ओबीसी साहित्य की दार्शनिक पृष्ठभूमि

हरेराम सिंह

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साहित्य में जो संघर्ष है, उसका भी हमारा और तुम्हारा है। वरना तुलसी के अति प्रिय राम और सूरदास के कृष्ण नहीं होते।कबीर का राम सगुण भक्तिवालों से भिन्न नहीं होते। यही हमारा तुम्हारा तो साहित्य का द्वंद है। जिससे साहित्य का पक्ष निर्मित होता है। साहित्य और सत्ता का गहरा संबंध है। जिनके साहित्य विस्तृत हैं, सत्ता उन्हीं के हाथों में है। साहित्य का सौंदर्य मजदूरों के पसीने में, किसानों की कुदालों में, मछुआरों के जालों में, सैनिकों की ढालों में और लोगों के इकबाल में है। इसे देखना है तो खुद संवेदनशील बनिए। और अपने मन के दीप को जलाये रखिए, स्नेह का घी डालकर उसे बचाए रखिए! वरना, यह जीवन नीरस बन जायेगा। दिल बहलाने व खेतों में काम करने चला जाता हूँ किसानों के पास तो कुछ लोग पूछते हैं, क्या मिलता है, वहाँ जाने से? मैं कहता हूँ- वह किसान हमारा पिता है और धरती हमारी माँ! और जो कलकल नदी बह रही है, जिसके पास अक्सर मैं जाता हूँ, वह मेरी साहित्य सरिता है। उनसे मैं कहता हूँ- जो नदी के पास सुकून मिलता है, वह और कहाँ? जो खेतों की मेंड़ पर आनंद है ,वह और कहाँ? श्रम में सौंदर्य की आत्मानुभूति का नाम ही तो ओबीसी साहित्य है। यह हमारा अपना है। और  वहाँ सिर्फ कला है, न दूसरे का, वज्र जीवन है, न संघर्ष है, और न हीं वहाँ श्रम की इज्जत है।ओबीसी साहित्य में सबसे अधिक श्रम का सम्मान है।
फकीर मोहन सेनापति

जहां साहित्य जिंदा है, वहां इंसानियत बची है! साहित्य सच और झूठ से बनी खिचड़ी है, जो स्वास्थ्य और जीवन के लिए बहुत उपयोगी है। साहित्य सिर्फ बाँसुरी की आवाज नहीं, वह वक्त की आवाज भी है, जहाँ लाठी की आवाज है हड्डियों की चटकने की आवाज है, बंदूकों की गरजन है और माँ के पुचकारने की आवाज हैं, बेटी की सिसकने की आवाज है पिता की डपट है और दादा के पुकारने की आवाज है अर्थात साहित्य में आवाज ही आवाज है…और यह ओबीसी साहित्य का अभिन्न अंग है।और यह विश्व भर में श्रमिकों, शिल्पियों, कृषकों व पशुपालकों की जरूरी आवाज है। फकीर मोहन सेनापति ओड़िया साहित्य व ओबीसी साहित्य के बड़े रचनाकारों में से हैं। वे उड़िया साहित्य को विश्वस्तरीय बनाने वाले साहित्यकार हैं। इन्हें पढ़कर वहां की सांस्कृतिक, राजनीतिक, सामाजिक जीवन का यथार्थ दर्शन हो जाता है। समय व काल की दृष्टि से वे प्रेमचंद से पूर्व के सबसे बड़े साहित्यकारों में से हैं। उनका जन्म मकर संक्रांति को 1843 ई. में उत्कल प्रदेश में हुआ। साहित्य एक ऐसा दरिया है जिसका एक मोती पाकर इंसान पूरी जिंदगी गुजार ले। साहित्य सृजन का आधार है, इसे बचाए रखना हमारा फर्ज है वरना पूरी मानव जाति अस्तित्वविहीन हो जाएगी। साहित्य युग सत्य का दूसरा नाम है। जहां समय विद्रूप व बलशाली है और उससे भी विद्रूप व बलशाली इंसान है जो समय के रथ को जिधर चाहता है उधर मोड़ देता है। जीवन को साहित्य सृजित करता है, उसे संघर्ष के लिए तैयार करता है। वह जीवन के प्रति आस्थावान बनाता है। साहित्य जीवन मूल्यों को भविष्य के लिए बचा लेता है, जहां साहित्य की उपेक्षा हुई वहां इंसानियत हारी और बर्बरता व क्रूरता बढी फूल सा जीवन कांटा बना। स्वर्ग सी धरती नीरस व उदास बनी। जीवन से उल्लास का सोता सूखा और मन बंजर हुआ। साहित्य जीवन को अर्थपूर्ण व लचीला बनाता है। यह तनाव को कम करता है। विभिन्न पात्रों के जरिय इंसान को विभिन्न परिस्थितियों में जीने की ताकत देता है।

