Wednesday, May 29, 2024
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पुलिसिया दमन सत्ता के इशारे के बिना मुमकिन नहीं..

दूसरा हिस्सा  जांच में झूठी निकली पुलिसिया कहानी  पुलिस की विराट मानवता का गान करने वाली इस कहानी के उलट एक तीसरी कहानी बल्कि क्षेपक भी है जिसे पुलिस द्वारा तैयार झूठे गवाहों ने जांच के दौरान सुनाई। उन्होंने यह बताया कि एस ओ जी टीम के जाने के पंद्रह मिनट बाद श्यामू कहीं से […]

दूसरा हिस्सा 

जांच में झूठी निकली पुलिसिया कहानी 

पुलिस की विराट मानवता का गान करने वाली इस कहानी के उलट एक तीसरी कहानी बल्कि क्षेपक भी है जिसे पुलिस द्वारा तैयार झूठे गवाहों ने जांच के दौरान सुनाई। उन्होंने यह बताया कि एस ओ जी टीम के जाने के पंद्रह मिनट बाद श्यामू कहीं से आया और एक चाय की दुकान पर पहुँचकर अपनी जेब से एक पुड़िया निकाल कर उसे खा गया और कहने लगा कि उसने ज़हर खा लिया है। जो पुलिसवाले उसके भाई को पकड़कर ले गए हैं उन सालों को पता चलेगा।  यह कहकर वह क्वारसी थाने की तरफ दौड़ने लगा।

इस मामले की जांच तीन बार हुई। एक बार स्थानीय पुलिस और दो बार सी बी सी आई डी ने की।  दो बार मामले में लीपापोती और हेराफेरी करके अपराधी पुलिसकर्मियों को बचाने का प्रयास किया गया लेकिन तीसरी बार सी बी सी आई डी ने गहन छानबीन करके कुछ ऐसे साक्ष्यों को ढूंढ निकाला जिनके आधार पर आसानी से यह साबित हो जाता है कि पुलिस ने बेरहमी से श्यामू को मार डाला था।

जाँच के दौरान पुलिस के गवाह और उनकी रटी हुई कहानी फर्ज़ी साबित हुई। पोस्टमार्टम और बिसरा रिपोर्ट में भी यह साफ ज़ाहिर हुआ था कि श्यामू की मौत दम घुटने से हुई और ज़हर उसके शरीर में नहीं फैलने पाया था। दीनदयाल अस्पताल के सामने चाय की दुकान पर उसने ज़हर नहीं खाया था। सबसे बड़ी बात कि जिस चाय की दुकान का ज़िक्र गवाहान के बयानों में बार-बार हुआ है उसे चलाने वाले ने कहा कि न तो एस ओ जी वाले हमशक्ल भाइयों को लेकर आये थे, न किसी की पहचान कराई गई और न ही किसी ने वहां ज़हर ही खाया था। यहाँ तक कि कुछ तथाकथित चश्मदीदों को घटना की सूचना अगले दिन अख़बार से हुई थी।

दूसरा झूठ यह था कि दोनों भाई हमशक्ल थे और उनमें आसानी से अंतर नहीं किया जा सकता था। उनकी तस्वीरें देखने और रिश्तेदारों के बयानों से यह बात सामने आई कि रामू भरे शरीर और चौड़े चेहरे वाला है जबकि श्यामू दुबला-पतला और पिचके चेहरे वाला था और दोनों को आसानी से पहचाना जा सकता था।

[bs-quote quote=”पुलिस ने लड़की से उस समय बयान दिलवाया जब उसके माँ-बाप नारी संरक्षण गृह जैतपुरा आते-जाते थे लेकिन बयान के समय उन्हें नहीं बुलाया गया। नारी संरक्षण गृह जैतपुरा की अधीक्षिका के अनुसार लड़की को बंगलौर की एक संस्था ने उसे सुपुर्द किया था। लेकिन जब मानवाधिकार जन निगरानी समिति के अनूप श्रीवास्तव ने इस मामले में बंगलौर के जिला प्रोबेशन कार्यालय से सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी कि वह किस संस्था में कितने दिन रही तो वहां से कोई जवाब ही नहीं आया” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

