अखिलेश यादव का सत्ता और मेनस्ट्रीम मीडिया पर करारा प्रहार

देवी प्रसाद

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अखिलेश यादव इस बार सत्ता से लड़ने के साथ ही #गोदीमीडिया पर भी प्रश्नवाचक चिह्न लगाते नजर आ रहे हैं। क्योंकि इस बार मेनस्ट्रीम मीडिया द्वारा यूपी में विधानसभा चुनाव को सपा बनाम भाजपा ध्रुवीकृत करने का प्रयास किया जा रहा है। जहां एक तरफ़, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस समय हिन्दू-तुष्टीकरण, दलित, पिछड़ा, किसान, मुसलमान तथा जिन्ना जैसे शब्दों का प्रचलन अपने चरम पर है, जिसके कारण मुस्लिम वोट सपा की तरफ़ झुकता हुआ नजर आ रहा है। वहीं दूसरी तरफ़, पूर्वी उत्तर प्रदेश की साधारण जनता इन शब्दों को सुनने की आदी हो चुकी है। अब अल्पसंख्यक तथा दलित-पिछड़ा वर्ग के मतदाता अपने हितों को ध्यान में रखकर एक समान भागीदारी तथा हिस्सेदारी चाहते हैं। आज वे ऐसे नेता को जिताना चाहते हैं, जो जमीनी स्तर पर सबको साथ लेकर चल सके। शायद इसलिए बहुसंख्यक पिछड़ा वर्ग और अल्पसख्यक वर्ग अखिलेश यादव की तरफ़ बड़ी आशा भारी निगाहों से देख रहा है।

अधिकांशतः यह देखा गया है कि लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने वाले बहुजन नेता उत्तर प्रदेश में लोकसभा या विधानसभा का चुनाव आते ही सोशल इंजीनियरिंग करने लग जाते हैं। अगर उनके दलीय गठबंधन का फार्मूला सफल नही हो पाता है तो कुछ ही समय में अलग राप अलापने लगते हैं। जिससे सामाजिक न्याय की भावना को गहरी चोट पहुंचती है।

मुलायम सिंह यादव ‘नेताजी’ पांच बार उत्तर प्रदेश की सबसे ऊँची कुर्सी पर बैठकर सभी जातियों, पंथों और धर्मों को एक साथ लेकर चलने का प्रयास किया। उन्होंने रक्षा मंत्री का पद संभाल देश की सीमाओं की हिफाजत की तथा शहीद हुए सैनिकों को सम्मानपूर्वक उनके पैतृक गांव तक पहुँचाने की व्यवस्था की। लेकिन इन सब कार्यों के बावजूद मीडिया उन्हें सिर्फ ‘कार सेवकों पर गोली चलवाने वाला’ के रूप में ही प्रोजेक्ट करके अपनी टीआरपी बढ़ाती दिखती है।

चुनावी सर्वे के आंकड़े: जमीनी हकीकत से उलट

हाल ही में हुए उत्तर प्रदेश में पंचायती चुनावों में सपा को बहुमत मिला था, जिसे भाजपा डैमेज कंट्रोल करती दिखी। पिछले कई वर्षों से मीडिया सिर्फ एक पार्टी को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाती है। इसलिए ऐसे चमचों (मीडिया घरानों) को एक नया नाम (गोदी मीडिया) दिया गया। अगर इतिहास के आईने में झांकें तो ज्ञात होता है कि बी.आर. अम्बेडकर, कर्पूरी ठाकुर, वीपी सिंह, कांशीराम, लालू यादव, शरद यादव, मुलायम सिंह यादव जैसे अनेक कद्दावर नेता सदैव वंचित वर्ग के सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक हितों के बारे में सत्ता से टकराते रहे। जिसके कारण मेनस्ट्रीम मीडिया में बैठे प्रिविलेज जातिओं के लोगों की भौंहें इन बहुजन नेताओं पर तनी रही तथा उन बहुजन नेताओं की एक नकारात्मक छवि भी प्रस्तुत करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। किसी को ‘मुल्ला मुलायम’, ‘टोटी चोर’ तो किसी को ‘चारा चोर’ कहा गया।

