हमारे देश में लोग भारी बारिश और बारिश की कमी दोनों से पीड़ित हैं। भारत में मानसून, इस वर्ष अपने पूर्वानुमान से अधिक था और अंततः सितंबर के मध्य तक हमने मान लिया कि मानसून किसानों और अन्य लोगों को खुशी दे रहा है। दुर्भाग्य से, मानसून गया या नहीं, पर बारिश बनी रही। सितंम्बर के मध्य के बाद मैं अपने कुछ मित्रों के साथ उत्तराखंड के ऊंचे इलाकों में इस उम्मीद के साथ यात्रा कर रहा था कि चमकीली धूप में पहाड़ों में अठखेलिया करती खूबसूरत नदियों और बर्फ से ढँकी चमकदार पहाडियों के दर्शन होंगे लेकिन वास्तव में मौसम ने हमें निराश किया। सबसे पहले बिन मौसम बरसात के चलते, हम दयारा बुग्याल तक अपना ट्रैक पूरा नहीं कर सके, जो समुद्र तल से लगभग 3000 मीटर ऊपर है और  हिमालय का शानदार दृश्य पेश करता है। जब हम अपने शिखर से लगभग 4 किलोमीटर की दूरी पर थे, तो भारी बारिश ने हमें घने जंगल में आश्रय की तलाश करने के लिए मजबूर कर दिया। दो घंटे के बाद जब बारिश थमी, तो हमने ऊपर चढ़ने के बजाय वापस लौटने का फैसला किया जो कि अधिक कठिन था क्योंकि यहाँ लगभग 50-60 डिग्री ढलान थी।

ग्लोबलवार्मिंग एक वास्तविकता है। जलवायु परिवर्तन एक वास्तविकता है। हमारे विभाजनकारी एजेंडे ने पहले ही भारत और उसके सामूहिक विचार को चोट पहुंचाई है। अब जिस विकास मॉडल का अनुसरण किया जा रहा है, वह विशुद्ध रूप से सत्ता में बैठे लोगों द्वारा जनता की संस्कृति और संसाधनों पर अनुबंध प्रदान करने के लिए है। दुर्भाग्य से, सत्ताधारी दल का सत्ता केंद्र अपने गुजराती जुनून से बाहर नहीं आ पाया है। यह हर जगह गुजराती एकाधिकार बनाने की कोशिश कर रहा है जो खतरनाक और हानिकारक है।

एक बार जब हम अपने होटल पहुंचे तो ठण्ड के चलते सभी की हालत खराब थी और पूरी रात की बहुत तेज़ बारिश के चलते ऐसा लगा कि हमारा फैसला सही था क्योंकि बुग्याल में रहने के लिए पुराने गोठ होते हैं जिनमे गाय-भैंस बांधी जाती हैं।  यह भी एक कटु सत्य है कि हिमालय में बारिश वाकई आपको डरा देती है। बारिश सुबह 7 बजे के आसपास ही रुकी और उसके बाद बादल छंटने लगे और  अचानक हमें तेज धूप और बर्फ से ढँकी चोटियां दिखाई दीं। एक दिन बाद, जब हम गंगोत्री से गोमुख की यात्रा करना चाहते थे, जो लगभग 18 किलोमीटर दूर था, तो हमें खुशी हुई कि आखिरकार हमें कुछ धूप दिखाई दे रही है, लेकिन 9 किलोमीटर की तनावपूर्ण पैदल यात्रा के बाद बारिश शुरू हो गई और हम अपनी पहली रात की यात्रा को बहुत मुश्किल से तय कर पहले दिन के गंतव्य स्थल भोजबासा तक पहुंचे जो समुद्र तट से 3775 मीटर की ऊंचाई पर स्थित था। यहाँ से भागीरथी को पत्थरों से भरे बेहद कठिन ऊबड़-खाबड़ रास्ते से 4 किलोमीटर और तय कर आप गौमुख पहुँचते है। भोजबासा में रहने की कोई विशेष व्यवस्था नहीं है कि आप संतोष से रह सकें जिससे अगले दिन यात्रा हो सकती हो। बादल छाए रहे और बारिश लगातार होती रही जिससे तापमान में भारी गिरावट आई। मुंबई के मेरे दोस्तों के लिए  इस यात्रा को जारी रखना बेहद मुश्किल था और उन्हें सांस लेने में तकलीफ हुई। ज्यादा उंचाई पर चलने में ऑक्सीजन की कमी एक बहुत बड़ी समस्या है, विशेषकर उनलोगों के लिए जो मैदानी क्षेत्रों से आते हैं और शारीरिक तौर पर फिट नहीं होते। इसलिए जब भी कोई ऐसी यात्राएँ करना चाहता है उसे पहले से ही इन क्षेत्रों की स्थिति और अपनी फिटनेस को ईमानदारी से समझ लेना चाहिए। अगली सुबह जब हम उठे, तो स्थिति स्पष्ट नहीं थी। बारिश की बूंदें गिर रही थीं और चारों ओर कोहरा था इसलिए अपने साथियों की स्थिति को देखते हुए हमने यात्रा को छोड़ने का मन बना लिया था क्योंकि सुरक्षित रूप से वापस पहुंचना अधिक महत्वपूर्ण था। हम यह अच्छी तरह से जानते थे कि बारिश में चलना मुश्किल था क्योंकि वहां भूस्खलन आम था। भोजबासा में कोई मोबाइल या फोन लिंक नहीं है। वहाँ से गंगोत्री का रास्ता बहुत मुश्किल है और यदि गलती से कोई दुर्घटना हो गयी तो पता भी नहीं चलेगा।

