बात पुरानी है, किंतु आज भी प्रासंगिक है। 12.06.2017 को नरेन्द्र तोमर ने यह टिप्पणी की थी, ‘वे (आरएसएस और भाजपा) भारत को 2023 तक हिंदू राष्ट्र बना देना चाहते हैं और इसको साकार करने की रणनीति पर विचार करने के लिए लगभग 150 छोटे-बड़े हिंदू राष्ट्रवादी संगठन 14 से 17 जून तक गोवा में मीटिंग करने जा रहे हैं। आरएसएस और हिंदू महासभा से जुड़े हिंदू राष्ट्र बनाने के इस विचार में 1992 में बाबरी मस्जिद गिराने के बाद एक नई जान-सी पड़ी थी। केंद्र में मोदी सरकार बनने के साथ ही आरएसएस और भाजपा फुफकारने और डंसने लगी थी। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनवा कर संघ ने तरह-तरह के नए-पुराने उग्र हिंदुत्ववादियों को पूरी तरह से बेलगाम कर दिया। हिंदू राष्ट्रवादी ये तत्व इस देश में समान नागरिक संहिता के नाम पर चाहते हैं कि लगभग 80 प्रतिशत हिंदू आबादी वाले भारत में हर किसी का खान-पान, पहनावा, रहन-सहन और पूजा-पद्धति आदि एक-समान वैसा हो जैसा ये मानते और चाहते हैं। यह कहना तो मुश्किल है कि तरह-तरह के स्वार्थों का प्रतिनिधित्व करने वाले ये हिंदू राष्ट्रवादी क्या कोई समान रणनीति बना पाएंगे, पर यह स्पष्ट है कि अपनी उग्र कार्रवाईयों के जरिए आम लोगों का ध्यान उनकी मूल समस्याओं से मोड़ने की कोशिश जरूर करेंगे।’
यथोक्त कथन से यह तो स्पष्ट होता है कि आज हम ऐसे कगार पर खड़े हैं कि न जाने कब किस प्रकार के सामाजिक बिखराव अथवा आतंक के शिकार हो जाएं। विज्ञान एवं तकनीकी के वर्तमान युग में भी धार्मिक कट्टरपंथी अपना-अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए नित नए-नए तरीके तलाशने में लगे हैं। धर्म के नाम पर उग्रवाद का सहारा लेना भी आजकल नैतिक हो गया है। मन्दिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरुद्वारे आदि का विवाद उठाना, लोगों की धार्मिक भावनाओं को भड़काना आदि इसी क्रम के आम कृत्य हैं। यही कारण है कि समय-समय पर धर्म परिवर्तन के मामले अक्सर प्रकाश में आते रहते हैं। एक आकलन के अनुसार पाया गया है कि हिन्दू धर्म सबसे ज्यादा विघटित हुआ है।
धर्म परिवर्तन का यह काम नया नहीं है। यह भी कि जब-जब भी धर्म परिवर्तन हुआ, तब-तब हिन्दुओं ने ही धर्म परिवर्तन किया। चाहे कोई ईसाई बना या सिख, चाहे कोई मुसलमान बना या बौद्ध… सब के सब हिन्दू ही रहे हैं। किंतु हिन्दू धर्म के ठेकेदारों को सदैव एक ही चिंता रही है कि उनके धर्म के लोग दूसरे धर्म में जा रहे हैं। उन्हें इसकी चिंता कभी नहीं रही कि ये लोग हिन्दू धर्म छोड़कर दूसरे धर्मों में क्यों जा रहे हैं?कट्टरपंथी हिन्दू अपने ही धर्म के पिछड़े और दलित लोगों की कोई मदद नहीं करना चाहते और न ही उनकी सामाजिक-आर्थिक दशा सुधारने के प्रयास ही करते हैं। दलितों और पिछड़ों को सामाजिक न्याय और सम्मान प्रदान करना तो कोसों दूर की गोटी रही है। जब हिन्दू समाज के दलित वर्ग के लोग हिन्दू धर्म छोड़कर कोई दूसरा धर्म ग्रहण करते हैं तो हिन्दू धर्म के नेता खूब हो-हल्ला करते हैं। वस्तुत: दलित वर्ग के लोग दूसरा धर्म इसलिए ग्रहण करते हैं कि वे अच्छी तरह समझ गए हैं कि हिन्दू धर्म में रहते उन्हें न तो सामाजिक-आर्थिक समानता मिलेगी और न ही भौतिक अत्याचारों से मुक्ति।
