मराठी की पहली दलित गद्यकार जिसने ब्राह्मणवादियों के दाँत खट्टे कर दिये

अनीता भारती

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आज से एक सौ सड़सठ साल पहले सावित्रीबाई फुले के विद्यालय में पढ़ने वाली तीसरी कक्षा की एक छात्रा मुक्ता साल्वे ने भारतीय इतिहास के वंचित और बहिष्कृत किये गए ‘दलित और स्त्री’ के जीवन को लेकर जो सवाल उठाए वह दलित चिंतन के इतिहास का बेमिसाल अध्याय है। वे सन 1855 में ब्राह्मणवाद, राजशाही, सामंतवाद और पितृसत्ता के लिए चुनौती बन कर उभरीं,  लेकिन उन्हें वैसे ही गायब कर दिया गया जैसा कि अक्सर दलित-वंचित-बहुजन समाज के नायक-नायिकाओं को किया जाता रहा है। अठारहवीं शाताब्दी को अपने कार्यों से जगमगाने वाली, समाज को नई चेतना देने वाली और समाज के आमूल-चूल परिवर्तन में जी-जान लगा देने वाली सावित्रीबाई फुले अपने शैक्षिक, दार्शनिक, साहित्यिक और सामाजिक कार्यों से एक अद्भुत व्यक्तित्व बनी थीं और हमेशा रहेंगी परन्तु भारतीय इतिहास में उनको भी कभी वह जगह नहीं मिली जो उन्हें मिलनी चाहिए थी। बिल्कुल ऐसा ही दलित किशोरी मुक्ता साल्वे के साथ भी हुआ।

इतिहास में विरला ही ऐसा उदाहरण होगा जिसमें किसी ने अपनी अल्पायु में मात्र एक भाषण से साहित्य में अपनी अमिट पहचान बनाई हो। मुक्ता साल्वे उन विरलों में शुमार एक ऐसा नाम है जिसने मात्र 13-14 साल की उम्र में सिर्फ अपने एक भाषण से ही ब्राह्मणवादियों के छक्के छुड़ा दिये। एक 13-14 साल की किशोरी जो मात्र तीसरी कक्षा में पढ़ती थी और अपनी उस नन्हीं-सी उम्र में ही अर्जित अपनी समझ से अपने एकमात्र भाषण के जरिए पेशवाकाल में  दलितों के ऊपर जातीय किये जा रहे नफरत, हिंसा और अत्याचार के कड़वे अनुभवों को लेकर दुख और गुस्सा प्रकट किया था और बहुत शिद्दत प्रखरता और से महिलाओं और दलितों के मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखी है। उनकी यह सोच हमें आश्चर्य में डाल देती है और साथ ही किशोरी मुक्ता साल्वे के प्रति गर्व और सम्मान भी पैदा करती है। आश्चर्य इस बात का होता है जब उस वक्त स्त्रियों को बोलने की आजादी नहीं थी तब भी उसने ऐसा निबन्ध लिखा और गर्व इस बात का कि वह 14 वर्षीय बालिका मुक्ता साल्वे हमारी पुरखिन थी और हम उसके वारिस हैं।

