सामाजिक क्षेत्र में राजनीति से ज्यादा बड़ा योगदान किया जा सकता है

सुप्रसिद्ध मानवाधिकार अधिवक्ता पीएल मिमरोठ से विद्या भूषण रावत की बातचीत

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दूसरा भाग-

आपने सेण्टर फॉर दलित राइट्स की स्थापना उस वक्त की जब राजस्थान में मानवाधिकारों के प्रश्न पर बहुत कुछ नहीं था बल्कि मानवाधिकारों के सवाल तो नक्शे से ही गायब थे। संगठन बनाने का ख्याल कब और क्यों आया ?

दलित अधिकारों पर वर्ष 2000 से पहले मैं दिल्ली और दिल्ली के आस-पास के क्षेत्र में कार्य करता था। मैं मूल रूप से राजस्थान का होने के कारण वहाँ की सामाजिक, जातीय, राजनीतिक, आर्थिक, भौगोलिक, सामंतवादी व्यवस्था से अच्छी तरह से परिचित था। राजस्थान में वर्ष 2001 से पहले की स्थिति और आज की स्थिति में काफी सुधार हुआ है। जब मैंने राजस्थान में वर्ष 2001 में दलित उत्पीड़न व दलित मानवाधिकारों पर काम करना शुरू किया उस समय स्थिति बहुत ही खराब थी। दलितों पर अत्याचार हो जाता था लेकिन पीड़ित की मुकदमा दर्ज करवाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था। मन मसोस कर बैठ जाता था। थाना में मुकदमा दर्ज करवाने जाता था तो मुकदमा दर्ज नहीं किया जाता था। उस समय राजस्थान में दलितों पर काम करना तो दूर की बात है, कोई भी संस्था या संगठन दलितों की पैरवी करने के लिए दलित कार्यकर्ताओं को एकजुट करने और उनको प्रशिक्षण देने के लिए काम तक नहीं करता था। कार्य करते समय कई प्रकार की समस्याएँ सामने आईं। कोई भी दलित महिला कार्यकर्ता काम करने के लिए तैयार नहीं होती थी। इसका मुख्य कारण यह है कि पढ़ी-लिखी दलित लड़कियों में भी शैक्षणिक भ्रमण के अभाव के कारण जानकारी और नॉलेज का अभाव था। दलित महिलाओं व पढ़ी-लिखी महिलाओं को अवसर नहीं मिलता था। अपनी बात कहने का मंच उपलबध नही था।

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ऐसा नहीं था कि दलित महिलाएं पढ़ी-लिखी नहीं थीं। पढ़ी लिखी थीं लेकिन उनकी दलित मानवाधिकारों व संस्थागत स्तर पर कार्य करने, घर से बाहर जाने के लिए परिवार के सदस्यों की अनुमति नहीं मिलती। ऐसे अनेक कारणों से दलित महिलाएँ आगे नहीं आती थीं। बड़ी मुश्किल से महिला कार्यकर्ताओं को तैयार किया, प्रशिक्षण दिया, उनकी टीम तैयार की, एक्पोजर विजिट आदि करवाई गई जिससे महिलाओं की समझ तैयार हुई।

मानवाधिकार क्या है? इसके बारे में पुलिस प्रशासन और मानवाधिकार आयोग भी दलित अत्याचार व हिंसा को मानवाधिकारों की दृष्टि से नहीं देखता था। हमारे लगातार प्रयासों से हमने पुलिस प्रशासन, सरकार, मीडिया, जनप्रतिनिधि को संवेदनशील करने का प्रयास किया जिसके परिणामस्वरूप राजस्थान में एक दलित आन्दोलन खड़ा हो पाया।

राजस्थान में दलितों पर कोई काम करने वाला नहीं था। यहां पर काम करना समय की मांग व आवश्यकता थी । इसलिए यहां काम करने की आवश्यकता महसूस की गई।

दलित अधिकार केन्द्र क्या करता है? इसकी प्रमुख उपलब्धियां क्या-क्या हैं?