कहना अतिश्योक्ति नहीं कि भारतवर्ष एक ऐसा देश है, जिसके समाज में गहरा अलगाव रहा है, क्योंकि भारतीय जनसमूह में अलग-अलग प्रकार की अनेक जातियां व धर्म हैं। सबकी आर्थिक, धार्मिक एवं सामाजिक स्थिति अलग-अलग है। हिन्दू धर्म में व्यापक जाति-भेद ही हिन्दू धर्म के निरंतर विघटन का मूल कारण कहा जाएगा। स्पृश्य हिन्दू और अस्पृश्य हिन्दू के बीच की सामाजिक असमानता ने धर्म परिवर्तन में और चार चाँद लगाए हैं। कितना अफसोसनाक सत्य है कि एक हिन्दू, एक गैर हिन्दू के प्रति मुख्यत: हिन्दूपन की भावना से व्यवहार करता है, किंतु अपने ही धर्म की दूसरी जाति के हिन्दू के प्रति जाति-भावना से व्यवहार करता है।
इससे पहले कि आज की सामाजिक स्थिति पर बात की जाए, मैं दिसंबर 1992 के अयोध्या कांड पर कुछ बात करना चाहता हूँ। गौरतलब है कि दिसंबर 1992 के अयोध्या कांड के उपरांत तो अनेक नए प्रश्नों ने जन्म लिया। विभिन्न शंकाओं/ आशंकाओं ने खूब सिर उठाया। बाबरी मस्जिद के विनाश को कोई तो राष्ट्रीय एकता के पुनर्गठन की प्रतिध्वनि के रूप में देख रहा था तो कोई इसे राष्ट्रीय मूल्यों के निर्वाह की प्रतिध्वनि के रूप में। राष्ट्रीय एकता के पुनर्गठन की बात एक राजनीतिक सोच ही कही जाएगी। अयोध्या कांड को राष्ट्रीय मूल्यों के विनाश की प्रतिध्वनि के रूप में देखना समसामयिक संदर्भों में न केवल सार्थक है, अपितु तर्कसंगत भी है।
कहा जाता है कि धर्म का मनुष्य के लिए नैतिक एवं सामाजिक जीवन में सदैव महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। राजनीतिक क्षेत्र में भी धर्म ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सिद्धांत रूप में राज्य को धर्म की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। लेकिन जब धार्मिक आचरण सामाजिकता तथा नैतिकता के विरुद्ध उन्मादित हो उठे तो राज्य को उसे नियंत्रित करना ही चाहिए। इन अर्थों में धर्म को सत्ता प्राप्ति का साधन बनाना न केवल धर्म के साथ बलात्कार समान है, अपितु राजनीति के चारित्रिक पतन का द्योतक भी है। धर्माश्रित राजनैतिक दल कभी भी सामाजिक न्याय के पक्षधर नहीं कहे जा सकते, क्योंकि धर्म आध्यात्मिकता पर टिका होता है और अकर्मण्यता को जन्म देता है। इस प्रकार राजनीति के धार्मिक आचरण में न तो राष्ट्रीय हित निहित हैं और न सामाजिक हित ही। धर्म गरीब एवं निरीह लोगों को धर्म के नाम पर भूखों मरने का सबक देता है। अनेक ऐतिहासिक तथ्य हैं कि हिन्दुओं ने अपनी आध्यात्मिक सोच के तहत अनेक बार हार को आमंत्रित किया है। अकर्मण्यता की पालकी में बैठकर हिंतुत्व की स्वप्न सुन्दरी ने समाज के गरीब तबकों को सदैव उन्मादित किया है और दासों के दास बने रहने को मजबूर किया है। हिन्दू धर्म ने सदैव सामाजिक विभेदीकरण को जन्म दिया है। हिन्दू धर्म का मूल ही वर्ण व्यवस्था का जनक है और वर्ण व्यवस्था ने सामाजिक छुआछूत को इस स्तर तक पहुँचा दिया कि कानून की दृष्टि में किसी भी अछूत न समझे जाने की संवैधानिक व्यवस्था के बावजूद भी व्यवहार में अभी तक छुआछूत का भेद विद्यमान है।
