औरतों को कभी इस निगाह से भी देखें (डायरी 3 फरवरी, 2022)

नवल किशोर कुमार

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कितनी सारी बातें होती हैं एक दिन में। कल का दिन तो कमाल का रहा। जगदेव प्रसाद की सौवीं जयंती थी। वहीं गोंडी भाषा, साहित्य और इतिहास के प्रसिद्ध अध्येता रहे डॉ. मोतीरावण कंगाली की जयंती भी थी। संसद में राहुल गांधी का शानदार भाषण था। हालांकि मुझे उनके भाषण ने अधिक प्रभावित नहीं किया। उन्होंने कहा कि आज भारत में दो तरह का भारत है। सौ लोगों के पास उतनी संपत्ति है जितनी की 55 फीसदी आबादी के पास। आर्थिक विषमता की खाई बढ़ती जा रही है। लेकिन इसके लिए एक अकेले नरेंद्र मोदी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। कांग्रेस को अपने पुराने दिन याद करने चाहिए।

कल ही तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन द्वारा सामाजिक न्याय को केंद्र में रखकर एक महासंघ बनाने का प्रस्ताव देश के उन सभी दलों को दिया गया जो भारत की विविधता और सामाजिक न्याय में विश्वास रखते हैं। जाहिर तौर पर स्टालिन ने भाजपा को इसमें शामिल नहीं किया है। यह एक अच्छी पहल है। हालांकि एक सच्चाई यह भी है कि कुछेक दलों को, जिनसे स्टालिन को अपेक्षा है, वे आज के दौर में सामाजिक न्याय के नाम पर महज ढोंग करते हैं। एक उदाहरण तो उनके यहां की एक पार्टी अन्नाद्रमुक है और बिहार से एक उदाहरण नीतीश कुमार की पार्टी जदयू है।

यह सच सभी को हृदय से स्वीकार करना ही चाहिए कि आज भी महिलाएं हाशिए पर हैं। आप कह सकते हैं कि उनका घर ही उनके लिए हाशिया है।

खैर, सियासत की बातें तो रोज होती रहती हैं। कल एक कहानी मिली। वैसे यह एक सच्ची घटना है। लेकिन इसे मैं कहानी ही कह रहा हूं। वजह यह कि कहानी के पात्र मेरे परिचित हैं। इस कहानी में एक नायक और नायिका हैं। दोनों साथ रहते हैं। दोनों की शैक्षणिक योग्यता में बहुत अधिक फर्क नहीं है। नायिका के पास योग्यता अधिक है। लेकिन उसके पास नौकरी नहीं है। नायक के पास नौकरी है। आए दिन नायक नायिका को यह अहसास कराता है कि वह उसके आसरे है। कई बार तो वह यह तंज भी कसता है कि नायिका के पास अधिक बुद्धि है।

इस कहानी की नायिका कोई अकेली उदाहरण नहीं है। भारतीय समाज में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है। इसके बावजूद आये दिन पढ़ने को मिलता है कि आज औरतें हर क्षेत्र में आगे आ रही हैं। ट्रेन, प्लेन, पार्टी, बिजनेस सब चला रही हैं। फिल्मों में काम करनेवाली महिलाओं की सफलता की कहानियां भी पढ़ने को मिल जाती हैं। लेकिन फिर जेहन में ख्याल आता है कि ऐसी कितनी महिलाएं हैं। मतलब यह कि कितनी महिलाएं हैं जो सेबी द्वारा सूचीबद्ध कंपनी की मालकिन हैं? कितनी ऐसी महिलाएं हैं जो कोई राजनीतिक पार्टी चला रही हैं? कितनी ऐसी महिलाएं हैं जो गीतकार और संगीतकार हैं? कितनी महिलाएं हैं जो फिल्मों में बतौर निर्देशक काम करती हैं? कितनी महिलाएं हैं मौजूदा केंद्रीय मंत्रिपरिषद में जो स्वतंत्र रूप से अपना प्रभाव बना सकी हैं? अभी के ही समय में कितनी महिलाएं मुख्यमंत्री हैं, राज्यपाल हैं? कितनी हैं? सोचकर देखिए।

भारतीय समाज जिसका आधार ब्राह्मणवादी पाखंड है, रोज-ब-रोज जड़ होता जा रहा है। इसका प्रभाव अन्य धर्मों पर भी पड़ता है। मैं तो यह देख रहा हूं कि आज गैर-हिंदू महिलाएं अधिक हिंदू होती जा रही हैं।