मीडिया की नाइंसाफी

यदि हम उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के किसी बड़े नेता की बात करें, जो गरीब, पिछड़े और किसानों की वकालत करता हो, तब हमारा ध्यान सर्वप्रथम मुलायम सिंह यादव ‘नेताजी’ पर जाता है। उन्होंने पांच बार उत्तर प्रदेश की सबसे ऊँची कुर्सी पर बैठकर सभी जातियों, पंथों और धर्मों को एक साथ लेकर चलने का प्रयास किया। ‘नेताजी’ ने रक्षा मंत्री बनकर देश की सीमाओं की हिफाजत की तथा शहीद हुए सैनिकों को सम्मानपूर्वक उनके पैतृक गांव तक पहुँचाने की व्यवस्था की। लेकिन इन सब कार्यों के बावजूद मीडिया उन्हें सिर्फ ‘कार सेवकों पर गोली चलवाने वाला’ के रूप में ही प्रोजेक्ट करके अपनी टीआरपी बढ़ाती दिखती है।

समाज की मुख्य धारा से विमुख तथा राजनीतिक रूप से पंगु बना दिए गए पिछड़ा वर्ग में ‘नेताजी’ ने सामाजिक क्रांति का बीज बोया। जिसके फलस्वरूप, आज यह वर्ग सशक्त होकर दमदार तरीके से समान भागीदारी और राजनीतिक हिस्सेदारी की वकालत करना शुरू कर चुका है। दलित-पिछड़े वर्गों तथा अल्पसंख्यकों में व्याप्त भय को दूर करने वाले लोकप्रिय राजनेता को मीडिया घराना द्वारा सिर्फ ‘पिछड़ा वर्ग का नेता’ करार देना भी हास्यास्पद लगता है।

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सत्ता की भाषा में बात करती मीडिया

योगी आदित्यनाथ यूपी की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठने से पूर्व उस पर गंगाजल से ‘पवित्र’ करने का स्वांग भरते हैं, क्योंकि उनसे पूर्व उस कुर्सी पर बैठकर पिछले तीन दशकों से दलित-पिछड़ी जाति के नेताओं ने शासन किया। एक पढ़े-लिखे लोकप्रिय बहुजन नेता की ‘औकात’ दिखाने के लिए ‘भैंस चरा रहे होते’ जैसे निंदनीय शब्दों का प्रयोग किया जाता है और मेनस्ट्रीम मीडिया घराना उन्हें ‘यशस्वी’ मुख्यमंत्री सिद्ध करने में कोई कसर नही छोड़ता है।

राष्ट्रवादी फ्रेमवर्क के नीचे दबता सामाजिक न्याय

राममनोहर लोहिया, देवीलाल चौटाला, चौधरी अजीत सिंह, कांशीराम, सोनेलाल पटेल, मायावती तथा जनेश्वर मिश्र जैसे लोकप्रिय नेताओं ने उत्तर भारतमें जीर्णलोकतंत्र की नींव को मजबूत किया और वंचित-पिछड़े वर्ग के सशक्तिकरण तथा सामाजिक-बंधन को अक्षुण्ण रखने के लिए अथक परिश्रम भी किया। निश्चित रूप से वे बेहतर प्रसंशा के पात्र हैं, लेकिन भारतीय मीडिया इन्हें जातीय ढांचे में रखकर ही देखना पसंद करती है।

वर्तमान में वे समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। उनके मुख्यमंत्रित्व काल (2012 से 2017) में उत्तर प्रदेश की जनता ने कई अमूल-चूल परिवर्तन भी देखा, फिर भी उन्हें मेनस्ट्रीम मीडिया ‘जंगलराज के नेता’, ‘गुंडाराज’ तथा ‘यादववाद’ के चश्में से ऊपर उठकर नही देखना चाहती है। जबकि अखिलेश यादव के शासनकाल की अपेक्षा योगी आदित्यनाथ के काल में दलितों और मुसलमानों पर अधिक अत्याचार की अधिक घटनाएं हुई हैं। हाथरस, उन्नाव, गोरखपुर जैसे भद्दे दाग होने के बाद भी #गोदी_मीडिया को रामराज्य नजर आता है।