पहाड़ों से गुजरती एक नदी

जब मैंने अपनी यात्रा की योजना बनाई थी, तो चमकीले सूरज की चमक का आनंद लेने का विचार था।   उत्तराखंड सर्दियों में आश्चर्यजनक रूप से चमकीला दिखता है। जब पूरा उत्तर भारत चारों ओर उदास कोहरे से पीड़ित होता है तो हिमालय के पहाड़ तेज धूप में चमकते हैं, जिससे यह क्षेत्र बहुत आकर्षक बन जाता है। हमारी यात्रा से कुछ दिन पहले, भारी वर्षा और भूस्खलन हुआ था इसलिए  मैंने सोचा कि सबसे बुरा समय खत्म हो गया है, लेकिन अब भारी बारिश, बाढ़ और आपदा ने साबित कर दिया है कि आज मौसम कितना अप्रत्याशित हो गया है।

यह दुर्लभ था जब हम हर जगह बारिश और बाढ़ की आपदा को  एक साथ सुनते और देखते हैं। मतलब यह कि अरब सागर से लेकर हिमालय तक बारिश, भूस्खलन और बाढ़ एक साथ हो यह आश्चर्यजनक था। हम जानते हैं कि केरल में मानसून मई के मध्य में शुरू होता है जबकि इसी दौरान उत्तराखंड में चार धाम  मंदिरों के द्वार जनता के लिए खोल दिए जाते हैं, क्योंकि यह पहाड़ियों की यात्रा के लिए सबसे अच्छी अवधि कही जाती है। जो लोग उत्तर भारत की गंदी और सड़ियल गर्मी से पीड़ित हैं या पश्चिम अथवा  दक्षिण भारत में भी उमस और गर्मी से निकलकर कुछ दिन पुनः उर्जावान होने के लिए पर्वतीय क्षेत्रों में आने की योजना बनाते हैं तो उनमें बहुत बड़ी संख्या उत्तराखंड आने वालो की होती है। ज्यादातर समय जुलाई-अगस्त बारिश का मौसम होता था और आधिकारिक तौर पर सितंबर के मध्य तक मानसूनखत्म हो गया था लेकिन इस साल यह चौंकाने वाला है।