तीसरी झूठी बात पुलिस और गवाहों के उस बयान से पकड़ी गई जिसमें उन्होंने कहा था कि जब श्यामू को अस्पताल ले गए तब वह पेंट शर्ट पहने हुए था जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में लिखा हुआ था कि उस वक्त वह केवल चड्ढी-बनियान और शर्ट पहने हुए था। जैसे जैसे एस ओ जी टीम के सदस्य अपनी गर्दन फंसता देख रहे थे उनकी बेचैनी बढती जा रही थी।  उन्होंने रामू को कई लाख रुपयों का लालच दिया लेकिन उसने इंकार कर दिया।

इस मामले में सी बी सी आई डी ने सातों पुलिसकर्मियों को हत्या का दोषी पाया और मुकदमा चलाने की संस्तुति की।

पुलिस की कहानियाँ हर कहीं झूठ का पुलिंदा साबित होती हैं 

बनारस की रेहाना बानो की लड़की रौशन जहाँ उर्फ़ निशाँ के गायब होने, मिलने और माता-पिता को सुपुर्दगी के दरम्यान बनारस पुलिस ने जिस तरह लीपापोती और धोखाधड़ी करके अपराधी को बचाने का प्रयास किया है वह पुलिस के चरित्र पर कभी न मिटनेवाला धब्बा है। इसके साथ ही गरीबी की भीषण मार झेलती रेहाना बानो के जीवट की यह अद्भुत कहानी है जिसने किसी दबाव और लालच के आगे झुकने से न केवल इनकार किया बल्कि न्याय के लिए अपना संघर्ष जारी रखा और विजयी हुई।

रेहाना कनई सराय, हरपालपुर लोहता वाराणसी की रहने वाली है और उसका परिवार साड़ी कटाई, चूना पुताई, चारपाई बुनाई जैसे मेहनत-मज़दूरी के काम से जीवन-यापन करता है। उसकी सोलह साल की बेटी रौशन जहाँ साड़ी व्यवसायी और गद्दीदार (ताज शिल्क सारीज) शाहिद जमाल निवासी मकान नंबर डी –31/331, डी -1 ए , चश्मा फेयर के निकट, मदनपुरा, वाराणसी के यहाँ रहकर कई बरस से घरेलू नौकरानी का काम कर रही थी। इसके बदले शाहिद जमाल उसे कोई मेहनताना नहीं देता था बल्कि खाना-कपड़ा और तीज-त्यौहार पर घर जाते हुए कभी-कभी सौ-दो सौ रूपये दे देता था।

एक बार शाहिद जमाल ने रौशन जहाँ से जोर-जबरदस्ती संबंध बनाने की कोशिश की। इस पर वह डरकर अपने घर चली आई और फिर वहां न जाने की ज़िद पकड़ ली। लेकिन उसने अपने साथ हुई हरकत की बात अपने माता-पिता और किसी अन्य को नहीं बताया। सबको लगा वह किसी छोटी-मोटी बात पर मालिक से गुस्सा है। रेहाना ने समझा-बुझाकर उसे वापस काम करने शाहिद जमाल के यहाँ भेज दिया।

लेकिन इसके कुछ ही दिनों बाद 30 सितम्बर 2012 को रेहाना को अपने एक रिश्तेदार मोहसिन के माध्यम से पता चला कि रौशन गद्दीदार के यहाँ से गायब हो गई है। यह सुनकर रेहाना अपने पति साबिर के साथ मदनपुरा शाहिद जमाल के यहाँ गई तो लड़की के गायब होने के बारे कुछ बताने की बजाय वह उल्टे उस पर सत्तर हज़ार रुपये, गहने और कंप्यूटर चोरी करके भागने का आरोप लगाने लगा। साथ ही उसने यह भी कहा कि तुम लोगों ने ही अपनी लड़की को गायब करके कहीं भेजा है। उसे ढूंढ कर लाओ। यह सुनते ही पति-पत्नी के पाँव के नीचे की जमीन खिसक गई।