आज राजनैतिक हित को सर्वोपरि रखते हुए सत्ताधारी पार्टी ने हर घटना को अल्ट्रा-नेशनलिस्ट फ्रेमवर्क में रखकर राजनीतिक नफा-नुकसान के साथ कार्य करती नजर आती है। जिसके कारण मॉब-लिंचिंग जैसी घिनौनी सामाजिक घटनाओं में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है तथा देश में भय की लहर उठ रही है। संवैधानिक अधिकार और न्याय के लिए लड़ने वाली सिविल सोसाइटी तथा सामाजिक-राजनीतिक रूप से जागरूक समाज को ‘आंदोलनजीवी’ व ‘एंटी-नेशनल’ कहकर असहाय व कमजोर बनाने का प्रयत्न किया जाता है, जिसके परिणाम घातक सिद्ध हो सकते हैं।

अखिलेश यादव तथा रामराज्य

सबके साथ और सबके सम्मान की विचारधारा पर चलने वाले अखिलेश यादव एक लोकप्रिय युवा राजनेता होने के साथ ही मुख्यमंत्री के रूप में कार्य करने का पांच साल का अनुभव भी है। वर्तमान में वे समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। उनके मुख्यमंत्रित्व काल (2012 से 2017) में उत्तर प्रदेश की जनता ने कई अमूल-चूल परिवर्तन भी देखा, फिर भी उन्हें मेनस्ट्रीम मीडिया ‘जंगलराज के नेता’, ‘गुंडाराज’ तथा ‘यादववाद’ के चश्में से ऊपर उठकर नही देखना चाहती है। जबकि अखिलेश यादव के शासनकाल की अपेक्षा योगी आदित्यनाथ के काल में दलितों और मुसलमानों पर अधिक अत्याचार की अधिक घटनाएं हुई हैं। हाथरस, उन्नाव, गोरखपुर जैसे भद्दे दाग होने के बाद भी #गोदी_मीडिया को रामराज्य नजर आता है। हालांकि, अखिलेश यादव को भी समावेशी सकारात्मक सोंच के साथ आगे बढ़ने के साथ #गोदी_मीडिया से बहुत अपेक्षा भी नही करनी चाहिए।

सपा में समान हिस्सेदारी और सबका सम्मान 

मुलायम सिंह यादव तथा अखिलेश यादव पर ‘जातिवादी’ और ‘यादववादी’ होने का आरोप अक्सर लगाया जाता है। इसलिए अखिलेश यादव कहते हैं कि अपने छद्म राष्ट्रवाद के चोले से बाहर निकलकर उन आरोप लगाने वालों को इस रामराज्य में तैनात अफसरों की जातियां भी गिन लेना चाहिए। जहां एक तरफ़, आज अखिलेश यादव विभिन्न मुद्दों पर भाजपा को बड़ी मुश्तैदी के साथ घेरते नजर आते हैं। वहीं दूसरी तरफ़, वे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले कुछ मीडिया घरानों पर भी प्रश्नवाचक चिह्न भी लगाते नजर आते हैं।

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि बहुजन समाज के हर व्यक्ति को अपने हक की लड़ाई तन्हा ही लड़ना होगा। बहुजन समाज को अपने अतीत से भी बहुत कुछ सीखना होगा तथा झूठ के नंगे नाच को भी समझना होगा और खयाली पुलाव में किसी राजनेता के भरोसे बैठने की अपेक्षा हकीकत में जीना सीख़ना होगा।