ब भी आप किसी कला का दर्शन किए, आप अपने आप से पूछिए कि संदर्भित कला में आप हारते हुए दिखाई देते हैं या जीतते हुए? मैं पूर्ण विश्वास के साथ कहता हूं। उस कला में आप कहीं न कहीं हैं। बस देखने की जरुरत है। और उसी से यह भी मालूम हो जाएगा कि वह कला या कलाकार आपका है या आपके वर्ग शत्रु का। सिनेमाई करेक्टर चुलबुल पांडेय को चुलबुल डोम बना दीजिये और कुम्हार पुत्री नायिका को पांडेय पुत्री बना दीजिये, तब देखिए करेक्टर का प्रभाव। बहुत लोग पचा नहीं पाएंगे। ऐसे करेक्टर से खेलने वाले लोग खेलते हैं। करेक्टर वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है। इसी तरह लोग इतिहास से भी लोग खेलते हैं और खेल रहे हैं।

यही कारण है कि साहित्य की सार्थकता आज तक बनी हुई है। साहित्य का रिश्ता भी मनुष्यों से अजीब सा है! जब मनुष्य स्वयं को अच्छा बनाना चाहता है, तो साहित्य उसका भरपूर मौका मुहैया कराता है। साहित्य के भीतर अद्भुत क्षमता है और इसी क्षमता का प्रयोग कर मनुष्य को मनुष्य बनाया जा सकता है। साहित्य का संबंध मनुष्य की चेतना से है। और चेतना ही जीवन को प्राणवान बनाती है। चेतनाहीन मनुष्य पशु के समान है और पशु को गुलाम बनते देर नहीं लगती। इसलिए जहां समृद्ध साहित्य है वहां का मनुष्य गुलाम कभी नहीं बन सकता। साहित्य का संबंध मंगल से है। और यह मंगल तब तक नहीं होगा जब तक समाज का वंचित तबका मान सम्मान हासिल नहीं करता, वह मुख्य धारा का हिस्सा जब तक नहीं बनता, साहित्य का कार्य पूरा नहीं होता। साहित्य का सृजन किसी घटना से कम नहीं, जो एक काल को जीवनप्रदान कर उसे भव्य और अर्थपूर्ण बनाता है। उल्लास व विषाद का गहन चित्रण साहित्य है। परिस्थितियों के रंग उसे और चटक बना देता है। कला में वहां की जनाकांक्षा, शैली व परंपरा अपने आप आ जाती है जब कलाकार अपने समय व समाज को जीवन में क्या पाया और खोया इसका सही-सही आकलन साहित्य करता है। साहित्य जहाँ जड़ता को तोडता है वहीँ भावुकता पर एक सीमा के बाद अंकुश लगाता है। संतुलन बनाना साहित्य का दायित्व है। साहित्य इतिहास का एक अंग है जहाँ भविष्य आतुर होकर प्रश्न पूछता है और उसके प्रश्न उसकी दीर्घता व महानता निर्भर करता है, इसलिए साहित्य की राह सचेतन की राह है। एक माँ की तरह लेखक यदि अपनी रचना के प्रति सचेत अगर हो उसके द्वारा रचित साहित्य सुंदर व कल्याणकारी होगा। माँ का ह्रदय यदि विशाल व आँखें दूर दृष्टि वाली हैं तो उसकी संतान अद्भूत होगी ठीक उसी तरह लेखक महान प्रवृति का होगा तो संभव है उसकी रचना भी महान होगी। साहित्य लेखक का लक्ष्य कृति का लक्ष्य है। साहित्य का नायक आमजन का नायक