सत्यम शिवम सुंदरम की तो ठठरी सूख गई

दीपक शर्मा

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के एल सोनकर सौमित्र जी ने हिंदी साहित्य के क्षेत्र में गज़लकार के रूप में अपनी पहचान बनाई है। उनकी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। जो अब एक संग्रह के रूप में पाठकों के समक्ष आ चुकी है। संग्रह का नाम है – ‘है ये हिंदुस्तान के किस्से’। जिसमें कुल 94 गजलों का संग्रह है। उनकी रचनाएं भूख, गरीबी अशिक्षा, असमानता, भ्रष्टाचार, अन्याय, अपराध एवं शोषण के विरुद्ध मजबूती से संवाद करती है।  सौमित्र जी प्रेम, सौंदर्य, मनोरंजन आदि लुभावने विषयों से बचते हुए सीधे समस्याओं पर लिखते हैं। वे किसानों मजदूरों एवं पीड़ितों, दलितों व अल्पसंख्यकों की बात करते हैं। वे सामाजिक राजनीतिक एवं सांस्कृतिक स्थिति पर पैनी नजर रखते हैं तथा विभिन्न विषम परिस्थितियों पर बेबाकी से लिखते हैं।

सौमित्र जी, देश में हो रहे अपराधों के बीच सुरक्षा पर सवाल उठाते हैं। देश ने गर्व के साथ जिन लोगों के हाथों में सुरक्षा का कमान सौंपा था। उन्हीं के बीच अस्मिता पर संकट है। जब खुलेआम चौराहों पर महिलाओं की आबरू लूटी जाती हो या घर में ही वे सुरक्षित नहीं हैं तब एक कवि के रूप वे सुरक्षा व्यवस्था को नकाब करते हैं –

        गर्व था कि सुरक्षित आबरू अब मुल्क में

        लुट गए हम चौराहे पर अपने रखवालों के बीच

            इज्जत जब घर में ही नहीं सुरक्षित हैं

          और गैर से कैसी आशा बस्ती में

कहने को विभिन्न मंचों से नारी सशक्तिकरण की तमाम बड़ी बातें की जाती हैं। जिसमें लक्ष्मी, सरस्वती दुर्गा सब का उदाहरण दिया जाता है, फिर भी बेटियों पर ज्यादती कम नहीं हो रही है। वह लगातार आत्महत्या कर रही हैं। ऐसे में लक्ष्मी सरस्वती दुर्गा की बात करना कवि को ठीक  नहीं लगता –

             लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा की बातें सब बेमानी है

          पढ़ी बिटिया सुसाइड कर ले सारी ज्यादती सह के

 देश में बहू बेटियों का चीर हरण आज एक आम बात हो गई है। अभी हाल ही में जिला पंचायत के चुनाव में पर्चा दाखिल करने गयी एक महिला की साड़ी खींचकर उसे अपमानित किया गया।  इस प्रकार छेड़खानी की घटनाएं आए दिन खुलेआम होती रहती हैं –

           चीर हरण अपहरण की बात आम हो गई

             छेड़छाड़ मौत का पैगाम देखता रहा

 

समतामूलक भारतीय समाज में दहेज लेना एक अपराध है। दहेज कम मिलने के कारण  लोग बहूओं पर तमाम तरह के अत्याचार करते हैं। जिस कारण ससुराल में वे आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो जाती हैं –

               घुटी चीखें थी अबला की धुआँ अब आसमां में हैं

           लगा पीहर के लोगों ने तिलक कुछ कम किया होगा

 

आज के दौर में नारियों और दलितों पर हर जगह विमर्श हो रहा है। यह केवल विमर्श तक ही सीमित है, इसलिए सौमित्र जी सवाल उठाते हैं कि आप अपने घरों में इन विमर्शों का अनुसरण कितना करते हैं? उनका मतलब है कि क्या आप विमर्श के मुताबिक अपने घरों में नारियों को वैसा सम्मान देते हैं? क्या आप अपने गांव कस्बों में दलितों के साथ वैसा व्यवहार करते हैं।

           विमर्श हो रहा है नारियों पर, दलितों पर

           बताओ यार तूने घर में बताया कितना?

