Friday, June 21, 2024

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रामनारायण पासवान के दिमाग में जैसे चील ने झपट्टा मारा हो, वह चौंक गया.. मर्डर केस में उसका नाम?  सत्तार मियाँ की हत्या… किसने की हत्या? उसे तो पता भी नहीं… फिर उसका नाम? आखिर फंसा ही दिया बुढ़उ ने…? बदला भी लिया तो इतना भयंकर… ? मरते-मरते अस्पताल में बयान दिया कि रामनारायण पासवान […]

रामनारायण पासवान के दिमाग में जैसे चील ने झपट्टा मारा हो, वह चौंक गया.. मर्डर केस में उसका नाम?  सत्तार मियाँ की हत्या… किसने की हत्या? उसे तो पता भी नहीं… फिर उसका नाम? आखिर फंसा ही दिया बुढ़उ ने…? बदला भी लिया तो इतना भयंकर… ? मरते-मरते अस्पताल में बयान दिया कि रामनारायण पासवान वल्द जामुन पासवान ने चाकू से उसका गला रेत दिया… फिर उसने उसके भाइयों के अलावे पट्टी के कई लोगों के भी नाम लिखवाए… बरसों बाद उसकी इस बदमिजाजी से उसके अंदर झुरझुरी-सी हो रही थी। खुद तो मर गया, पर उसका डर उसका गला दबा रहा था। उसे महामंत्रीजी याद आ रहे थे। पाँव तले की जमीन हिल रही थी। उन्होंने तब चढ़ा-बढ़ाकर इस कुपंथ पर चलने का हौसला दिया था, उस समय उसे कहाँ अनुमान था कि बरसों बाद वह बर्बाद हो जाएगा… और गुरुजी के लिए वही कुछ वरदान हो जाएगा। आज उसका पूरा करियर ही दाँव पर लग गया था… एक झटके में उसकी दुनिया ध्वस्त हो गयी थी… वह कितना संभाले, कितनी भाग-दौड़ करे।

उन दिनों जब वह छात्र था, शाखा में आना-जाना था। एक रोज उसने बस इतना कहा था “गुरुजी मुसलमान अगर लव जिहाद के नाम पर इस इलाके में हिन्दू लड़कियों से विवाह कर हमारी नाक काट रहे, तो हम लोग क्यों बैठे हैं? उनकी लड़कियों से हम भी विवाह करें… इस पर विचार होना चाहिए … हमारा धर्म कैसे भ्रष्ट हो जाता है? हिंदुओं में बहुत बकथोथी है, दो कदम आगे चले कि फिर बैक फुट पर आ जाते हैं लोग…”

“यही करना होगा बेटा।” महामंत्रीजी ने लार कहा था,” मैं तुमसे सहमत हूँ। ईंट का जवाब पत्थर से दो…तुम लोग आगे आओ…नहीं तो यह देश मलेच्छों का हो जाएगा… उनको अगर यह सिखाया जा रहा है कि हिंदुओं की बहू-बेटियों की इज्जत उतारो, तो हम भी यही कह रहे …ऐसा करो… यह हमारा आपद धर्म है..  इतिहास को बदल दो बेटा.. गर्व से बोलो हम हिन्दू हैं….”

उसके मन का चोर बाहर निकल आया था इस उकसावा पर। वह गाँव में सत्तार की लड़की रजिया से प्रेम करता था, पर उसकी हिम्मत नहीं होती थी कि वह अपने रिश्ते को अंजाम दे, सो टटोल कर कहा था,” गुरुजी मैं फिर कहता हूँ हिंदुओं की कथनी-करनी में बड़ा भेद है…” उसका सवाल साफ था,” हुक्का-पानी बंद कर देंगे लोग… पहले हिंदू दर-ब-दर करेंगे, फिर मुसलमान…”

“नहीं-नहीं, अब मंथन शिविर में इस पर विमर्श चल रहा है.. “उनका उत्तर उत्साहवर्द्धक था,” कोई तो यह कारनामा कर दिखाए, मेरा सीना चौड़ा हो जाएगा…मैं ब्राह्मण होकर उसके घर भोजन करूँगा… आशीर्वाद दूँगा… उसके बच्चे का नामकरण और यज्ञोपवीत करवाऊँगा… प्रचारक हूँ पार्टी का.. संगठन को मजबूत करना ही मेरा लक्ष्य है…”

