प्रेमचंद और बहुजन साहित्य की अवधारणा (डायरी, 30 जुलाई, 2022)

नवल किशोर कुमार

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समाज को कैसा होना चाहिए? इसका निर्धारण साहित्य के जरिए किया जाता रहा है। साहित्य की जिम्मेदारी यह है कि वह समाज की परिभाषा को विस्तृत करे और उसे समतामूलक बनाए। वजह यह कि यदि समता नहीं है तो समाज चाहे जैसा भी हो, समाज की परिभाषा को संपुष्ट नहीं कर सकता। परंतु वर्तमान में कई तरह के समाज हैं और सभी के पास अपना-अपना साहित्य है। साथ ही साहित्य के स्वरूप में भी तेजी से बदलाव हो रहा है। गांव की संस्कृति धीरे–धीरे खत्म होती जा रही है। इसका एक पक्ष यह है कि जो गांव प्रेमचंद की रचनाओं में या फिर भिखारी ठाकुर के नाटकों में नजर आता था, अब नजर नहीं आता। सामंतवाद की बेड़ियां टूटने लगी हैं। दूसरा पक्ष यह कि अब वहां एक नया चलन है और वह आर्थिक सामंतवाद है। बाहरी संस्कृति का असर भी साफ-साफ देखा जा सकता है। हालांकि यह बदलाव 1950 के दशक में ही शुरू हो गया था जब नयी कहानी आंदोलन दौर आया। गांव साहित्य से दूर होते गए और विषय के रूप में शहर स्थापित होते गए। रेणु की कहानियों में भी यह बदलाव दिखता है। मसलन, मैला आंचल जो कि उनकी कालजयी रचना रही, उसमें वह सामाजिक सामंतवाद और आर्थिक सामंतवाद के अंतर को सामने लाते हैं।
अपनी रचनाओं में रेणु बताते हैं कि कैसे सामाजिक सामंतवाद सामंतों को क्रूर बना देता है और इतना क्रूर कि वह उत्पीड़ित वर्गों का हिंसक तरीके से शोषण करने से भी गुरेज नहीं करता है। छुआछूत भी इसका ही हिस्सा है। लेकिन आर्थिक सामंतवाद अलग है। इसमें उत्पीड़ित वर्ग के प्रति लचीला रूख अपनाया जाता है। आर्थिक सामंतवाद शोषित और पीड़ित जनों को रोजी–रोटी देने की बात करता है। वह चाहता है कि यह जो वंचित तबका है, वह काम करे। छुआछूत का प्रत्यक्ष प्रदर्शन नहीं किया जाता है।

गोदान का प्रकाशन 1936 में हुआ था। प्रेमचंद ने तभी बता दिया था कि समाज बदलने वाला है और सामंतवाद का खात्मा होगा। गोदान में दो ही मुख्य पात्र हैं। एक तो होरी और दूसरा उसका बेटा गोबर। दोनों में जमीन--आसमान का अंतर है। एक होरी महतो है जो सामंती व्यवस्था को कबूल करने में भलाई समझता है तो दूसरी तरफ गोबर है जो अपने पिता से सवाल पूछता है कि आप बेगारी करने रोज क्यों जाते हैं? प्रेमचंद गोबर के माध्यम से यह दिखाते हैं कि धन-संपत्ति अर्जित करने का अधिकार अंग्रेजों ने सभी को दे दिया है और कोई भी मजदूरी कर अपना जीवन-यापन कर सकता है।

 

आधुनिक साहित्य में दलित साहित्य की धमक ने पारंपरिक साहित्य को पुरजोर चुनौती दी। इसकी मजबूत बुनियाद में आंबेडकर के विचार व संघर्ष रहे। फिर चाहे वह ओमप्रकाश वाल्मीकि का जूठन हो या फिर तुलसीराम की आत्मकथा मुर्दहिया। मोहनदास नैमिशराय की रचनाएं भी भारतीय समाज के बदलावों और वंचितों की मजबूत होती आवाज की परिचायक हैं। लेकिन इन सबके बीच साहित्य दो भागों में विभक्त हो गया। एक जिसे मुख्यधारा का साहित्य कहा गया और दूसरा वंचितों का साहित्य। यह बीसवीं सदी के अंतिम दशकों में हुआ अहम बदलाव था।
दरअसल, समय के साथ सामंतों की आवश्यकताएं बढ़ी हैं। अब इसको ऐसे समझें कि पहले के समय में सामंतों के यहां पालकी ढोनेवाले होते थे। वे ही साधन थे उनके लिए। लेकिन अब क्या है कि पालकियां खत्म हो चुकी हैं। उनकी जगह अत्याधुनिक गाड़ियां हैं।गाड़ियां भी ऐसी जिनकी कीमत लाखों में होना तो आम बात है। कई गाड़ियां करोड़ों में आती हैं। और जब गाड़ियां इतनी महंगी होंगी तो सामंतों को उसके रखरखाव के लिए आदमी चाहिए। ठीक वैसे ही जैसे पहले हाथियों को संभालने के लिए महावत रखे जाते थे। लेकिन एक अंतर है। महावत एक बेगार टाइप का आदमी होता था। पेट पर जीनेवाला आदमी। साल में उसे तीन-चार जोड़ी कपड़े और रोज पेट की भूख मिटाने भर की आवश्यकता होती थी। लेकिन अब तो सब बदल गया है। वैश्वीकरण ने सबकुछ बदल दिया है। अब तो महावत (गाड़ियों के संबंध में चालक व अन्य तरह के काम करनेवाले लोग) भी अपनी कीमत जान गए हैं। उन्हें अब मजदूरी चाहिए और वह भी ऐसी मजदूरी जो उनके हिसाब से हो। पहले की तरह नहीं कि भीख की तरह कुछ भी दे दिया तो वे मान जाएंगे।

