जातिवादी अन्याय के खिलाफ एक अग्निपुंज थे राजा ढाले

कुसुम त्रिपाठी

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देश में आपातकाल का दौर था। मुझे आज भी याद हैं जब मुम्बई के विक्रोली कन्नमवार नगर-1 की बिल्डिंग नम्बर-19 में फ्लोर पर राजा ढाले हमारे पड़ोसी बनकर आये, तो पूरी बिल्डिंग के लोग ऐसे दुबक रहे थे जैसे वहाँ कोई दहशतगर्द, या असामाजिक व्यक्ति आ गया हो। तब तक ढाले एक बड़े दलित नेता के रूप में अपनी पहचान बना चुके थे। जब उनका सामान आ रहा था, तब मेरे पिताजी दरवाजा खोलकर उन्हें देखने के लिए खड़े थे। हमारे पूरे घर में उन्हें देखने की उत्सुकता थी। धीरे-धीरे उनके और हमारे घर से निकटता बढ़ती चली गई। तब हमने पाया कि ढाले जी उच्च कोटि के चिन्तक और विद्वान थे। उनके जैसा पढ़ा-लिखा, सुसंस्कृत, अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर विख्यात व्यक्ति बिल्डिंग में कोई नहीं था। उनकी पत्नी दीक्षा ढाले गोद में छोटी-सी नन्हीं बेटी गाथा को लेकर आई थी। उनकी बेटी गाथा 1975 में पैदा हुई थी। वह और मेरी छोटी बहन अनिता हमेशा साथ-साथ खेलते हुए बड़े हुए। दीक्षा ढाले कस्टम अधिकारी थीं। राजा ढाले और उनकी पत्नी में जिन्दगी भर यह समझौता रहा कि दीक्षा हमेशा नौकरी करती रहेंगी और ढाले जी सामाजिक-राजनैतिक काम करेंगे। जीवनपर्यन्त दीक्षा ढाले ने उनका साथ दिया।

गाथा अक्सर हमारे ही घर में  रहा करती थी। उसमें अपने पिता के गुण कूट-कूट कर भरे हैं। बचपन से तेज-तर्रार थी। मेरी छोटी बहन अनिता और गाथा दोनों ही भाषण प्रतियोगिता में पुरस्कार लाती थीं। राजा ढाले आपातकाल के दौरान कन्नमवार नगर में रहने आए थे, इस कारण पुलिस अक्सर उनके घर की तलाशी लेती थी। एक बार हमने देखा था कि उनकी पत्नी अपनी छोटी-सी बच्ची को लेकर एक कोने में बैठी थीं, राजा ढाले बाहर गये हुए थे और पुलिस क्रूरतम तरीके से उनके घर की तलाशी ले रही थी। वह उनके गद्दे, सोफे फाड़कर तलाशी ले रही थी। उस समय मेरा परिवार ही दरवाजा खोलकर खड़ा था जबकि पड़ोसियों ने तो डर के मारे दरवाजा बन्द कर लिया था।

हमारे और उनके घर में पुस्तकों का भंडार था। हमारे घर की दीवारों पर पुस्तकें ही पुस्तकें थीं लेकिन ढाले जी के घर पर इतनी पुस्तकें थीं कि सोफा के नीचे, पलंग के नीचे, बालकनी तक में पुस्तकें भरी रहती थीं। उस समय रद्दी पेपरवाला रद्दी पेपर लेने आता और दोनों परिवारों से कहता था कि अभी इन पुस्तकों को बेच दो, आठ आने किलो के भाव मिल जाएंगे। बाद में उतना भी भाव नहीं मिलेगा। बड़ी गंभीरता से वह हमें सुझाव देता था। हम लोग हँसते थे। उसकी नजर में पुस्तकें मात्र रद्दी पेपर थीं।

मुझे आज भी यह घटना नहीं भूलती जब मेरे घर पर शिवकुमार मिश्र और राममूर्ति त्रिपाठी आए थे। दोनों को यह पता चला कि राजा ढाले यहाँ रहते हैं तब दोनों ने उनसे मिलने की इच्छा जाहिर की। बातचीत करते-करते खाने का समय हो गया। जैसे ही थाली लगने लगी ढाले जी चले गये। मेरी माँ ने कहा उनकी भी थाली लगी है। मेरे पिता जी उन्हें बुलाने गये और साथ में खाना खाया। तब ढाले जी ने कहा मैंने कभी नहीं सोचा था काशी के ब्राहमण हमारे साथ खाना खायेंगे।

जनवादी लेखक संघ का अधिवेशन 1985 में कन्नमवार नगर-1 में हुआ मेरे घर से ही संचालित हो रहा था। तब भी शिवकुमार मिश्र, चन्द्रबली सिंह, प्रो. चंचल चौहान, हृदयेश मयंक, आत्माराम, रमण मिश्रा, सुबोध मोरे, आलोक भट्टाचार्य, शैलेश सिंह, देवमणि पाण्डेय, डॉ. दशरथ सिंह और न जाने कितने हिन्दी के साहित्यकार घर पर जमा थे। ढाले साहब से सभी मिले, घंटों सबकी बहसें उनके साथ होती रहती थी।