होता है, खासकर ओबीसी साहित्य का, इसीलिए उसका प्रभाव व्यापक होता है। आमजन व वंचित वर्ग से ताल्लुक रखने वाले नायक खूब पसंद किये जाते हैं क्योंकि वे संघर्ष से उपजे होते हैं। जब आम इंसान आसमान की ओर देखता है तो उसकी आँखों में आश्चर्य और उत्सुकता ज्यादा जागृत होती है जो उसे कभी उदास करती है और कभी खुशी प्रदान करती है। साहित्य भी आसमान की तरह ही है जहाँ तारे हैं तो टूटते हुए उल्का पींड भी। पर आश्चर्य और नयापन सर्वत्र है, यह ओबीसी साहित्य की विशेषता है। ओबीसी साहित्य का खुरदुरापन मानव समाज का खुरदुरापन है। इस खुरदुरापन में जीवन का सच छुपा है। चूँकि जीवन सरल और सपाट नहीं है। इसलिए साहित्य भी इकहरा नहीं है। इंद्रधनुषी रंग से लेकर मिट्टी के भूरेपन की चमक साहित्य के औजार हैं। इसे संजोकर रखना चाहिए, यही ताकत देते हैं। मन की प्रवृतियों के भेदन से ही साहित्य का भेदन होता है इससे शासक वर्ग तिलमिला जाता है वजह उसका चरित्र आंखों के सामने होता है। साहित्य का इतिहास भी मानव संघर्ष का इतिहास है। और जिस समाज या वर्ग का साहित्य नहीं है उसका इतिहास अधूरा होता है। अतीत और वर्तमान के बीच गहरा रिश्ता है। साहित्य उन रिश्तों की पड़ताल करता है और हकीकत आपके सामने होती है। यही साहित्य का मूल्य है जो छीज नहीं पाता,वह दृष्टिसंपन्न बनाता है। तब आप कहेंगे कि साहित्य में हमारा तुम्हारा कहाँ? पर, आप उस वक्त तुम भूल कर रहे होते हैं, क्योंकि पूंजूवादियों व द्विजवादियों का साहित्य आमजन को सत्ता से दूर रहने के सलाह देते हैं और ओबीसी साहित्य आमजन को सत्ता में जाकर,आमजन के लिए काम व नीति बनाने की सलाह देते हैं। यही साहित्य का हमारा और तुम्हार है, जो विश्व के सर्वहारा और बुर्जुआ साहित्य के बीच के अंतर को रेखांकित करता है। और यही हमारा-तुम्हारा आमजन में विश्वास को जन्म देता है और यकीनन हम, सर्वहारा साहित्य के साथ हैं। ओबीसी साहित्य, दलित साहित्य व आदिवासी साहित्य मिलकर सर्वहारा साहित्य के उतरदायित्वों को पूरा करते हैं और आज यह अपना परचम लहरा रहे हैं। राजेंद्र यादव, रमणिका गुप्ता और राजेंद्र प्रसाद सिंह इसे बखूबी स्थापित किए और यह आज सर्वस्वीकृत व मुख्य-धारा के साहित्य बन जनता को सभ्य व आंदोलित करता है। और यही हमारी प्रतिबद्धता है। साहित्य का यहीं संघर्ष है, यही उसका हमारा व तुम्हारा है। इसे तुलसी साहित्य व कबीर साहित्य के बीच के अंतर से अच्छी तरह समझा जा सकता है। यही साहित्य का द्वंद है। कबीर के राम व तुलसी के राम का द्वंदवाद है। साहित्य का संघर्ष ही चेतना को विराट बनाता है। यह संघर्ष ओबीसी साहित्य का मूलाधार है।

