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सामाजिक न्याय
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उन्नीसवीं सदी में फुले जितना साहसी, त्यागी और निडर नेता दूसरा कोई नहीं हुआ
पिछले कुछ वर्षों से भारत में हिंदुत्ववादी ताकतों के एजेंडे के अनुसार जातिवाद और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को आक्रामक रूप से बढ़ावा दिया गया है। महात्मा जोतीबा फुले का जन्म लगभग आज से 200 वर्ष पूर्व हुआ था और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का जन्म फुले की मृत्यु के एक वर्ष बाद हुआ था। कहने का मतलब कि इनकी जयंती और पुण्यतिथि मनाने के अलावा, वस्तुतः कोई सक्रिय जाति-विरोधी या सांप्रदायिक-विरोधी आंदोलन मौजूद नहीं है। अपने जीवन का तीन-चौथाई से अधिक हिस्सा इन आंदोलनों में सक्रिय रूप से बिताने के बावजूद, मैं 11 और 14 अप्रैल को उनकी जयंती के अवसर पर यह लेख इन दो महान विभूतियों को एक आत्म-निरीक्षणात्मक श्रद्धांजलि के रूप में लिख रहा हूँ।
हिन्दुत्व के खतरनाक दौर में कहाँ खो गया जाति के विनाश का एजेंडा
आज जब हम डॉ. अंबेडकर को याद करते हैं, तो हमें इस बात का भी भान होना चाहिए कि सामाजिक समानता की ओर बढ़ने की प्रक्रिया में आने वाला - चाहे वह प्रत्यक्ष हो या सूक्ष्म - अधिकांश विरोध, RSS जैसी गहरी पैठ रखने वाली संस्था की ओर से आता है। RSS विभिन्न माध्यमों से अपने प्रतिगामी (पिछड़ेपन वाले) एजेंडे का प्रसार कर रहा है। जहाँ एक ओर RSS का मुस्लिम-विरोधी एजेंडा बिल्कुल स्पष्ट और सबके सामने है, वहीं उसका दलित-विरोधी एजेंडा कहीं अधिक सूक्ष्म है; और 'जाति-विहीन समाज' के सपने को साकार करने के लिए इस सूक्ष्म एजेंडे का मुकाबला करना बेहद ज़रूरी है।
महाड़ सत्याग्रह के सौ वर्ष बाद शूद्रों की मुक्ति का हासिल
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने यह स्पष्ट किया था कि जाति-व्यवस्था को खत्म करने का सबसे असरदार तरीका केवल अंतर-जातीय और अंतर-धार्मिक विवाह ही हैं। लेकिन मौजूदा दौर में, जिस तरह भारतीय सरकार—'लव जिहाद' की आड़ में—ऐसे विवाहों को रोकने के लिए कानून बना रही है, और इसके लिए ऐसे अवैज्ञानिक तर्कों का सहारा ले रही है कि मनुस्मृति के अनुसार मिश्रित विवाहों के परिणाम आने वाली पीढ़ियों के लिए बुरे होंगे। 99 साल पहले, 25 दिसंबर 1927 को, महाड तालाब के पानी के लिए आयोजित सत्याग्रह आंदोलन के वर्ष में, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने 'मनुस्मृति दहन' कार्यक्रम का आयोजन किया, जो 25 दिसंबर को शाम 4:30 बजे शुरू हुआ। इसमें यह घोषणा की गई कि सभी स्त्री और पुरुष जन्म से ही समान दर्जे के हैं और मृत्यु तक समान ही रहेंगे। जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता और चिन्तक डॉ सुरेश खैरनार का महत्वपूर्ण लेख
यूजीसी एक्ट के खिलाफ क्यों अपनी कुंठा और विद्वेष लहरा रहे हैं भारतीय सवर्ण?
यदि यह जानने का प्रयास हो कि मानव जाति के हजारों साल के इतिहास में इस धरती पर ऐसा कौन सा समाज मौजूद रहा है ,जिसमें अपने ही धर्म के बहुसंख्य लोगों को आथिक-राजनीतिक-शैक्षिक-धार्मिक शक्ति के सभी स्रोतों में रत्ती भर भी हिस्सेदार बनाने की मानसिकता नहीं रही है बल्कि इसके उलट जब-जब राज्य द्वारा बहुसंख्य वंचितों को कुछ अधिकार देने का प्रयास हुआ, तब-तब उस समाज ने देश को एक रणभूमि में तब्दील कर दिया हो तब इसका एकमात्र जवाब है कि वह ब्राह्मण-क्षत्रिय- वैश्यों से युक्त भारत का सवर्ण समाज होगा! लाख प्रयास के बावजूद ऐसे किसी अन्य समाज का नाम नहीं ढूँढा जा सकता, जिसकी सवर्णों जैसी अपने ही सहधर्मियों को अधिकार- शून्य देखने की तीव्र चाह हो। जाने-माने एक्टिविस्ट लेखक और बहुजन डायवर्सिटी मिशन के अध्यक्ष एच एल दुसाध इस लेख में कहते हैं कि ‘यह समाज शुद्रातिशूद्रों के रूप में विद्यमान देश की 85 प्रतिशत आबादी के अधिकारों के इतना खिलाफ रहा कि उसे बहुसंख्य आबादी को अच्छा नाम रखने, शिक्षा पाने एवं मोक्ष के लिए आध्यात्मानुशीलन का अधिकार देना भी कभी गंवारा नहीं रहा। दुनिया के इतिहास में सबसे क्रूर माने जाने वाले एटिला द हूण, चंगेज खां जैसे शासकों ने पराधीन बनाये गए लोगों को अच्छा नाम रखने, शिक्षा ग्रहण करने एवं दुःख मोचन के लिए देवालयों में जाकर अपने भगवानों से प्रार्थना करने से कभी नहीं रोका। ऐसी बर्बरता का परिचय समग्र इतिहास में सिर्फ सवर्णों ने दिया।’