इस बात की काफी संभावना है कि यदि 1855 में उस सभा में पढ़ा गया मुक्ता साल्वे का निबन्ध उस वक्त के प्रसिद्ध अखबार ज्ञानोदय में न छपता तो हम मुक्ता साल्वे का नाम कभी नहीं जान पाते क्योंकि हमारे यहाँ ज्ञान को ढूंढने नहीं छिपाने की परम्परा है। अत: बिना छपाई के यह निबन्ध बड़ी कुशलता से या तो भुला दिया जाता या छिपा दिया जाता। हमारे इतिहासकार बहुत शातिर प्रवृत्ति के रहे हैं। उन्होंने वहीं लिखा, वहीं खोजा, वही सोचा और उसी का अध्ययन किया जो उनके जातीय और वर्गीय हित और सोच अनुकूल था। मुक्ता साल्वे का निबन्ध महार मातंग के दुख सबके सामने रह जाने का कारण यह रहा कि एक तो यह निबन्ध सार्वजनिक तौर पर लगभग तीन हजार लोगों सामने पढ़ा गया, दूसरे इसमें अनेक अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोग उपस्थित थे। मेजर केन्डी इस कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे थे। मेजर केन्डी को यह निबन्ध इतना पसंद आया कि उन्होंने मुक्ता साल्वे को बच्ची समझ चाकलेट देने का प्रयास किया परन्तु मुक्ता साल्वे ने मेजर केन्डी को चॉकलेट देने के बदले (give me library sir not chocolate कहते हुए) लाइब्रेरी की मांग की। एक 14 वर्ष की किशोरी द्वारा चॉकलेट के बदले लाइब्रेरी की मांग करना यह साबित करता है कि उनकी सोच कितनी परिपक्व थी।

 मुक्ता साल्वे क्रान्तिज्योति सावित्री और ज्योतिबा द्वारा खोले गए तीसरे स्कूल की छात्रा थीं। तीसरी पाठशाला 1 मई 1852 को वेताल पेठ में शुरू की गई। यह पाठशाला अस्पृश्य वर्ग की छात्राओं के लिए थी। अस्पृश्य वर्ग की छात्राओं के लिए यह विशेष पाठशाला एक अनोखा सामाजिक-शैक्षिक प्रयोग था। यह पहली पाठशाला अस्पृश्यों के लिए मील का पत्थर साबित हुई क्योंकि इस पाठशाला की प्रशंसा में पूना के प्रतिष्ठित अखबार पुणे ऑब्जर्वर ने 29 मई 1852 यह सामाचार छापा कि –रोपकार की भावना से प्रेरित माली जाति के व्यक्ति ने अपने खर्च से अस्पृश्य वर्ग के लिए पाठशाला स्थापित की है, यह जानकर भारत के सुधारवादी लोगों को बहुत खुशी होगी। यह पाठशाला वेताल पेठ में होने से यहां महार, माँग और पखारी जैसी जातियों के बच्चों को पढ़ाया जाता है। वेताल पेठ के इसी विद्यालय की एक छात्रा थी मुक्ता साल्वे। वह  1852 में यहाँ दाखिल हुई और 1855 में वह अपना ब्राह्मणों को चुनौती देने वाला निबन्ध पढ़ा।

 मुक्ता साल्वे कौन थीं और वह कैसे इस स्कूल में दाखिल हुईं? इस पर भी बात करना जरूरी है। हरेक इंसान की एक पृष्ठभूमि होती है और उसके व्यक्तित्व को गढ़ने में उसकी परिस्थितियाँ, उसके परिवार के लोग, उसके पुरखे बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

मुक्ता साल्वे के दादा राधो जी साल्वे युद्ध कला में पारंगत थे। राधो जी साल्वे एक शूरवीर यौद्धा थे। उनकी बहादुरी का किस्सा इसी से पता चलता है कि उन्होंने एक बाघ से युद्ध किया और उसको जीवित लेकर पेशवा के महल में गए थे। बाद में राधो जी साल्वे पेशवाओं की तरफ से अंग्रेजी सेना से लड़ते हुए मारे गए।