 

मंडल आयोग और ओबीसी साहित्य

ओबीसी साहित्य

ओबीसी की समस्याओं और उपलब्धियों को रेखांकित करना प्रत्येक ओबीसी का धर्म है। ओबीसी भारतीय समाज का वैज्ञानिक क्लासिफिकेशन है, अतएव ऐसा साहित्य जो इस क्लासिफिकेशन को संपूर्णता में प्रतिबिंबित करता है, वह ओबीसी साहित्य ही है। देश भर में ओबीसी लेखकों की कमी नहीं है और न ही उनके द्वारा रचित साहित्य की कमी है, बस जरूरत है यह बताने की कि फलां ओबीसी लेखक हैं। अगर ओबीसी लेखक संगठन बनता है, तो ओबीसी लेखक और उनका साहित्य स्वत: स्पष्ट हो जाएगा, लोलो-पोपो या कनफ्यूजन नाम की कोई बात रह ही नहीं जाएगी। मतलब, ओबीसी लोगों के लिए ओबीसी द्वारा लिखा गया साहित्य ही ओबीसी साहित्य है। ओबीसी पर शोध करने के लिए सभी फ्री हैं। फिलहार सीडी सिंह की पत्रिका पहचान ओबीसी साहित्य को प्रमुखता से छाप रही है। कौन प्रयासरत हैं, की जगह सभी ओबीसी लेखक प्रयासरत हो जायें, तो किसी का मुंह ताकने वाली बात ही नहीं रह जाएगी। पर, दूसरे के द्वारा लिखा साहित्य ओबीसी साहित्य होगा कि नहीं यह फ्यूचर बताएगा, कारण कि ओबीसी के मिजाज को गैरों द्वारा लिखा ओबीसी साहित्य कितना ताकत दे रहा है, यह तो पूरी ओबीसी बिरादरी व ओबीसी के मान्य एक्सपर्ट बनाएंगे, पर निर्णायक भूमिका ओबीसी जनता करेगी या उन पर पड़ा प्रभाव ही बताएगा। पर,इतना स्पष्ट है जिन्हें ओबीसी से ही नफरत है वह पूतना मां की तरह ओबीसी कृष्ण को गोद में ही मार देना चाहेंगे। क्योंकि न ओबीसी कृष्ण रहेगा और न ही इंद्र को चुनौती देगा। आगे आप लोग भी सोचिए। हां, ‘रोअना बालक’ की तरह मैं किसी ओबीसी को नहीं देखना चाहता हूँ, न ही कुछ मूल निवासी संघों या कुछ दलित साहित्यकारों जैसा हर बात में दूसरों को दोष देना ही साहित्य का असल मकसद समझते हैं। ओबीसी साहित्य आत्मनिरीक्षण करने का भरपूर अवसर देता है, न कि हर बात में गैरों को दोष देकर काम का इतिश्री समझता है। चूकि आप देखेंगे कि ओबीसी आयोग का गठन एक वैज्ञानिक पद्धति पर हुआ है। यह समाज के मुख्य धारा से वंचित लोगों को जोड़ता है। आप ओबीसी आयोग को जिस तरह जातिवादी सिद्ध नहीं कर सकते, ठीक उसी तरह ओबीसी साहित्य को भी आप जातिवादी नहीं कह सकते। यही तो ओबीसी आयोग व ओबीसी साहित्य की विशेषता है कि इसमें जाति का जिक्र रहेगा, पर जातिवाद नहीं रहेगा। मतलब यह कि दोनों का उद्देश्य मानसिक व सामाजिक रूप से कमजोर बना दिए गये या किंहीं कारणों से बन गये लोगों को सबल बनाना एवम् मुख्य धारा से जोड़ना है। ताकि देश वास्तव में सबल व सक्षम बन सके। ओबीसी साहित्य व आयोग सामाजिक, शैक्षिक व मानसिक स्तर पर पिछड़ गये लोगों को सबल बनाने का काम करता है।