मुझे आज भी यह घटना नहीं भूलती जब मेरे घर पर शिवकुमार मिश्र और राममूर्ति त्रिपाठी आए थे। दोनों को यह पता चला कि राजा ढाले यहाँ रहते हैं तब दोनों ने उनसे मिलने की इच्छा जाहिर की। बातचीत करते-करते खाने का समय हो गया। जैसे ही थाली लगने लगी ढाले जी चले गये। मेरी माँ ने कहा उनकी भी थाली लगी है। मेरे पिता जी उन्हें बुलाने गये और साथ में खाना खाया। तब ढाले जी ने कहा मैंने कभी नहीं सोचा था काशी के ब्राहमण हमारे साथ खाना खायेंगे।

 

राजा ढाले दलित पैंथर के साथियों के साथ

सन 1976-77 के दौरान मेरा भाई सरोज त्रिपाठी कालेज में पढ़ते हुए छात्र-राजनीति की तरफ आकर्षित तब हो रहा था। उन दिनों के बाद गांधी, अनुराधा शानबाग (गांधी), बसंती रमन, रितु दीवान, प्रवीण नाडकर, सुनील दिघे, गुरुवीर सिंह, नीलन कर्णिक (सिंह), विलास सोनवणे, आनन्द तेलतुंबड़े, सुबोध मोरे, प्रकाश रेड्डी और न जाने कितने छात्र नेता घर पर आया-जाया करते थे। मेरा घर छात्र-आन्दोलन का अड्डा बन गया था।

आपातकाल के बाद जनता दल का शासन आया और उन्होंने मुम्बई विश्वविद्यालय की फीस 33 प्रतिशत बढ़ा दी। उस फीस वृद्धि के खिलाफ सफेक नामक वामपंथी विचारों के विद्यार्थियों का संगठन बना था। आठ वर्षों तक विभिन्न विषयों पर यह संगठन आन्दोलन करता रहा। आह्वान नाट्य मंच के विलास घोगरें, संभाजी भगत आदि सभी शामिल थे। सभी जब भी हमारे घर आते राजा ढाले से जरूर मिलते थे। जितने भी वामपंथी आन्दोलन के लोग आते थे, सभी ढाले जी से मिलते थे। वैचारिक मतभेद के बावजूद ढाले जी घंटों सभी के साथ बातें करते और सभी से उनकी दोस्ती थी। 80 के दशक में मेरा घर वामपंथी विद्यार्थी आन्दोलन का गढ़ था। इस कारण हमेशा पुलिस आती थी। रात को दो-तीन बजे भी आकर तलाशी लेती। बिल्डिंग के नीचे सालों पुलिस सीआईडी तैनात रहते। उस समय ढाले जी हमेशा हमारे परिवार के साथ खड़े थे।

दलित पैंथर और शिवसेना के बीच महाराष्ट्र में हमेशा तनाव रहता था। एक बार जब दशहरा के दिन शिवसैनिक शिवाजी पार्क की रैली से लौट रहे थे उन्होंने सुभाष नगर, चबूतरे में बौद्ध-विहार पर चप्पल-जूते फेंके, गालियाँ दी और बुद्ध की मूर्ति को क्षति पहुँचाई। परिणामस्वरूप पूरे मुम्बई व महाराष्ट्र में शिवसेना (मराठा) और दलितों के बीच दंगा हो गया। विक्रोली कन्नमवार नगर में कर्फ़्यू लग गया। रातो-रात सेना बुलाई गई। कई दिनों तक हमारी बिल्डिंग के नीचे सेना का फ्लैग मार्च चलता रहा और ढाले अंकल बड़ी शांति से बिना किसी बॉडीगार्ड के आराम से घूमते रहे।

ऐसी ही एक और घटना है। हमारे सामने की बिल्डिंग में शिवसेना प्रमुख रहता था। उसका 14-15 वर्ष का बेटा ढाले अंकल को देखकर जय भीम कहकर चिढ़ाता था। एक दिन ढाले जी ने उस बच्चे को एक चाटा जड़ दिया और फिर ऊपर मेरे घर आए और बोले मैं नांदेड़ जा रहा हूँ, अपने घर की सुरक्षा आप लोगों के हवाले कर रहा हूँ। हालांकि कुछ अनहोनी घटना नहीं घटी।

ढाले अंकल पढ़ने में इतना ज्यादा मगन हो जाते थे कि उन्हें कुछ भान ही नहीं रहता था। एक बार उन्होंने गैस पर दूध रखा और पढ़ते-पढ़ते ताला लगाकर रमाबाई चाल (घाटकोपर) चले गये। धीरे-धीरे दूध का टोप जलकर फट गया और आग लग गई। हमने फायर ब्रिगेड को बुलाया। पूरी बिल्डिंग खाली करवाई गई। बिजली काट दी गई। फिर किसी ने उनको सूचना दी कि आपकी बिल्डिंग में आग लगी है। वे दौड़ते-भागते वापस आए और देखा। उनके घर का ताला तोड़कर फायर ब्रिगेड के लोग आग बुझा रहे हैं।

उनकी पत्नी दीक्षा ढाले के साथ मिलकर मैंने कई बार महिलाओं के केस लिए थे। हम रात को दो-तीन बजे भी हिंसा की शिकार औरतों की मदद करने घर से निकलते थे। मैं कई बार विक्रोली के हरियाली विलेज में, घाटकोपर के रमाबाई चाल में तथा कुर्ला में जहाँ भी मास मूवमेंट की शाखाएँ थीं, उनके साथ जाया करती थी।