मुक्ता को अपनी बात कहने का साहस अपनी पारिवारिक परम्परा से मिला था। अभी तक दलित समाज पर होने वाले अत्याचारों को लेकर इतनी निर्भीकता से किसी ने बात नहीं रखी थी। इस बात के लिए मुक्ता साल्वे की प्रशंसा की जा सकती है कि उसने ब्राह्मणों की आंख में आंख डालकर अपने समाज पर होने वाले अत्याचारों की पोल खोलकर रख दिया। सावित्रीबाई फुले की कविताओं, पत्रों और वैचारिकी में ब्राह्मणवाद विरोध के जो तत्व हैं वे मुक्ता साल्वे के भाषण में भी मिलते हैं। अभिव्यक्ति के मामले में मुक्ता साल्वे अपनी शिक्षिका सावित्रीबाई फुले से आगे निकल उनके द्वारा दी गई शिक्षा को एकदम सार्थक बना दिया। मुक्ता अपने निबन्ध में कई स्तरों पर एक साथ बात की है। वह दलित समाज को सूत्र वाक्य देती है – हम धर्म रहित है अर्थात मुक्ता साल्वे के शब्दों में यदि वेद केवल ब्राह्मणों के लिए हैं, तो वह स्पष्ट रूप से हमारे लिए नहीं हैं अर्थात हमारे पास धर्म पुस्तक नहीं है। यदि वेद ब्राह्मणों के लिए हैं तो वेदों के अनुरूप जीना ब्राह्मणों का धर्म है। इस धर्म को देखने मात्र की भी हमको छूट नहीं है तब यह स्पष्ट हो जाता है कि हम धर्म रहित हैं।

 सन 1817 मे अंग्रेजों के खिलाफ लड़े गए खड़की युद्ध में राधो जी साल्वे खूब वीरता से लड़े। लगभग 12 दिन लड़ने के बाद वह अंग्रेजी सेना द्वारा मार दिए गए। उस वक्त राधो जी साल्वे के पुत्र लहुजी साल्वे 23 साल के थे और अपने पिता के युद्ध में मारे जाने के बाद अपने मन में देशभक्ति की भावना लिए युद्ध-कला में लोगों को पारंगत बनाने के लिए उन्होंने कुश्ती का अखाड़ा खोला जिसमें युद्ध विद्या यानी सशस्त्र प्रशिक्षण दिया जाता था। लहुजी साल्वे के दादा यानी राधो जी साल्वे के पिता लाटो जी साल्वे भी अपनी बहादुरी के कारण छत्रपति शिवाजी महाराज के बहुत प्रिय और खास थे इसलिए छत्रपति शिवाजी महाराज ने उनको पुरन्दर किले के संरक्षण की जिम्मेदारी थी। इसी किले की रखवाली करते हुए लहुजी के दादाजी और उनके सहयोगियों ने अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी। इस वजह से शिवाजी ने उन्हें ‘राऊत’ की उपाधि दी थी। अपने परदादा, दादा और चाचा के साहसिक और शौर्यपूर्ण परिवार की बेटी मुक्ता साल्वे भी अपनी पारिवारिक परम्परा को निभाते हुए अत्यन्त निडर, बेबाक और प्रखर बुद्धि की थी। मुक्ता साल्वे के माता-पिता के बारे में तो कोई जानकारी नहीं मिलती पर मुक्ता के चाचा लहुजी उस्ताद के बारे में अवश्य जानकारी मिलती है। मुक्ता साल्वे के चाचा लहुजी उस्ताद आजीवन ब्रह्मचारी रहे और उन्होंने अपना पूरा समय सामाजिक कार्य के लिए बलिदान कर दिया। लहुजी उस्ताद ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले को अपना गुरु मानते थे। सावित्रीबाई और ज्योतिबा ने जब ‘अस्पृश्य’ बालिकाओं के लिए तीसरा स्कूल खोला तो लहुजी उस्ताद ने सबसे पहले अपनी भतीजी मुक्ता साल्वे को उसमें दाखिला दिलवाया। वह न सिर्फ अपनी भतीजी को ही पढ़ाने के लिए लाए अपितु उन्होंने और कई बालिकाओं को भी उस पाठशाला में पढ़ने के लिए प्रेरित किया। कहते हैं, वह अपने कंधों पर बैठाकर बच्चियों को स्कूल छोड़ने जाते थे। एक तरह से कहा जा सकता है कि लहुजी साल्वे दलित बच्चों की शिक्षा के लिए बेहद समर्पित व्यक्तित्व थे।

