प्रभाष जोशी ब्राह्मण थे, इसलिए बकवास भी खूब लिखते थे डायरी (6 अगस्त, 2021)

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“तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार” का नारा कांशीराम ने दिया था। उन्होंने यह नारा क्यों दिया था, यह मुझे तब समझ में नहीं आता था जब मैं पत्रकार नहीं था। तब कोई मतलब भी नहीं होता था कि कौन नेता क्या बोल रहा है और उसके बोलने का मतलब क्या है। पत्रकारिता के प्रारंभिक दिनों में भी मुझे कभी जाति को लेकर कोई खास अनुभव नहीं हुआ था। मैं तो यह मानता था कि यदि हम मेहनत करके खबर लिखेंगे तब निश्चित तौर पर उसे जगह मिलेगी। होता भी यही था। दैनिक आज के पहले पन्ने पर मुझे जगह मिलती रही।

उन दिनों पुस्तकालयों में जाने का शौक बहुत था। अक्सर मैं या तो गांधी संग्रहालय, पटना या फिर ए एन सिन्हा सामाजिक अध्ययन शोध संस्थान, पटना की लाइब्रेरी में चला जाता था। वहां मुझे अपनी पसंद की किताबें मिल जातीं और सबसे बड़ी नेमत थीं अखबारों की उपलब्धता। जिस अखबार को मैं सबसे अधिक पढ़ता, वह दिल्ली से प्रकाशित “जनसत्ता” था। इसकी वजह थे प्रभाष जोशी। उनका स्तंभ अच्छा लगता था। बाद में तो मैंने अपने घर में इसे मंगवाना शुरू किया। हालांकि जल्द ही मेरा मोह भी भंग हुआ और इसकी वजह भी जोशी जी ही रहे और तभी मुझे इसका जवाब भी मिला था कि कांशीराम ने “तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार” का नारा क्यों दिया होगा।

जिस अखबार को मैं सबसे अधिक पढ़ता, वह दिल्ली से प्रकाशित “जनसत्ता” था। इसकी वजह थे प्रभाष जोशी। उनका स्तंभ अच्छा लगता था। बाद में तो मैंने अपने घर में इसे मंगवाना शुरू किया। हालांकि जल्द ही मेरा मोह भी भंग हुआ और इसकी वजह भी जोशी जी ही रहे और तभी मुझे इसका जवाब भी मिला था कि कांशीराम ने “तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार” का नारा क्यों दिया होगा।

दरअसल, मैं प्रतिभा को जाति जनित प्रतिभा नहीं मानता था और यह भी कि अवगुण जाति से जुड़े नहीं होते। लेकिन ऐसा नहीं होता है, इसकी जानकारी प्रभाष जोशी के कारण ही मिली। “रविवार” पत्रिका को दिए अपने साक्षात्कार में जोशी जी ने प्रतिभा और ब्राह्मण जाति के बीच के संबंध को स्पष्ट किया था। उन दिनों मैं एक ब्लॉग चलाता था। ब्लॉग का नाम था – यादवजी कहिन। 31 अगस्त, 2009 को मैंने अपने ब्लॉग में प्रभाष जोशी के नाम पहला पत्र लिखा था। यह पत्र उन्हें 2 सितंबर, 2009 को ईमेल भी किया था। मुझे उनसे जवाब की आशा थी। लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया था।

मैंने जो लिखा था, उसे यहां पढ़ा जा सकता है –http://yadavjikahin.blogspot.com/2009/08/blog-post_31.html?m=1

 

बचपन के जो खिलौने होते हैं, वो बाद में हमारे औजार बनते है. जिससे हम चीजों को हैंडल करना सीखते है. क्रिकेट में भी आप देखेंगे, सभी क्रिकेटरों का एनॉलिसिस करके देखेंगे तो आप पाएंगे कि सबसे ज्यादा सस्टेन करने वाले, सबसे ज्यादा टिके रहने वाले कौन खिलाड़ी हैं? सुनील गावस्कर सारस्वत ब्राह्मण, सचिन तेंदुलकर सारस्वत ब्राह्मण.”