 

के एल सोनकर सौमित्र

सौमित्र जी प्रशासनिक व्यवस्था पर भी तीखा सवाल उठाते हैं जिनमें अपराधी लोग हमेशा बच जाते हैं और जो निर्दोष होते हैं जेल में सलाखों के पीछे होते हैं –

           आततायी बच गए निर्दोष जन पकड़े गए

           प्रशासनिक प्रयास का परिणाम देखता रहा।

 

वे संविधान के बुरे हालात पर भी चिंता करते हैं। संविधान की हालत एवं दशा क्यों खराब हो गई है।  इन बदली हुई परिस्थितियों में आज संविधान पर जो लगातार हमले हो रहे हैं। देश संकट की स्थिति में है। संविधान के इस तमाशाई हालात बैठकर आपस में चर्चा करने की जरूरत है –

        आइए मिल बैठकर कुछ पल यहां चर्चा करें

         हालत संविधान की क्यों तमाशाई हो गई

 

सरकारों द्वारा कर्ज लेकर विकास के सुनहरे सपने दिखाए जाते हैं। वास्तव में ये विकास है ही नहीं। विकास के नाम पर धोखा है और आम जनता इन लुभावनी बातों में आकर वाहवाही करती है और तालियां पिटती है –

          ऋण चढ़ रहा है सर पर हमारी प्रगति के नाम

         हम हैं कि वाह वाही और ताली में मस्त हैं

 

कवि को चिंता है कि इस विकास की आँधी में किसानों के खेत कारखानों में और घर दवाखाने में तब्दील हो रहे हैं। यही नहीं हवा, पानी, भोजन, रोशनी सब के सब जहरीले होते जा रहे हैं –

           खेत कारखाने हो रहे हैं

           घर कि दवा खाने हो रहे हैं

           हवा पानी भोजन रोशनी

          सभी जहरखाने हो रहे हैं

 इन सारी समस्याओं के विश्लेषण के बाद कवि इस निष्कर्ष पर जाता है कि सत्ता और शासन चलाने की जिम्मेदारी जनता ने उन्हीं को ही दे दी है जिनको वास्तव में सत्ता चलाना ही नहीं आता। यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है।

          लूर गुलशन सजाने को जिनके नहीं

           बागवानी उन्हीं को थमा दी गई

 निजीकरण पर भी कवि ने गहरा चोट किया है। जिनमें आम जनता की संपत्ति और जमीनें कारपोरेट घरानों के पास जा रही हैं, ऐसे में उन्हें अपने अस्तित्व और वजूद की चिंता हो रही है। जब ये सारे सरकारी सेक्टर मिट जाएंगे तो हमारा क्या होगा –

           धन व धरती दे रहे हो कारपोरेटों को मगर

           हम भला जाए कहाँ सुझाव तो कुछ कीजिए।

सौमित्र जी वर्तमान के हालात को समझाने के लिए धार्मिक आख्यानों एवं पुराणों में जाते हैं। राम के द्वारा शंबुक का वध या विष्णु के द्वारा वृंदा का पतिव्रता भंग, एक ऐसी ही सच्चाई है।

          बड़ी हलचल है राहों में, हवा का रुख लगा तीखा

      कहीं शंबूक का कोई राम ने फिर वध किया होगा

       बड़ी उत्तेजना है गांव के लोगों में ऐ यारों

       वृंदा का किसी विष्णु ने पतिव्रता भंग किया होगा

सौमित्र जी गांधी को एक अच्छे चरित्र या मसीहा के रूप में मानते हैं बुरे चरित्र वालों को वे कहते हैं कि ऐसे लोग भी गांधी के शक्लों में पेश आ जाते हैं। वही गांधी जी के हत्या को एक जगह वे जाने अनजाने में वध कहकर उनका अपमान भी कर बैठतें हैं –

          हित में वह कहने लगा मसीहाई अंदाज में

          गांधी के शक्लो-अक्ल में हैं मगर शैतान है

          रामराज की बड़ी चर्चा किया करता था वो

         बध गया गांधी जहां शंबुक-सा हसरत लिए

 ‘ये हिंदुस्तान के किस्से’ सौमित्र जी का प्रतिनिधि गज़ल है। जिनमें उन्होंने देश के वास्तविक हालात का परिचय दिया है-