 मुक्ता साल्वे को अपने परिवार और विद्यालय के क्रान्तिकारी माहौल ने मात्र 14 साल की उम्र में कक्षा तीन तक पढ़कर ही वह लिखवा दिया जो लोग बहुत उम्र बीतने पर और बहुत अधिक पढ़ने-लिखने पर भी नहीं लिख पाते।

एक अनुमान के मुताबिक मुक्ता साल्वे का जन्म 5 सितंबर, 1843  को माना जाता है। वह 1852 में वेताल पेठ के विद्यालय में दाखिल हुई और 1855 में मात्र तीसरी कक्षा में थी तब यह निबन्ध लिखा। मुक्ता को अपनी बात कहने का साहस अपनी पारिवारिक परम्परा से मिला था। अभी तक दलित समाज पर होने वाले अत्याचारों को लेकर इतनी निर्भीकता से किसी ने बात नहीं रखी थी। इस बात के लिए मुक्ता साल्वे की प्रशंसा की जा सकती है कि उसने ब्राह्मणों की आंख में आंख डालकर अपने समाज पर होने वाले अत्याचारों की पोल खोलकर रख दिया। सावित्रीबाई फुले की कविताओं, पत्रों और वैचारिकी में ब्राह्मणवाद विरोध के जो तत्व हैं वे मुक्ता साल्वे के भाषण में भी मिलते हैं। अभिव्यक्ति के मामले में मुक्ता साल्वे अपनी शिक्षिका सावित्रीबाई फुले से आगे निकल उनके द्वारा दी गई शिक्षा को एकदम सार्थक बना दिया। मुक्ता अपने निबन्ध में कई स्तरों पर एक साथ बात की है। वह दलित समाज को सूत्र वाक्य देती है – हम धर्म रहित है अर्थात मुक्ता साल्वे के शब्दों में दि वेद केवल ब्राह्मणों के लिए हैं, तो वह स्पष्ट रूप से हमारे लिए नहीं हैं अर्थात हमारे पास धर्म पुस्तक नहीं है। यदि वेद ब्राह्मणों के लिए हैं तो वेदों के अनुरूप जीना ब्राह्मणों का धर्म है। इस धर्म को देखने मात्र की भी हमको छूट नहीं है तब यह स्पष्ट हो जाता है कि हम धर्म रहित  हैं।

मांग महारों ने यदि कोई बढ़िया कपड़े पहन लिये तो भी इनकी आंखों को नहीं सुहाता था। यह तो चोरी का है, इसने चुराया होगा, ऐसे बढ़िया कपड़े तो सिर्फ ब्राह्मण पहन सकते हैं यह कहकर वह उन्हें खम्भे से बांध कर पीटते थे। लेकिन ब्रिटिश राज में पैसे से कोई भी कपड़े खरीद कर पहन सकता है। जो ऊंची जाति का दंड मांग-महारों के सिर मढ़ दिया जाता था । ब्रिटिश राज में वह भी बंद हुआ। जुल्म और बेगारी को भी बंद कर दिया है। कहीं पर छू जाने, स्पर्श हो जाने का खुलापन भी आया है। खेल के मैदान पर हत्या बंद कर दी गई है। अब हम भी बाजार जा सकते हैं। निष्पक्ष ब्रिटिश राज के तहत ऐसी कई चीजें हुई हैं।

मुक्ता ईश्वर के आगे सवाल खड़े करते हुए कहती हैं – वेदों को हमारे द्वारा पढ़े जाने पर महापातक घटित होता है फिर उसके अनुसार आचरण किए जाने पर तो हमारे पास कितने दोष पैदा हो जायेंगे?

