‘सोलह आने’ का समाजवाद

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जयप्रकाश कर्दम

त्रिलोचन शास्त्री की ख्याति एक कवि के रूप में है। अन्य विधाओं की तुलना में पद्य में उन्होंने सर्वाधिक लेखन किया है, इसे देखते हुए यह स्वाभाविक भी है। किंतु कवि के साथ साथ वह गद्यकार भी थे। गद्य में भी डायरी लेखन से लेकर निबंध लेख और कहानी तक उन्होंने कई विधाओं में सृजनात्मक लेखन किया। ‘देशकाल’ उनका एकमात्र कहानी संग्रह है, जो सन 1986 में राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ। विडम्बना है कि यह भी अब बाजार में उपलब्ध नहीं है इस संग्रह में उनकी बीस कहानियां संगृहीत हैं। देखा जा सकता है कि कविता के क्षेत्र में जहां उनके एक दर्जन से अधिक संग्रह प्रकाशित हुए कहानियों का एक ही संग्रह प्रकाशित हुआ। शायद यह भी एक कारण रहा हो कि उनकी कविताओं पर जितनी चर्चा हुई, उसका शतांश भी कहानियों पर नहीं हुई। चर्चा की दृष्टि से उनकी कहानियां साहित्य जगत में प्राय: उपेक्षित रही हैं। लेखन में मात्रा से अधिक गुणवत्ता का महत्व होता है। इसलिए किसी लेखक की बीस कहानियां कम नहीं होती हैं। चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ एक उदाहरण के रूप में हमारे सामने हैं, जिन्होंने बहुत कम कहानियां लिखीं, और जो कहानियां लिखीं उनमें भी ‘उसने कहा था’ ही सर्वाधिक चर्चित हुई और यही एक कहानी गुलेरी जी की पहचान बनीं।

उत्तर प्रदेश और बिहार में आर्थिक रूप से विपन्न और मजदूरी करने वाले भूमिहीन प्राय: दलित हैं। देवल के मुसाफिरखाने में रहने का एक कारण यह भी हो सकता है कि उसे कोई मकान किराए पर न मिला हो। क्योंकि भारत के जाति-समाज में दलितों को किराए पर मकान मिलना सरल नहीं होता है। यह एक कड़ुवी सच्चाई है कि सवर्ण समाज में दलितों की स्वीकार्यता प्राय: नहीं है और बहुत से दलितों को सवर्णों के घर या मौहल्लों में आज भी जाति छिपाकर रहना पड़ता है।

त्रिलोचन प्रगतिवादी चेतना के रचनाकार थे। उनकी रचनाओं में सर्वत्र प्रगतिशीलता का स्वर सुनायी देता है, जिसमें मजदूर, किसान और श्रमिकों की आर्थिक दुर्दशा, शोषण और संघर्ष का चित्रण है। उनकी रचनाओं के नायक भी प्राय: श्रमशील और निम्न वर्गों के व्यक्ति हैं, जो अपनी अस्मिता और अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। त्रिलोचन का जीवन एक गांव या शहर तक सीमित नहीं रहा। कभी यहां, कभी वहां, कोई निश्चित ठोर-ठिकाना नहीं, घुमुंतु की तरह वह यहां-वहां भटकते रहे। इस घुमक्कड़ी में उन्होंने समाज को भिन्न-भिन्न रूपों में, भिन्न-भिन्न कोणों से, बहुत करीब से देखा, भिन्न-भिन्न प्रकार के अनुभव उनको हुए। उनका अनुभव संसार इतना बड़ा है कि उसमें एक पूरा युग समाया हुआ है। सामाजिक संबंधों की उन्हें गहरी परख है और उन पर उतनी ही गहरी पकड़ भी है। भिन्न–भिन्न प्रकार के व्यक्तित्व और विचार वाले, भूमिहार से लेकर भूमिहीन, मालिक से लेकर मजदूर, शोषक से लेकर शोषित सबके जीवन को उन्होंने निकटता से देखा और सभी प्रकार के व्यक्ति उनकी रचनाओं के पात्र बने हैं|