केरल में बाढ़ से तबाही

केरल ने इस अप्रत्याशित बारिश में 42 से अधिक लोगों को खो दिया है। कोट्टायम, तिरुवला, इडुक्की, पथनमथित्था जैसे शहरों में नदियों में पानी के सबसे बड़े झटके का सामना करना पड़ रहा है। मकान ताश के पत्तों की तरह ढह गए और अनेक वाहन बह गए। केरल और तमिलनाडु के बांध इस समय ओवरफ्लो हो रहे हैं और इन बांधों के गेट खुलने से विभिन्न जिलों में जल स्तर ऊंचा हो गया है। एक बार जब हमें लगा कि केरल में बारिश खत्म हो गई है, तो मौसम विभाग ने उत्तराखंड में भारी बारिश की भविष्यवाणी की थी। मुझे यकीन नहीं था, लेकिन अगले दिन जब हमें इसकी जानकारी मिली तो इसने हमें 2013 की भयानक त्रासदी की याद दिला दी। उसे हिमालयी सुनामी कहा गया था, जिसमें हजारों लोग मारे गए थे और राज्य में विशाल बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा था। दुनिया ने उस समय अभूतपूर्व विनाश देखा जब घर, सड़कें, पुल, वाहन तैरते हुए गंगा और कुछ ज्ञात एवं कई अज्ञात या मौसमी सहायक नदियों के उग्र पानी में बह गए। अक्टूबर की असमय बारिश में अब तक 58 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है, सैकड़ों लोग घायल हुए हैं। कई ट्रेकर्स, जो इन क्षेत्रों की सुंदरता का आनंद लेने आए थे, उनका अभी भी पता नहीं चल पाया है। अधिकांश सड़कें धंस गई हैं और कई जगहों पर स्थिति सामान्य होने में समय लगेगा।

इस बात से कोई इनकार नहीं करता कि हमारे पास सड़क का अच्छा बुनियादी ढांचा होना चाहिए लेकिन यह समझना और जानना भी महत्वपूर्ण है कि विकास के नाम पर हम प्रकृति का जो विनाश कर रहे हैं वह कैसे हो रहा है और कितना बड़ा है? मुझे यह देखकर दुख हुआ कि कैसे बड़ी मशीनों द्वारा पहाड़ों को ड्रिल किया जा रहा था और प्राकृतिक जंगलों की जगह कंक्रीट ले रहा था। हिमालयी क्षेत्र में फोर लेन की सड़कें तभी बन सकती हैं जब हम इतने संवेदनहीन हो जाएँ कि हमें हमारी ऐतिहासिक विरासत को नष्ट करने में कोई शर्म न हो।

सुनामी 2004 में आया था जबकि उत्तराखंड की त्रासदी 2013 में हुई थी लेकिन ऐसा लगता है कि हमारी सरकारों ने उससे बहुत कम सीखा। तबाही की भयावहता ने सरकार और नौकरशाही द्वारा अपनाई गई नीतियों में किसी भी बदलाव को प्रभावित नहीं किया। यह स्पष्ट है कि जलवायु संकट एक ऐसा मुद्दा है जिसकी उपेक्षा की गई है। ‘विकास’ के नाम पर हमारे पहाड़, नदियाँ, समुद्र और चारागाहों, झरनों पर  लालची कंपनियों की नज़रें हैं और राजनीतिक नेता और सरकारें मात्र उनके व्यावसायिक ‘एजेंट’ बन कर रह गए हैं।