वेद यदि देवों की तरफ से आए हुए हैं तब उनका अनुभव ईश्वर से उत्पन्न हुए मनुष्य भला क्यों नहीं कर सकता? है न यह आश्चर्य की बात

मुक्ता साल्वे आगे महार-मातंग लोगों आर्थिक-सामाजिक शोषण पर बात करते हुए समस्या के मूल में जाते हुए कहती हैं- इन लोगों ने बड़ी-बड़ी इमारतें बना ली और उसमें बैठ गए और इन इमारतों की नींव में हमें तेल पिलाकर और सिंदूर लगाकर दफन करते हुए हमारे वंश को नाश करने का भी षड्यंत्र चलाया।

महार-मांग-मातंग समुदाय के ऊपर की जा रही भयंकर हिंसा की तस्वीर खींचते हुए मुक्ता साल्वे कहती हैं– जिस समय बाजीराव का राज्य था उस समय हमें गधों के बराबर ही माना जाता था। आप देखिए लगड़े गधे को भी मारने पर उसका मालिक आपकी खबर लिए बिना नहीं मानेगा लेकिन मांग महारों को मत मारो ऐसा कहने वाला भला एक भी नहीं था। उस समय मांग या महार यदि उनकी व्यायामशाला के आगे से गुजर जाएं तो गुल पहाड़ी के मैदान में उनके सिर को काटकर उसकी गेंद बनाकर और तलवार से बल्ला बनाकर खेला करते थे। जब ऐसे पवित्र राजा के द्वार से गुजरने की भी पाबन्दी हो तब विधा अध्ययन की आजादी भला कैसे मिलेगी? कदाचित किसी महार-मातंग ने पढ़ना सीख भी लिया  और यह बात बाजीराव को पता चल गई तो वह कहता— तुम मांग महार होकर भी पढ़ने लगे हो तब क्या ब्राह्मणों के दफ्तर का काम तुम्हें सौंप दिया जाए औऱ ये ब्राह्मण क्या बगल में थैला दबाए विधवा स्त्रियों की हजामत बनाते फिरें? ऐसा फरमान देकर वह उन्हें दण्डित करता था।

युवती मुक्ता साल्वे अपने इस निबन्ध में दलित स्त्रियों की दुर्दशा पर ध्यान खींचते हुए कहती हैं — पंडितों तुम अपने स्वार्थी और पेट भरू पांडित्य को एक कोने में गठरी बांध कर रख दो और जो मैं कह रही हूँ उसे ध्यान से कान खोलकर सुनो। जिस समय हमारी स्त्रियों की जचकी हो रही होती है उस समय उन्हें छत भी नसीब नही होती इसलिए उन्हें धूप, बरसात और शीतलहर के उपद्रव से होने वाले दुख-तकलीफों का एहसास खुद के अनुभवों से जरा करके देखो । यदि ऐसे में उन्हें जचकी से जुड़ा कोई रोग हो जाए तब उसकी दवा और वैद्य के लिए पैसा कहां से आऐगा? क्या आपके बीच में कोई डॉक्टर ऐसा है जो लोगों का मुफ्त में इलाज करें?

दलित स्त्रियों के साथ दलित बच्चों पर ऊंची जाति के लोगों द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों पर अपना क्रोध प्रकट करते हुए मुक्ता साल्वे कहती हैं — मांग और महार के बच्चे कभी भी शिकायत दर्ज करने की हिम्मत नहीं करते, भले ही ब्राह्मण के बच्चों ने पत्थर फेंक कर उन्हें गम्भीर रूप से घायल कर दिया हो। वे चुपचाप सहते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि उन्हें बचे हुए जूठन के लिए इन्हीं लोगों के घर जाना पड़ता है। हे भगवान यह दुखों का हिमालय ! अगर मैं इस अन्याय के बारे में और अधिक लिखती हूं तो मुझे रोना आ जायेगा।