राजस्थान में दलित अधिकार केन्द्र के माध्यम से हमने कई महत्वपूर्ण उपलब्ध्यिां हासिल की है जिनको शब्दों की सीमा में बाँधना सम्भव नहीं है, क्योंकि राजस्थान जैसे सामंतवादी प्रदेश में दलितों की आवाज बिल्कुल दबी व बेजान थी। ऐसे माहौल में अगर कोई दलित अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने की सोचने भी लगा है तो दलित अधिकार केन्द्र का मानना है कि वह भी एक सकारात्मक परिवर्तन व सफलता है। इसलिए केन्द्र के प्रयास से जो महत्वपूर्ण सफलता मिली है उसका वर्णन निम्न प्रकार है।

दलित अधिकार केन्द्र के मुख्य कार्य:

  1. दलित अत्याचार व उत्पीड़न की घटना की मॉनिटरिंग करना व पीडितों को न्याय दिलाने के लिए सम्बन्धित अधिकारियों, व आयोगों को पत्र प्रेषित कर न्याय की मांग करना।
  2. दलित अत्याचार के गम्भीर प्रकरणों में केन्द्र के जांच दल द्वारा फैक्ट फाइण्डिग करना, घटना की वास्तविकता का पता लगा कर जांच दल की रिपोर्ट सम्बन्धित अधिकारियों व आयोगों को पत्र प्रेषित कर न्याय की मांग करना।
  3. दलित कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देना।
  4. पूरे प्रदेश में दलितों व महिलाओं में जागरूकता लाने के लिए रैली, जनसभा, बैठकें, सामाजिक समरसता बैठक, जन सुनवाइयां, कार्यशाला, प्रशिक्षण शिविर आदि का आयोजन करना।
  5. पुलिस, प्रशासन, सरकार, मीडिया, नागर समाज को संवेदनशील करने के लिए समय-समय पर संवाद आयोजित करना।
  6. दलितों के हित के लिए बनी योजनाओं, कानूनों की प्रभावी क्रियान्विति के लिए पुलिस प्रशासन व सरकार के साथ एडवोकेसी करना व दबाव समूह का कार्य करना।
  7. प्रदेश स्तर पर दलित भूमि अधिकारों को लेकर भूमि अधिकार अभियान का संचालन व भूमि सुधार के लिए भूमिहीन दलितों को भूमि आवंटित कराने के लिए लगातार प्रयास करना।
  8. दलित महिला जनप्रतिनिधियों को संवेदनशील करना व प्रशिक्षण देना।
  9. दलितों के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुये राजस्थान उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर करना।
  10. दलितों के आंकड़े और शोध के माध्यम से एकत्रित कर राज्य, राष्ट्रीय स्तर पर आवाज उठाना।
  11. दलितों के आर्थिक अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए आर्थिक अधिकारों की योजनाओं की प्रभावी क्रियान्वयन व नई योजना लागू करवाने के लिए प्रयास करना।
  12. जमीनी स्तर पर महिला कार्यकर्ता तैयार करना।

दलित अधिकार केन्द्र की सफलता

  1. राजस्थान सरकार (सामाजिक न्याय एंव अधिकारिता विभाग, जयपुर) द्वारा सामाजिक न्याय के क्षेत्र  में उल्लेखनीय कार्य करने पर वर्ष 2009 में दलित अधिकार केन्द्र के मुख्य कार्यकारीके तौर पर मुझे यानी पी.एल.मीमरौठ को अशोक गहलोत द्वारा एक लाख रुपये नगद व प्रशस्ति पत्र देकर समानित किया गया।
  2. राजस्थान सरकार (सामाजिक न्याय एंव अधिकारिता विभाग, जयपुर) द्वारा सामाजिक न्याय के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने पर वर्ष 2017 को दलित अधिकार केन्द्र के निदेशक सतीश कुमार, एडवोकेट को इक्कयावन हजार रुपये नगद व प्रशस्ति पत्र देकर समानित किया गया।
  3. दलित अधिकार केन्द्र के लगातार प्रयास से राजस्थान में तीन हजार महिला कार्यकर्ता व सात हजार पुरुष कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देकर तैयार किया गया और अभी यह प्रयास लगतार जारी है।
  4. दलित पीड़ितों की पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज होने लगी है।
  5. दलित उत्पीड़न के मामलों में अनुसूचित जाति/ जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन अधिनियम 2015 के तहत मुकदमा दर्ज करने लगे है।
  6. पीडितों को वर्ष 2000 तक कोई मुआवजा नही मिलता था अब केन्द्र के प्रयास से मुआवजा मिलने लगा है।
  7. आरोपियों को गिरफ्तार किया जाने लगा है।
  8. पूरी तरह तो मामलों में निष्पक्ष व सही जांच नहीं होती लेकिन जांच अधिकारी की कार्यशैली में काफी सुधार होने लगा है।
  9. दलित पीड़ितों को अनुसूचित जाति/ जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत पहले मुआवजा राशि नहीं दी जाती थी लेकिन अब मुआवजा राशि मिलने लगी है।