             बहुत हुए शमशान के किस्से

             बहुत हुए शैतान के किस्से

             अधनंगे बच्चे रोते हैं

             है ये हिंदुस्तान के किस्से

देश में गरीबों के यहां रोटियों के लाले पड़े हुए हैं और अंधविश्वास रूढ़िवादी जनता उन पर ध्यान न देकर भगवान और बाबाओं को मोटे-मोटे चढ़ावे चढ़ाती है –

           ऐसे उन गरीबों पर, जिनको रोटी के लाले हैं

           भाग्य भगवान बाबाओं के ही चलते असलहे हैं

ऐसे में वे मजदूरों और किसानों के हालात पर भी चिंतन करते हैं, जो खुद भूखे, नंगे और अभाव में रहकर सबका पेट भरते हैं किंतु उनके लिए सत्यम शिवम सुंदरम का बढ़ियां- बढ़ियां ख्वाब दिखाया जाता है। उनके लिए यह सिर्फ एक छलावा मात्र ही है –

          मजदूरों अन्नदाताओं की हालत क्या कहना

         सत्यम शिवम सुंदरम की तो ठठरी सूख गई

कवि को चिंता है कि अदालत से लेकर शासन और सत्ता तक केवल अपराधियों लुटेरों की ही सुनवाई हो रही है। दीन दुखियों की तो भगवान भी नहीं सुन रहा है-

          लठमारो घूसखोरों और लुटेरों का ही सुनता वो

        दीन-हीन दुखीयारों का रब सुनता कहां दुहाई अब।

सौमित्र जी इस बदलते हुए हालात को देख रहे हैं, जिनमें शीलता, शालीनता और सौम्यता लगातार लुप्त होती जा रही है। इसके बदले हमारे देश और समाज में विद्वेष, डाह और घृणा को बढ़ावा मिल रहा है। यही नहीं हमारे विरासत में हमारे पुरखों ने जो इतिहास बनाया था, उस इतिहास को भी मिटाने की कोशिश लगातार हो रही है. ऐसे में कवि व्यंग्य के स्वर में प्रपंचकारियों को नमस्कार भर कर लेते हैं-

         शीलता, शालीनता और सौम्यता है लुप्त

         द्वेष, डाह, घृणा का व्यापार बहुत है

         इतिहास मिटाने की इन्हीं कोशिशों के बीच

        सोनकर इस युग को नमस्कार बहुत है।

इन सारी समस्याओं के बीच कवि के भीतर एक ऐसी घुटन हैं जिनको किसी से कह नहीं पाते। अपनी पीड़ा को वे स्वयं अनुभव करते हैं। जिसे कहने के लिए उनके साथ न कोई हमदर्द है न ही कोई हमसफर है –

         सौमित्र बस घुटन है कहूँ तो कहूँ किस से

         न हमदर्द रहा कोई , हमसफ़र न रहा।

के एल सोनकर सौमित्र जी की गजलें तर्क एवं विचार प्रधान हैं। समाज एवं राजनीति के विभिन्न पक्षों को वे बड़ी शालीनता से कह देते हैं। संग्रह की भूमिका में ही वे अपनी रचना प्रक्रिया को स्पष्ट कर देते हैं – “मेरी राय है कि सारे के सारे यथार्थ रचनाओं के माध्यम से सामने आए, कला कम हो सकती है लेकिन यथार्थ प्रचुर है, कड़वा भी है, करेला कड़वा होते हुए भी सेव्य है।…. कोशिश किया हूं की गजल के शब्द गरिष्ठ ना होने पाए ,चाहे प्रयोग में हुए उर्दू के शब्द हो, हिंदी के हो या फिर संस्कृत के। लगे कि वह हिंदी ग़ज़ल के मिसरें हैं। मैंने आम जनों की भाषा और शब्दों को प्रयोग की कोशिश की है।

दीपक शर्मा युवा कवि और कथाकार हैं।

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