छोटे शहर का कैमरा

उषा वैरागकर आठले

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इप्टा ने अपने प्रारंभिक काल में धरती के लाल फिल्म बनाई। उसके बाद इप्टा के ही चेतन आनंद, ख्वाजा अहमद अब्बास, सागर सरहदी आदि ने भी अनेक शानदार फिल्में बनाईं। फिल्म एक ऐसा माध्यम है, जिसकी पहुंच काफी ज़्यादा लोगों तक होती है। रंगमंच की अपेक्षा इसके दर्शकों की संख्या बहुत अधिक है। साथ ही फिल्म से तकनीक जुड़ी हुई है। कैमरे की आंख से दुनिया को देखने और दिखाने का हुनर एक अलग आकर्षण रखता है।

अजय आठले अपनी उम्र के पचीसवें वर्ष में इप्टा से जुड़ चुका था और उसमें भी यह हुनर ठाठें भरता था। अजय को बचपन से फोटोग्राफी का शौक रहा है। उसके दादा बहुत अच्छी तस्वीरें खींचते थे, घर में ही डार्क रूम था, जहां वे अपनी तस्वीरें धोते व प्रिंट करते थे। साथ ही रायगढ़ की पुरानी नटवर स्कूल में छात्रों को अन्य कारीगरी के साथ फोटाग्राफी सीखने की सुविधा थी। इसलिए अजय का यह शौक बरकरार रहा। एक टेक्निकल पर्सन होने के कारण नए अद्यतन कैमरों की जानकारी उसके पास होती थी। अपनी आरम्भिक नौकरियों में ही उसने कैमरा खरीद लिया था। बाद में जब उसने इंश्योरेंस सर्वेयर का काम शुरु किया तो रोज़ ही कैमरे का काम पड़ता था। फर्क ये था कि इसमें प्रायः क्षतिग्रस्त मशीनरी या गाड़ियों के फोटो खींचे जाते। इसके अलावा अपनी सौंदर्य दृष्टि के अनुसार भी वह फोटो खींचता था, खासकर बच्चों के! वीडियो कैमरे के आने के बाद तो उसकी आंख और तैयार होने लगी। उसने छोटे- बड़े वीडियो बनाने शुरू किये।

रायगढ़ इप्टा की पहली लघु फिल्म मुगरा

कुछ प्रोजेक्टस की वीडियोग्राफी कर वीडियो रिपोर्ट या वीडियो फिल्म बनाने लगा। इस मामले में यही कहा जा सकता है कि उसने अपना कौशल बढ़ाना शुरु किया। पहले पहल जल संसाधन के प्रोजेक्ट में चेकडैम और स्टॉपडैम पर वीडियो बनाया। तब तक पृथक छत्तीसगढ़ी राज्य बन चुका था, पृथक राजनैतिक अस्तित्व मिलने पर छत्तीसगढ़ी भाषा और लोकसंस्कृति के प्रति लोगों की अस्मिता जागृत होने लगी। इसके साथ ही छत्तीसगढ़ी फिल्मों की बाढ़ आ गई। आसपास के सभी कलाकार फिल्मों की ओर दौड़ पड़े। ‘छालीवुड’ बनाने की बात की जाने लगी। छत्तीसगढ़ी फिल्मों की हाजरी लग गई। रंगमंच करने वाले कलाकार भी फिल्मों की ओर कूच कर गए, नाट्य संस्थाओं का काम ठप्प होने लगा।

अजय ने महसूस किया कि बड़े परदे का आकर्षण नाटक के कलाकारों को भी बहा ले जा रहा है। मुंबई जाने के सपने देखने वालों को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर खींचने लगी मगर सबको वहां अवसर कैसे मिल सकता था! एक तरह की अफरा-तफरी मची हुई थी। अजय ने इप्टा रायगढ़ के कलाकारों के सामने प्रस्ताव रखा कि ‘‘चलो, अपन लोग खुद ही फिल्म बनाते हैं!’’ सभी साथी खुश! उस बीच हम कई छोटी कहानियां पढ़ चुके थे।