बारिश में घर ताश के पत्ते की तरह बह गए

केरल एक सुंदर राज्य है, लेकिन बढ़ती हुई आबादी की मांग को पूरा करने के लिए,  बढ़ते शहरीकरण और सीमेंटेड इंफ्रास्ट्रक्चर वाला विकास बहुत बड़े पैमाने पर वहां पहुंच गया है । शहरी आबादी, जो 1971 में केवल लगभग 15% थी, अब लगभग 50% को पार कर रही है। इसके अलावा, मध्य पूर्व में नौकरियों के लिए भारी आप्रवासन के परिणामस्वरूप घर लौटने पर लोग अपने पुराने घरों के ‘विकास’ का ‘विचार’ करते हैं, जो कभी भी स्थानीय पर्यावरण और जरूरतों के अनुसार नहीं, बल्कि कहीं और देखी गई कल्पनाओं के अनुसार होता है। रेत और पत्थरों की आवश्यकता को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर खनन ने संकट को बढ़ा दिया है। वनों की कटाई औद्योगिकीकरण का मार्ग प्रशस्त करने और पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए समुद्री तटों का अधिग्रहण और उनकी मांगें अंततः बड़ी आपदा का मार्ग प्रशस्त कर रही हैं। केरल में लगभग 58 बड़े या छोटे बांध हैं और यह निश्चित है कि उनमें से कई महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में हैं। पहली बार हमने सुना कि इनमें से कई बांध इस बार अपनी क्षमता से अधिक चल रहे हैं। तथ्य यह है कि भारत में कई क्षेत्रों में बाढ़ का कारण ये अति प्रवाह वाले बांध ही हैं जो अचानक पानी के लिए अपने द्वार खोल देते हैं जिसके परिणामस्वरूप हर जगह भारी बाढ़ आ जाती है। भारतीय विशेषज्ञों को अभी इस पर विचार करना होगा कि कब तक इसकी अनुमति दी जाएगी। चाहे महाराष्ट्र हो, राजस्थान हो, कर्नाटक हो, तमिलनाडु हो, हमने हर साल ऐसी घटनाएं होते हुए देखी हैं जो संपत्ति, फसलों और मानव जीवन को नुकसान पहुंचाती हैं। इन बातों पर शुरुआत में ही ध्यान देने का समय आ गया है ताकि मानवीय भूलों के कारण मानव जीवन नष्ट न हो।

उत्तराखंड और केरल में जो हो रहा है वह विनाश है। लालची व्यापार लॉबी समुद्री तट, बैकवाटर सिस्टम, खनन के लिए छोटी नदियों को नष्ट करना चाहती हैं। उत्तराखंड में वे पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए ‘शीर्ष’ तक पहुंचना चाहते हैं और इसके लिए उन्हें हमारी मूल पहचान, पहाड़ों को नष्ट करने में कोई शर्म नहीं है। रेलवे नेटवर्क को ऊंची पहाड़ियों पर लाने के साथ जोड़ी गई चारधाम यात्रा परियोजना दरअसल आपदा को आमंत्रण है। इस बात से कोई इनकार नहीं करता कि हमारे पास सड़क का अच्छा बुनियादी ढांचा होना चाहिए लेकिन यह समझना और जानना भी महत्वपूर्ण है कि विकास के नाम पर  हम प्रकृति का जो विनाश कर रहे हैं वह कैसे हो रहा है और कितना बड़ा है?  मुझे यह देखकर दुख हुआ कि कैसे बड़ी मशीनों द्वारा पहाड़ों को ड्रिल किया जा रहा था और प्राकृतिक जंगलों की जगह कंक्रीट ले रहा था। हिमालयी क्षेत्र में फोर लेन की सड़कें तभी  बन सकती हैं जब हम इतने संवेदनहीन हो जाएँ कि हमें हमारी ऐतिहासिक विरासत को नष्ट करने में कोई शर्म न हो। पहाड़ों का निवासी होने के कारण मैं यह साफ़ तौर पर कहता हूँ कि यहाँ की नदियाँ और पहाड़ हमारी पहचान हैं। अगर हम इन्हें नष्ट कर दें तो हमारी अस्मिता तो ख़त्म हो जाएगी। यह पूरे उत्तरी और पूर्वी भारत को, बंगाल की खाड़ी तक कितना नुकसान पहुंचा सकता है इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता है।