त्रिलोचनजी

त्रिलोचन जी की प्रसिद्ध कहानी ‘सोलह आने’ भी संबंधों के ताने-बाने की कहानी है। कहानी के तीनों पात्र कमलनारायण, वरुण और देवल परस्पर मित्र होते हुए भी उनके चरित्र एक-दूसरे से भिन्न हैं और उनके संबंधों में एक उलझाव सा है। यह उलझाव कई रूपों में दिखायी देता है| तीनों शहर में पढते हैं। कमल और वरुण की आर्थिक स्थिति बेहतर है, जबकि देवल की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय है। वह एक-एक पैसे को मुंहताज है तथा अपनी आजीविका के लिए एक प्रेस में काम करता है। कमल किराए के मकान में रहता है। वरुण का अपना मकान है ही। किंतु देवल मकान का किराया चुकाने में असमर्थ है इसलिए किराए के मकान में भी नहीं रहकर मुसाफिरखाने में रात गुजारने को विवश है| इन पात्रों की जाति का कोई उल्लेख कहानी में नहीं है, किंतु उनके व्यक्तित्व उनकी जातीय पहचान की ओर संकेत करते हैं।

कमल का चरित्र सामंती है, जिसमें एक बेफिक्री सी है। गांव से आकर शहर में पढने वाले विद्यार्थियों के पास कई बार गांव से पैसे समय से नहीं पहुंचते तो उनको आर्थिक तंगी हो जाती है। वे एक-दूसरे से उधार लेकर अपना काम चलाते हैं और घर से पैसे आ जाने पर लौटा देते हैं। सामंती व्यक्ति अपने हाथ से काम नहीं करता| अपने काम भी वह दूसरों से कराना चाहता है। कमल की स्थिति बिल्कुल वैसी ही है। कहानी के प्रारम्भ में ही देवल कमल से मिलने उसके पास जाता है तो वह देवल से आग्रहपूर्वक कहता है, ‘आज तुम भी यहीं खाओ। वरुण है ना, बना लेगा।’ और दुमंजिले की ओर देखकर चिल्लाता है ‘वरुण, ओ वरुण! आज तीन आदमियों के लिए खाना बनाना| देवल भी यहीं खाएगा|’

कमल जिस प्रकार वरुण से आदेशात्मक स्वर में बोलता है उससे प्रथम दृष्टया यह आभास होता है कि वरुण, कमलनारायण का नौकर या रसोइया है। इससे यह तो स्पष्ट इंगित होता है कि कमल का खाना वरुण बनाता है। ऐसा दो ही स्थितियों में संभव है, पहला यह कि कमल और वरुण के बीच यह परस्पर सहमति हो कि खाने के सामान का खर्च कमल वहन करेगा और खाना वरुण बनाएगा या कि खाना वरुण बनाएगा और जूठे बर्तन कमल साफ करेगा। किन्तु यह स्थिति प्रतीत नहीं होती, क्योंकि यदि ऐसा होता तो खाने का सामान लाने के लिए वह वरुण से यह नहीं कहता कि ‘कोई बात नहीं, पैसे दे दो। देवल ले आएगा।’ और वरुण और कमल दोनों में से किसी के पास पैसे नहीं होने पर उसके कहने पर देवल अपनी जेब से खाने का सामान लेकर आता है तो उन नौ आने को तीन भाग में बांटकर कमल अपने हिस्से के तीन आने पैसे ही देवल को देता है, वरुण के हिस्से के नहीं।