 

अच्छा, एक अंतर और आया है समाज में। पहले हाथी केवल बड़े जमींदारों के पास ही होते थे। अब तो लग्जरी गाड़ियों के मालिकों की कोई कमी नहीं है। बेचारे सामंत आपस में ही प्रतिस्पर्धा से परेशान हैं। तो ऐसे में उनके महावतों के पास विकल्प भी होता है कि एक सामंत यदि ढंग की मजदूरी नहीं देगा तो दूसरे सामंत के पास जाएंगे।

अपनी रचनाओं में रेणु बताते हैं कि कैसे सामाजिक सामंतवाद सामंतों को क्रूर बना देता है और इतना क्रूर कि वह उत्पीड़ित वर्गों का हिंसक तरीके से शोषण करने से भी गुरेज नहीं करता है। छुआछूत भी इसका ही हिस्सा है। लेकिन आर्थिक सामंतवाद अलग है। इसमें उत्पीड़ित वर्ग के प्रति लचीला रूख अपनाया जाता है।

 

खैर, समाज में बदलाव होने ही चाहिए। बदलाव न हो तो समाज का अस्तित्व ही न रहे। तो कल जो बेगार थे, आज असंगठित क्षेत्र के मजदूर हैं। कानून उनके लिए भी है, लेकिन कागजों पर। फिर भी बेगाराें जैसी स्थिति नहीं है। वैश्वीकरण ने बाजार को बदल दिया है। अब हालात यह है कि यदि किसी मजदूर को किसी एक कंपनी में मनमाफिक मजदूरी नहीं मिलती है या फिर मेहनताना देने में आनाकानी होती है तो मजदूर दूसरी कंपनी में जाकर नौकरी कर सकता है। यह दृश्य पहले की तरह का नहीं है कि वंचित तबके के लोगों को हर हाल में किसी सामंत-जमींदार के यहां हर हाल में काम करना ही है और नहीं करने पर उसे शारीरिक सजा दी जाएगी।
बदलते परिवेश में मुंशी प्रेमचंद का साहित्य एक उदाहरण के रूप में सामने आता है। गोदान का प्रकाशन 1936 में हुआ था। प्रेमचंद ने तभी बता दिया था कि समाज बदलने वाला है और सामंतवाद का खात्मा होगा। गोदान में दो ही मुख्य पात्र हैं। एक तो होरी और दूसरा उसका बेटा गोबर। दोनों में जमीन–आसमान का अंतर है। एक होरी महतो है जो सामंती व्यवस्था को कबूल करने में भलाई समझता है तो दूसरी तरफ गोबर है जो अपने पिता से सवाल पूछता है कि आप बेगारी करने रोज क्यों जाते हैं? प्रेमचंद गोबर के माध्यम से यह दिखाते हैं कि धन-संपत्ति अर्जित करने का अधिकार अंग्रेजों ने सभी को दे दिया है और कोई भी मजदूरी कर अपना जीवन-यापन कर सकता है। यह एक बड़ा अधिकार था जो भारतीय समाज में तब नहीं था। याद करिए गोदान का वह अंश जब गोबर अपने गांव लौटता है तब जो उसकी ठाठ होती है। कितना खूबसूरत दृश्य खींचा है प्रेमचंद ने। एकदम अलहदा दृश्य है। गोबर के ठाठ के सामने सौ बीघा जोतवाले की चमक फीकी पड़ गयी।
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तो मूल मसला यह है कि अब हम कैसा समाज चाहते हैं। अंग्रेजों ने अपना काम तो कर दिया था। ज्ञान और धन का अधिकार शूद्रों को दे दिया था। बाद में देश का अपना संविधान भी लागू हुआ लेकिन जिस तरह के समाज निर्माण की कल्पना संविधान निर्माताओं ने की थी, देश का समाज उस दिशा में आगे बढ़ता हुआ नजर नहीं आ रहा है। इसके पीछे साहित्यकारों की भूमिका भी अहम रही, जिन्होंने अपने लेखन के केंद्र में उच्च व मध्यम आय वर्ग को रखा। उनके लिए मानवीय मूल्य का मतलब साहित्य-दर-साहित्य व्यक्ति केंद्रित होता गया। और आज परिणाम हमारे सामने है कि साहित्य व बाजार एक-दूसरे के पूरक बनते जा रहे हैं। मानवीय मूल्यों का ह्रास हो रहा है।

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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