डॉ.ललन प्रसाद सिंह के मुताबिक जिसका दर्शन मजबूत रहता है जीत उसी की होती है। सिनेमा व साहित्य में भी किसी न किसी वर्ग की जीत या हार ही दिखाई जाती है। साधारण शब्दों में कहें तो कला जीत और हार का कलात्मक प्रस्तुति है। जब भी आप किसी कला का दर्शन किए, आप अपने आप से पूछिए कि संदर्भित कला में आप हारते हुए दिखाई देते हैं या जीतते हुए? मैं पूर्ण विश्वास के साथ कहता हूं। उस कला में आप कहीं न कहीं हैं। बस देखने की जरुरत है। और उसी से यह भी मालूम हो जाएगा कि वह कला या कलाकार आपका है या आपके वर्ग शत्रु का। सिनेमाई करेक्टर चुलबुल पांडेय को चुलबुल डोम बना दीजिये और कुम्हार पुत्री नायिका को पांडेय पुत्री बना दीजिये, तब देखिए करेक्टर का प्रभाव। बहुत लोग पचा नहीं पाएंगे। ऐसे करेक्टर से खेलने वाले लोग खेलते हैं।

 

साहित्य का अदर(Other)
साहित्य का ‘अदर’ , समाज का ‘अदर’ है और यह ‘अदर’ ही वर्ग संघर्ष का मूल है। क्या ओबीसी सचमुच ‘बंच ऑफ कास्ट’ है? फिर ‘अदर’ क्या है? ‘बैकवर्ड’ क्या है और ‘क्लास’ क्या है? क्या इतना संकीर्ण है ओबीसी? मेरे जाने नहीं। ऐसे पूरा भारत ‘बंच ऑफ कास्ट’ है, पर भारत और कुछ भी है और इससे बड़ा भी है, ठीक उसी तरह ओबीसी भी है। निश्चित ही ओबीसी साहित्य का निर्धारण ओबीसी की प्रवृत्तियों पर ही होगा। जैसे दलित साहित्य, काला साहित्य व आदिवासी साहित्य की कसौटियां हैं। पहले रचनाएँ विकसित होती हैं, जो किसी न किसी समाज की प्रतिनिधित्व करती हैं, उनकी मानसिकता को अभिव्यक्त करती हैं, यह मानसिकता ही प्रवृत्तियों का रूप धारण करता है। कला और साहित्य में यह प्रवृति यहाँ मूर्त व अमूर्त, स्पष्ट या अस्पष्ट, साफ-साफ या धुंधले रूपों में उभर कर सामने आती हैं। उदाहरण के तौर पर डॉ. लाल रत्नाकर, राकेश दिवाकर की पेंटिग्स को देख सकते हैं, उपन्यास में रेणु, मधुकर सिंह, राजेंद्र यादव, बनाफर चंद्र, ललन प्रसाद सिंह, व सुधीर मौर्य आदि अनेकों साहित्यकारों संजीव व रमणीका गुप्ता आदि की रचनाओं में वह प्रवृत्तियाँ स्पष्ट नजर आती हैं। इन प्रवृत्तियों में ईश्वरीय सत्ता का विरोध, जातिगत श्रेष्ठता का खंडन, श्रम के महत्व का प्रतिपादन, सत्ता में पिछड़ों का संघर्ष, कृषक या गोपालक या शिल्पी महिलाओं का संघर्ष व स्वाभिमान का चित्रण, इतिहास के प्रति सजगता, शिक्षा व अन्य सेवा में पिछड़ों का योगदान व मानव सेवा का गुरुतर संकल्प, खाँची, कुदाल, हल, बैल, बरछी का महत्व आदि हजारों प्रवृतियां ओबीसी साहित्य को एक खार रंग देती है,जो हू-ब-हू न तो सवर्ण साहित्य में है और न दलित साहित्य में। ओबीसी