लोगों को बचाने में लगे लोग

बांधों को धिक्कारने की जरूरत नहीं है लेकिन सभी जगह इनके कारण पर्यावरण, नदियों, पहाड़ों, स्थानीय लोगो को कितना नुकसान हो सकता है उसे तो देखना ही पडेगा। विकास के सारे कार्यक्रमों में ‘दिल्ली’ ‘बम्बई’ के विशेषज्ञों की नहीं पहले स्थानीय लोगों से बात करने और उनके अनुभवों से समझने की जरूरत है। केरल तो एक अधिक जनसंख्या घनत्व वाला राज्य है लेकिन इसके विपरीत उत्तराखंड की पहाड़ियों में जनसंख्या में नकारात्मक वृद्धि दर दिखाई देती है। सैकड़ों गांवों में कोई बसावट नहीं है क्योंकि लोग पलायन कर रहे हैं। सर्दियाँ ठंडक लाती हैं और सर्दियों के दौरान कई ग्रामीण दूसरे क्षेत्रों में चले जाते हैं। यह एक तरह की खानाबदोश जिंदगी है, जब लोग अक्टूबर के मध्य से फरवरी-मार्च के अंत तक दूसरे शहरों या गांवों में चले जाते हैं, जब पूरा हिमालय क्षेत्र गहरी और घनी बर्फ से ढँका होता है। वन आवरण बहुत अधिक है जो सरकार द्वारा नियंत्रित होता है। कई गांवों में सार्वजनिक उपयोगिता का स्थान भी नहीं है क्योंकि उन्हें जंगल विभाग से अनुमति लेनी पड़ती है फिर भी बड़े रिसॉर्ट आ गए हैं। आप जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क में बड़े रिसॉर्ट देख सकते हैं जो वास्तव में तराई क्षेत्र (हिमालयी मैदान) में है, लेकिन कहीं और भी। 3500 मीटर से ऊपर की ऊंची रेंज में लोगों को पशु चराने की अनुमति भले नहीं है लेकिन विदेशों के फाइव स्टार सैलानियों के लिए बड़े-बड़े रिसोर्ट हैं ताकि वे शांति का आनंद उठा सकें। यह ‘पर्यावरणवादियों’ की लॉबी है जो स्थानीय लोगों को पर्यावरण का दुश्मन बताती है और खुद को पर्यावरणवाद के ‘चैंपियन’ के रूप में पेश करती है। सच कहूं तो इसी लॉबी ने प्रकृति को नुकसान बहुत पहुंचाया है।

लेखक उत्तराखंड में

कानूनों में यह सुनिश्चित करना चाहिए कि स्थानीय संस्कृतियों, समुदायों और पारिस्थितिक मुद्दों की रक्षा और सम्मान किया जाए। जिस समस्या ने इस विशाल संकट को पैदा किया है, वह है लोगों और उनके ज्ञान का सम्मान करने में भारतीय राज्यों की पूर्ण उपेक्षा और अक्षमता। अक्सर जिन सवालों को ‘स्थानीयकृत’ माना जाता है उससे बचने के  लिए बाहर से  ‘विशेषज्ञों’ को लाया जाता है  और वे सत्ता से जुड़े  अभिजात वर्ग के राजनीतिक प्रचार को वैध बनाते हैं। तथ्य यह है कि सभी ‘विकासात्मक’ परियोजनाओं में ‘विचारक’ और ‘विशेषज्ञ’ वे होते हैं जो बड़े महानगरों में बैठी निजी कंपनियों से निकलते हैं, जिनका प्रमुख काम राजनेताओं, मंत्रियों और राजनीतिक दलों के साथ ‘लॉबिंग’ करना है ताकि उनके काम को पूरा किया जा सके। उनमें से अधिकांश, स्थानीय भावनाओं या पर्यावरण संरक्षण के लिए कम से कम चिंता करते हैं या जिसे अनिवार्य रूप से पूर्व सूचित सहमति के रूप में जाना जाता है और जब भी अधिक पर्यावरणीय चिंता के क्षेत्र में और साथ ही वन स्थित अथवा मूलनिवासी समुदायों में एक विकास परियोजना की योजना बनाई जाती है, उसे कानूनी तरीके से पूरे करने की एक अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया है। दुनिया भर में यह माना जाता है कि स्थानीय समुदाय पर्यावरण की रक्षा के लिए जिम्मेदार माध्यम हैं क्योंकि प्रकृति के अनुसार जीना और रहनाउनकी संस्कृति और परम्परा है। लेकिन बड़े शहरों में राजनीतिक कनेक्शन वाले ठेकेदारों और औद्योगिक घरानों द्वारा वित्त पोषित ‘विशेषज्ञों’ ने अपने उद्देश्यों के लिए न्यायपालिका का इस रूप में उपयोग किया है, जिसमें ‘स्थानीय समुदायों’ को पर्यावरण के लिए ‘खतरे’ के रूप में देखा और प्रस्तुत किया जाता है।

