वास्तविक जीवन के कर्मठ अधिकारी

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 दूसरा और अंतिम भाग

आईएएस अधिकारीनरेश चन्द्र, जिन्हें अपनी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए पद्म विभूषण दिया गया। एन. एन. वोहरा जम्मू कश्मीर के राज्यपाल बनाए गए और पद्म विभूषण भी मिला। चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने कई सारे चुनाव सुधार किये। इनको रामन मैगसेसे पुरस्कार मिला। योगेन्द्र नारायण, गोपाल कृष्ण गाँधी, डी.के. रवि आदि का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। के. एस. सिंह ने पीपल ऑफ़ इंडिया प्रोजेक्ट पर काम करके देश के समस्त समुदायों एवं संस्कृतियों के ब्योरों को दर्ज करने का एतिहासिक काम किया। डॉ. बी. डी. शर्मा (आईएएस 1956) ने जनजातीय आयुक्त के तौर पर जनजातियों के अधिकारों के लिए एक एक्टिविस्ट की तरह काम किया। आईएएस पी. एस. कृष्णन ने भी आजीवन सामाजिक न्याय के पक्ष में काम किया। मंडल कमीशन को लागू करने में उनकी प्रभावी भूमिका थी। एस. आर. शंकरन को पीपुल्स ऑफिसर कहा जाता है जिन्होंने बंधुआ मजदूर, कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण के क्षेत्र में काम किया। वे दलित लोगों के उत्थान के लिए आजीवन समर्पित रहे। हर्ष मंदर अपनी नौकरी से त्यागपत्र देकर अमन बिरादरी नामक सामाजिक संगठन चला रहे हैं। उमाकांत उमराँव मध्य प्रदेश के देवास जिले को पुनः पानीदार बनाकर जलाधीश के नाम से मशहूर हुए। जल संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने के लिए उन्हें सम्मानित भी किया गया। उत्तर प्रदेश कैडर के कई आईएएस अधिकारियों ने जनहित में सरकारी व्यवस्था में कई नवाचार किये और सेवाओं को आसान बनाया। आमोद कुमार यादव जी ने  लोकवाणी नामक ऑनलाइन प्लेटफार्म बनाया और जनसमस्याओं को दर्ज कराकर उनका निस्तारण सुनिश्चित कराया।  इसी तरह मिड डे मील को मोनिटर करने के लिए भी आईवीआरएस सिस्टम बनाया। उनके नवाचारों के लिए उन्हें सन 2008 में प्रधानमंत्री एक्सीलेंस अवार्ड दिया गया।  फ़ोर्ब्स पत्रिका ने उन्हें सन 2010 में प्रोमिजिंग यंग लीडर ऑफ़ इंडिया के रूप में चिन्हित किया। राजशेखर जी ने जनसेवा केन्द्रों की स्थापना करके जनता को अपनी समस्याओं के लिए एक ऑनलाइन माध्यम उपलब्ध कराया। उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस सुहास एल.वाई. ने दिव्यांग श्रेणी में अन्तराष्ट्रीय स्तर पर बैडमिंटन के खेल में कई गोल्ड मेडल जीता और प्रदेश तथा  देश का नाम उंचा किया।  इन अधिकारियों के कार्यों और उपलब्धियों को आधार बनाकर बॉलीवुड को अच्छी फ़िल्में बनानी चाहिए।