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गुरुजी भविष्य की आँखों में हिंदुत्व के अमर-बीज बो रहे थे। रामनारायण की किरमिची आँखें स्वप्निल हो रही थीं…उसने फैसला कर लिया था कि गुरुजी जब कह रहे, तो वह रजिया से विवाह करेगा, जिसको, जो करना है, करे…पटना से वापस  आकर उसने कोर्ट मैरेज कर लिया। किसी को हवा तक नहीं लगने दी। रजिया को लेकर नानी गाम में छुप गया। वह बचपन से ही उससे बेपनाह मुहब्बत करती थी। उसकी काँपियों में स्कूल से आने पर चुपके से कोई सुंदर तस्वीर टांक देती थी, फिर उसकी कल्पना में देर तक बारिश होती थी और मन का मोर नाचता था। बिसनपुर में ऐसे तो बारहो-बरन थे, पर पासवान और मुसलमान की आबादी सबसे ज्यादा थी.. जमींदार और काश्तकार वर्ग में राजपूत, ब्राहमण, यादव, कोइरी और कुर्मी आदि जातियाँ थीं। गाँव की राजनीति कुछ ऐसी थी कि लोग गरीब को गरीब बनाये रखने की साजिश करते रहते थे। अपने सात भाइयों ही नहीं पूरी दलित बस्ती में वही पढ़ा-लिखा था। अकेला ग्रेजुएट जात-बिरादरी में। बाद में उसकी देखा-देखी कइयों ने कोशिशें कीं। उसने प्रोत्साहन भी दिया। मगर भूख और अभाव ने उन्हें आगे नहीं बढ़ने दिया। कुछ मैट्रिक में फेल, तो कुछ पास हुए। वह पीछे मुड़कर देखता है, तो अपने कुल-वंश में दूर तक उसेे अज्ञान का अँधेरा पसरा दिखाई देता है। प्रकाश का कोई नामो-निशान तक नहीं। वही जानता है कि किस पहाड़ को ठेलकर उसके जैसे लोग कैसे आगे बढ़ते हैं। कदम -कदम पर प्रगति के पथ पर स्पीड ब्रेकर लगा दिये जाते हैं कि वे बीच में ही दम तोड़ दें। कितने अपमान और उपेक्षा के दंश सहते हैं दलित अपने रोजमर्रे के जीवन में!

सदियों से दमित और कुचला हुआ अंतर्मन छटपटाता है कि वे इस अभागत से बाहर आएँ… और अगर कोई रामनारायण इस दुर्भाग्य के चक्रव्यूह से बाहर निकल भी आता है, तो उसे उतना मान-मरजाद कहाँ मिलता है… पार्टी कहती है कि सभी हिंदू एक है, तब इतना भेद क्यों? शाखा में वह इस बात को जोर-शोर से उठाता था। गुरुजी कहते थे, “इसी कारण हिंदू जाति का अध:पतन हुआ है, पर अब फिजां बदल रही है…हमारा प्रयास एक दिन रंग लाएगा… फूल खिलेगा सत्ता के पोखर में… “उम्मीद का दामन थामे वह उसी लाइन पर आज भी घिसट रहा… गुरुजी की बात सच साबित हुई,  सत्ता का फूल खिला, पर दाँव-पेंच और गीदड़-भभकी वही… फिर बदला क्या? उसे संतोष है कि रजिया के रूप में उसे एक बेहतरीन साथी मिली, जिसने उसके विश्वास को कभी टूटने नहीं दिया। आज वह कह सकता है कि वह पाॅर्टी की विचारधारा से उत्प्रेरित नहीं भी होता, तब भी उसकी पसंद रजिया ही होती। रजिया उसका प्रेम उतना ही अटूट और नैसर्गिक था, जितना भावनाओं के घोंसले में दो अबोध गोरैया… बचपन से वह उसकी दुनिया के आसपास फुदकती थी, भले यह रूपाकार बाद में उनके भीतर उभरा हो…