वरुण स्वभाव से खर्चीला है। कमल देवल को बताता है, ‘वरुण के पास भी पैसे नहीं टिकते। आए कि गए। एक से एक नये–नये खर्च बढते जाते हैं। ‘वरुण की यह स्थिति बताती है कि वह आर्थिक रूप से भी इतना कमजोर नही है कि कमल पर निर्भर हो और इसलिए उसका खाना बनाने को विवश हो। इस तरह की कोई विवशता उसके सामने नहीं है। यह हो सकता है कि कमल की आर्थिक स्थिति वरुण से कहीं अच्छी हो और जरूरत पड़ने पर वह जब-तब कमल से पैसे उधार लेता हो और इस कारण उससे दबा रहता हो, और इस दबाव में उसका खाना बना देता हो। यह देवल से कहे गए कमल के इस कथन से भी सिद्ध होता है, ‘मेरे भी उसने पैसे लिए हैं। दिए नहीं। मांगे। इस पर बिगड़ गया और अब मुझसे नहीं बोलता। लेकिन मेरी कोई हानि नहीं। मैं तो उसी के मकान में रहता हूं, किराये में पटा दूंगा।’

देवल की स्थिति इन दोनों से भिन्न है। उसके पास रहने का ठिकाना नहीं है, लेकिन कमल या वरुण दोस्त होते हुए भी उसे अपने पास रहने के लिए नहीं कहते हैं। कभी देवल उनसे मिलने आए और देर हो जाने पर उनके आग्रह पर वहीं रूक जाए यह एक अलग बात है, किंतु रोज-रोज रहने के लिए उसे आश्रय वे नहीं देते हैं। वह मुसाफिरखाने में रात गुजारता है। ऐसी स्थिति प्राय: दलितों की ही होती है। इसके अलावा, देवल भूमिहीन भी है। उत्तर प्रदेश और बिहार में आर्थिक रूप से विपन्न और मजदूरी करने वाले भूमिहीन प्राय: दलित हैं। देवल के मुसाफिरखाने में रहने का एक कारण यह भी हो सकता है कि उसे कोई मकान किराए पर न मिला हो। क्योंकि भारत के जाति-समाज में दलितों को किराए पर मकान मिलना सरल नहीं होता है। यह एक कड़ुवी सच्चाई है कि सवर्ण समाज में दलितों की स्वीकार्यता प्राय: नहीं है और बहुत से दलितों को सवर्णों के घर या मौहल्लों में आज भी जाति छिपाकर रहना पड़ता है। देवल भी इस जातीय दंश का शिकार हो सकता है।

कमल जब भी मिलता है या तो अपनी चारपाई पर बैठा या लेटा हुआ या अपने कमरे में पढता हुआ अथवा संगीत सुनता हुआ। जबकि देवल सदैव अपनी भूख की आग से जूझता हुआ मिलता है| कमल और देवल के बीच यह बहुत बड़ा अंतर है| कमल को भूख की चिंता नहीं है इसलिए वक एक्टिंग भी कर सकता है, संगीत भी सुन सकता है तथा मनोरंजन के अन्य उपाय भी कर सकता है, किन्तु दिन-रात पेट की आग से जूझ रहा देवल इससे आगे नहीं सोच पाता है। उसके लिए रोटी ही मनोरंजन और रोटी ही संगीत है।

यह कहानी यथार्थ में देखा जाए तो इंसानियत की तलाश की कहानी है, जो बताती है कि आज के समाज में इंसानियत भी सोलह आने शुद्ध नहीं है, उसमें भी कुछ न कुछ मिलावट है। भले ही छल-कपट, धोखेबाजी, स्वार्थपरता न हो, निजी हितों के संरक्षण की भावना कहीं न कहीं आज की इंसानियत में मिलती है। शुद्ध इंसानियत का मिलना दुर्लभ है। यह सोलह आने केवल उधार की राशि नहीं है, अपने आप में यह बहुत बड़ा व्यंग्य भी है कि समाज में कोई भी सोलह आना खरा नहीं है, हर किसी में कोई न कोई कमी या कमजोरी है। देवल जो कमल और वरुण को अपना मानता है। उनसे कुछ छिपाता नहीं है| उन पर विश्वास करता है, उनकी चिंता करता है| अपनी जेब का एक-एक पैसा उनके ऊपर खर्च कर देता है| वह अत्यंत अर्थाभाव के कारण हफ्तों तक स्वयं भूखा रहता है, किंतु अपनेपन के बोझ से दबा होने के कारण ही यह सोचकर कि कहीं मांगूं तो वरुण को बुरा न लग जाए, या कि पता नहीं उसके पास होंगे कि नहीं, नहीं होंगे तो बेकार में उसका दिल दुखेगा, वह वरुण से अपने सोलह आने नहीं मांग पाता है। लेकिन कमल और वरुण, दोनों में से कोई भी, यह जानते हुए भी कि वह अत्यंत कठिन परिस्थितियों से गुजर रहा है, उसकी कोई मदद नहीं करते हैं। अपनी ओर से मदद करने की बात तो दूर उसके सोलह आने ही उसे वापस नहीं लौटाए जाते। बल्कि, मदद की बात तो अलग देवल के सोलह आने में से एक भी पैसा न लौटाकर वरुण एक प्रकार से उसका शोषण ही करता है।