उत्तराखंड में नदियों में कूड़ा डंप किया जा रहा है

पहाड़ों से ताल्लुक रखते हुए मैं उन्हें अपनी पहचान मानता हूं। मैंने अक्सर कहा है कि जब भी कोई मित्र यात्रा करना चाहता है तो उसे प्रकृति को नैसर्गिक रूप में देखने का मन बनाना चाहिए। यहाँ आपको विशाल महल, बड़ी इमारतें, ऐतिहासिक स्थान और मुंबई, कोलकाता, दिल्ली, लखनऊ, मैसूर, चेन्नई जैसे शहर नहीं मिलेंगे। अच्छे होटल या ढाबे भी शायद न हों। लेकिन यदि आप पहाड़ियों पर आ रहे हैं, तो आपको केवल हिमनद, नदियाँ, फव्वारे, पहाड़ और अन्य प्राकृतिक चीजें मिलेंगी और वे हमारे लिए ‘संसाधन’ नहीं बल्कि हमारी मूल पहचान हैं। यदि ‘पहाड़’ नहीं है तो कोई पहाड़ी पहाड़ नहीं हो सकती जो हमारी पहचान है। यदि पहाड़ नष्ट हो गए तो हमें भारी कीमत चुकानी पड़ेगी और हम अंततः अपनी पहचान को खत्म कर देंगे।

यहां तक कि जब मैं एक मानवतावादी के रूप में सोचता हूं, तो मैं पहाड़ियों से निकलती विभिन्न नदियों का ऋणी होता हूं। अगर आप उनके गीतों को सुनें, और आप में भावपूर्ण गुनगुनाहट को समझने और स्थानों पर उनकी गति, शक्ति, शांति और तीव्रता को देखने और महसूस करने की क्षमता है, तो वे अद्वितीय हैं। वे आपको ऊर्जा देते हैं और मानसिक शान्ति भी।  हकीकत में वे आज के दिखावटी जीवन से उपजी परेशानियों और दुखों से लड़ने का एक इलाज भी हैं। उदात्त हवा और शुद्ध पानी का आनंद लें।  साथ ही यह भी देखें कि प्रकृति कैसे उदारता से जीवन को आनंद से भर रही है। लेकिन हमने उनका क्या किया है? हमने अपनी नदियों को नियंत्रित करने की कोशिश की है। उत्तराखंड में विभिन्न नदियों पर अनेक बांध  बन रहे हैं। यह चिंतनीय है। जिसे हम माता कहते हैं, जिसने हमें देश की सबसे उपजाऊ और पूजनीय नदी गंगा दी उसको उसके ‘भक्तो’ ने पैसा उगाने वाली मशीन बना दिया। ऋषिकेश या देहरादून से गंगोत्री, यमुनोत्री और बद्रीनाथ-केदारनाथ दोनों की यात्रा आपको इस बात का प्रमाणदेगी कि हमने कितनी बेरहमी से पहाड़ों के साथ-साथ अपनी सुंदर, मनमोहक और पूजनीय नदियों को भी धोखा दिया है। यहाँ हमने भारत के सबसे बड़े प्राकृतिक उपहार पर एक क्रूर हमले के अलावा और कुछ नहीं किया है। हम इस समय एक अजीब समाज में रहते हैं जहां ‘सम्मान’ के नाम पर अपनी नदियों और पहाड़ों को प्रदूषित करते हैं और उनके विनाश के मुद्दे पर चुप रहते हैं।