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उसे खयाल आता है कि जब रजिया से उसकी शादी हुई और वे गाँव से गायब हो गए, तो सत्तार शुरु-शुरु में गलतफहमी में रहा। उसे शक था कि रजिया को उसके टोले के जमील और युसुफ ने भगाया है। युसुफ और जमील के हाथों वह रजिया को मोटी रकम पर बेचना चाहता था। दोनों बकरियों-खस्सियों के साथ लड़कियों के खरीद-फरोख्त का भी धंधा करता था।बहला-फुसलाकर गरीब लड़कियों को अरब देशों में निकाह कराता था। इस सेटिंग से अच्छी कमाई हो जाती थी दोनों की।भले उनका जीवन गारत हो जाए। रजिया को इस बात का इमकान हो गया था। रामनारायण को उसने बाप की साजिश के बारे में बता दिया था। इसलिए यह कदम उठाना और भी जरूरी हो गया था। उसने एक कागज पर पिंजरा बनाया और उसके अंदर एक चिड़िया डाल दी। इससे पहले कि कोई चिड़िया को कोई कैद करे, वे फुर्र हो गए। सचमुच आज भी उसे लगता है रजिया के भीतर एक कलाकार है, जो हर वक्त जीवंत रहता है, उसे न हिंदू रंग देते बनता है और न मुसलमान… वह आज भी बच्चों की कापियों में चुपके से कुछ न कुछ बना देती है.. सुग्गा.. मैना.. मोर… बत्तख… फूल… हवाई जहाज… एक दिन नानीगाम में जब वो छुपकर रह रहे थे, उसने भीड़ का फोटो बनाया था और दूसरे पेज पर रेल का… रामनारायण का दिमाग गाँव की खबरों में उलझा था, वह कुछ नहीं समझ सका।

मामला जब काफी तनावपूर्ण हो गया। हलचल बढ़ गयी,  इलाके के मुसलमान जमील और युसुफ पर तनने लगे, तो दोनों ने कुरान शरीफ उठाकर जमात में कसमें खायीं कि रजिया की गुमशुदगी में उनका कोई हाथ नहीं.. सत्तार पुरानी दुश्मनी निकाल रहा.. वह खुद तस्करी और लड़की टपाने का धंधा करता है, बार्डर पार नेपाल से गाजा लाता है और सरेआम बेचता है… रामनारायण के भाइयों से पुराना मेल-जोल है.. बाहर से आए लोगों ने उन्हें इस बात पर बरी कर दिया और कहा मुसलमानों की बेइज्जती का सवाल है, वे रजिया का पता लगाने में सत्तार की मदद करें… आखिरकार भेद खुला, तो बवेला मच गया था। हिंदू जहाँ चुप्पी साधे हुए थे, वहीं मुसलमान आग-बबूला हो गए थे। सत्तार हवा में गालियाँ उछाल रहा था कि रजिया को वापस करो, नहीं तो हिंदुओं की बहू-बेटियों की भी खैर नहीं…वह भागा-भागा फिर रहा था। मुसलमान उसका पीछा कर रहे थे, मगर रजिया अब वापस नहीं जाना चाहती थी। सत्तार पर उसे भरोसा नहीं था। वह एक नम्बर का शराबी और अड्डाबाज था। उसके सातों बेटे तक उससे नाराज रहते थे। बीच-बीच में वह जमीन का कोई न कोई टुकड़ा बेच लेता था, जिससे  घर का माहौल बिगड़ जाता था, लेकिन अभी रजिया की बात पर सब में एका हो गया था!

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रजिया को क्या इल्हाम हुआ, उसने उसके सामने फिर वही तस्वीर रख दी… तब रजिया की तस्वीरों ने मानो उसके कान में कुछ फुसफुसा कर कहा। उसे लगा नानी गाम में वे महफूज नहीं हैं। मुसलमान जब तक सुराग ढूँढ़ें, वह  खतरे को भाँपकर उसे लेकर रेल से पटना भाग आया। हिन्दुओं और मुसलामानों के बीच बैठकें होती रहीं। दूर-दूर से मौलवी लोग बिसनपुर आते रहे। गाँव में कशीदगी बढ़ती रही, आखिर सत्तार ने हारकर उस पर मुकदमा कर दिया कि रामनारायण पासवान उसकी नाबालिग लड़की को लेकर भाग गया है… मुकदमा जोर-शोर से चला। नतीजा रजिया के कारण उसके पक्ष में रहा। वकील मिलाने से लेकर मेडिकल टेस्ट तक की रिपोर्ट बदलने की कोशिशें हुईं, पर गुरु देवेन्द्राचार्य ने उसकी दिल खोलकर काफी मदद की। हिन्दुत्व को जीताने वाले लव जिहाद में  ही उनकी जीत थी। उस दलदल से निकालने के बाद एक स्कूल में उसे रखवा दिया और कहा, “किसी बात की चिंता मत करो। आने वाला समय हमारा है! हमारी पार्टी एक दिन बहादुर हिंदुओं को सम्मानित करेगी। मैं खुद पहल करूँगा। तुमने आज मेरी गुरु दक्षिणा चुका दी है… मुझे गर्व हो रहा है… जय श्रीराम!.”