हमें पुन्नीसिंह यादव की कहानी, जो मध्यप्रदेश इप्टा और प्रगतिशील लेखक संघ के हमारे वरिष्ठ साथी भी थे, मुगरा पसंद आ गई। अजय ने पटकथा तैयार की। फिल्म में हमारी टीम के साथी युवराज सिंह आज़ाद, अपर्णा श्रीवास्तव, लोकेश्वर निषाद, रामकुमार अजगल्ले, श्याम देवकर  इन पांच कलाकारों को लेकर शूटिंग शुरु हुई। अन्य सभी कलाकारों ने फिल्म निर्माण में सहायक के रूप में खुशी से ज़िम्मेदारियां संभाल ली थीं। फिल्म का एक गीत मेरी सहकर्मी डॉ. नीलू श्रीवास्तव ने गाया। शूटिंग रायगढ़ के आस-पास के लोकेशन्स पर हुई। सारे संसाधन व्यक्तिगत होने के कारण मात्र डेढ़ हज़ार रूपये में सन् 2003 में फिल्म तैयार हो गई थी। एडिट अनादि ने किया था, जो उस समय मात्र पंद्रह साल का था।

फिल्म विशुद्ध तकनीकी माध्यम है। कैमरा और उसकी भाषा, उसके सामने अभिनय की समझ, साउंड, लाइट्स, डबिंग और पोस्ट प्रोडक्शन के अनेक काम… इस तकनीकी ज्ञान को हासिल करने और उसमें कुशलता तथा सिद्धहस्तता हासिल करने के लिए अजय ने इंटरनेट की सहायता से अनेक वीडियो देखे, लेख और किताबें मंगवाईं। इनके अलावा व्यावहारिक कुशलता अर्जित करने के लिए उसने रायगढ़ में बनाई जाने वाली फिल्मों और म्युज़िक वीडियोज़ की भी एडिटिंग शुरु की। उस समय अधिकांश लोग शौक से फिल्में या वीडियो बना रहे थे, कटक जाने के लिए उनके पास पर्याप्त धनराशि नहीं होती थी, ऐसे लोग अजय के पास आते थे। अजय ने रिसर्च कर साॅफ्टवेयर मंगवाए, कंप्यूटरअपडेट किया। मुगरा के निर्माण तक अजय ने अपना हाथ साफ कर लिया था। मुगरा धोबी के बेटे की कहानी है, जो पढ़ने में तेज़ होने के बावजूद अपने पियक्कड़ बाप द्वारा शिक्षा से वंचित कर काम में लगा दिया जाता है। उस समय बालश्रम के विरुद्ध अनेक जागरूकता कार्यक्रम चल रहे थे, उनका सूत्र पकड़कर फिल्म का अंत हुआ है बाल श्रमिक परियोजना के सरकारी प्रचार-प्रसार के लिए निकले जुलूस से। इस तरह की अनेकों परियोजनाएँं लागू करने का तब तक कोई औचित्य नहीं हो सकता, जब तक समाज में व्याप्त सामाजिक-आर्थिक विषमता न हटाई जाए! अन्यथा इस तरह के बुद्धिमान बच्चे शिक्षा से वंचित होकर बचपन में ही हाथ में मुगरा लेने के लिए बाध्य होंगे।

रायगढ़ इप्टा की फिल्म बच्चे सवाल नहीं करते

इसके बाद ही संयोग से 2004 में फिल्म इंस्टीट्यूट के संकल्प मेश्राम रायगढ़ में बच्चों की फिल्म छुटकन की महाभारत की शूटिंग करने आए। उसमें उन्होंने इप्टा के बाल कलाकारों को तो लिया ही, साथ ही अन्य कलाकारों को भी चयनित किया। अजय को सरपंच की खासी महत्वपूर्ण भूमिका दी गई थी। रायगढ़ के नज़दीक के गांव भिलवाटिकरा में लगभग एक महीना शूटिंग चली। अजय ने अपना पूरा महीना फिल्म प्रोडक्शन यूनिट के साथ ही बिताया। उसने समूची प्रोसेस बहुत बारीकी से देखी-परखी। उसने जो सैद्धांतिक ज्ञान हासिल कर लिया था, वह अब व्यावहारिक अनुभव से और बेहतर हुआ। उसके बाद अजय ने दूसरी लघु फिल्म बच्चे सवाल नहीं करते बनाई। यह फिल्म भी पुन्नी सिंह यादव की इसी नाम की ही कहानी पर आधारित थी। इसमें भी इप्टा रायगढ़ के ही तमाम कलाकारों ने अभिनय और प्रोडक्शन किया था। हमारे समाज में हमेशा ही खाने और दिखाने के दाँत अलग-अलग होते हैं। बच्चे सवाल नहीं करते में बड़ी मासूमियत के साथ इस बात को व्यक्त किया गया है। स्कूली शिक्षा में पर्यावरण संरक्षण के पाठ पढ़ाने वाला समाज उच्च राजनैतिक आर्थिक स्तर पर किस तरह पर्यावरण विरोधी होता है, इसका रूपक एक परिवार की कहानी के माध्यम से रचा गया है। दोनों लघु फिल्में रायगढ़ इप्टा के यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध हैं।