किसी को भी निजी लाभ के लिए प्रकृति का दोहन करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। हमारी योजनाओं और कार्यक्रमों का इको-ऑडिट होना चाहिए ताकि हम जान सकें कि जमीन पर क्या हो रहा है और हमारी प्रकृति और जैव विविधता के लिए क्या खतरा है? यह हम सबके खड़े होने का समय है। हम अपनी एकमात्र भूमि को 'विकासात्मक माफिया' द्वारा नष्ट नहीं होने दे सकते।

केरल और उत्तराखंड में प्रकृति के कोप ने स्पष्ट चेतावनी दी है। आप दोनों राज्यों को भगवान का अपना देश और देवभूमि कहते हैं। मेरे लिए, दोनों ही आनंद लेने के लिए प्रकृति की बेहतरीन रचना हैं। अरब सागर की सुंदरता और मन्नार में पहाड़ों की आश्चर्यजनक हरियाली, कुमारकोम में प्यारा बैकवाटर और कई अन्य स्थान प्रकृति की महान रचनाएँ हैं जो अब लालची उद्योगपतियों और भ्रष्ट नेताओं द्वारा नष्ट किए जा रहे हैं।  जब आप उत्तराखंड की यात्रा करें तो गंगा की सुंदरता से मंत्रमुग्ध हो जाएंगे और आप जितना ऊपर की ओर बढ़ेंगे, स्वर्णिम जल और गुनगुनाहट के साथ सुंदर बर्फीली नदियाँ आपको आकर्षित करती हैं। ये  हिमालय की बर्फ से ढँकी चोटियाँ जो सचमुच अपने शक्तिशाली पड़ोसी से भारत की रक्षा करती हैं, हमारी सबसे अच्छी रक्षक हैं। इनके अलावा वहाँ झीलें हैं। घास के मैदान हैं। फव्वारे हैं। लेकिन मनुष्य के लालच और आरामतलबी ने  प्रकृति को चोट पहुँचाने वाले बुनियादी ढाँचे का निर्माण किया है।

हम सभी जानते हैं कि ग्लोबलवार्मिंग एक वास्तविकता है। जलवायु परिवर्तन एक वास्तविकता है।  हमारे विभाजनकारी एजेंडे ने पहले ही भारत और उसके सामूहिक विचार को चोट पहुंचाई है। अब  जिस विकास मॉडल का अनुसरण किया जा रहा है, वह विशुद्ध रूप से सत्ता में बैठे लोगों द्वारा जनता की संस्कृति और संसाधनों पर अनुबंध प्रदान करने के लिए है। दुर्भाग्य से, सत्ताधारी दल का सत्ता केंद्र अपने गुजराती जुनून से बाहर नहीं आ पाया है। यह हर जगह गुजराती एकाधिकार बनाने की कोशिश कर रहा है जो खतरनाक और हानिकारक है। ठेकेदारों, हवाई अड्डों, बड़े बंदरगाहों, टेलीफोन कंपनियों, इंटरनेट सेवाओं को देखें और पता करें कि वे कौन लोग हैं? उनमें क्या विविधता है? इन ‘बहुमुखी’ प्रतिभाओं के लिए, लाभ ही सब कुछ है, भले ही इसके लिए मानवता को तबाह करना हो।

हम चिल्लाते हैं कि हिमालय से अरब सागर तक भारत एक है लेकिन यहां मैं कहना चाहता हूं, हिमालय से लेकर अरब सागर तक हम प्रकृति से चेतावनी भरे संकेतों को नहीं समझ सके। चाहे पहाड़ हों, नदियाँ हों या समुद्र, प्रकृति हम सभी को अपने रास्ते ठीक करने या तबाही का सामना करने का एक जोरदार संदेश भेज रही है। यह समय है, राजनीतिक दलों, कार्यकर्ताओं, सरकार को गंभीरता से विचार करने का। स्थानीय नगर निकायों, राज्य सरकारों को संरचनाओं और विकास के संदर्भ में स्थानीय मॉडल का कार्य करना चाहिए और उनका विकास करना चाहिए। हम नैनीताल जैसा खूबसूरत और मनमोहक शहर बाढ़  के द्वारा ध्वस्त होते नहीं देख सकते। हम विनाशकारी जलजले से पीड़ित कोट्टायम के वीडियो नहीं देख सकते हैं जब बड़े घर ताश के पत्तों की तरह नदी में बह गए। हमें अपनी विरासत की रक्षा करने की जरूरत है जो प्रकृति से निकलती है। हम प्रकृति का सम्मान करें, उसके साथ रहना सीखें। स्थानीय समुदायों का सम्मान करें जो प्रकृति की रक्षा करते हैं और प्राकृतिक जीवन जीते हैं। ये ही लोग उन लोगों के खिलाफ खड़े होते हैं जो अपने ‘लाभ’ के लिए फर्जी ‘विकासात्मक’ मंत्र के साथ आपके पास आते हैं।