कहना अतिशयोक्ति न होगा कि अन्य धर्मों के मुकाबले हिन्दू धर्म आध्यात्मक अर्थात रूढ़ीवादिता को अधिक प्राथमिकता देता है। भारत जैसे देशों में धर्म ने आर्थिक क्षेत्रों के साथ-साथ सामाजिक क्षेत्रों को भी प्रभावित किया है। हिन्दू धर्म का विश्वास है कि कर्म से मुक्ति पाकर ही व्यक्ति जन्म और मृत्यु के बन्धन से मुक्ति पा सकता है। यह मूर्खतापूर्ण मान्यता अनपढ़ों को अधिक प्रभावित करती है। उल्लेखनीय है कि भारत में हिन्दू धर्म जाति-प्रथा के पोषक तत्वों में प्रमुख हैं। हिन्दू धर्म ने श्रमिक वर्ग को अभावों भरा धर्मान्ध जीवन ही दिया है। फलत: पूंजीवादी वर्ग पूंजी के माध्यम से बिना किसी श्रम के धनी बना है और श्रमिक वर्ग सिर पर धर्मान्धता का ताज पहन कर पूंजी से वंचित धर्म के बल पर जीवन चलाता है। पूंजीवादी वर्ग न केवल शासक है, अपितु श्रमिकों का नाना प्रकार से शोषण करता रहा है।
यथोक्त के आलोक में, जगजाहिर है कि जातिगत अत्याचारों के चलते धर्म परिवर्तन की गति को बल मिल रहा है और अक्सर धर्म परिवर्तन के मामले भाजपा के प्रनिधित्व वाले राज्यों में देखने को ज्यादा ही मिलते हैं। केन्द्र में भाजपा की सरकार के चलते भाजपा शासित राज्यों में जातीय दंगों में शामिल लोगों को राज्य और केन्द्र का अघोषित संरक्षण मिलता है। हाँ! बयानबाजी में जरूर अपराधियों के खिलाफ कार्यवाही करने की बार-बार घोषणा की जाती रहती है।
यह भी कि केन्द्र में भाजपा सरकार के आते ही हिन्दुओं के स्वंभू गोरक्षकों के जैसे अपराधी समूहों की संख्या में तेज़ी से वृद्धि हो रही है। कहना न होगा कि उत्तर प्रेदश में योगी सरकार के शासन में आने के बाद से आरएसएस और उसके अनुषांगिक संगठन अपना असली रंग दिखा रहे हैं। ऐसे में पीड़ितों के पास इसके सिवाए कोई विकल्प नहीं है कि वे ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म को त्याग दें। अल्पसंख्यक वर्ग भी इस त्रासदी से नहीं बचा है। और तो और अब तो भाजपा के जरिए आरएसएस दलितों और मुसलमानों के बीच अलगाव पैदा करने का काम कर रही है जो न केवल समाज की, अपितु देश की प्रगति में बाधक है। इससे सामाजिक सद्भाव तो बिगड़ता ही है, साथ ही अनेक प्रकार की बैर भावना को स्थायित्व भी प्रदान करता है। लगता तो ये है कि भाजपा दलितों और अल्पसंख्यकों को एक पाले में इसलिए देखना पसंद करती है, क्योंकि इनकी एकता इस पार्टी के कुचालों पर भारी पड़ सकती है।