वह अपने इस निबन्ध में अंग्रेजी सरकार का धन्यवाद करना नहीं भूलतीं क्योंकि कठोर सामंती-जातिवादी पेशवाओं के जुल्मों की सत्ता को खत्म कर, दलितों पर होने वाले अत्याचारों को समाप्त करने में अंग्रेजी कानून ने मदद की। मुक्ता साल्वे इस बात को समझती हैं कि यदि अंग्रेज नहीं होते तो उनपर पेशवाओं का दमन आज भी पहले जैसा ही चलता रहता। वह कहती हैं– इसी कारण भगवान ने हम पर कृपा करते हुए दयालु ब्रिटिश सरकार को यहां भेज दिया। जिसके कारण हमारे दुखों का निवारण शुरू हो गया।

वे एक तरफ अछूतों पर ढाये जा रहे जुल्मों की दास्तान ही नहीं सुनातीं बल्कि अछूतों के लिए किए जा रहे कार्यों पर भी नजर रखते हुए वह आश्चर्य प्रकट करती है -- जो ब्राह्मण पहले अछूतों पर जुल्म करते थे वही आज स्वदेशीय प्रिय बन्धु हमें इन दुखों से उबरने का सतत प्रयास कर रहे हैं लेकिन सभी ब्राह्मण ऐसा कर रहे हैं ऐसा भी नहीं है। उनमें से भी जिनके विचार शैतान ले गया वे पहले जैसा ही हमसे द्वेष करते हैं। और यह जो मेरे प्रिय बन्धु हमें इस व्यवस्था से उबारने में प्रयासरत हैं उन्हें जाति से निकालने की धमकी दी जा रही है।

 मुक्ता साल्वे ब्राह्मणों की झूठी शूरवीरता पर लानत भेजते हुए कहती हैं — पहले गोखले, आपटे, त्रिकमज, आंधला, पानसरा, काले, बेहरे आदि अपने घर में चूहों की हत्या करके अपनी बहादुरी दिखाते थे और हमें बिना किसी कारण या गलती के सताते थे। गर्भवती स्त्री को भी नही छोड़ते थे परन्तु अब यह बंद कर दिया गया है। पुणे में अंग्रेजी शासन के दौरान उत्पीड़न और यातनाएं बंद हो गई। अब किलों और मकानों की नींव में अछूतों को दफनाने की प्रथा भी बंद हो गई है। अब कोई भी हमें जीवित नहीं गाड़ता। अब हमारी आबादी संख्या में बढ़ रही है।

 मुक्ता साल्वे उच्च जतियों के लोगों द्वारा दलित समुदाय से की जानेवाली जातीय नफरत पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहती हैं — मांग महारों ने यदि कोई बढ़िया कपड़े पहन लिये तो भी इनकी आंखों को नहीं सुहाता था। यह तो चोरी का है, इसने चुराया होगा, ऐसे बढ़िया कपड़े तो सिर्फ ब्राह्मण पहन सकते हैं यह कहकर वह उन्हें खम्भे से बांध कर पीटते थे। लेकिन ब्रिटिश राज में पैसे से कोई भी कपड़े खरीद कर पहन सकता है। जो ऊंची जाति का दंड मांग-महारों के सिर मढ़ दिया जाता था ।  ब्रिटिश राज में वह भी बंद हुआ। जुल्म और बेगारी को भी बंद कर दिया है। कहीं पर छू जाने, स्पर्श हो जाने का खुलापन भी आया है। खेल के मैदान पर हत्या बंद कर दी गई है। अब हम भी बाजार जा सकते  हैं। निष्पक्ष ब्रिटिश राज के तहत ऐसी कई चीजें हुई हैं।