[bs-quote quote=”पुलिस ने अपनी कार्यशैली में से मानवाधिकार और संवेदना जैसी भावनाओं को निकाल दिया है।  वह अपने आग्रहों पर क्रूरतापूर्ण ढंग से कायम रहती है।  हिरासत में मौतों और फर्ज़ी मुठभेड़ की पूरे देश में एक लम्बी श्रृंखला दिखती है। इसके विरुद्ध अनेक प्रकार के कानून और प्रावधान बनाये गए हैं लेकिन हमारी लचर राजनीतिक व्यवस्था के कारण उन्हें लागू करना अभी दूर की कौड़ी ही है। ” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

शाहिद जमाल और उसका बेटा आसिफ दोनों रेहाना को धमकाने लगे। यह पूछने पर कि क्या उन लोगों ने रौशन के इस तरह से गायब होने की रिपोर्ट थाने में दर्ज कराई? वे दोनों गोल-मोल जवाब देने लगे। वे उसपर और रौशन पर बदचलनी का आरोप लगाते हुए उसे गालियाँ देने लगे। इससे रेहाना को समझ में आने लगा कि बेटी के साथ कुछ अनहोनी हुई है।  उसका मन तरह-तरह की आशंकाओं और भय से उमड़ने-घुमड़ने लगा। वह थाना दशाश्वमेध गई और पुलिस को सारी बातें बताई लेकिन उसकी रिपोर्ट आठ दिन बाद दर्ज की गई।

इसके लगभग तेरह महीने बाद राजकीय पश्चातवर्ती देख-रेख संगठन द्वारा रेहाना को सूचित किया गया कि आपकी लड़की रौशन हमारी संस्था में है। उचित पहचानपत्र दिखाकर ले जाओ। इस प्रकार जो कहानी पुलिस ने बनाई उसके मुताबिक रौशन जहाँ अपनी मौसी के लड़के वसीम से प्रेम करती है और वह उसके साथ बंगलौर गई जहाँ वे दोनों वसीम के दोस्त गुड्डू के घर चार-पांच महीने रहे। बनारस लौटते समय वसीम से उसका साथ छूट गया। बाद में बंगलौर की एक स्वयंसेवी संस्था ने उसे अपने संरक्षण में रखा और नौ-दस महीने बाद वाराणसी नारी संरक्षण गृह में भेज दिया।

यह सारा उपक्रम अपराधी शाहिद जमाल को बचाने के लिए किया गया। शाहिद को भरोसा हो गया कि वह आसानी से बच निकलेगा इसलिए 29 मार्च 2014 को वह रेहाना के घर पर आया और जबरदस्ती कोर्ट का एक कागज़ देते हुए बोला कि देखो मैंने कैसे पुलिस और अदालत को खरीद लिया। अब तुम्हें और तुम्हारी बेटी के साथ तुम्हारे घरवालों को बर्बाद कर दूंगा। मैंने पैसे से सबको खरीद लिया है और अब तुम्हारी बेटी खुद तुम्हारे खिलाफ बयान देगी। तुमको जेल भिजवा दूंगा।

पुलिस के झूठ दर झूठ के खिलाफ एक औरत के दुर्दमनीय साहस और हिम्मत की कहानी 

दो बरस से बेटी को लेकर तनाव, परेशानी, भय और तबाही के कगार पर जी रही रेहाना ने शाहिद जमाल के इस नंगे नाच को देखकर भी अपना मानसिक संतुलन नहीं खोया। वह कागज़ लेकर वह मानवाधिकार जन निगरानी समिति के कार्यालय आई तो पता चला यह रौशन जहाँ के 164 सी आर पी सी के तहत न्यायालय में दिए गए बयान की कॉपी है।