भारतीय समाज में अतीत से लेकर वर्तमान तक, राजनीति में जाति-प्रथा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। जाति प्रथा के उदय और उसके प्रचलन के बारे में कई अलग-अलग दावे और व्याख्याएं की जाती रही हैं। डॉ. अंबेडकर का मानना था, ‘जाति की जड़ें, हिन्दू पवित्र ग्रंथों में हैं।’ परंतु हिन्दुत्व की विचारधारा के पैरोकारों का कहना है कि हिन्दू समाज में सभी जातियां समान थीं। मुस्लिम आक्रांता, हिन्दुओं को मुसलमान बनाना चाहते थे और जो लोग धर्म परिवर्तन करने के लिए तैयार नहीं थे वे दूरदराज़ के स्थानों पर भाग गए और यहीं से जातिगत असमानता की शुरुआत हुई। किंतु यह व्याख्या घटनाओं की सही विवेचना नहीं है और ऊँची जातियों की दूषित सोच को प्रतिबिंबित करती है। जो लोग कहते हैं कि मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा ज़बरदस्ती धर्मपरिवर्तन करवाने की कोशिश के कारण जाति व्यवस्था जन्मी, उनके दावों का खंडन करने के लिए मनुस्मृति पर्याप्त है, जो दूसरी सदी ईस्वी में रची गई थी और जिसमें जातिगत पदक्रम का विस्तार से वर्णन किया गया है। माना जाता है कि जब मनुस्मृति लिखी गई थी, तब इस्लाम दुनिया में था ही नहीं।’
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यथोक्त बे-सिर-पैर की व्याख्या के विपरीत, स्वामी विवेकानंद बताते हैं कि दलितों द्वारा इस्लाम में धर्म परिवर्तन मुख्यतः जातिगत उत्पीड़न के चलते हुआ। औपनिवेशिक काल में भारत के अर्ध-आधुनिकीकरण की प्रक्रिया शुरु हुई परंतु इसके बाद भी जाति व्यवस्था बनी रही। आज, स्वाधीनता के 70 साल और भारतीय संविधान, जो सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है, के लागू होने के 67 साल बाद भी, जाति प्रथा जिंदा है। गोरखनाथ मठ के भगवाधारी आदित्यनाथ योगी के उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद एक बार फिर यह साबित हो गया है कि जाति प्रथा हमारे समाज में आज भी उतनी ही मज़बूत है, जितनी पहले थी। योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से उत्तर प्रदेश में दलितों पर अत्याचार की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है। सहारनपुर में हुई हिंसा इसका एक उदाहरण है। कुछ रपटों के अनुसार, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ गांवों के 108 दलित परिवारों ने योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से दलितों पर अत्याचार की घटनाएं बढ़ने पर अपना विरोध-प्रदर्शन करने के लिए बौद्ध धर्म अंगीकार कर लिया है। सहारनुपर के कुछ गांवों में, ठाकुरों और दलितों के बीच हिंसक झड़पें हुईं, जिनका मूल कारण जातिगत विद्वेष ही रहा है। ठाकुरों ने अंबेडकर की मूर्ति नहीं लगने दी और दलितों ने राजपूत शासक राणाप्रताप की जयंती मनाने के लिए एक जुलूस को निकलने नहीं दिया, क्योंकि उसके लिए विधिवत अनुमति नहीं ली गई थी। दलितों का कहना है कि क्योंकि योगी खुद ठाकुर है, अत: आदित्यनाथ की सरकार, केवल सवर्णों की सरकार बनकर रह गई है।