श्रीमती ढाले एक वर्किंग महिला होते हुए भी हमेशा ढालेजी के सामाजिक और राजनीतिक कार्यों में यथासंभव सहयोग दिया है। यदि ढाले अंकल जिन्दगी भर फुलटाइम बिना किसी नौकरी के सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता बने रहें तो उसका सबसे बड़ा कारण उनकी पत्नी का सहयोग रहा। घर की आर्थिक जिम्मेदारी आजीवन उन्होंने ही उठा रखी थी और इस बात की शिकायत उन्होंने कभी नहीं की। राजा ढाले  की सफलता के पीछे उनकी पत्नी का बहुत बड़ा हाथ था।

हिन्दू समाज की जाति व्यवस्था कोई साधारण प्रथा नहीं है बल्कि यह गुलामी की सम्पूर्ण व्यवस्था है। इसका प्रभाव व्यक्ति के शरीर से लेकर आत्मा तक और जन्म से लेकर मृत्यु तक बराबर बना रहता है। भारतीय समाज में जाति व्यवस्था जितनी पुरानी है, उतनी ही पुरानी है उसके विरुद्ध विद्रोह और संघर्ष की परम्पराएँ। गौतम बुद्ध, ज्योतिबा फुले और बाबा साहब अम्बेडकर आन्दोलन ने जाति प्रथा के खिलाफ लड़ाई की।

श्रीमती ढाले एक वर्किंग महिला होते हुए भी हमेशा ढालेजी के सामाजिक और राजनीतिक कार्यों में यथासंभव सहयोग दिया है। यदि ढाले अंकल जिन्दगी भर फुलटाइम बिना किसी नौकरी के सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता बने रहें तो उसका सबसे बड़ा कारण उनकी पत्नी का सहयोग रहा। घर की आर्थिक जिम्मेदारी आजीवन उन्होंने ही उठा रखी थी और इस बात की शिकायत उन्होंने कभी नहीं की। राजा ढाले की सफलता के पीछे उनकी पत्नी का बहुत बड़ा हाथ था।

 

भारत के संविधान को डॉ.अम्बेडकर ने यथाशक्ति श्रेष्ठ बनाने का प्रयत्न किया है। संविधान द्वारा स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे महान विचारधाराओं और आदर्शों को सफल बनाने का प्रयत्न किया गया। इसमें देश की पुरानी विषमतावादी, अमानवीय, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक व्यवस्था के स्थान पर समता, न्याय और समान अवसरों की सुविधा और सुरक्षा सभी नागरिकों को समान रूप से दिये जाने की व्यवस्था है। इसमें दलितों  (शूद्रों) और स्त्रियों के प्रति किसी भी प्रकार के भेदभाव का निषेध है।

भारतीय संविधान में स्त्री, पुरुष में किसी भी प्रकार का भेदभाव न मानते हुए कानून के रूप में उन्हें समान अधिकार दिये गये है। इस तरह पहली बार भारतीय नारी को समाज में स्वतंत्रता और समानता का अधिकार प्राप्त हो सका। पर क्या सचमुच उपर्युक्त अधिकार भारतीय समाज व्यवस्था में दलितों और स्त्रियों को मिली? नहीं मिली। इसी कारण डॉ.अम्बेडकर की मृत्यु के पन्द्रह वर्ष बाद महाराष्ट्र की दलित राजनीति में पैंथरों की चिंघाड़ सुनाई दी।

इन पैंथरों की चिंघाड़ ने न केवल महाराष्ट्र की राजनीति में भूचाल पैदा कर दिया बल्कि मराठी साहित्य के साथ-साथ देश की सभी भाषाओं के साहित्यकारों को बौद्धिक स्तर पर प्रभावित किया। दलित साहित्य ने सौन्दर्य शास्त्र, सौन्दर्य बोध में आमूल परिवर्तन दिया। इसी दलित पैंथर के संस्थापकों में से एक थे राजा ढाले।

राजा ढाले ने आजीवन कठिन संघर्ष किया 

राजा ढाले

राजा ढाले का जन्म 30 सितम्बर, 1940 में सांगली जिला के नांदेड़ गांव, (महाराष्ट्र) में हुआ था। उनका पूरा नाम राजाराम पिराजी ढाले था। चार साल की उम्र में वे अपनी मौसी के घर वर्ली (मुम्बई) में रहने आ गये थे। उनकी स्कूली शिक्षा मराठा मंदिर हाई स्कूल, मुम्बई में हुई। वर्ली में दलितों की बड़ी बस्ती है यहाँ अम्बेडकर जयंती जिस प्रकार धूमधाम से मनाई जाती है दुनियाँ में कहीं नहीं इस तरह मनाई जाती। इन्हीं वातावरण में ढाले जी बड़े हो रहे थे। यहीं से अम्बेडकर के विचारों से प्रभावित होकर राजा ढाले एक चित्रकार/लेखक/राजनेता/समाजसेवक चिन्तक बने।