मेरी और उसकी रूचियां काफी मिलती-जुलती थीं और दोनों को नए क्षेत्रों को जानने-समझने की भारी उत्सुकता और जिज्ञासा हुआ करती थी। इसलिए हम प्रायः एक दूसरे के हरेक प्रोजेक्ट में शामिल रहते थे। तो, इन तीन वर्षों में हमने जितने भी वीडियो और ऑडियो रिकाॅर्ड किये थे, अजय ने उस पर दो डाॅक्यूमेंट्रीज़ बनाई।

हालांकि इसके बाद का फिल्म निर्माण असफल रहा था। तपन बैनर्जी की पहल में प्रकाशित एक कहानी पर समूची तैयारी कर शूटिंग शुरु हुई उस फिल्म में शहर के कलाप्रेमी वरिष्ठ लोगों को भी बतौर अभिनेता अजय ने लिया। बयार के सम्पादक साहित्यकार सुभाष त्रिपाठी, प्रोफेसर जी.एन.श्रीवास्तव को अनुरोध के साथ फिल्म में लिया गया था। बेरोजगारों की दुर्दशा पर केन्द्रित यह फिल्म तकनीकी गलती से डिब्बे में बंद हो गई। कुछ हिस्से शूट हो चुके थे, कुछ ही बचे थे। वह डीवी कैसेट का ज़माना था। पता नहीं कैसे चूक हो गई कि, फिल्म की शूटिंग वाले कैसेट के कुछ हिस्से पर ही कुछ दूसरा शूट कर लिया गया। कुछ सीन डिलीट हो गए। जब अजय को ध्यान में आया, उसने सिर पीट लिया।

तब तक कुछ महीने बीत चुके थे। फिर से शूटिंग करने के लिए कलाकारों से सम्पर्क किया गया तो पता चला, मुख्य कलाकार युवराज ने अपने बाल रंग लिए थे इसलिए अब विकल्प एक ही था कि, दोबारा फिल्म शूट की जाए! मगर ‘बीत गई सो बात गई’ वाली बात हो गई और वह फिल्म नहीं ही बन पाई। इस बीच इप्टा रायगढ़ के नाटकों बकासुर, गगन घटा घहरानी, गगन दमामा बाज्यो की वीडियो रिकाॅर्डिंग कर डीवीडी बनाने, रायपुर दूरदर्शन के लिए नाटकों गदहा के बरात, होली, गांधी चौक की शूटिंग और दूरदर्शन द्वारा निर्देशित एक धारावाहिक सपने कब हुए अपने’ के अनुभव ने भी समूची टीम को कैमरे से रूबरू होने का अवसर प्रदान किया। 2007 से 2010 तक मैंने यूजीसी के एक प्रोजेक्ट के तहत रायगढ़, जशपुर और सरगुजा जिले की पारम्परिक लोकसंस्कृति का दृश्य-श्रव्य डाॅक्यूमेंटेशन किया था, जिसमें अजय की भी बहुत सक्रिय भूमिका रही।

मेरी और उसकी रूचियां काफी मिलती-जुलती थीं और दोनों को नए क्षेत्रों को जानने-समझने की भारी उत्सुकता और जिज्ञासा हुआ करती थी। इसलिए हम प्रायः एक दूसरे के हरेक प्रोजेक्ट में शामिल रहते थे। तो, इन तीन वर्षों में हमने जितने भी वीडियो और ऑडियो रिकाॅर्ड किये थे, अजय ने उस पर दो डाॅक्यूमेंट्रीज़ बनाई। पहली, अगरिया – जो सरगुजा की अगरिया जनजाति के लौह निर्माण की समूची प्रक्रिया पर है। और दूसरी, छत्तीसगढ़ की जीवनशैली और संस्कृति पर। ये दोनों डाॅक्यूमेंट्रीज़ भी रायगढ़ इप्टा के यूट्यूब चैनल पर देखी जा सकती हैं।

यह भी देखें :