भाजपा के केन्द्र में आने के बाद, पिछले तीन वर्षों में दलितों के प्रति दुर्भावना और पूर्वाग्रह अलग-अलग तरीकों से प्रकट हुआ है। आईआईटी मद्रास में अंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल पर प्रतिबंध लगाया गया; हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के प्रशासन की दलित-विरोधी नीतियों के कारण वहां के शोधार्थी रोहित वेमूला की संस्थागत हत्या हुई; गुजरात के ऊना में पवित्र गाय की रक्षा के नाम पर दलितों को बर्बर ढंग से पीटा गया। दरअसल, हिन्दू राष्ट्रवाद की राजनीति, जाति व्यवस्था से दमित वर्गों के लक्ष्य से एकदम विपरीत दिशा की ओर ले जाने वाली है। हमें याद रखना चाहिए कि सामाजिक न्याय के महानतम पैरोकारों में से एक अंबेडकर ने मनुस्मृति को सार्वजनिक रूप से जलाया था। परंतु इसी मनुस्मृति का आरएसएस के चिंतकों, जैसे एमएस गोलवलकर ने महिमामंडन किया। गोलवलकर जैसे लोगों ने तो भारतीय संविधान तक का इस आधार पर विरोध किया कि जब हमारे पास मनुस्मृति के रूप में पहले से ही एक ‘अद्भुत’ संविधान मौजूद है, तो हमें नए संविधान की ज़रूरत ही क्या है? जहां अंबेडकर कहते थे कि गीता, मनुस्मृति का संक्षिप्त संस्करण है। वहीं, मोदी सरकार गीता का प्रचार-प्रसार करने में जुटी हुई है। वह वैदिक युग के मूल्यों को पुनर्जीवित करना चाहती है।
खेद की बात है कि इतने पर भी आज तक देश में हिंसा की खबरें लगतार आटी रहती हैं। अफसोस की बात ये भी है कि पुलिस और स्थानीय अखबार इसके लिए लगातार पीड़ित पक्ष को ही जिम्मेवार ठहरा रहे हैं। इस क्रम में भीम आर्मी का नाम इस प्रकार उछाला जा रहा है, जिससे ऐसा लगने लगा है कि वही संगठन हिंसा के लिए जिम्मेवार है। उल्लेखनीय है कि धार्मिक अधिकारों पर संघ परिवार का पूरा पहरा है। जानना होगा कि हिन्दू धर्म के स्वंभू हिन्दू धर्मरक्षक धर्मांतरण को तो मुद्दा बनाते हैं, लेकिन जाति पर आधारित शोषण-दमन, भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार जैसे मसले उनकी नजर में कोई समस्या नहीं हैं।
धर्मांतरण की इन घटनाओं के तटस्थ विश्लेषण से यह साफ़ हो जायेगा कि दूसरा धर्म ग्रहण करने वाले ज्यादातर लोग हिंदू समाज की दलित-वंचित जातियों के या फिर गरीब आदिवासी रहे हैं। हिंदू समाज में सबसे निचले पायदान पर रखी गई इन जातियों की सामाजिक हैसियत और उनसे ऊंची कही जाने वाली जातियों का उनके साथ क्रूरतापूर्ण बर्ताव किसी से छिपा नहीं है। ऊंची और दबंग जाति के लोग इनके साथ जानवरों सा बर्ताव करते हैं। दलित और वंचित जातियों को समाज में हर जगह भेदभाव का सामना करना पड़ता है। मंदिरों में उन्हें प्रवेश नहीं मिलता। उनका शोषण और दमन होता है। तनिक भी विरोध करने पर उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता है, जो गरीबी, अशिक्षा और अभाव से भरी उनकी जिंदगी को और भी दुखमय बना देता है। वैसे मेरे मन-मस्तिष्क में यह सवाल भी उठता है कि आखिर मन्दिर प्रवेश से दलितो को मिलने वाला क्या है? उल्टे हिन्दू धर्म की दासता ही हाथ लगेगी… और कुछ नहीं।