पन्द्रह वर्ष की उम्र में आरसुड़ा के सदस्य बने। महाराष्ट्र दलित संघ नामक साहित्यिक संस्था के सदस्य बने। 1956 में बाबा साहब के मृत्यु के छह महीने  बाद ही उन्होंने विद्यार्थियों का संगठन बनाया और उसके अध्यक्ष बने। 1968 में अमेरिका से जो साप्ताहिक आते थे, उसे पढ़कर ढाले जी को अमेरिका में अफ्रीका ब्लैंक पैंथर आन्दोलन की जानकारी मिली। वे उनके साहित्य से प्रभावित हो रहे थे। उन कविताओं का अनुवाद करने लगे और इसी तरह सिद्धार्थ कालेज, मुम्बई में पढ़ते हुए ब्लैक पैंथर और ब्लैक साहित्य से उन्हें प्रेरणा मिली।

अन्याय, अत्याचार का डटकर सामना करने की उन्होंने ब्लैक पैंथर आन्दोलन के सशस्त्र-संघर्ष का गहन अध्ययन किया और उसी की तर्ज पर दलित पैंथर आन्दोलन खड़ा किया गया। चूँकि अमेरिका का ब्लैक पैंथर आन्दोलन उग्र स्वरूप ले चुका था। मालकम एक्स के नेतृत्व में सषस्त्र संघर्ष कर रहा था उसी की तर्ज पर महाराष्ट्र में दलित पैंथर आन्दोलन की शुरुआत हुई।

दलित पैंथर के उदय का कारण यह था कि डॉ. अम्बेडकर के निधन के बाद उनके अनुयायियों ने 3 अक्टूबर, 1957 के दिन शैड्यूल कास्ट फेडरेशन का विसर्जन कर रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया नामक पार्टी बनाई, पर इन लोगों ने अम्बेडकर के विचारों को फैलाने से बेइमानी की। दलितों पर लगातार अत्याचार अन्याय हो रहे  थे।

स्वतंत्रता के 25 वर्षों के बाद भी दलितों का शोषण, अत्याचार, अन्याय और हिंसा व्याप्त थी। भारत की न्याय और दंड व्यवस्था भी ऐसे अत्याचार को रोक नहीं पाई और दलितों को न्याय तक नहीं दिला पाई। पुलिस और प्रशासन भी शोषित, पीड़ित दलितों के लिए अधिक कुछ नहीं कर रहे थे। कानून होने पर भी समाज में कानून का पालन नहीं किया जाता है। इसी बीच 1971-72 में परिमल कमीशन की रिपोर्ट आई जिसमें संपूर्ण भारत में दलित समाज पर हुए अत्याचार, अन्याय और हिंसा का सर्वेक्षण किया गया था, जो चौंकाने वाला था। इसे देखकर पढ़े-लिखे दलित नौजवानों में आक्रोश पैदा हुआ।

दलित पैंथर का उदय 

दलितों पर बढ़ते अत्याचार के कारण युवाओं में फैले असन्तोष और रिपब्लिकन पार्टी के पुराने नेतृत्व के बारे में हुए भ्रम, निराशा आदि के कारण ही दलित पैंथर का जन्म हुआ। नामदेव ढसाल (प्रजा समाजवादी पार्टी), राजा ढाले (दलित युवा संगठन), भाऊ संगारे (काँग्रेस), गंगाधर गाडे, टी.एम काम्बले (दलित युवा संगठन), जे.वी.पवार, अरूण काम्बले (रिपब्लिकन पार्टी) आदि विभिन्न संगठनों में काम कर रहे मुम्बई के सिद्धार्थ बिहार छात्रावास के छात्रों का दलित पैंथर निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान था।

अनेक जुझारू युवकों का, दलितों पर हुए अन्याय, अत्याचार के विरुद्ध खून खौल रहा था। वे सभी सिद्धार्थ बिहार हॉस्टल में इकट्ठा हो चुके थे। इस सम्पूर्ण पृष्ठभूमि में दलित पैंथर संगठन का उदित होना अनिवार्य घटना थी। पैंथर के युवकों का निडर भाषण, भीड़ को आकर्षित करने वाली तूफानी संभाएँ, लड़ाई-झगड़े, मार-ठुकाई, पुलिस के अभियोग आदि के कारण दलित पैंथर ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया। दलित पैंथर के कार्यकर्ता व नेता निडर थे, युवा थे। सभी प्रबुद्ध पढ़े-लिखे विचारवन्त, अव्वल दर्जे के एवं साहित्यकार थे।

डॉ. अम्बेडकर के निधन के उपरांत निराश दलित समाज को पैंथर से एक नई चिन्गारी अनुभूत होने लगी। जैसे दलित पैंथर के उदय के कारण दलित युवाओं के मन में विषम व्यवस्था के बारे में विद्यमान क्रोध के लिए एक नया मंच प्राप्त हो गया, वैसे ही यह भी नकारा नहीं जा सकता कि दलित समाज में आन्दोलन की चेतना उत्पन्न हो गयी। पैंथर, बहुसंख्य महार और बौद्ध युवाओं का संगठन है। पिछड़े वर्ग, जाति, मेहनतकश  कामगार, भूमिहीन मजदूर, गरीब किसान, घुमंतू जनजाति, आदिवासी, नव-बौद्धिष्ट अन्य बहिष्कृत जातियों, जनजातियों को भी इस संगठन में सम्मिलित किया गया।