इसके बाद जब इस पूरे मामले का विश्लेषण शुरू किया गया तो पुलिस, नारी संरक्षण गृह जैतपुरा वाराणसी और शाहिद जमाल की एक-एक परत उधडती चली गई। गौर करने की बात है कि दशाश्वमेध पुलिस ने शाहिद जमाल के खिलाफ रेहाना का एफ आई आर दर्ज करने में जानबूझकर देरी की। दूसरे, उसी दिन पुलिस ने रौशन की गुमशुदगी में वसीम के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज भी कर ली जबकि 18 दिसंबर 2013 को हुए रौशन जहाँ के बयान में पहली बार उसका नाम आया।  तीसरी बात कि वसीम के खिलाफ एफ आई आर दर्ज करने के बाद दशाश्वमेध पुलिस ने उसे गिरफ्तार नहीं किया और न ही उसके घर कभी दबिश दी, बल्कि 20 मार्च 2013 को पत्र लिखकर 23 मार्च को थाने में बयान देने आने को कहा। बाद में  उसे जेल भेज दिया।

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पुलिस ने लड़की से उस समय बयान दिलवाया जब उसके माँ-बाप नारी संरक्षण गृह जैतपुरा आते-जाते थे लेकिन बयान के समय उन्हें नहीं बुलाया गया। नारी संरक्षण गृह जैतपुरा की अधीक्षिका के अनुसार लड़की को बंगलौर की एक संस्था ने उसे सुपुर्द किया था। लेकिन जब मानवाधिकार जन निगरानी समिति के अनूप श्रीवास्तव ने इस मामले में बंगलौर के जिला प्रोबेशन कार्यालय से सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी कि वह किस संस्था में कितने दिन रही तो वहां से कोई जवाब ही नहीं आया। इस पूरे मामले में वाराणसी की दशाश्वमेध पुलिस और राजकीय पश्चातवर्ती देख-रेख संगठन जैतपुरा वाराणसी द्वारा किये गए विवादस्पद कार्यवाही के कुछ बिन्दु –

रौशन जहाँ का 164 सीआरपीसी के तहत बयान दिनांक 18 दिसम्बर, 2013 को हुआ जिसके विषय में रेहाना बानो या उसके परिवार को कोई भी जानकारी नहीं दी गयी जबकि उस दौरान वे लोग रोज राजकीय पश्चात देख-रेख संगठन जैतपुरा वाराणसी जाते थे।

[bs-quote quote=”11 दिसम्बर, 2013 को हुए मेडिकल रिपोर्ट में रौशन के माहवारी का आखिरी समय 3 महीने पहले बताया गया तब यह प्रश्न उठता है कि क्या लड़की के साथ उक्त संगठन में यौन उत्पीड़न किया गया है? इसकी रिपोर्ट संगठन द्वारा पुलिस में क्यों नहीं कराई गयी?” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

164 सीआरपीसी के बयान में मु0 अ0 स0 124/12 सरकार बनाम शाहिद मसूर धारा 363/366 भा. द. स.  दर्ज किया गया जबकि FIR में आरोपी का नाम शाहिद जमाल दर्ज किया गया है।

164 सीआरपीसी के बयान में यह लिखा गया है कि रौशन जहाँ अपने मौसी के लडके वसीम के साथ बंगलौर गयी थी और उसके दोस्त गुड्डू के घर पर 3-4 महीने रुकी थी जबकि वसीम रौशन जहाँ के गायब होने से लेकर अभी तक अपने घर पर ही था। वह कभी भी बंगलौर नहीं गया और न ही उसका कोई दोस्त वहां पर रहता है। इस बात की छानबीन पुलिस ने क्यों नहीं की? साथ ही लड़की से पूछताछ करके पुलिस ने गुड्डू को क्यों नहीं खोजा?

164 सीआरपीसी के बयान में यह लिखा गया है कि रेलवे स्टेशन पर मेरी बेटी वसीम से बिछड़ गयी तब यह प्रश्न उठता है कि जब रौशन जहाँ के पास वसीम का नम्बर था, जैसा कि उसके बयान में लिखा गया है, तब पुलिस या नारी संरक्षण गृह ने वसीम को फोन क्यों नहीं किया?