देवल और वरुण के मूल्य भिन्न हैं, देवल और कमल के मूल्य भिन्न हैं और कमल और वरुण के मूल्य भी भिन्न हैं। उनमें कोई सामज्जस्य नहीं है, किंतु कोई टकराहट भी नहीं है। सबके मूल्य अपनी-अपनी जगह सुरक्षित से हैं। देवल और वरुण के बीच सोलह आने का यह मामला कुछ उसी तरह का है जैसा श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास रागदरबारी में लंगड़ और तहसील के बाबू के बीच नकल का मामला।

जब भी वह वरुण से अपने पैसे मांगना चहता है और वरुण उससे पूछता है कि ‘अभी कोई खास जरुरत तो नहीं है?’ तो देवल ‘नहीं’ या ‘अभी तो नहीं’ कहकर ही जवाब देता है।

कारण वह मित्र की जरुरत को अपनी जरुरत से बड़ी समझता है और इसलिए मित्र को कष्ट में न डालकर खुद कष्ट सहता है। ‘न तो रहने का कोई ठिकाना न खाने का बंदोबस्त: यह तो दशा थी’ देवल की। किंतु, इसके उपरांत वह वरुण के मांगने पर अपनी जेब के सारे पैसे उसे दे देता है और फिर फाकापरस्ती में किसी तरह अपना समय काटता है। किंतु दूसरी ओर वरुण है जो देवल को अपनी एक पुस्तक भी उधार नहीं देता और बहाना बना देता है कि ‘किताब उसकी भाभी की है और वह देने में असमर्थ है, और यह कि देवल जैसे भूमिहीन के पास से वह किताब फिर वापस मिलेगी, इसका भी विश्वास नहीं है।‘ मित्र एक-दूसरे की मदद करते हैं, एक-दूसरे की प्रगति पर खुश और गर्व करते हैं। मित्र एक-दूसरे की विपन्नता और बदहाली पर कभी खुश नहीं होते, जबकि वरुण, देवल के प्रति इस प्रकार के भाव रखता है। देवल के ‘फटे-पुराने कपड़े उसके जी को संतोष दे रहे थे कि इसके पास पैसे कभी नहीं हो सकते।‘ देवल उस ग्रामीण या लोक जीवन का प्रतिनिधि है, जिसमें व्यक्ति अपने मुंह का निवाला किसी जरूरतमंद को देकर सुख का अनुभव करता है। उसका यह भोलापन ही उसकी मनुष्यता है। देवल का यह निश्छल भोलापन अपनी पूरी ईमानदारी और नैतिकता के साथ इस कहानी में देखा जा सकता है। यह भोलापन उस लोक जीवन की पहचान और पूंजी है, जिसे आज की शहरी सभ्यता और संस्कृति ने निगल लिया है।