2009 में अनादि का दाखिला फिल्म एवं टेलिविजन संस्थान पुणे में हुआ और अजय को अब घर का प्रशिक्षक मिल गया। वह अनादि से नित नए बिंदुओं की जानकारी लेता, उसके द्वारा लाई गई ढ़ेर सारी फिल्में देखकर चर्चा करता। दो साल बाद अनादि छुट्टियों में ‘जून एक’ फिल्म बनाने अपने साथियों के साथ रायगढ़ आया। उस समय भी इप्टा के सभी सदस्यों ने इस फिल्म निर्माण में संलग्न होकर बहुत कुछ सीखा।

2009 में अनादि का दाखिला फिल्म एवं टेलिविजन संस्थान पुणे में हुआ और अजय को अब घर का प्रशिक्षक मिल गया। वह अनादि से नित नए बिंदुओं की जानकारी लेता, उसके द्वारा लाई गई ढ़ेर सारी फिल्में देखकर चर्चा करता। दो साल बाद अनादि छुट्टियों में जून एक फिल्म बनाने अपने साथियों के साथ रायगढ़ आया। उस समय भी इप्टा के सभी सदस्यों ने इस फिल्म निर्माण में संलग्न होकर बहुत कुछ सीखा। यह सिलसिला उसके बाद चलता ही रहा। 2014 में अनादि और उसके साथियों ने छत्तीसगढ़ फिल्म बनाने का प्रस्ताव रखा। उस समय उनका पाठ्यक्रम समाप्त नहीं हुआ था। तीन निर्देशकों के संयुक्त निर्देशन में बनने वाली यह फिल्म मोर मन के भरम इप्टा के साथियों के लिए किसी नाटक के इम्प्रोवाइज़ेशन से कम नहीं थी। अजय ने इस फिल्म में स्वयं अभिनय तो किया ही था, परंतु प्रोड्यूसर की भूमिका भी अदा की थी। जहां ये बच्चे फंसते ही अंकल के पास दौड़ पड़ते। कभी शूटिंग के लोकेशन के लिए परमिशन का मामला हो, कोई प्रापर्टी न मिल रही हो, भोजन की व्यवस्था करनी हो या फिर फिल्म के भीड़वाले दृश्य के लिए लोगों को जुटाना हो, अजय अनादि और तमाम बच्चों का देवदूत था। अपना व्यवसाय संभालने के साथ-साथ सबकुछ करने के लिए तैयार! क्रू मेम्बर्स के साथ हंसी-मज़ाक किस्सागोई करते हुए वह माहौल को खुशनुमा बनाए रखता था।

छतीसगढ़ी फीचर फिल्म मोर मन के भरम में अजय आठले

मोर मन के भरम को 2015 के मामी फिल्म फेस्टिवल में ज्यूरी स्पेशल अवॉर्ड मिला और स्क्रीनिंग के लिए पूरी टीम मुंबई रवाना हुई। फिल्म में अजय एक फोटोग्राफर की भूमिका में था। निर्देशक करमा टकापा ने उससे यह रोल बहुत कॉमिक ढंग से करवाया था। अजय के अभिनय में बहुत सहजता थी, इसलिए समूचा सीन यादगार बन गया था। उसके बाद फिल्म इंस्टीट्यूट के कई निर्देशकों ने रायगढ़ आकर पिछले चार-पाँच सालों में कई फिल्में बनाई। 2018-19 में पियुष ठाकुर ने एक शाॅर्ट फिल्म और करमा टकापा ने एक फीचर फिल्म रायगढ़ आकर शूट की। ये सब युवा प्रतिभाशाली निर्देशक अजय के भरोसे ही आते थे कि अंकल सब व्यवस्था करवा देंगे। इस बीच अजय ने बेहतरीन कैमरे, ट्राइपाॅड, ट्राॅली, लाइट्स, साउंड रिकाॅर्डर जैसे कई उपकरण खरीद लिये थे, जिससे सभी का काम आसान हो जाता और लो बजट होने पर भी काम चल जाता था।