जब कर्नाटक पुलिस पीड़िता को नारी संरक्षण गृह में ले गयी और करीब 9-10 महीने वहीं रही तब वहाँ  पर लड़की का कोई बयान सक्षम अधिकारी के सामने हुआ कि नहीं और यदि लड़की वाराणसी से थी तब कर्नाटक पुलिस या नारी संरक्षण गृह ने वाराणसी पुलिस से संपर्क क्यों नहीं किया?

164 सीआरपीसी के बयान में यह लिखा है कि पीड़िता को 29 नवम्बर, 2013 को नारी संरक्षण गृह बंगलौर से वाराणसी भेजा गया और 29 नवम्बर, 2013 को ही वह वाराणसी पहुँच गयी। तब यह प्रश्न उठता है कि बंगलौर से वाराणसी उसी दिन कैसे पहुची? उसे किस साधन से बंगलौर से वाराणसी लाया गया?

[bs-quote quote=”हालिया वर्षों में आर्थिक समृद्धि का जो दौर आया है उसने कई प्रकार से चीजों और स्थितियों को उलट-पुलट दिया है। पैसे ने एक अलग प्रभाव और प्रभामंडल तैयार किया है और जीवन-जगत के हर स्तर पर समझ और व्यवहार में परिवर्तन आया है। अपराधों में तेजी आई है और इसी अनुपात में फर्जी और दूसरे मुकदमों में ढेरों निर्दोष लोगों को फंसाया गया है। ” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

दशाश्वमेध पुलिस द्वारा शाहिद जमाल के नाम से मु अ. स. 124/12 धारा 363/506 भा. द. वि. दिनांक 8 नवम्बर, 2012 को दर्ज किया जबकि लड़की 30 सितम्बर, 2012 से ही लापता थी। जान बूझ कर FIR दर्ज करने में देरी की गई।

इसके साथ ही वसीम के नाम से मु. अ. स. 124/13 धारा 363, 506 IPC के तहत 8 नवम्बर 2012 को ही FIR दर्ज किया। यदि देखा जाय तो 124/12 और 124/13 मु. अ. स. 124 ही है यह बड़े आश्चर्य की बात है। इसके साथ वसीम के खिलाफ भी दर्ज मुकदमा 124/13 है लेकिन दिनांक 8 नवम्बर, 2012 ही दर्शाया गया है। यह कैसे मुमकिन है? जबकि 164 सीआरपीसी के तहत बयान 18 दिसम्बर, 2013 को हुआ है, जिसमें वसीम का नाम आया है। अतः पुलिस व अन्य मिलकर लीपापोती करते हुए वसीम को फँसाना चाहते थे और इसके लिए बैक डेट में वसीम के खिलाफ FIR दर्ज किया गया।

वसीम के खिलाफ मुकद्दमा दर्ज होने पर भी पुलिस ने उसकी गिरफ्तारी नहीं की, बल्कि 20 मार्च, 2014 को नोटिस उसके घर दिया कि वह बयान देने थाना दशाश्वमेध जाए। जबकि ऐसी धारा में गिरफ्तारी होनी चाहिए।

पुलिस ने यह नोटिस देकर वसीम के घर वालोंपर यह दबाव बनाया कि वसीम की शादी रौशन से कर दो नहीं तो पूरे परिवार को जेल जाना पड़ेगा।

जब रेहाना राजकीय पश्चातवर्ती देख रेख संगठन जैतपुरा वाराणसी गयी तो उससे हलफनामा और पहचान पत्र माँगा गया जो 20 दिसम्बर, 2013 को दिया गया।  तब भी उसको यह क्यों नहीं बताया गया कि उसकी लड़की का 18 दिसम्बर, 2013 को 164 सीआरपीसी का बयान हो चुका है?