29 मई, 1972 दलित पैंथर की स्थापना हुई। प्रमुख नेता थे नामदेव ढसाल, राजा ढाले, जे.पी.पवार, अरूण काम्बले, अविनाश महाटेकर। पैंथर में आने से पहले राजा ढाले लिटिल मैगजीन आन्दोलन में सक्रिय थे। वे येरू पत्रिका के संपादक थे। साठ के दशक में ब्राहमणवादी मराठी साहित्य के लेखन को दलित साहित्य ने चुनौती दी। प्रस्थापित ब्राहमणवादी साहित्य को चुनौती देने के लिए दलित साहित्यकारों का हुजूम खड़ा होने लगा। ढेरों लेखक जैसे-अषोक राहाणे, भालचन्द्र नेमाडे़, नामदेव ढसाल, राजा ढाले, अरुण कांबले, बाबूराव बागुल, दया पवार इत्यादि इसी लिटिल मैगजीन आन्दोलन से उभरे। राजा ढाले लिटिल मैगजीन का नेतृत्व भी किया। नारायण धुर्वे के माझे विद्यापीठ (मेरा विश्वविद्यालय) लेख संग्रह ने स्थापित लेखकों के अन्दर भूचाल पैदा कर दिया था।

जिन लोगों ने स्त्री को नंगा कर घुमाया था उन्हें न्यायालय ने 50 रुपये का जुर्माना दण्ड के तौर पर देने को कहा। ढाले जी ने अपने लेख में सवाल उठाया- सिनेमाघर में यदि राष्ट्रगीत के दौरान कोई व्यक्ति खड़ा नहीं होता तो उसे 350 रुपये दण्ड भरना पड़ता है। तो क्या एक स्त्री को नंगा करके घुमाने से राष्ट्रध्वज (तिरंगा) का अपमान से कम कीमत है क्या? उन्होंने प्रश्न उठाया कि जिस तिरंगा के नीचे हमें न्याय नहीं मिलता, उस राष्ट्रध्वज का क्या उपयोग है।

 

देश में हो रहे अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध 

इसी बीच महिलाओं पर अत्याचार अपने क्रूरतम रूप में जारी था और महिलाओं तथा दलितों के साथ भेदभाव उन्हें प्रजातंत्र के अधिकार से वंचित करने जैसा था। समाज में दलित स्त्रियों का यौन शोषण और बलात्कार की घटनाएँ आम बात थी। ऐसी घटनाओं पर स्त्रियों को न्याय नहीं मिल पाता।

एक तरफ देश आजादी का 25 वां वर्ष मना रहा था तो दूसरी ओर एक  दलित स्त्री को नंगा कर उसे पूरे  गांव में घुमाया गया। इस घटना से आहत होकर राजा ढाले ने समाजवादी पार्टी की पत्रिका साधना में एक लेख लिखा। उस लेख में राष्ट्रध्वज पर सवाल उठते हुए काला स्वतंत्रता दिवस नामक लेख लिखा जिसमें उन्होंने लिखा कि एक स्त्री ने पहनी हुई साड़ी और एक झण्डा (तिरंगा) दोनों ही एक ही कपड़े से बने वस्त्र है।

एक कपड़े को साड़ी का रूप दिया गया तो दूसरे कपड़े को तीन रंगों से डिजाइन बनाकर तिरंगा बना दिया गया, पर अन्त में है तो दोनों ही वस्त्र। तो क्या एक स्त्री की साड़ी उतारकर आप उसको नंगा करते हैं, उसकी कीमत तिरंगे की कीमत से कम है क्या? एक स्त्री को निर्वस्त्र कर आप उसे शहर में घुमाते है क्या इससे देश का अपमान नहीं होता? और न्याय के नाम पर क्या मिलता है?

जिन लोगों ने स्त्री को नंगा कर घुमाया था उन्हें न्यायालय ने 50 रुपये का जुर्माना दण्ड के तौर पर देने को कहा। ढाले जी ने अपने लेख में सवाल उठाया- सिनेमाघर में यदि राष्ट्रगीत के दौरान कोई व्यक्ति खड़ा नहीं होता तो उसे 350 रुपये दण्ड भरना पड़ता है। तो  क्या एक स्त्री को नंगा करके घुमाने से  राष्ट्रध्वज (तिरंगा) का अपमान से कम कीमत है क्या? उन्होंने प्रश्न उठाया कि जिस तिरंगा के नीचे हमें न्याय नहीं मिलता, उस राष्ट्रध्वज का क्या उपयोग है।

इस लेख के कारण राजा ढाले को देशद्रोही घोषित कर दिया गया। उन्हें माफी मांगने को कहा गया। उन पर केस किया गया पर उन्होंने कहा मुझे फांसी पर चढ़ा दो पर मैं माफी नहीं मांगूंगा। उस एक लेख से प्रभावित होकर हजारों दलित युवक सिर पर कफन बांधकर जाति  प्रथा और जाति  व्यवस्था को ललकारने निकल पड़े। दलित पैंथर ने समाज व्यवस्था की नींव को हिलाकर रख दिया।

दुर्गा भागवत मराठी साहित्य की प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं। उन्होंने सत्यकथा पत्रिका में वेश्या पर अपमानजनक टिप्पणी की जिस पर राजा ढाले ने सत्याकथैची सत्याकथा (सत्यकथा की सत्यकथा) लिखकर प्रस्थापित ब्राहमणवादी लेखकों के अन्दर बवंडर खड़ा कर दिया। राजा ढाले की कविताएँ जातिवाद के खिलाफ आग उगलती थीं।