क्या आपको ऐसा लगता है कि संगठन स्थापना से पहले जो आप सोचते थे, उसे पूरा करने में सफल रहे? यदि नहीं तो कौन-सी ऐसी बातें हैं जो आप करना चाहते थे लेकिन नहीं कर पाए है?

मैंने संगठन की स्थापना से पहले जिस सामाजिक परिवर्तन के लिए सोचा था उसमें पचास प्रतिशत परिवर्तन (सुधार) दिखाई देने लगा है जो कि उपरोक्त बिन्दुओं में आपने देखा होगा। लेकिन शत-प्रतिशत सफलता कोई भी संस्था, संगठन व्यक्ति हासिल नही कर सकता क्योंकि कई समस्याओं में समय के अनुसार सुधार होगा कई समस्याओं का समाधान सरकार की इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है। कई सुधार व परिवर्तन समाज की मानसिकता पर निर्भर करता है। जब तक जनता समाज परिवर्तन को स्वीकार नही करेगी या परिवर्तन करना नही चाहेगी तब तक किसी भी मुद्दे पर परिवर्तन सम्भव नहीं है। इसलिए जितना सोचा उतना तो सफल नहीं हो पाया लेकिन पूरे विश्वास के साथ यह कह सकता हूँ कि जितना काम किया उसमें आशातीत सफलता मिली। इससे प्रदेश के दलित आन्दोलन की सफलता के दूरगामी परिणाम सामने आने लगे है।

कुछ अन्य प्रकार के सवाल हैं जिनका समाधान नहीं हो पाया है जैसे राज्य सरकार भूमि सुधार पर कोई कार्यवाही नहीं कर सकी। जातिगत भेदभाव, छुआछूत उन्मूलन के लिए सरकार के द्वारा कोई विशेष प्रयास नहीं किये गये। भूमिहीन दलितों को भूमि मिलनी चाहिये थी। अगर भूमि सुधार होता और सीलिंग एक्ट की प्रभावी पालना होती तो राजस्थान में कोई भी भूमिहीन नहीं रह पाता लेकिन सीलिंग एक्ट, ग्राम दान व भूदान एक्ट की पालना नहीं हो सकी।

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अभी आप का मुख्य फोकस क्या है ?

दलित अधिकार केन्द्र के माध्यम से मुख्य रूप से दलितों को गरिमा, स्वतंत्रता व समानता मिले इसके लिए प्रयास कर रहे हैं। हमारा प्रयास है कि जातिगत भेदभाव समाप्त हो। व्यक्ति को गरिमा और सम्मान जाति के आधार पर नहीं मिल कर मानव होने के नाते मिले। अभी मुख्य रूप से अनुसूचित जाति/ जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधित अधिनियम 2015 व नियम 2016 की प्रभावी पालना करवाने, राजस्थान में सीलिंग एक्ट लागू करवाने के लिए प्रयासरत हैं। इसके साथ-साथ दलित महिलाओं की स्थिति में सुधार हो। दलित महिलाओं में नेतृत्व क्षमता उभर कर आये। इसके लिए प्रयासरत हैं।

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संगठन बनाने के पूर्व से आप सामाजिक जीवन में सक्रिय रहे हैं। क्या आप अपने बारे में कुछ जानकारी देंगे। आपकी पैतृक जगह कौन सी है ? और आपका बचपन कैसे बीता? पढ़ाई कैसे की। आपके माता-पिता क्या करते थे?