“जय श्रीराम!” रामनारायण गदगद हो गया था। तब लगा था गुरुजी ने उसे जीवनदान दिया है। देवेन्द्राचार्य की कृपा से सब उसकी मुट्ठी में आ गया था। आगे चलकर उसके दोनों बेटों का भी नामकरण उन्होंने ही किया अक्षत और चंदन। गाँव का रास्ता वह हमेशा के लिए भूल गया। बात आयी-गयी हो गयी। वह सत्तार की पहुँच से कोसों  दूर था, रजिया ने भी कभी गाँव लौटने की इच्छा नहीं की, वह रामनारायण को आक्रोश की उस दुनिया में  लेकर कैसे जा सकती थी! कुछ समय तक सत्तार पगलाया रहा। ताड़ी पीकर गाँव वालों की बहू-बेटियों को गरियाता रहा। दंगे-फसाद की बातें करता रहा… फिर शांत हो गया और तीन-पाँच के अपने धन्धे में लग गया। गाँव से अब ऐसी-वैसी खबर भी नहीं आ रही थी। रजिया अपने बच्चों के लिए हसीन सपने रच रही थी, जात-धरम भूल कर अब सुंदर-सुंदर तस्वीरें बना रही थी। उन तस्वीरों में उनके बच्चे पंख लगाकर उड़ते। रामनारायण लगभग निश्चिंत हो चुका था। एकाध बार छुपकर जब सत्तार अपनी बेटी से मिलने पटना उसके आवास पर आया, तो उसका बाँकी अंदेशा भी जाता रहा। उसने कई बार रजिया के कहने पर केस-मुकदमे में उसकी पैरवी भी की थी, पर आज? सारी तस्वीरें बदरंग हो चुकी थीं..उसके बड़े भाई ने फोन पर उसे बताया था कि अपने बेटे सुलेमान की बीबी से उसने अकेले में छेड़-छाड़ की, तो गुस्से में आकर उस औरत ने बचाव में उसका गला रेत दिया, गाँव में उसकी थू-थू हो रही है, पर लफड़ा तो हो ही गया है…तुम बच कर रहो, पुलिस खोज-पुछार कर रही है… हम लोग भी परेशान हैं…”

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खबर सुनकर रजिया भी कम परेशान नहीं थी। इतने बरस के बाद अपने बाप के इस कुकृत्य से वह दुखी थी। वह जानती थी कि रामनारायण पटना में था, वह निर्दोष है, पर पुलिस क्या गुल खिलाए, कौन जाने। माँ तो बचपन में ही मर गयी थी, वह अपने मन का मलाल किससे कहे, वह बेचैन हो रही थी। गुरुजी हों कि रामनारायण उनकी गिट-पिट में कभी उसने रूचि नहीं ली। उसने तो बस रामनारायण से निश्छल प्रेम किया था… नदी… पेड़… चिड़िया की तरह… वह अपने प्रेम में धरम-करम के फंदे से अनजान थी। जाल और शिकार का तानबाना जो बुने, सो जाने! पर अब उसे भी लग रहा था कि उसके फैसले ने रामनारायण को हमेशा सूली पर ही टांगकर रक्खा…

गुरुजी से कहो न?” उसने घबराकर रामनारयण से कहा,” कोई रास्ता निकालें… मेरी तो साँस ही अटक रही है…अब्बू ने किसका पाप किसके गले लगा दिया… मेरे बच्चों का भी खयाल नहीं किया…”

“गुरु जी?” उसने चौंक कर कहा,” गुरुजी तो गवर्नर हो गए हैं… पार्टी में उनका कद अब बहुत बड़ा हो गया है… वे अब मदद करेंगे? ऐसे भी वे नाराज चल रहे हैं… मैं अब सुदर्शनजी के गुट में हूँ… पार्टी में हड़बड़ाकर कुछ कहने से भी नुकसान हो सकता है… फिर मामला भी तो ऐसा है कि मुझे खुद यकीन नहीं हो रहा…”

“कहने में क्या हर्ज है…” रजिया के लिए रामनारायण की जिंदगी से बड़ा अब कोई मज़हब़ नहीं था। अक्षत और चंदन के भविष्य में ही उसका भविष्य था… उसकी आँखों में अँधेरा छा रहा था। बच्चे अलग अकबक हो रहे थे। सत्तार की क्रूर छवि उसकी आँखों में नाच रही थी, बाप में इस जिंदगी का सबसे बड़ा दुश्मन नजर आ रहा था… सारी सतरंगी तस्वीरों पर स्याही पसर रही थी…