स्त्री व पुरुष का करेक्टर व काम करने का अंदाज भी अलग है, भावनाओं को व्यक्त करने की भाषा, भंगिमा व शब्दों का चुनाव भी भिन्न है, जो ओबीसी साहित्य की कसौटी है। ओबीसी का बौद्धिक जन, श्रमिक जन और शातिर जन तीनों में सवर्णों व दलितों से भिन्न है। आप लालू जी की भाषा, शरद जी की भाषा, मोदी व मुलायम जी, मायावती जी, राहुल जी, दिग्विजय सिंह, मुरली मनोहर जोशी आदि राजनीतिज्ञों के कैरेक्टर व भाषा से भी ओबीसी की प्रवृत्तियों से पकड़ लेंगें, जैसे पंडित जी की भाषा और यादव जी की भाषा और कैरेक्टर दोनों के अपने-अपने रूप हैं, जैसे किसी कुशवाहा व जाटव में अंतर है। खैर, ओबीसी की प्रवृत्तियां हर जगह स्पष्ट है। वरना, लेक्चरर या अन्य बड़े इंटरव्यू में भाषा व भंगिमा के आधार पर इतनी बड़ी धांधली न होती, जहां तिवारी जन माल मार ले जाते हैं और कूर्मीजन आउट कर दिए जाते हैं और यह इतना गोपन तरीके से मानस के धरातल पर होते हैं कि कोई भेदभाव का एवीडेंस भी नहीं मिल पाता और संविधान के मूल उद्देश्य से खेलकर लोग संविधान की दुहाई देते हैं। यह भी वर्ग संघर्ष है। और आप जानते हैं ओबीसी एक वर्ग है। और ओबीसी साहित्य उस वर्ग के संपूर्ण करेक्टर को प्रस्तुत करता है। पर, यह ओबीसी साहित्य केवल शूद्रों का साहित्य है, ऐसा नहीं कहा जा सकता, वजह-अगर ओबीसी शूद्रों का केवल वर्ग होता तो इसमें कुछ ब्राह्मण, राजपूत व प्राचीन क्षत्रिय न होते। खैर, मैं इस आलेख द्वारा मनुस्मृति के नव निर्माण की ओर नहीं बढ रहा, जैसा कि कुछ लोग आरोप लगा रहे हैं। बल्कि भारत में किस तरह का वर्ग संघर्ष है, उसे परिभाषित करने का प्रयास कर रहा हूं। भारत में गरीबी-अमीरी के साथ जातियों का कैरेक्टर भी लिपटा रहता है, जिसे व्यक्त करने में लोग मुंह चुराते हैं। और इसी वजह से यहाँ का वर्ग संघर्ष साफ तौर पर आईडेंटीफाई नहीं हो पाता। इसलिए यहाँ का वर्ग संघर्ष केवल आर्थिक न होकर के, सामाजार्थिक होता है। मैं वर्ग संघर्ष के विशुद्धतावाद की बात नहीं कर रहा, जहाँ सिर्फ व सिर्फ़ आर्थिक आधारवाला संघर्ष ही वर्ग संघर्ष माना जाएगा, भारत के लिए अभी यह यूटोपिया या आदर्शवाद जैसा कुछ है, मैं भारत का ‘रियल क्लास स्ट्रगल’ की बात कर रहा हूं, जो यहाँ के परिप्रेक्ष्य में है। और ओबीसी साहित्य उसी संघर्ष व मन:चेतन का प्रतिफल है।
हिंदी सिनेमा में ओबीसी चरित्र