देखा जाय तो प्रत्येक आचरण में उसका विरोधी आचरण निहित होता है और इन विरोधी तत्वों एवं दृष्टिकोणों के आपसी अंतर्द्वद्वं के कारण ही परिवर्तन (समाज के संबंध में इसे सामाजिक परिवर्तन भी कह सकते हैं) की प्रक्रिया जन्म लेती है। आज हिन्दू समाज का बहुजन इन मूल्यों एवं अर्थों को खूब समझने लगा है और अनुपूरक प्रक्रिया के बल पर सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को निरंतर बल प्रदान करने की ओर अग्रसर है। अभी भी वक्त है कि हिन्दूवादी ताकतें आज के यथार्थ को समझें और समय रहते दलितों-वंचितों और गैर हिंदू अल्पसंख्यकों के प्रति अपने अनाचारी व्यवहार में परिवर्तन लाएं। कहीं ऐसा न हो कि भारतीय समाज का दबा-कुचला वर्ग अपने हकूक की प्राप्ति के लिए दक्षिण अफ्रीका की चाल पर चल निकले। अभी जनता द्वारा तो नहीं अपितु सत्ता के घरानों में होने भी कुछ ऐसा ही लगा है। सर्वत्र धार्मिक/ राजनीतिक उन्माद की जद में मानवाधिकार दफन किए जाने लगे हैं। सर्वत्र हिंसा का दौर चल रहा है। छोटी-बड़ी हिंसात्मक घटनाएं ही नहीं, मणीपुर जैसी विभत्स दुर्घटनाओं पर भी सरकार मुंह तक नहीं खोलती।
कहना अतिशयोक्ति नहीं कि आज हमारे लोकतंत्र की स्वायत्तता तानाशाही में बदलता जा रहा है। सरकार पर किसी का कोई अंकुश नहीं रह गया है। सरकार बिना पगाह के बैल की तरह आचरण करने में लगी है। स्वतंत्र कहे जाने वाली तमाम सरकारी ईकाइयां सरकार के इशारे पर केवल और केवल विपक्ष के नेताओं पर ही दंडात्मक कार्यवाही करने पर उतारू रहती है। हाँ, अपवाद स्वरूप एक-दो केस सत्ता पक्ष के नेताओं पर दायर कर विपक्ष के इस आरोप को नकारने का असफल प्रयास करती है कि सरकार की ईडी, सीबीआई, आयकर जैसे आदि विभाग सत्तापक्ष पर भी नजर रखते हैं।
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चमकते शहर की तलाश में उपेक्षित होते जा रहे हैं गांव
उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ महीनों से राजनीतिक भ्रष्टाचार के मामलों में जांच एजेंसी ईडी ने लगातार सक्रियता दिखाई है। वह एक के बाद एक कई छापे मार रही है और गिरफ्तारियां भी कर रही है। हालांकि, ईडी के निशाने पर लगभग सारे विपक्षी नेता और राजनीतिक दल ही रहे। इसी वजह से इस मुद्दे पर राजनीति तेज हो गई। विपक्षी दल ईडी को सरकार और बीजेपी का टूल बताने लगे हैं। सरकार ईडी को स्वतंत्र एजेंसी बताकर उसके कदमों को डिफेंड तो कर रही है, लेकिन आंकड़े गवाह हैं कि ईडी की ओर से की गई कार्रवाई में बाढ़ सी आ गई है।
सरकार और बीजेपी विपक्षी दलों के नेताओं पर कसते ईडी के शिकंजे को करप्शन के खिलाफ बड़ी कार्रवाई के रूप में प्रोजेक्ट कर रही है। वहीं, विपक्षी दल इस मसले पर जनता की सहानुभूति लेने की कोशिश कर रहे हैं। विपक्ष इसे अपने नेताओं को परेशान करने या विपक्ष शासित राज्य को अस्थिर करने की साजिश का हिस्सा बता रहा है। कुल मिलाकर संकेत साफ है कि आने वाले समय में ईडी की तमाम कार्रवाई अगले आम चुनाव में बड़ा मुद्दा बन सकती है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो यही रहेगा कि क्या चुनावों में भ्रष्टाचार निर्णायक मुद्दा बन सकता है? इसका परिणाम क्या होगा या जनमानस पर इसका असर क्या होगा? इस मामले में अब तक के ट्रेंड विरोधाभासों से भरे रहे हैं।