राजस्थान में दलित अधिकार केन्द्र की स्थापना से पूर्व मैं दिल्ली में वकालत करता था। मेरा पैतृक गांव राजस्थान के दौसा जिले में बांदीकुई कस्बे के पास बिवाई गांव है। मेरे पिताजी गांव में भूमिहीन व्यक्ति थे। वह अपने रोजगार की तलाश में दिल्ली चले गये, दिल्ली कलॉथ मिल में मजदूर के रूप में काम करते थे। बचपन में मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत ही कमजोर थी परन्तु फिर भी मेरे पिताजी ने मुझे प्रारम्भिक शिक्षा दिल्ली में ही दिलवाई। मैंने 1958 में पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ से मैट्रिक की परीक्षा पास की उसके बाद में मुझे रेलवे में क्लर्क की नौकरी मिली और मैंने नौकरी के दौरान ही दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक व एलएलबी की डिग्री हासिल की।

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आप तो दिल्ली में वकालत कर रहे थे। कैसे इस पेशे में आये ?

वर्ष 1984 तक मैंने रेलवे में नौकरी की और लेखाधिकारी के पद से त्यागपत्र देकर वकालत शुरू की। वकालत के दौरान मुझे दिल्ली में विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ता, दलित संगठनों व नेताओं के सम्पर्क में आने का मौका मिला। शुरू में मेरी रुचि सामाजिक कार्यक्रमों में ज्यादा थी परन्तु कालान्तर में दलितों की दयनीय स्थिति के बारे में पता चला तो दलित मानवाधिकारों में मेरी रुचि ज्यादा बढ़ गई। मैं दलित समस्याओं को मानवाधिकारों से जोड़ने के लिए अनेक संस्थाओं से जुड़ गया।

मानवाधिकारों के लिए लड़ने की प्रेरणा कहाँ से मिली और किन-किन लोगों का सहयोग मिला?

मुझे मानवाधिकारों के बारे में लड़ने की प्रेरणा तत्कालीन राज्यसभा के सासंद एनएच कुम्भारे महामंत्री रिपब्लिक पार्टी ऑफ इण्डिया (गवई) तथा मानवाधिकारों पर कार्य करने वाले पुरोधा न्यायमूर्ति वीआर कृष्णा अय्यर, जो कि उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश थे, से मिली। जब मैं उनके सम्पर्क में आया तो उन्होंने मुझे एक दलित अधिवक्ता होने के नाते अपना पूरा संरक्षण और प्रोत्साहन दिया और उन्हीं के कारण मैं आज इस स्थान तक पहुंचा हूँ।

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आपको कभी राजनीति में आने का न्यौता मिला या कभी आपने राजनीति में जाने की सोची?

मैंने कभी भी सक्रिय राजनीति में जाने की सोच नहीं बनाई, क्योंकि मेरी दृष्टि में एक सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता को मानवीय मूल्यों, नैतिकता से न चाहते हुए भी समझौता करना पड़ता है। सत्ता के गलियारों में जो-जो नैतिक-अनैतिक बातें होती थीं दिल्ली में रहने के कारण मैं उनसे अवगत था। इसके अलावा मेरे अन्दर एक राजनीतिक कार्यकर्ता जैसा कोई गुण व विशेषता नहीं थी इसलिए मैंने अपने आपको अयोग्य मानते हुए राजनीति में नहीं जाने का मानस बना लिया था। मेरी दृष्टि से सामाजिक क्षेत्र में रहकर कोई भी व्यक्ति ज्यादा योगदान दे सकता है और अपना नैतिक व मानवीय मूल्यों का निर्वाह कर सकता है। एक बार मुझे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इण्डिया की ओर से 1989 में दौसा जिले की बांदीकुई विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्णा अय्यर ने प्रेरित किया था, क्योंकि उस क्षेत्र में उस समय दबंग और बलशाली जातियां दलितों को वोट नहीं डालने देती थीं। जबरन बूथ कैप्चर कर लेती थीं। मेरे चुनाव लड़ने से यह फायदा अवश्य हुआ कि दबंग जातियों द्वारा दलितों को वोट डालने से रोकने तथा जबरन बूथ कैप्चरिंग पर काफी हद तक रोक लग पाई।

vidhya vhushan

विद्या भूषण रावत जाने-मने लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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