आप बेगूसराय या मिर्जापुर देखिए। आप स्पष्ट हो जाएंगे कि कुछ जाति विशेष के प्रभुत्व को उभारकर शेष समाज को यह बताया जाता है कि तुम कहीं नहीं और कुछ नहीं हो। कला के इस खेल में पिछड़े सचमुच पिछड़े हैं। बकौल चितरंजन सिंह हिंदी सिनेमा या सीरियल में उच्च लोगों की मौत भी रॉयल दिखलाई जाती है और छोटे लोगों की मौत कुत्ते से भी बद्तर इस तरह उच्च लोगों की मौत भी एक आदर्श बन जाती है और छोटे लोगों की मौत घटिया। ऐसा करेक्टर हिंदी सिनेमा में कई जगह देखने को मिलेगा। आप सिनेमा का नाम ‘राजपूत’, ‘क्षत्रिय’ देखेंगे पर, शायद आपको कोई फिल्म दिखे जिसका नाम ‘यादव’ या ‘कुशवाहा’ हो। अगर ऐसा कोई करता है तो उस पर जातिवाद का आरोप लगाया जाएगा। पर, इसे नजरअंदाज कर जैसे वे काम कर जाते हैं, आपको भी कर जाना चाहिए। किसी ने लिखा था -इतिहास का जिक्र उसी का होता है जो पन्नों पर, पत्थरों पर या दिल में होते हैं, शेष को कोई नहीं जानता। अभी तो यह भी देखने में आ रहा है कि एक काल विशेष में बहुतों का ब्रह्मणीकरण हो रहा था, आज एक बड़ा तबका बहुत कुछ का शूद्रीकरण कर रहा है। यहां क्षत्रियकरण भी होता है और वैश्यीकरण भी। यहां का वर्ग संघर्ष कुछ इसी प्रकार का है। कला को बिना राजनीतिक ज्ञान के समझा नहीं जा सकता। कला पर दर्शन का प्रभाव भी रहता है।
डॉ.ललन प्रसाद सिंह के मुताबिक जिसका दर्शन मजबूत रहता है जीत उसी की होती है। सिनेमा व साहित्य में भी किसी न किसी वर्ग की जीत या हार ही दिखाई जाती है। साधारण शब्दों में कहें तो कला जीत और हार का कलात्मक प्रस्तुति है। जब भी आप किसी कला का दर्शन किए, आप अपने आप से पूछिए कि संदर्भित कला में आप हारते हुए दिखाई देते हैं या जीतते हुए? मैं पूर्ण विश्वास के साथ कहता हूं। उस कला में आप कहीं न कहीं हैं। बस देखने की जरुरत है। और उसी से यह भी मालूम हो जाएगा कि वह कला या कलाकार आपका है या आपके वर्ग शत्रु का। सिनेमाई करेक्टर चुलबुल पांडेय को चुलबुल डोम बना दीजिये और कुम्हार पुत्री नायिका को पांडेय पुत्री बना दीजिये, तब देखिए करेक्टर का प्रभाव। बहुत लोग पचा नहीं पाएंगे। ऐसे करेक्टर से खेलने वाले लोग खेलते हैं। करेक्टर वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है। इसी तरह लोग इतिहास से भी लोग खेलते हैं और खेल रहे हैं।

हरेराम सिंह हिंदी के जाने-माने युवा कवि,आलोचक व कथाकार हैं और बिक्रमगंज, बिहार में रहते हैं।

1 Comment
  1. Singh Sujeet Kumar says

    ओबीसी साहित्य के इतिहास पर काम करने की आवश्यकता है। फकीरमोहन सेनापति और कुछ आधुनिक ओबीसी साहित्यकारों का नाम लेने भर से काम नहीं चलेगा।

    फिर भी, इस आलेख में बहुत-सी महत्वपूर्ण बातें कही गयीं। हरेराम सिंह को बधाई और शुभकामनाएँ!

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