मुक्ता साल्वे अपनी छोटी-सी उम्र में ही वक्त की नब्ज़ पर कड़ी नज़र रखती थीं। वे एक तरफ अछूतों पर ढाये जा रहे जुल्मों की दास्तान ही नहीं सुनातीं बल्कि अछूतों के लिए किए जा रहे कार्यों पर भी नजर रखते हुए वह आश्चर्य प्रकट करती है — जो ब्राह्मण पहले अछूतों पर जुल्म करते थे वही आज स्वदेशीय प्रिय बन्धु हमें इन दुखों से उबरने का सतत प्रयास कर रहे हैं लेकिन सभी ब्राह्मण ऐसा कर रहे  हैं ऐसा भी नहीं  है। उनमें से भी जिनके विचार शैतान ले गया वे पहले जैसा ही हमसे द्वेष करते हैं। और यह जो मेरे प्रिय बन्धु हमें इस व्यवस्था से उबारने में प्रयासरत हैं उन्हें जाति से निकालने की धमकी दी जा रही है।

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इसी निबन्ध में वह मांग-महारों को भी आगे बढ़ने और पढ़ने के लिए प्रेरित करती है। वह मांग-महारों से अपने बच्चों को इन पाठशालाओं में पढ़ाने का अनुरोध करती है– हमारे प्रिय बन्धुओं ने मांग-महारों के बच्चों के लिए जो पाठशाला लगाई है और इन पाठशालाओं को दयालु ब्रिटिश सरकार मदद कर रही है। इसलिए दरिद्रता और दुखों से पीड़ित हैं! महार मांग लोगों तुम रोगी हो, तब अपनी बुद्धि के लिए ज्ञानरूपी औषधि को यानी तुम अच्छे ज्ञानी बनोगे तो तुम्हारे मन की कुकल्पनाएं जाएंगी और तुम नीतिवान बनोगे। जो लोग तुमसे जानवरों जैसा बर्ताव करते है वह भी बंद हो जायेगा। अब पढ़ाई करने के लिए कमर कस लो। यानी तुम ज्ञानी बनकर कुकल्पनाएं नहीं करोगे।

अपने निबन्ध के अन्त में मुक्ता साल्वे कहती हैं कि — मैं यह भी साबित नहीं  कर सकती। उदाहरण के लिए जो शूद्र पाठशालाओं में पढ़कर निपुण हुआ और अपने आप को सुधरा हुआ मानता तो वह भी किसी समय शरीर में रोंगटे खड़े देने जितना बुरा कर्म करता है फिर तुम तो मांग-महार हो।

 मुक्ता साल्वे का लिखा मराठी गद्य का यह पहला निबन्ध दलित साहित्य की अनमोल थाती है। जातीय अपमान, पीड़ा, हिंसा और अत्याचार पर उस समय और आज भी स्वयं दलित कवि और कवयित्रियों की अनेक कविताएं मिल जायेंगी, परन्तु गद्य के रूप में यह निबन्ध पहला है और इसलिए यह निबन्ध दलित अत्याचारों के दस्तावेज़ के साथ-साथ दलित स्त्री साहित्यिक लेखन का पहला दस्तावेज़ भी है। एक किशोरी ने जिस प्रखरता से दलित समाज के अन्दर, दलित पुरुषों, बच्चों और महिलाओं पर होने वाले सामाजिक-आर्थिक और राजनैतिक अत्याचार-उत्पीड़न  का बयान किया है वह उस अल्पायु की स्त्री के साथ भारत के दलित बच्चों के मानसिक स्तर पर पढ़ने पर प्रभाव और उससे उत्पन्न आक्रोश, क्षुब्धता, दुख और निराशा को भी इंगित करता है। मुक्ता साल्वे की पीड़ा का विस्तार समझने के लिए दलित लेखक-लेखिकाओं की  आत्मकथाओं को पढ़ना चाहिए। मुक्ता साल्वे  बहुत छोटी आयु में एक बहुत बड़ी विचारक बनकर दलित साहित्य के पटल-पर उभरीं और अपनी गुरु, शिक्षिका, प्रिंसीपल और मार्गदर्शक सावित्रीबाई फुले की परम्परा को बुलंद करने वाली  सिद्ध हुईं।

अनीता भारती जानी-मानी कवि-कथाकार और दलित लेखक संघ की अध्यक्ष हैं। 

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