नांदेड़ : राजनीति और शासन जाति की सड़ांध से प्रेमियों को नहीं बचा सकते
इस कहानी का सबसे बुरा हिस्सा यह है कि सक्षम और आंचल के रिश्ते के बारे में परिवार में सभी जानते थे और उन्होंने उनके रिश्ते को स्वीकार करने का नाटक किया, लेकिन यह परिवार की एक चाल थी और आखिरी दिन उन्होंने सक्षम की हत्या कर दी। बात यहीं खत्म नहीं हुई, आंचल ने अपना विरोध दिखाया और सक्षम की लाश से शादी कर ली। 'सिंदूर' लगाया और मांग की कि उसके माता-पिता और भाइयों को फांसी दी जाए।
कैसे डॉ. अंबेडकर ने मेरी जीवनधारा बदली
मैं लल्लूभाई पार्क टेलीफोन एक्सचेंज अंधेरी के सरकारी आवास में रहता था। रविवार सुबह दस बजे के आसपास दरवाजे की घंटी बजी। मैंने खुद दरवाजा खोला। करीब 5-6 आशाराम बापू के भक्त, उनके नाम का कलेंडर, घड़ी और कुछ बुकलेट लिए मुझे अपना सदस्य बनाने के लिए खड़े थे। भगवान और आस्था को लेकर बातचीत होने लगी। स्वाभाविक है, तर्क-वितर्क काफी होने लगा। शिष्टाचार के नाते मैंने कहा बाहर डिस्कस करना ठीक नहीं है। आइए, अन्दर बैठ कर चाय-नाश्ता के साथ ढंग से बातचीत हो जाएगी। ठीक है। वे मान गए। मैंने दरवाजा खोला, अभी अन्दर दो ही लोग आए थे कि सबकी नजर सामने दीवाल पर लगे बाबा साहेब आंबेडकर की फोटो पर पड़ गई। अब क्या? सबकी बोलती बंद हो गई। सिर्फ एक-दो लोगों ने खड़े-खड़े पानी पिया होगा और बाकी तो आग्रह करने पर भी बिना पानी पिए ही उलटे पांव लौट गए।
अम्बेडकर के लिए काम कीजिये वर्ना लोग भूल जाएँगे
हिन्दू आरक्षण की काट आंबेडकरी आरक्षण से हो सकती थी, जो हुई भी। इसी आंबेडकरी आरक्षण से सही मायने में सामाजिक अन्याय के खात्मे की प्रक्रिया शुरू हुई। हिन्दू आरक्षण के चलते जिन सब पेशों को अपनाना अस्पृश्य-आदिवासियों के लिए दुसाहसपूर्ण सपना था, अब वे खूब दुर्लभ नहीं रहे। इससे धीरे-धीरे वे सांसद-विधायक, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफ़ेसर इत्यादि बनकर राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़ने लगे। दलित-आदिवासियों पर आंबेडकरवाद के चमत्कारिक परिणामों ने जन्म के आधार पर शोषण का शिकार बनाये गए अमेरिका, फ़्रांस, न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका इत्यादि देशों के वंचितों के लिए मुक्ति के द्वार खोल दिए।
अनुसूचित जनजातियां आदिवासी हैं या वनवासी?
आदिवासी इलाके देश के सबसे गरीब क्षेत्रों में शामिल हैं और पिछले दो दशकों में वहां आदिवासियों के विरुद्ध हिंसा में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है। आंकड़ों से पता चलता है कि यह हिंसा बड़े पैमाने पर नहीं हो रही है परंतु यह लगातार जारी है
क्या आपने गुलामगीरी पढ़ा है?
गुलामगीरी में फुले ने ब्रह्मा के चार मुख, आठ भुजाओं और विभिन्न मिथकों को सीधे-सादे तर्क से खारिज करते हुए उसे एक हास्यास्पद परिघटना में बदल दिया है। इसी प्रकार आगे चलकर शेषशायी विष्णु की नाभि से कमलनाल का उद्भव और उसमें ब्रह्मा का चारमुखी आकार और भी विचित्र और मनगढ़न्त कपोल कल्पना है। फुले ने ब्राह्मणवाद द्वारा फैलाए गए गहरे अंधकार को काटते हुए उस मूल धारा की नष्ट हो चुकी अस्मिता को प्रकाश में लाने के लिए ब्राह्मणवादी स्थापनाओं पर जमकर प्रहार किया है और अपनी तर्क-दृष्टि से उन्हीं मिथकों को उल्टा टाँग दिया है जिनके बल पर ब्राह्मण अपने वर्चस्व की स्थापना करता है।
आरक्षण के इतिहास में वी पी सिंह की जगह बेमिसाल है
वीपी सिंह जी की पुण्यतिथि पर विशेष भारतीय संविधान के निर्माता तथा आधुनिक भारत के शिल्पी कहे जाने वाले दिवंगत बाबा साहब डा. भीमराव अम्बेडकर...