इस बीच एक और लघु फिल्म अजय ने बनाई। ‘पहल’ में ही प्रकाशित टुम्पा नामक बंगला कहानी के रूपांतरण ने अजय को आकर्षित किया और फिर इसी नाम से पर्दे पर एक रूपक रचा गया, जिसमें अमेरिकी साम्राज्यवाद का प्रवेश किस तरह वैश्वीकरण के बाद हरेक व्यक्ति की निजी ज़िंदगी में भी हो गया है, इसका चित्रण है। अमेरिका दो देशों को परस्पर एक दूसरे के खिलाफ खड़ा कर किस तरह दोनों को हथियार बेचकर अपना उल्लू सीधा करता है, यह एक सीधी-साधी फैंटेसीनुमा कहानी के माध्यम से दिखाया गया है। यह फिल्म भी इप्टा रायगढ़ के बैनर पर ही बनी और यूट्यूब पर अपलोड की गई। जब से मोबाइल और स्मार्ट फोन्स का हरेक घर में प्रवेश हुआ है, तब से सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया पर ही लोग ज़्यादा व्यस्त रहने लगे। अजय को तीव्रता से महसूस हुआ कि इप्टा को भी अब सिर्फ रंगमंच और नुक्कड़ पर नाटक करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफाॅर्म पर हस्तक्षेप करना चाहिए। हमने कई रंगकर्मियों और नाट्यदलों के स्टुडियो थियेटर के बारे में सुना था। अजय का सपना था कि, इस तरह का स्टुडियो थियेटर हमारा भी हो, जिसमें हम न केवल रिहर्सल, नाट्य प्रस्तुति, संगोष्ठियां, कार्यशालाएं, व्याख्यान आयोजित कर सकें, बल्कि फिल्म स्क्रीनिंग्स और अनेक प्रकार के टाॅक शोज़ भी बना सकें।

यह सपना 2019 की गर्मियों में पूरा हुआ। मई माह से बच्चों की और उसके बाद युवाओं की कार्यशाला हुई। अनेक फिल्में बच्चों को दिखलायी गईं। साथ ही अजय की परिकल्पना के अनुसार टाॅक शो ‘मुद्दे की बात’ 29 फरवरी 2020 से शुरु हुआ। कोरोना महामारी के कारण रायगढ़ में अगस्त में लाॅकडाउन लगने तक ‘मुद्दे की बात’ के तेरह एपिसोड तैयार कर यूट्यूब पर अपलोड किये गये।

उसका यह सपना 2019 की गर्मियों में पूरा हुआ। मई माह से बच्चों की और उसके बाद युवाओं की कार्यशाला हुई। अनेक फिल्में बच्चों को दिखलायी गईं। साथ ही अजय की परिकल्पना के अनुसार टाॅक शो मुद्दे की बात 29 फरवरी 2020 से शुरु हुआ। कोरोना महामारी के कारण रायगढ में अगस्त में लाॅकडाउन लगने तक मुद्दे की बात के तेरह एपिसोड तैयार कर यूट्यूब पर अपलोड किये गये। जो विषय हमें तात्कालिक रूप से ज़रूरी लगते थे, उन्हें चुनकर हम संबंधित विषयों के विषय विशेषज्ञ और व्यक्तियों को आमंत्रित करते थे। टीम का युवा साथी सुमित मित्तल, जिसने पत्रकारिता का पाठ्यक्रम पूरा किया है, उसे एंकरिंग सौंपा गया, साउंड रिकाॅर्डिंग भरत निषाद करता, लाइट्स श्याम देवकर और वासुदेव निषाद सम्भालते, कैमरा सचिन टोप्पो और अजय सम्भालते  इस तरह पूरी तकनीकी टीम चाक-चौबंद थी। तमाम तकनीकी संसाधन हमारे पास इकट्ठा हो चुके थे और अजय एडिटिंग में भी काफी पारंगत हो चुका था अतः सिलसिला चल पड़ा था।

इसमें विषय थे परीक्षा में तनाव विद्यार्थियों, अभिभावकों तथा शिक्षकों पर तीन अलग-अलग एपिसोड हुए; सीएए- एनआरसी का सच, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर ऑटो ड्राइवर, सफाई सुपरवाइज़र तथा घरेलू सहायक महिलाओं से बातचीत, भगतसिंह पुण्यतिथि पर ऐ भगतसिंह तू ज़िंदा है, श्रमिक दिवस/मई दिवस पर ‘महिला कामगारों की स्थिति’ विषय पर, लाॅकडाउन में अप्रवासी मज़दूरों की दुर्दशा पर चर्चा रखी गई। दो एपिसोड प्रेमचंद और भीष्म साहनी पर केन्द्रित किये गए तथा एक एपिसोड, जिसमें अजय ने खुद कोरोना वाइरस का रोल निभाया था। ‘कोरोना से बातचीत’, इसके अंतर्गत पत्रकार युवराज सिंह के साथ नाटकीय साक्षात्कार था तीन साक्षात्कार भी स्टूडियो थियेटर में ही रिकाॅर्ड किये गये, इन्हें संवाद शीर्षक दिया गया था। रंगकर्मी एवं अभिनेत्री सुषमा देशपांडे, स्टोरी टेलर डाॅ.शिल्पा दीक्षित तथा सामाजिक कार्यकर्ता सविता रथ का। अजय को फिल्म निर्माण में गहरी रूचि थी। उसमें छिपी रचनात्मकता और प्रभावशीलता से वह अच्छी तरह वाकिफ था। उसने अनादि में अपनी इस रूचि का बीजारोपण उसने काफी बचपन से ही कर दिया था।