पुलिस अफसरों वाला सिनेमा

फिल्म सरफ़रोश के एक सीन में आमिर खान और नसीरुद्दीन शाह

पुलिस और सेना के अधिकारियों/कर्मचारियों के जीवन एवं कार्यों के ऊपर बहुत सारी फिल्में बनी हैं।  इफ्तेखार तो सत्तर और अस्सी के दशक के कई फिल्मों इत्तेफाक (1969), जॉनी मेरा नाम (1970),  जंजीर (1973), डॉन (1978), रक्षा (1982) में पुलिस अफसर के रोल में नजर आये और बहुत पसंद किये गए।  स्वयं अमिताभ बच्चन जंजीर फिल्म में इंस्पेक्टर बनकर हिट हुए।  राम बलरामगिरफ्तारमेजर साब, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियोंलक्ष्यबंटी और बबली फिल्मों में पुलिस के रोल में दिखते हुए उन्होंने देव(2004) फिल्म में जॉइंट कमिश्नर ऑफ़ पुलिस बनकर शानदार अभिनय किया। वर्दीपुलिसवाला गुंडा और अन्य कई फिल्मों में धर्मेन्द्र ने पुलिस का रोल किया। बॉलीवुड के ज्यादातर बड़े अभिनेताओं और अभिनेत्रियों ने पुलिस का रोल किया है। कहानी (2012) में नवाजुद्दीन सिद्दीकी और गब्बर इज बैक (2015) में जयदीप अहलावत ऐसे पुलिस अधिकारी के रूप में सामने आते हैं जिनकी बॉडी लैंग्वेज देखकर लगता है कि बस कुछ ही घंटों में सारे अपराध तंत्र की पोल खोल करके सभी अपराधियों को गिरफ्तार ही कर लेंगे थानेदार (1990),  कुरुक्षेत्र  (2000), पुलिसगिरी (2013) आदि फिल्मों में संजय दत्त, मोहरा, आन:मेन एट वर्क, एवं खाकी आदि फिल्मों में अक्षय कुमार तो चक्रव्यूह (2012) में नक्सल के खिलाफ कार्यवाही करने के लिए अर्जुन रामपाल पुलिस अधिकारी बने हैं। धूम सीरिज में सन 2004 से लेकर 2013 तक कुल तीन फिल्में रिलीज हुईं।  चोर सिपाही के खेल में अभिषेक बच्चन पुलिस के रोल में स्मार्ट चोर को पकड़ने के लिए जोर लगाते रहते हैं।  दबंग सीरिज की 2010 से 2019 तक तीन फिल्में रिलीज हुईं।  सलमान खान (चुलबुल पांडे) अभिनीत अभिनीत इन फिल्मों के इंस्पेक्टर चुलबुल पांडे के लिए कुछ भी प्रतिबन्धित नहीं।  ये फ़िल्में फिल्म निर्माताओं द्वारा एक जोकर टाइप इंस्पेक्टर के भ्रष्ट व्यवहार को कामेडी में लपेटकर सही साबित करने का प्रयास प्रतीत होती हैं। सरफ़रोश में आमिर खान एसीपी के रोल में आतंकवादियों के खिलाफ लड़ते दिखते हैं। अब तक छप्पन (2004) फिल्म एनकाउंटर स्पेशलिस्ट कहे जाने वाले मुम्बइया इंस्पेक्टर के जीवन पर आधारित है।  एक-डेढ़ दशक़ पहले इन एनकाउंटर स्पेशलिस्ट को जनता हीरो समझती थी लेकिन अब धीरे-धीरे कई जांचों के बाद उनके कुकर्मों की पोल खुलती जा रही हैं।  कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी के जीवन पर बनी सहर (2005)अरशद वारसी की महत्वपूर्ण फिल्म है । समय-समय पर महिला पुलिस अधिकारियों के उपर भी बॉलीवुड में कुछ अच्छी फ़िल्में बनी हैं। दृश्यम (2015) में तब्बू एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की भूमिका में कहर ढाती हैं जो राज उगलवाने के लिए संदेहास्पद लोगो को थर्ड डिग्री देने में जरा भी संकोच नहीं करती है। अंधा कानून (1983) में हेमा मालिनी, तेजस्विनी (1994) में विजयाशांति, जय गंगाजल (2016) में प्रियंका चोपड़ा, मर्दानी (2014, 2019) में रानी मुखर्जी आदि से एक्शन से भरपूर काम लिया गया है। इस प्रकार फिल्मों में जाबांज और कर्मनिष्ठ महिला पुलिस अधिकारियों की कहानी सिल्वर स्क्रीन पर दिखाई गयी है।