किसी को भी निजी लाभ के लिए प्रकृति का दोहन करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। हमारी योजनाओं और कार्यक्रमों का इको-ऑडिट होना चाहिए ताकि हम जान सकें कि जमीन पर क्या हो रहा है और हमारी प्रकृति और जैव विविधता के लिए क्या खतरा है? यह हम सबके खड़े होने का समय है। हम अपनी एकमात्र भूमि को ‘विकासात्मक माफिया’ द्वारा नष्ट नहीं होने दे सकते। यह सभी के लिए जागने का समय है। हमें उम्मीद है कि केरल और उत्तराखंड के लोग अपनी प्राकृतिक पहचान की रक्षा के लिए खड़े होंगे और पर्यावरण-पारिस्थितिकी मुद्दों को प्रमुख राजनीतिक एजेंडा बनाएंगे। हमारी आकर्षक और मनमोहक प्राकृतिक विरासत को बचाने के लिए ‘विकासात्मक’ मॉडल पर सवाल उठाने का समय आ गया है।

विद्याभूषण रावत प्रखर सामाजिक चिंतक और कार्यकर्ता हैं। उन्होंने भारत के सबसे वंचित और बहिष्कृत सामाजिक समूहों के मानवीय और संवैधानिक अधिकारों पर अनवरत काम किया है। 

3 Comments
  1. Mahesha nand says

    विकास के नाम पर किया जा रहा खनन, पेड़ों का अंधादुंद कटान इसकी सबसे बड़ी वजह है.
    आपका लेख कई और कारणों को उजागर कर रहा है. यदि समय रहते हम नहीं चेते तो आने वाला समय बहुत घातक होने वाला है.
    आज पौड़ी का मौसम फिर बदल गया है. दो दिन से बादलों की छुटपुट परत आसमान में जम और उड़ती दिखाई दे रही है. अब शाम के समय लग रहा कि वर्षा होगी. यह बे मौसम वर्षा प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का नतीजा है.

  2. nand Mahesha says

    विकास के नाम पर किया जा रहा खनन, पेड़ों का अंधादुंद कटान इसकी सबसे बड़ी वजह है.
    आपका लेख कई और कारणों को उजागर कर रहा है. यदि समय रहते हम नहीं चेते तो आने वाला समय बहुत घातक होने वाला है.
    आज पौड़ी का मौसम फिर बदल गया है. दो दिन से बादलों की छुटपुट परत आसमान में जम और उड़ती दिखाई दे रही है. अब शाम के समय लग रहा कि वर्षा होगी. यह बे मौसम वर्षा प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का नतीजा है.

    1. nand Mahesha says

      विकास के नाम पर किया जा रहा खनन, पेड़ों का अंधादुंद कटान इसकी सबसे बड़ी वजह है.
      आपका लेख कई और कारणों को उजागर कर रहा है. यदि समय रहते हम नहीं चेते तो आने वाला समय बहुत घातक होने वाला है.
      आज पौड़ी का मौसम फिर बदल गया है. दो दिन से बादलों की छुटपुट परत आसमान में जम और उड़ती दिखाई दे रही है. अब शाम के समय लग रहा कि वर्षा होगी. यह बे मौसम वर्षा प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का नतीजा है.

Leave A Reply

Your email address will not be published.