अनादि छठवीं में पढ़ रहा था, उसी समय अजय ने पहली बार उसके हाथ में वीडियो कैमरा थमाया। हम पंचमढ़ी घूमने गए थे। अनादि ने वहां जो भी वीडियोग्राफी की, लौटने के बाद अपनी ही आवाज़ में कमेन्ट्री कर उसने एक रिपोर्ताज़ जैसा बनाया था। उसके बाद अजय जो भी प्रोजेक्ट हाथ में लेता, अनादि को भी उसमें जोड़ लेता। अनादि ने नौवीं कक्षा में अपनी पहली डाॅक्यूमेंट्री रहिमन पानी राखिये शीर्षक से बनाई थी, जिसे पर्यावरण पर आधारित किसी फिल्म फेस्टिवल में बच्चों की श्रेणी में अजय ने भेजा था। जब अनादि का चयन फिल्म एवं टेलिविजन इंस्टीट्यूट पुणे में हुआ, उसे वहां अपने सहपाठियों से सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि उनमें से अधिकांश लोग अपने मां-पिता से झगड़कर इस कोर्स में आए थे। उनके अभिभावक उन्हें इस कोर्स में न भेजकर किसी अधिक प्रतिष्ठित कोर्स में भेजना चाहते थे। जबकि अनादि के साथ उल्टा हुआ था। बचपन से कैमरा हैंडल करते हुए उसने पहले सिनेमेटोग्राफी में उच्च शिक्षा लेने का मन बनाया था मगर अपने ग्रेजुएशन के दौरान मास कम्युनिकेशन करते हुए उसकी रूचि ग्राफिक डिज़ाइन की ओर हुई। उसने हमारे सामने अपनी मंशा जाहिर की, अजय ने उसे समझाते हुए फिल्म निर्माण की ओर ही फोकस करने के लिए कहा। अनादि आश्चर्यचकित! सहपाठियों से उसका अनुभव एकदम उल्टा था!!

मराठी नाटक शेवंता जीती हाय का छतीसगढ़ी में अनुवाद कर खेला गया ..बाएं से दूसरे अजय आठले

अजय ने लघु फिल्में बनाईं, डाॅक्यूमेंट्रीज बनाईं, टाॅक शो प्रोड्यूस किये, अनेक कविता कोलाज और कविताओं के वीडियोज़ जारी किये, मगर उसका एक बड़ा सपना अधूरा रह गया छत्तीसगढ़ी फीचर फिल्म बनाने का। इप्टा रायगढ़ ने चार-ंपाँच साल पहले मराठी नाटककार प्रल्हाद जाधव लिखित नाटक शेवंता जित्ती हाय का छत्तीसगढ़ी लोकशैली में मोंगरा जियत हावे शीर्षक से नाटक तैयार किया, जिसके अनेक मंचन हुए। इसी नाटक पर फिल्म बनाई जानी थी। मूल लेखक से अनुमति प्राप्त हो चुकी थी। जनवरी-फरवरी 2020 में फिल्म के लिए सभी छत्तीसगढ़ी लोकगीत रिकाॅर्ड किये जा चुके थे। फिल्म के लिए अजय ने पटकथा भी आधी लिख ली थी मगर लाॅकडाउन के प्रतिबंधों के कारण यह योजना बाधित हो गई, जो अजय की अचानक एक्ज़िट के साथ ठंडे बस्ते में दफन होकर रह गई है। छोटे पर्दे और बड़े पर्दे में प्रयोग का जिज्ञासु हमेशा के लिए सो गया।

उषा वैरागकर आठले जानी-मानी रंगकर्मी और इप्टा के राष्ट्रीय सचिव मण्डल में हैं।

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