रामनारायण ने मन ही मन कई गालियाँ दीं सत्तार को। दाँत भींचे, पर मन का आक्रोश नहीं गया। वह  खुद हैरान था, जानता था, यह समय इस तरह सोचने का नहीं था। इतना खौफ तो उसे रजिया से विवाह के वक्त भी नहीं हुआ था। अपने मित्र सुदर्शनजी को उसने फोन लगाया, फोन नहीं लगा। पार्टी और रजिया के प्रति एकनिष्ठ वफादार रहने वाले रामनारायण पासवान की भी कम इज्जत नही थी शहर में। उसका नाम एमएलसी के लिए जाने वाला था, पर चर्चा यह भी थी कि गुरु देवेन्द्राचार्य अपने बेटे के लिए यह सीट चाहते हैं। उसका पत्ता वही काट रहे हैं। सुदर्शनजी का काल बैक आया। उसने पूरी कहानी बतायी। वे दुखी हुए, “यह कांड  गलत समय पर हुआ रामनारायण जी… सब गुड़ गोबर हो गया।”

रामनारायण पासवान की घिग्घी बंद थी, सुदर्शनजी ने कहा” खैर गुरुजी से बात कीजिए…वही कुछ करें…विपत्ति में धैर्य रखिए… पार्टी तो आखिर हम सब की है, आज अगर उनका इतना ऊँचा मुकाम है, तो हम कार्यकर्त्ताओं का कम योगदान नहीं… असल बलिदान तो हम लोगों का है… हमने पसीने और खून से बून्द-बून्द सींच है इस बेल को…”

रात में बहुत बार फोन लगाने के बाद करीब दस बजे नम्बर लगा। उसने साहस कर कहा, “गुरु जी। मेरे साथ एक घटना हो गयी… मुझ निर्दोष को… उस  सत्तार ने मरते-मरते फँसा दिया है…”

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“मुझे मालूम हो गया है… पर वह फैसला तो अदालत करेगा।” वे खुश थे, दाँव मारकर बोले, “फिलहाल आप सुरेन्द्राचार्य के लिए एमएलसी का सीट छोड़ दें, अगले टर्म में आपके लिए देखा जाएगा …फिर मैं सोचता हूँ …क्या कर सकता हूँ …सच्चे हिन्दू देवेन्द्राचार्य की कलई खुल रही थी।”

“छोड़ दिया गुरु जी!” उसने हकला कर कहा, ‘मेरे तो सबकुछ आप हैं… आपके बल पर ही इतना आगे बढ़ा …अब भी आप ही पर आसरा है…।’

“ठीक है वचन देता हूँ… कुछ नहीं होने दूँगा।” पुलक कर उन्होंने कहा, “आप सच्चे हिन्दू हैं,… आपने मेरी बात मान ली…मैं देखता हूँ …क्या कर सकता हूँ… इस तरह के मामले में दखल देने से अपना इमेज खराब होता है… सोशल मीडिया पर खबर वाॅयरल हो जाती है…पहले मैं संगठन में था, तो बात अलग थी… अब राजधर्म का भी खयाल रखना पड़ता है… थोड़ा टाइम लगेगा… पहले बेल कराइए…एन्टीसेपेट्री…”

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“जी…” रामनारायण को उनका लहजा औपचारिक लग रहा था, उनमें आत्मीय हिन्दू की वह ऊष्मा नहीं, राजनीतिक साजिश की गंध थी। उसके हाथ से मोबाइल छूटकर गिर पड़ा। उसे लगा लगा, सत्तार ने नहीं, बिसनपुर के किसी सवर्ण हिंदू ने उसे लात मारी है और वह चारोखाने चित्त हो गया है…।

संजय कुमार सिंंह पूर्णिया महिला काॅलेज में प्रिंसिपल हैं।

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1 COMMENT

  1. अद्भुत कहानी। आज के सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक परिदृश्य का सुंदर और सटीक चित्रण।सांप्रदायिकता जो आज हमारे हवा में घुलमिल गई है उसका बड़ा ही सुक्ष्म अवगाहन । सिद्ध कथाकार श्री संजय सिंह को बहुत बहुत धन्यवाद और आभार।
    उत्तम अति उत्तम……

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