जब 6 जनवरी, 2014 को आरटीआई द्वारा यह पूछा गया कि लड़की को उसके माता पिता को क्यों सुपुर्द नहीं किया गया तब राजकीय पश्चातवर्ती देख रेख संगठन द्वारा 1 फरवरी, 2014 को जवाब दिया कि रौशन ने लिखित प्रार्थना पत्र देकर माता-पिता के साथ जाने से मना कर दिया है लेकिन उसमें भी 18 दिसम्बर, 2013 को हुए 164 सीआरपीसी के बयान का कोई भी जिक्र नहीं किया गया।

जब 164 सीआरपीसी का बयान माननीय न्यायालय के समक्ष हो चुका था तब बाल कल्याण समिति के समक्ष लिए गए बयान और अधीक्षिका राजकीय पश्चातवर्ती  देख रेख संगठन के पत्र का हवाला देकर लड़की को सुपुर्द करने से क्यों मना किया गया? जबकि 164 सीआरपीसी का बयान उसके पहले 18 दिसम्बर, 2013 को ही हो चुका था।

जब 164 सीआरपीसी के तहत बयान 18 दिसम्बर, 2013 को ही हो चुका था तब 15 जनवरी 2014 को बाल कल्याण समिति के समक्ष बयान की क्या आवश्यकता थी।

पश्चातवर्ती देख रेख संगठन द्वारा 15 जनवरी, 2014 व 17 जनवरी, 2014 को रौशन द्वारा लिखित पत्र पेश किया गया है जिसमें एक दिन के अन्तर पर ही बयान बदले हुए हैं और पीड़िता के हस्ताक्षर भी एक दूसरे से मेल नहीं खाते है।

15 जनवरी, 2014 के बाल कल्याण समिति के समक्ष लिए गए बयान में रौशन ने साफ़ तौर पर कहा कि मालिक ने उसके साथ गलत काम किया है और वह उसके खिलाफ केस लड़ना चाहती है। फिर बाल कल्याण समिति ने पुलिस में बयान के आधार पर FIR क्यों नहीं दर्ज करवाया?

यह बात बिलकुल ही उपेक्षित कर दी गई कि किस आदेश या पत्र के अनुसार बंगलौर नारी संरक्षण गृह ने वाराणसी पश्चातवर्ती देख रेख संगठन को लड़की सौपा? लड़की किसके साथ वाराणसी लाई गयी?

रौशन का मेडिकल 11 दिसम्बर, 2013 को कराया गया जबकि लड़की उक्त संगठन में 29 नवम्बर, 2013 को दाखिल हुई थी तब इतने समय बाद क्यों मेडिकल करवाया गया?

11 दिसम्बर, 2013 को हुए मेडिकल रिपोर्ट में रौशन के माहवारी का आखिरी समय 3 महीने पहले बताया गया तब यह प्रश्न उठता है कि क्या लड़की के साथ उक्त संगठन में यौन उत्पीड़न किया गया है? इसकी रिपोर्ट संगठन द्वारा पुलिस में क्यों नहीं कराई गयी?

18 दिसम्बर, 2013 के 164 सीआरपीसी के बयान के दौरान लड़की के गर्भवती होने की सूचना न्यायालय में दी गयी कि नहीं? 11 दिसम्बर, 2013 को हुए मेडिकल रिपोर्ट में यह भी लिखा हुआ है कि रौशन के मालिक द्वारा उसका यौन उत्पीड़न किया गया था।

11 दिसम्बर, 2013 के मेडिकल रिपोर्ट में यह भी दर्शाया गया है कि उसके पुराने जख्म भर रहे हैं। तब यह प्रश्न उठता है कि क्या लड़की के साथ यौन उत्पीड़न के साथ साथ मार पीट भी की गई और इसके लिए बंगलौर या वाराणसी का संगठन जिम्मेदार है। इस प्रकार हम देखते हैं कि पुलिस ने अपने कारनामों से एक मासूम लड़की को गर्त में धकेल दिया।