राजा ढाले मात्र एक राजनेता और सामाजिक कार्यकर्ता ही नहीं थे बल्कि बहुत बड़े सृजनशील साहित्यकार थे। विलक्षण कल्पनाशक्ति, साहित्य की सूक्ष्म समझ, विचारक आलोचक और कमाल की तर्कशक्ति थी। इसी कारण वे मात्र रजानेता नहीं थे बल्कि अपनी साहित्य द्वारा भी समाज में वैचारिक बदलाव ला रहे थे।  ब्राहमणवादी मराठी साहित्यकार दलित साहित्य को ’साहित्य’ मानने से इंकार कर रहे थे। ऐसे समय में राजा ढाले ने दलित-साहित्य को अपने तार्किक विचारधारा के बल पर जीवित रखा।

उनके दोस्त जे.पी.पवार के अनुसार यदि ढाले न होते तो दलित साहित्य की भ्रूणहत्या हो चुकी होती। हरिजन शब्द के प्रयोग को दलित पैंथर ने बहिष्कृत  किया। इसी तरह राजा ढाले दलित-साहित्य के बदले उसे अम्बेडकर के विचारों पर आधारित साहित्य लिखते हैं तो इसी नाम से इससे जाना, जाना चाहिए। आज दलित शब्द का प्रयोग कम हो रहा है, इसका कारण राजा ढाले की एकाकी लड़ाई थी। इससे इनकार नहीं किया जा सकता।

1973 में दलित पैंथर ने कोल्हापुर में शंकराचार्य पर चप्पल फेंके। राजा ढाले ने उसका नेतृत्व किया था। जातिप्रथा तथा जाति व्यवस्था को बनये रखने में हिन्दू धर्म गुरुओं का सबसे बड़ा हाथ है शिवसेना के विरुद्ध गीता दहन (भगवतगीता) का केस हो सबमें दलित पैंथर के लोग आगे थे।

1974 का वर्ली दंगा सबसे भयावह और उग्र था। चूँकि ब्लैक पैंथर की तर्ज पर दलित पैंथर आन्दोलन खड़ा हुआ था इसलिए उन्होंने सोचा गांवों में हमारे लोगों को मारा जाता है, पिटाई की जाती है तो हम भी शहरों में सवर्णों को पिटेंगे।    दलितों ने हिन्दू महासभा पर मारपीट का आरोप लगाया। तीन महीने तक सवर्णों और दलितों के बीच दंगा चला। पुलिस बुरी तरह दलितों की पिटाई कर रही थी।

इसी बीच भोईवाड़ा में बिल्डिंग के ऊपर से पत्थर फेंका गया जिसमें भागवत जाधव नामक युवक की मृत्यु हो गयी और यह आन्दोलन अत्यधिक उग्र हो उठा। राजा ढाले को गिरफ्तार कर लिया गया। वर्ली दंगे के बाद दलित पैंथर को सही अर्थों में पहचान मिली। यह वह वक्त था जब न तो मोबाइल फोन था, न हाइवे जैसी सड़कें थीं, न सोशल मीडिया था, पर जब कोई घटना घटती और पैंथर के लोग नवयुवकों को मैसेज भेजते तो उनके एक मैसेज पर पांच-पांच हजार नवयुवक एक जगह पर इकट्ठा हो जाया करते थे।

कहीं भी जाना होता तो ट्रेन में बिना टिकट के आया-जाया करते और यदि टीसी टिकट मांगता तो उसे उठाकर स्टेशन पर उतार देते थे। वर्ली दंगों के बाद महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली, पंजाब और लंदन में दलित पैंथर की शाखाएँ खुलीं। हालात ऐसे बन गए कि दलित पैंथर का नाम लेते ही दहशत फैल जाती थी। वर्ली दंगों में राजा ढाले ने चातुर्वर्ण को खुली चुनौती दी। भगवतगीता का दहन किया। इस प्रकार कामों के कारण समाज में यह बात फैल गई कि  पैंथर के लोग कुछ भी कर सकते हैं। 1974 में दलित पैंथर ने चुनाव का बहिष्कार किया।

जाति व्यवस्था का अस्तित्व ही हमारे देश के लोकतंत्र का सबसे बड़ा अपमान है। हमें व्यवस्था बदलनी है न कि उस व्यवस्था का भाग बनना है। हमारे लोग स्वार्थी हैं, सभी नेता बिके हुए हैं। अलग-अलग पार्टियों में जाकर बैठे हुए हैं। नयी विचारधारा फलनी-फूलनी चाहिए, पर हमारे नेताओं में ध्येयवाद ही नहीं है। अम्बेडकरवादी नेताओं में लगन नहीं है। आज व्यवस्था बदलने के लिए साहित्य और संगठन की जरूरत है।

 