सामंत, दलित के साथ सहानुभूति प्रकट करता है, उस पर दया भी करता है या दिखाता है, किंतु उसकी स्थिति को बेहतर बनाने के निमित्त कोई सार्थक प्रयास नहीं करता है। कमल भी यही करता है। वह देवल के प्रति सहानुभूति व्यक्त करता है और एक दिन उसकी भूख पर तरस खाकर उसे उसके द्वारा खर्च किए गए तीन आने पैसे देकर होटल जाकर खाना खाने के लिए कहता है, ’यह लो तीन आने पैसे। किसी होटल में खा आओ। तब बैठो।‘ किंतु इसके अलावा वह कोई अन्य मदद देवल की नहीं करता है। देवल द्वारा वरुण को दिए गए उधार के पैसे उसे वापस मिल जाएं यह तो वह चाहता है और देवल से कहता भी है कि वह वरुण से अपना उधार मांगे। किंतु, यह जानते हुए भी कि देवल आपसी संबंधों का लिहाज करते हुए वरुण से अपने पैसे मांगने में संकोच कर रहा है, वह वरुण से देवल के पैसे लौटाने के लिए उस पर दबाव नहीं डालता है| केवल हल्के ढंग से एक बार कहता भर है।

इस कहानी के पात्रों के मूल्यों में बिखराव है। देवल और वरुण के मूल्य भिन्न हैं, देवल और कमल के मूल्य भिन्न हैं और कमल और वरुण के मूल्य भी भिन्न हैं। उनमें कोई सामज्जस्य नहीं है, किंतु कोई टकराहट भी नहीं है। सबके मूल्य अपनी-अपनी जगह सुरक्षित से हैं। देवल और वरुण के बीच सोलह आने का यह मामला कुछ उसी तरह का है जैसा श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास रागदरबारी में लंगड़ और तहसील के बाबू के बीच नकल का मामला। लंगड़ व्यावहारिक नहीं है, इसलिए बाबू से नकल लेने के लिए उसे दो रुपए न देकर सालों तक कचहरी के चक्कर काटता है। उसे लगता है कि बाबू अपना धर्म निभा रहा है और वह अपने धर्म पर है| बाबू जब नकल देगा वह तब ही लेगा। देवल भी व्यावहारिक नहीं है, वह अपने ही पैसे वरुण से नहीं मांग पाता है।

त्रिलोचन जीवन की विसंगतियों पर चोट कर समाज की चेतना को झकझोरने वाले रचनाकार हैं। समाज की अनेक विसंगतियों पर उन्होंने कहीं सीधे और कहीं व्यंग्य के द्वारा चोट की है, किन्तु वर्ण-व्यवस्था या जातिवाद से टकराने की कोशिश उनकी रचनाओं में बहुत कम देखने को मिलती है।’सोलह आने’ कहानी मेँ भी पात्रों के संबंधों को आर्थिक दृष्टि से अभिव्यक्त करने की कोशिश की गयी है और जातिगत पहलू को नजरअंदाज किया गया है। जबकि सामाजिक संबंधों में जाति भी काम करती है।

खाने पर नौ आने के खर्च को तीन व्यक्तियों में समान रूप से बांटना समाजवाद का एक अच्छा उदाहरण हो सकता था यदि उसी भावना से कमल और वरुण द्वारा अपने-अपने हिस्से के तीन-तीन आने पैसे देवल को दे दिए गए होते। हालांकि कमल तो बाद मेँ एक दिन देवल को कई दिनों से भूखा देख उस पर दया दिखाते हुए उसे तीन पैसे दे भी देता है, किंतु वरुण खाने के तीन आने और देवल से उधार लिए गए तेरह आने मेँ से कुछ भी उसे नहीं लौटाता है| वरुण का यह व्यवहार समाजवाद की धज्जियां उड़ा देता है। वरुण का चरित्र समाजवाद पर बहुत बड़ा व्यंग्य है। वह जिस प्रकार देवल का शोषण करता है वह किसी भी रूप में समाजवादी मूल्यों के अनुरूप नहीं है। सामाजिक संबंधों के निर्वाह के लिए परस्पर समानता, संतुलन और सामज्जस्य का होना आवश्यक है। देवल और वरुण के संबंधों में इस प्रकार का संतुलन और सामज्जस्य नहीं है। क्योंकि वरुण के व्यवहार में स्वार्थ और कुटिलता है, वह केवल अपने हित देखता है। यहां देखा जाए तो संबंध केवल देवल द्वारा एकतरफा रूप से निभाया जा रहा है।