निष्कर्ष

दलित-पिछड़ा और अल्पसंख्यक वर्ग की संख्या लगभग दो तिहाई है। पिछले तीन दशकों से यह बहुसंख्यक वर्ग अपने सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक हितों को लेकर मुखर हुआ है, लेकिन वैचारिकदृष्टि से काफ़ी बंटा हुआ है। कांशीराम जैसे कद्दावर नेताओं ने भी इसे स्वीकार किया और इस कमेरा समाज की तुलना पिंजड़े में बंद मुर्गे से की। जिस प्रकार पिंजड़े में बंद कोई मुर्गा अपने साथियों के शहादत के समय चुप्पी मारकर दाना चुगने में व्यस्त रहता है, उसी प्रकार यह 85 प्रतिशत बहुसंख्यक समाज सिर्फ अपनी बारी आने पर ही गिड़गिड़ाता है तथा न्याय की गुहार लगाता है। उदाहरण स्वरूप, जनता दल की सरकार के समय पिछड़े वर्ग (लगभग 50 प्रतिशत जनसंख्या) को मात्र 27 प्रतिशत आरक्षण देते ही देश में भूचाल आ गया तथा तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह पर प्रश्नों की बौछार किया गया। मेनस्ट्रीम मीडिया द्वारा ‘मेरिट बनाम पिछड़ा’ का नया विमर्श खड़ा किया गया। जिससे मुंह मोड़ने या बचने के लिए भाजपा को रथयात्रा तक निकालनी पड़ गई थी।

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हाल ही में ईडब्लूएस के तहत मोदी सरकार द्वारा चुपचाप 10 प्रतिशत आरक्षण सवर्णों को दे दिया गया। जिस पर मीडिया खामोश रही और साथ ही ओबीसी के अधिकांश तथाकथित रहनुमाओं ने पिंजड़े में बंद मुर्गों की तरह चुप्पी साधने में ही अपनी भलाई समझी। सिर्फ राष्ट्रीय लोकदल के युवा नेता तेजस्वी यादव ने इस फैसले पर प्रश्नचिह्न खड़ा किया। इस संदर्भ में प्रमुख विपक्षी दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भी पक्ष को उजागिर करना भी यथोचित होगा। क्योंकि यदि हम इतिहास के पन्ने में झांके तो हमें ज्ञात होता है कि बीपी मंडल ने अपनी रिपोर्ट 1980 में ही दे दिया था। मगर कांग्रेस ने एक दशक तक इस रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में ही डाले रखा, जो कि इस पार्टी की बड़ी गलती साबित हुई। इसी तरह, कांग्रेस ने फिर से पुरानी गलती को दोहराते हुए 2011 में हुए जाति जनगणना के आंकड़े को प्रकाशित नहीं कराई, जिसे सपा प्रमुख अखिलेश यादव यूपी में इस समय प्रमुख मुद्दा बनाते नजर आ रहे हैं तथा सामाजिक न्याय के मुद्दे को धार देने के लिए तीन महीने के भीतर जातीय जनगणना कराने का वादा भी कर चुके हैं।

यूपी में सात चरणों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इसलिए इस बार विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण के समय सपा प्रमुख अखिलेश यादव द्वारा समाज के सभी वर्गों को उचित हिस्सेदारी देने की यथोचित सकारात्मक कोशिश भी की है। आज उन्हें ओमप्रकाश राजभर तथा स्वामी प्रसाद मौर्या जैसे राजनेताओं का भरपूर सहयोग भी मिल रहा है। अब तो आने वाले समय में ही पता चल सकेगा कि अखिलेश यादव सामाजिक न्याय के कारवां को कितना आगे बढ़ा पाते हैं।

#लेखक हैदराबाद विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग में डॉक्टरेट फेलो हैं। इन्हें भारतीय समाजशास्त्रीय परिषद द्वारा प्रतिष्ठित ‘प्रोफ़ेसर एम॰एन॰ श्रीनिवास पुरस्कार-2021’से भी नवाजा गया हैं।

1 Comment
  1. Thank you, sir
    लेख प्रकाशित करने के लिए हार्दिक आभार.
    https://www.researchgate.net/profile/Devi-Prasad-4

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