इसी बीच पूना के पास भूगांव में एक दलित स्त्री अपने मायके आई थी। उसका बलात्कार किया गया जिसके परिणामस्वरूप उस स्त्री ने कुएँ में कूद कर जान दे दी। तब नामदेव साहब, राजा ढाले, जे.वी.पवार आदि दो  हजार नौ जवानों के साथ भूगांव पहुँचे। वे लोग दलित पैंथर का बैनर नहीं ले गये थे पर हाकी स्टिक, लाठी, साइकिल की चैन, तलवार जैसे हथियार के साथ ही डीजल और पेट्रोल लेकर उस बलात्कारी का घर जलाने के उद्देश्य से गये थे। पैंथर ने मुम्बई में चाहे खार की घटना हो, विलेपार्ले या ताड़देव की घटना हो, सभी का मुँहतोड़ जवाब दिया। ढाले जी का कहना था कि पृष्ठभूमि ऐसी थी कि हमें आक्रामक होना पड़ा।

24 अक्टूबर, 1974 में दलित पैंथर आन्दोलन में फूट पड़ गयी। नामदेव ढसाल को कम्युनिस्ट मानते हुए राजा ढाले अलग हो गये। ढाले के साथ संगारे और अविनाश भी आगे चलकर अलग हो गए। ढाले ने महात्मा फुले और अम्बेडकर के विचारों पर आधारित मास मूवमेंट नामक संस्था बनाई। आपातकाल के दौरान नामदेव ढसाल गुट में भी फूट पड़ गई।

महाराष्ट्र के इतिहास की लोमहर्षक घटनाएँ 

इसी बीच ’गवई बन्धुओं की आँख निकाल ली गई थी। जे.वी.पवार और ढाले तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी से मिले। इन्दिरा जी ने पूरी घटना का जायजा लिया और इस घटना से वे इतनी आहत थी कि उनकी आँखों में आँसू आ गये थे। उन्होंने  गवई बन्धुओं को खेती करने के लिए जमीन दिलवाई। इसी बीच मराठावाड़ा नामांतर आन्दोलन हुआ। इस आन्दोलन के दौरान बहुत हिंसा हुई। राजा ढाले ने नांदेड़ में अधिवेशन का आयोजन किया।

रिडल्स ऑफ  हिन्दुइज्म

उन्होंने गुरुद्वारे से 40 तलवारें खरीदी और नामांतर आन्दोलन में कूद पड़े। इसके बाद महाराष्ट्र में रिडल्स का आन्दोलन सबसे बड़ा था। डॉ. अंबेडकर की पुस्तक रिडल्स ऑफ  हिन्दुइज्म पर शिवसेना ने बवाल मचाया था और कुछ भाग निकालने की मांग की, जो राम को लेकर विवादास्पद थे। उसके विरोध में दलितों ने महाराष्ट्र विधानसभा पर इतना बड़ा मोर्चा निकाला कि शिवसेना भी चुप हो गई। उनकी ताकत और शक्ति को देखकर राजा ढाले ने महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री शंकरराव चौहान के साथ मिलकर ड्राफ्ट तैयार किया था। उस समय छगन भुजबल शिवसेना में थे और ढाले जी को ऊपर फुटनोट लिखने के लिए दबाव डाल रहे थे। राज ढाले ने उनकी एक न सुनी और अपने तरीके से ड्राफ्ट तैयार किया।

राजा ढाले ही थे वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने महाराष्ट्र सरकार से समग्र अम्बेडकर साहित्य छपवाने की मांग की थी। जिसके परिणामस्वरूप अम्बेडकर के साहित्य का 24 खण्ड, बहिष्कृत भारत और मूकनायक पुस्तकें महाराष्ट्र सरकार ने छापी। 1986 में डॉ. अम्बेडकर मेमोरियल की मांग भी राजा ढाले न की थी। अपने सामाजिक व्यक्तित्व और साहित्यिक कार्यों के लिए प्रसिद्ध राजा ढाले ने मुम्बई उत्तर-पूर्व लोकसभा क्षेत्र में भारतीय रिपब्लिकन पार्टी (भारिप, प्रकाश अम्बेडकर) 1999 और 2004  में चुनाव लड़ा, जिसमें उन्हें जीत हासिल नहीं हुई।

मेरी आखिरी मुलाक़ात 

मैं  ढाले अंकल से आखिरी बार मई, 2019 में मिली थी। इस वादे के साथ कि भोपाल से लौटने के बाद आपसे अवश्य मिलूँगी। उस समय मेरी नजर उनके आस-पास रखी पुस्तकों पर गयी। मैंने पूछा कि आप नया क्या लिख रहे हैं? उन्होंने कहा मैं जाति-व्यवस्था पर लिखना चाहता हूँ। आज तक जाति पर ब्रिटिशों ने ही लिखा। ढाले जी का कहना था कि वेदों की रचना गैर-हिन्दुओं ने प्राकृत भाषा में की थी। बाद में ब्राहमणों ने संस्कृत भाषा में लिखा। इसी तरह रामायण और महाभारत दोनों की रचना क्रमश: वाल्मिकी और व्यास ने की, दोनों ही कोली जाति के थे। मैं जाति-प्रथा  पर इतिहास लिखकर जाति प्रथा के मूल पर परिषद लूँगा। उन्होंने दृढ़ता से कहा जाति-व्यवस्था जब तक खत्म नहीं होती तब तक लोकतंत्र कायम नहीं हो सकता।