[bs-quote quote=”रेहाना कनई सराय, हरपालपुर लोहता वाराणसी की रहने वाली है और उसका परिवार साड़ी कटाई, चूना पुताई, चारपाई बुनाई जैसे मेहनत-मज़दूरी के काम से जीवन-यापन करता है। उसकी सोलह साल की बेटी रौशन जहाँ साड़ी व्यवसायी और गद्दीदार (ताज शिल्क सारीज) शाहिद जमाल निवासी मकान नंबर डी –31/331, डी -1 ए , चश्मा फेयर के निकट, मदनपुरा, वाराणसी के यहाँ रहकर कई बरस से घरेलू नौकरानी का काम कर रही थी। इसके बदले शाहिद जमाल उसे कोई मेहनताना नहीं देता था बल्कि खाना-कपड़ा और तीज-त्यौहार पर घर जाते हुए कभी-कभी सौ-दो सौ रूपये दे देता था।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

 

स्पष्ट दिशानिर्देशों के बावजूद संवेदनहीन रवैया खतरनाक है 

पुलिस ने अपनी कार्यशैली में से मानवाधिकार और संवेदना जैसी भावनाओं को निकाल दिया है।  वह अपने आग्रहों पर क्रूरतापूर्ण ढंग से कायम रहती है।  हिरासत में मौतों और फर्ज़ी मुठभेड़ की पूरे देश में एक लम्बी श्रृंखला दिखती है। इसके विरुद्ध अनेक प्रकार के कानून और प्रावधान बनाये गए हैं लेकिन हमारी लचर राजनीतिक व्यवस्था के कारण उन्हें लागू करना अभी दूर की कौड़ी ही है।  गिरफ़्तारी, हिरासत और पूछताछ के समय हिंसा की घटनाओं को देखते हुए उच्चतम न्यायालय ने डी के बासु बनाम पश्चिम बंगाल सरकार, (1997), 1 एस सी सी 216 पुलिस और सरकार के कुछ अन्य विभागों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करने या हिरासत में रखने या पूछताछ करने के समय पुलिसकर्मियों को सही और स्पष्ट दिखाई देने वाले पहचान चिन्ह और नाम-पट्टी लगाना जरूरी है। साथ ही पूछताछ का ब्यौरा रजिस्टर में दर्ज होना चाहिए।  गिरफ्तारी के समय मेमो ऑफ़ अरेस्ट बनाया जाना चाहिए और समय और तारीख के साथ कम से कम एक गवाह का हस्ताक्षर होना चाहिए तथा वह व्यक्ति उस इलाके का जाना-माना व्यक्ति हो अथवा गिरफ्तार व्यक्ति के परिवार का सदस्य हो।  गिरफ्तार करते समय गिरफ्तारी का आधार और अपराध बताना जरूरी है।  सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार गिरफ्तारी के 24 घंटे बाद मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत करना है। हिरासत में जुर्म कबूलने के लिए लिया गया बयान अदालत में अमान्य है। महिला और पंद्रह वर्ष से कम उम्र के पुरुष को थाने नहीं ले जाया जा सकता।

गिरफ्तार किये गए व्यक्ति को हक़ है कि उसके परिवार के लोगों या किसी शुभचिंतक, मित्र को फोन करके सूचना दी जाय कि उसे गिरफ्तार किया गया है और किस स्थान पर रखा गया है।  यदि गिरफ्तार व्यक्ति के परिवारीजन किसी अन्य शहर में हों तो गिरफ़्तारी के 8 से 12 घंटों के बीच उन्हें तार द्वारा सूचना पहुंचानी आवश्यक है। तार जिला कानूनी सहायता केंद्र और संबंधित महकमे द्वारा किया जायेगा।

लेकिन हम देखते हैं कि पुलिस की कार्रवाइयों में इन कानूनों और प्रावधानों का स्पष्ट उल्लंघन किया जाता है। उपरोक्त रामू श्यामू मामले में तो घर के लोगों द्वारा मना करने पर एस ओ जी टीम ने रिवाल्वर ही निकाल लिया था। अनेक ऐसे मामले हैं जिनमें बिना कारण उठाया गया और कई दिनों के टॉर्चर के बाद मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया।