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डकैत (1986) और आक्रोश (2010) में परेश रावल सिविल पुलिस के डरावने इंस्पेक्टर के रोल में हैं जो कानून और अपने पद का भरपूर दुरूपयोग करते हैं। वे पैसे के लिए किसी को भी गोली मार सकते हैं। फर्जी केस में फंसा सकते हैं। मोहरा फिल्म में भी वे माफियाओं से पैसे लेकर पुलिस विभाग की गोपनीय सूचनाएं लीक करते हैं। शूल (1999) में मनोज वाजपेयी ने एक ईमानदार, निडर एवं कर्तव्यनिष्ठ पुलिस इंस्पेक्टर की भूमिका निभाई है। शूल पुलिस वालों के जीवन पर बनी एक आदर्श फिल्म है। बिहार राज्य की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म में पुलिस के एक कानूनपसंद और स्वाभिमानी इंस्पेक्टर को विद्रोही होना पड़ता है।  उसकी निजी जिंदगी तबाह हो जाती है। यह फिल्म दर्शको को सोचने पर मजबूर करती है और भ्रष्टचारियों और  अपराधियों के खिलाफ आवाज उठाने को प्रेरित करती है। गंगाजलसिंघम,  सिंघम रिटर्न्स आदि फिल्मों में अजय देवगन ने ईमानदार पुलिस अधिकारी की भूमिका में अच्छा काम किया है। इन फिल्मों को बार-बार देखने का मन करता है। गंगाजल का पुलिस अधीक्षक अमित कुमार हिंसा से नहीं, कानून के माध्यम से अपराधियों को सजा दिलाना चाहते हैं।  सिम्बाकटियाबाजशंघाई जैसी कुछ और फिल्मे हैं जो पुलिस के जीवन और कार्य पर आधारित हैं। आर्टिकल 15 में आयुष्मान खुराना सिस्टम के अंदर और बाहर की सारी प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करते हुए रेप और मर्डर की शिकार लड़कियों को न्याय दिलाने हेतु कार्य करते हैं और अपराधियों को सजा दिलाते हैं। इस फिल्म का पुलिस अधिकारी, गंगाजल वाले एसपी की तरह लोगों में पुलिस के प्रति भरोसा पैदा करने का काम करता है । वन विभाग के अधिकारियों के कार्यों पर कुछ अच्छी फ़िल्में बनी हैं।  दोस्त (1989)  में मिथुन वन विभाग के अधिकारी बने हैं जो जंगली जानवरों को पोचर्स और स्मगलर्स से बचाने के लिए लड़ते हैं। अंधा कानून में अमिताभ रेंज आफिसर की भूमिका में माफिया द्वारा वनों के काटने से बचाते हैं लेकिन उनकी साजिश का शिकार होकर जेल पहुँच जाते हैं और उनकी निजी ज़िन्दगी तबाह हो जाती है। शेरनी (2021) फिल्म में विद्या बालन सम्भागीय वन अधिकारी (डीएफओ) की भूमिका में शेरनी और उसके दो बच्चों को शूटर्स और ओछी राजनीति से बचाने के लिए पूरे साहस से काम करती हैं। उनकी भूमिका सराहनीय एवं प्रेरणादायक है।

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वास्तविक अधिकारियों की सच्ची कहानियों पर ध्यान देना चाहिए

बॉलीवुड में अन्य विभागों की तुलना में पुलिस और सेना पर ज्यादा फिल्में बनती रही हैं। लोग ईमानदार और देशभक्त अफसरों पर बनी फिल्मों को पसंद करते हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि लोग मजिस्ट्रेट और अन्य विभागों के लोगों पर बनी फिल्मों को जानना या देखना पसंद नहीं करेंगे। इसका मुख्य पहलू यह है कि बॉलीवुड सिनेमा उनके उपर फिल्म बनाने में रुचि नहीं दिखाता है। पुलिस के अच्छे और बुरे दोनों पहलुओं पर बहुत सारी फिल्में बनती हैं। कोर्ट रूम सीन भी खूब फिल्माए जाते हैं लेकिन वहां भी वकीलों की बहस और पुलिस-वकील डाईकोटॉमी पर ही फिल्ममेकर का फोकस रहता है।  जॉली एलएलबी सीरिज की दोनों फिल्मों में जज साहब को भी पर्याप्त महत्व दिया गया है लेकिन उनको मजाकिया मूड में ज्यादा दिखाया गया है। बॉर्डरकारगिल जैसी फिल्मों से जे.पी. दत्ता ने सीमा पर लड़ने वाली फिल्मों में लोगों की रुचि बढाई।  कुछ फिल्में अन्य विभागों और अधिकारियों पर बनी हैं तो उनमें उनके कार्यों और  संघर्षों की अपेक्षा उनके निजी जीवन, पिता-पुत्र संबन्धों, इश्क-प्यार-मोहब्बत का मसाला ही प्रमुखता से चित्रित किया गया है जिससे फिल्में प्रभावी नहीं हो पातीं और मूल मुद्दे से भटक जाती हैं। राज्य सेवा के अफसरों पर बहुत कम फिल्में बनी हैं जबकि वे विभिन्न पदों पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाते हैं। केवल उत्तर प्रदेश में देखें तो ज्ञान पीठ पुरस्कार विजेता साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल पीसीएस अधिकारी थे। श्याम सिंह यादव अन्तराष्ट्रीय स्तर के निशानेबाज और अब सांसद हैं। शिवमूर्ति प्रख्यात कथाकार हैं तो सुभाषचंद्र कुशवाहानामचीन इतिहासकार-कथाकार हैं। पीसीएस अधिकारी सुधाकर अदीब एक जाने-माने उपन्यासकार हैं। भारतीय सिनेमा के निर्माता-निर्देशकों को निष्ठा और दायित्वबोध के साथ जनहित में कार्य करने वाले सभी विभागों के अधिकारियों और कर्मचारियों के जीवन पर सार्थक फ़िल्में बनाने की पहल करनी चाहिए।

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