जाति व्यवस्था का अस्तित्व ही हमारे देश के लोकतंत्र का सबसे बड़ा अपमान है। हमें व्यवस्था बदलनी है न कि उस व्यवस्था का भाग बनना है। हमारे लोग स्वार्थी हैं, सभी नेता बिके हुए हैं। अलग-अलग पार्टियों में जाकर बैठे हुए हैं। नयी विचारधारा फलनी-फूलनी चाहिए, पर हमारे नेताओं में ध्येयवाद ही नहीं है। अम्बेडकरवादी नेताओं में लगन नहीं है। आज व्यवस्था बदलने के लिए साहित्य और संगठन की जरूरत है।

हमारे 90 प्रतिशत लोग नौकरी के लिए तरस रहे हैं। आज हमारा प्रधानमंत्री हिन्दुस्तान राष्ट्र का प्रयोग कर रहा है। इस शब्द का प्रयोग इसीलिए हो रहा है कि हम गुलामों के गुलाम रहें और हिन्दू राज करें इसलिए हिन्दुस्तान शब्द का प्रयोग हो रहा है। प्रधानमंत्री आज यही चाहते हैं। आज आदिवासी नंग-धड़ंग घूम रहे है। क्या खाते है क्या पीते है, कैसे रहते है? देश  की सरकार को इससे कुछ लेना देना नहीं है।

फुले-अम्बेडकर का ध्येयवाद था जाति व्यवस्था बदलना। सभी का दिमाग बदलना चाहिए। आज आरपीआई टुकड़ों में बंटी है। मैं जाति व्यवस्था बदलने के लिए कल भी जान देने को तैयार था, आज भी हूँ। हमारे नेता बिकाऊ हैं। वे अनैतिक हैं।  गौतम बुद्ध, फुले और अम्बेडकर ने नैतिकता को महत्व दिया था। हमारे विरोधियों की संख्या आज बढ़ गई है। पर जाति के खिलाफ लड़ने की तैयारी हमारे लोगों में नहीं है। ढाले जी हमेशा दलितों की वेदना के साथ खड़े थे। उनका कहना था गौतम बुद्ध ने इंसान को पंचशील का सिद्धांत देकर मानव बनाया। हमारे नेताओं में सामर्थ्य नहीं। नेता बनने के लिए आग पर चलना पड़ता है। मैं सभी भाइयों से अपील करता हूँ – लड़ों, नहीं तो मारे जाओगे। ज्ञान बहुत बड़ी चीज है। कबीर-फुले-अम्बेडकर का दृष्टिकोण विज्ञानवादी था। नैतिकता सबसे बड़ी चीज है। पैंथर निराश नहीं। आगे आने वाली पीढ़ी उसे अवश्य आगे ले जायेगी।

तुम उनसे मिलने नहीं आई, वो तुम्हारी राह देख रहे थे…. 

मैं भोपाल से जून 2019 के आखिरी सप्ताह में वापस आई। सोच ही रही थी कि उनसे मिलूँ। स्त्रीकाल के  संपादक संजीव चन्दन तथा इंडिया टुडे की मेरी एक सहेली उनका इन्टरव्यू लेना चाहते थे। इस कारण मैंने उन्हें फोन किया पर उन्होंने जब फोन नहीं उठाया तब मैंने उनकी पत्नी दीक्षा ढाले से बात की उन्होंने कहा- ‘उन्हें कान से सुनाई नहीं देता। उनकी तबियत ठीक नहीं है, किडनी में भी तकलीफ है। पर तुम मिलने जरूर आना।’

मैं किन्हीं कामों में व्यस्त थी और मिलने न जा सकी। 16 जुलाई 2019 को अचानक मेरी छोटी बहन अनिता का फोन आया। गाथा ने बताया कि ढाले अंकल नहीं रहे। उनके अंतिम संस्कार में जब मैं गई तब श्रीमती ढाले का पहला वाक्य था -’अरे, तुम उनसे मिलने नहीं आई, वो तुम्हारी राह देख रहे थे।’ यह कहकर वे गले लगकर फूट-फूटकर रो रही थीं और मैं भी!..

अब मैं जिन्दगी भर राजा ढाले अंकल की राह देखते हुए बिताऊँगी, जिनकी छत्रछाया में मैंने दलित साहित्य, फुले और  अम्बेडकर की पुस्तकें पढ़ी। धनंजय कीर की पुस्तक उन्होंने ही मुझे दी थी। दलित पैंथर के आक्रामक नेता राजा ढाले ने जीवन भर नैतिकता का निर्वाह किया। कभी बिके नहीं। ईमानदारी के साथ सिर उठाकर चलें।

एक विद्रोही विचारक, साहित्यकार नेता, जो पिछले पचास वर्षों से अधिक समय तक साहित्य  और अम्बेडकरी आन्दोलन में विद्रोह की तलवार भांजते हुए एक राजा की तरह लड़ा। आज सहस्त्राब्दी का पैंथर पंचशील में विलीन हो रहा था। दलित आन्दोलन को उनके जाने से बहुत बड़ा नुकसान हुआ। उनकी दोस्ती कम्यूनिस्ट से लेकर नक्सलाइट लोगों तक से थी। सभी को हमेशा इस विचारवन्त की कमी महसूस होगी।

कुसुम त्रिपाठी जानी-मानी लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। संप्रति वे एसएनडीटीयू मुंबई और बीआरएयूएसएस महू में अतिथि प्रोफेसर हैं। 

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