यह कहानी मानवीय सम्बन्धों पर पूंजी के प्रभाव को भी दर्शाती है। बाजारवाद का प्रभाव कहानी पर स्पष्ट दिखायी देता है, जिसमें व्यक्तियों के संबंध मानवीय न रहकर आर्थिक हो जाते हैं। बाजार किसी पर दया नहीं करता, कमल, वरुण और देवल के संबंध भी कुछ इसी प्रकार के हैं। कोई अपना पैसा दूसरे पर खर्च करने या छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। पैसे को लेकर उनके सम्बन्धों मेँ एक दरार सी आ रही है| पैसा अपनों को अपनों से अलग करता है। कहानी कहना चाहती हे कि पैसे या पूंजी की यह संस्कृति मनुष्यता के लिए घातक है।

त्रिलोचन जीवन की विसंगतियों पर चोट कर समाज की चेतना को झकझोरने वाले रचनाकार हैं। समाज की अनेक विसंगतियों पर उन्होंने कहीं सीधे और कहीं व्यंग्य के द्वारा चोट की है, किन्तु वर्ण-व्यवस्था या जातिवाद से टकराने की कोशिश उनकी रचनाओं में बहुत कम देखने को मिलती है।’सोलह आने’ कहानी मेँ भी पात्रों के संबंधों को आर्थिक दृष्टि से अभिव्यक्त करने की कोशिश की गयी है और जातिगत पहलू को नजरअंदाज किया गया है। जबकि सामाजिक संबंधों में जाति भी काम करती है। कहानी को देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि कहानी के पात्र जाति से मुक्त हैं, उन पर जाति का कोई प्रभाव नहीं है। किंतु कहानी की गहराई में जाने पर जाति की गंध महसूस की जा सकती है। वरुण जब देवल द्वारा मांगे जाने पर उसको अपनी एक किताब इस आधार पर नहीं देता कि ‘देवल जैसे भूमिहीन के पास से वह किताब फिर वापस मिलेगी, इसका भी विश्वास नहीं है ‘तो यहां भूमिहीन का संबंध केवल देवल की आर्थिक दरिद्रता के साथ नहीं, उसकी जाति की ओर भी जाता है। देवल के बारे में वरुण की यह सोच इंगित करती है कि वरुण भूस्वामी या भूमिहार है। कमल जानता है कि देवल वरुण से दृढ़ता से अपने पैसे नहीं मांग सकता है, इसलिए वह उसका मनोबल बढ़ाने की कोशिश करता है कि वह वरुण से अपने पैसे मांगे। वरुण भी जानता है कि देवल दलित है और सलीके से वह अपने पैसे नहीं मांग सकेगा। इसलिए वह देवल से इस प्रकार बातें करता है कि देवल उससे अपने पैसे मांग ही नहीं पाता है। कमल और वरुण की तुलना में देवल कुछ संकोची और दब्बू किस्म का युवक है, और जितने विश्वास और सहजता से कमल और वरुण अपनी बात कह देते हैं, वह नहीं कह पाता है। यहाँ जाति का समीकरण काम करता दिखाई देता है। भारत जैसे जाति-समाज में व्यक्ति को दब्बू या दबंग बनाने में जाति बहुत बड़ी भूमिका निभाती है। जब तक समाज में जातिगत भेदभाव और शोषण है, तब तक समाजवाद की सफलता संदिग्ध है। समाजवाद की सफलता समाज में समानता, स्वतन्त्रता और न्याय के मूल्यों की स्थापना पर निर्भर है।

जयप्रकाश कर्दम मशहूर दलित साहित्यकार और आलोचक हैं।

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