[bs-quote quote=”बहुत से अनसुलझे या दबाये जा रहे मामलों में किसी और को उठा लिया जाता है और फर्ज़ी कहानियां गढ़ दी जाती हैं।  कुल मिलाकर यह सब भारतीय लोकतंत्र के लिए एक खतरनाक संकेत है। पुलिस अमीरों और प्रभावशाली लोगों द्वारा गरीबों के खिलाफ इस्तेमाल किये जाने वाले औजार में बदलती गई है।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

आखिर इस त्रासद सच के पीछे कौन से कारण हैं ? इसका जवाब ढूँढने के लिए हमें भारतीय सामाजिक व्यवस्था की गहरी छानबीन करनी पड़ेगी। हमारा देश वर्णवादी और जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त है और यह मानसिकता अलग-अलग समय और स्वार्थों के हिसाब से अलग-अलग स्तरों पर काम करती है। मसलन सांप्रदायिक दंगों के समय जाति की अस्मिता ख़त्म होकर धार्मिक पहचान प्रबल हो उठती है तो दूसरी जाति के साथ झगड़े में स्वजातीय पहचान जोर मारने लगती है। निम्नतम स्तर पर निजी स्वार्थों के लिए जातियों के बीच गोत्रों और उससे भी निचले स्तर पर भाई-भाई के बीच अंतर्विरोध और झगड़े बढ़ जाते हैं। ये झगड़े अनेक बार इतने बढ़ जाते हैं कि कई तरह के अपराध सामने आते हैं।

इसी प्रक्रिया में आगे बढ़ते हुए हम पाते हैं कि पुलिसकर्मियों में भी वर्ण और जाति की कुत्सित और पतनशील भावनाएं अपने उफान पर होती हैं और समयानुसार स्वार्थों के अनुसार उनका व्यवहार तय होता है। प्रबल जाति आग्रहों के कारण उनमें वैसी ही क्रूरता होती है जैसी समाज में व्यवहृत होती है। एक सर्वेक्षण के अनुसार पुलिस अत्याचारों के शिकार पंचानबे प्रतिशत लोग दलित , अतिपिछड़े , आदिवासी और अल्पसंख्यक जातियों से आते हैं। उनकी उत्पीड़क पुलिस अमूमन सवर्ण और मजबूत पिछड़ी जातियों से आते हैं। सर्वेक्षण के अनुसार हिरासत में हिंसा और मौतों के पीछे एक बड़ा कारण पुलिस की जातिवादी आग्रहों से निसृत घृणा है।

हालिया वर्षों में आर्थिक समृद्धि का जो दौर आया है उसने कई प्रकार से चीजों और स्थितियों को उलट-पुलट दिया है। पैसे ने एक अलग प्रभाव और प्रभामंडल तैयार किया है और जीवन-जगत के हर स्तर पर समझ और व्यवहार में परिवर्तन आया है। अपराधों में तेजी आई है और इसी अनुपात में फर्जी और दूसरे मुकदमों में ढेरों निर्दोष लोगों को फंसाया गया है।  बहुत से अनसुलझे या दबाये जा रहे मामलों में किसी और को उठा लिया जाता है और फर्ज़ी कहानियां गढ़ दी जाती हैं।  कुल मिलाकर यह सब भारतीय लोकतंत्र के लिए एक खतरनाक संकेत है। पुलिस अमीरों और प्रभावशाली लोगों द्वारा गरीबों के खिलाफ इस्तेमाल किये जाने वाले औजार में बदलती गई है।

निश्चित रूप से इस परिदृश्य के खिलाफ एक जनमानस तैयार करने की जरूरत है ताकि सार्वजनिक संस्थाओं की जनता के प्रति जवाबदेही अधिक से अधिक हो सके !

(यह लेख रामजी यादव की किताब  अंधेरा भारत  से लिया गया है। )

 

रामजी यादव गाँव के लोग के संपादक और कथाकार हैं ।

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