आपके पास कुछ गिने-चुने नाम होंगे, जो केवल और केवल उदाहरण कहे जा सकते हैं। जैसे कि ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं और महिला हैं। या फिर एक नंदिता दास हैं जो कि अभिनेत्री भी हैं और उन्होंने कुछ फिल्मों का निर्देशन भी किया है। मुमकिन है कि आप उषा खन्ना को जानते हों, जो फिल्मी गीतों को संगीत दिया करती थीं। तो कहने का मतलब यह कि आपके पास केवल उदाहरण हैं। यह सच सभी को हृदय से स्वीकार करना ही चाहिए कि आज भी महिलाएं हाशिए पर हैं। आप कह सकते हैं कि उनका घर ही उनके लिए हाशिया है।

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दरअसल, भारतीय समाज जिसका आधार ब्राह्मणवादी पाखंड है, रोज-ब-रोज जड़ होता जा रहा है। इसका प्रभाव अन्य धर्मों पर भी पड़ता है। मैं तो यह देख रहा हूं कि आज गैर-हिंदू महिलाएं अधिक हिंदू होती जा रही हैं। उन्हें हिंदू महिलाओं की तरह गुलाम बनने में आनंद की प्राप्ति होने लगी है। यह घटना मेरे ही एक परिचित की है। इस घटना को छोड़ता हूं। मेरे परिचित को बुरा लगेगा। मैं अपने घर की बात करता हूं। मेरी मां पिछले 11 सालों से लकवा ग्रस्त हैं। लेकिन इसके पहले मेरी मां अर्जक महिला रहीं। पापा सरकारी नौकरी करते थे। लेकिन मेरी मां बेरोजगार नहीं थी। अपने दम पर चार-चार भैंसें पालती थी। अपने पास पैसा भी रखती थीं। एक बार पापा बीमार पड़े और घर में नकदी की जरूरत आन पड़ी तो मां ने अपने पास से पच्चीस हजार रुपए निकालकर सामने रख दिया। वे पैसे मां ने पापा से नहीं लिये थे। वह उनकी कमाई के पैसे थे। लेकिन मां को वह सामाजिक सम्मान हासिल नहीं हो सका जो सम्मान मेरे पापा को प्राप्त है। समाज की नजर में तो घर के मुखिया वही थे और आज भी हैं।

दरअसल, हम पितृसत्ता के नशे में चूर होते जा रहे हैं। मेरे पास इसका कोई आंकड़ा नहीं है कि कितनी फीसदी महिलाएं हैं, जिनके पति उन्हें गालियां देते हैं। वह भी इसके बावजूद कि वह अर्जन करती हैं। मेरे पास कोई आंकड़ा नहीं है कि कितनी महिलाओं को उनके पति आए दिन यह कहते हैं कि मेरा घर छोड़कर चली जाओ। गोया घर में महिलाओं का कोई अधिकार नहीं है।

कल ही तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन द्वारा सामाजिक न्याय को केंद्र में रखकर एक महासंघ बनाने का प्रस्ताव देश के उन सभी दलों को दिया गया जो भारत की विविधता और सामाजिक न्याय में विश्वास रखते हैं।

मुझे लगता है कि इस देश को इस विषय पर जरूर सोचना चाहिए कि महिलाओं को उनके घर में सम्मान कैसे मिले। उनके हिस्से गालियां और मारपीट नहीं हो, इसके बारे में सोचना चाहिए। महिलाओं को भी इस दिशा में सोचना चाहिए कि वह गुलाम से आजाद कैसे हो सकती हैं।

सनद रहे कि केवल कानून पर्याप्त नहीं हैं। समाज को संवेदनशील होना ही पड़ेगा।

खैर, कल एक कविता जेहन में आयी।

सामने मेरे बेबस मजदूरों की आंखें हैं

हुक्मरान की नित नई बातें हैं

जंगल में आदिवासियों की लाशें हैं

चौराहे पर परिंदों का शोर है

आसमान में पतंग की डोर है

एक बच्चे के हाथ में मां की साड़ी का कोर है।

खेत-खलिहान है

सामने साहूकार का मकान है

बगल में सड़क है

अगले मोड़ पर पीर का मजार है

उसके आगे गांव का बाजार है

असगनी पर सूख रही गेंदड़ी

और धान की बालियाें से 

एक औरत ने किया श्रृंगार है।

किसी के पास विरासत है 

किसी के पास अर्जित अधिकार है।

इंडिया गेट के सामने राजमहल है

अगल-बगल वजीरों का दरबार है

दो डेग पीछे जामा मस्जिद गुलजार है।

गीत-संगीत है

किसी को मिला मनमीत है

दूर रात के अंधेरे में जलाई जा रही 

किसी दलित लड़की की चिता है

राजा के अनुसार यही रीत है।

राम का मंदिर है

नानक का घर-द्वार है

कहीं पंडित खाता पकवान है

कनकनी में जूते गांठता चमार है

धोबी का गदहा है

बिरहा गा रहा गोवार है।

उफ्फ! कितना कुछ है

इस देश में कविताई के लिए।

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं ।

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