पत्र लिखने के पीछे कारण यह था कि जोशी जी ने सचिन तेंदुलकर के बारे में अपनी टिप्पणी में कहा था कि वह अच्छा इसलिए खेलता है क्योंकि वह ब्राह्मण है। उनकी पूरी टिप्पणी थी – “मान लीजिए कि सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली खेल रहे है. अगर सचिन आउट हो जाये तो कोई यह नहीं मानेगा कि कांबली मैच को ले जायेगा. क्योकि कांबली का खेल, कांबली का चरित्र, कांबली का एटीट्यूड चीजों को बनाकर रखने और लेकर जाने का नहीं है. वो कुछ करके दिखा देने का है. जिताने के लिए आप को ऐसा आदमी चाहिए, जो लंगर डालकर खड़ा हो जाये और आखिर तक उसको ले जा सके यानी धारण शक्ति वाला. अब धारण शक्ति उन लोगों में होती है, जो शुरू से जो धारण करने की प्रवृत्ति के कारण आगे बढ़ते है. अब आप देखो अपने समाज में, अपनी राजनीति में. अपने यहां सबसे अच्छे राजनेता कौन है ? आप देखोगे जवाहरलाल नेहरू ब्राह्मण, इंदिरा गांधी ब्राह्मण, अटल बिहारी वाजपेयी ब्राह्मण, नरसिंह राव ब्राह्मण, राजीव गांधी ब्राह्मण. क्यों ? क्योंकि सब चीजों को संभालकर चलाना है इसलिए ये समझौता वो समझौता वो सब कर सकते है. बेचारे अटल बिहारी बाजपेयी ने तो इतने समझौते किये कि उनके घुटनों को ऑपरेशन हुआ तो मैंने लिखा कि इतनी बार झुके है कि उनके घुटने खत्म हो गये, इसलिए ऑपेरशन करना पड़ा. ये मैं जातिवादिता के नाते नहीं कह रहा हूं. एक समाज में स्किल का लेवल होता है, कौशल का एक लेवल होता है, जो वो काम करते-करते प्राप्त करता है. उस कौशल का आप अपने क्षेत्र में कैसा इस्तेमाल करते हैं, उस पर निर्भर करता है. इंदिरा गांधी बचपन में गूंगी गुड़ियाओं की सेना बना कर लड़ा करती थीं. जब वह प्रधानमंत्री बनीं तो उन्होंने अपने आसपास गूंगे लोगों की फौज खड़ी की. ऐसे लोग, जो उसके खिलाफ बोल नहीं सकते थे. या जो अपनी खुद की कैपेसिटी में कुछ कर नहीं सकते है. वही एक सर्वोच्च नेता रहीं. बचपन के जो खिलौने होते हैं, वो बाद में हमारे औजार बनते है. जिससे हम चीजों को हैंडल करना सीखते है. क्रिकेट में भी आप देखेंगे, सभी क्रिकेटरों का एनॉलिसिस करके देखेंगे तो आप पाएंगे कि सबसे ज्यादा सस्टेन करने वाले, सबसे ज्यादा टिके रहने वाले कौन खिलाड़ी हैं? सुनील गावस्कर सारस्वत ब्राह्मण, सचिन तेंदुलकर सारस्वत ब्राह्मण.”

अब इसको पढ़ने के बाद प्रभाष जोशी को जूते मारने का मन किसको नहीं करेगा। मैंने उन्हें जूते तो नहीं मारे लेकिन उनसे पूछा जरूर। वर्ष 2009 में निधन के पहले आखिरी बार वह पटना आए थे। उन दिनों वे एक अभियान चला रहे थे। पेड न्यूज को लेकर। तब पटना के गांधी संग्रहालय में उनसे मुलाकात हुई थी। मुलाकात संग्रहालय के निदेशक डॉ. रजी अहमद के कारण हो सकी थी। मैं प्रभाष जी का साक्षात्कार करना चाहता था। मेरे पास सवाल थे, जिन्हें मैं लिखकर ले गया था। उनमें एक सवाल उनके ब्राह्मण होने को लेकर भी था। परंतु जोशी जी को मेरा ईमेल याद था और पत्र भी उन्होंने ब्लॉग के मार्फत पढ़ लिया था। जब उनसे मिला तो उन्होंने कहा कि अच्छा तो आप ही हैं नवल किशोर कुमार! फिर उन्होंने कुछ इधर-उधर की बातें कहीं। लेकिन साक्षात्कार नहीं दिया।

खैर, मुझे मलाल भी नहीं था। मैं यह तो जानता ही था कि मेरे शब्द उनको जरूर चुभे होंगे।

आज फिर प्रभाष जोशी को याद करने का सबब यह है कि महिला हॉकी टीम को लेकर जाति सूचक शब्द इस्तेमाल किए गए हैं। हरिद्वार में वंदना कटारिया के घर पर सवर्णों द्वारा हुल्लड़बाजी की गयी। कहा गया कि चूंकि टीम में अधिकांश दलित-बहुजन हैं, इसलिए टीम अर्जेंटीना के खिलाफ मैच हार गयी। मुझे पक्का यकीन है कि यदि प्रभाष जोशी जिंदा होते तो वह भी यही कहते।

नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस में संपादक हैं ।

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