2014 के बाद विपक्षी नेताओं के खिलाफ ईडी के मामलों में चार गुना उछाल पाकर, 95 फीसदी का आंकड़ा छू गया है। ईडी की केसबुक में विपक्षी राजनेताओं और उनके करीबी रिश्तेदारों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी देखी गई है। विपक्षी नेता भी लगातार इसे लेकर आवाज उठाते रहे हैं। तानाशाही, सरकार का वह रूप जिसमें एक व्यक्ति या एक छोटे समूह के पास प्रभावी संवैधानिक सीमाओं के बिना पूर्ण शक्ति होती है। तानाशाही, सरकार का वह रूप जिसमें एक व्यक्ति या एक छोटे समूह के पास प्रभावी संवैधानिक सीमाओं के बिना पूर्ण शक्ति होती है। तानाशाह आमतौर पर निरंकुश राजनीतिक शक्ति हासिल करने के लिए बल या धोखाधड़ी का सहारा लेते हैं, जिसे वे धमकी, आतंक और बुनियादी नागरिक स्वतंत्रता के दमन के माध्यम से बनाए रखते हैं। वे अपने सार्वजनिक समर्थन को बनाए रखने के लिए बड़े पैमाने पर प्रचार की तकनीकों का भी इस्तेमाल करते हैं। 19वीं और 20वीं शताब्दी में लोकतंत्र में तानाशाहों के शासन ने कई अलग-अलग रूप ले लिए हैं।
भारत में नित्य पनपती हिंसा और मानवीय मूल्यों के गिरते दौर में आतंकवाद और सामाजिक अलगाव पैदा करने वाले हाल ही में दशहरा के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ चीफ मोहन भागवत ने विजयादशमी के अवसर पर नागपुर की रैली में अपने भाषण में संघ के मुस्लिमों के बीच पहुंच बढ़ाने की कोशिश करते हुए कहा कि आखिर एक ही देश में रहने वाले इतने पराए कैसे हो गए? संघ प्रमुख का इशारा मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधियों से मुलाकात को लेकर स्वयंसेवकों की तरफ से उठ रहे सवालों की तरफ था। भागवत ने कहा कि अविवेक और असंतुलन नहीं होना चाहिए। अपना दिमाग ठंडा रखकर सबको अपना मानकर चलना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि विक्टिम हुड की मानसिकता से काम नहीं चलेगा। कोई विक्टिम नहीं है।
यहाँ यह सोचना ही चाहिए कि आखिर मोहन भागवत जो वर्गवादी व्यवस्था और धार्मिक कट्टरता को उभारने काम करते हैं, उन्हें किस मजबूरी में अपने बयानों को मानवातावादी आदर्शों की ओर मोड़ देने को विवश होना पड़ा है। किंतु बहुजन समाज को उनके ऐसे दो-तरफा बयानों के तले नहीं दबना चाहिए। वह इसलिए एक तरफ तो आरएसएस सामाजिक व्यवस्था को सर्वहितकारी बनाने का बयान देती है और दूसरी तरफ हिंदू मंदिरों में खुलेआम शस्त्र पूजन और नियमित रूप से शस्त्र विद्या का प्रीशिक्षण देने का काम करती है। विदित रहे कि यदि साँप डंसना छोड़ भी दे तो फुफकारना तो कतई नहीं छोड़ सकता।