बाल बंधुआ से सामाजिक कार्यकर्ता बनने वाली सखुबाई की कहानी

सुधा अरोड़ा

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मैं सुखदम्बा की रहनेवाली हूं। मेरे माता-पिता वहीं रहते हैं। हम आठ भाई-बहन हैं। जब मैं बहुत छोटी थी, लगभग पांच-छः बरस की या उससे भी छोटी, तब तक मेरी तीन बड़ी बहनों का ब्याह हो चुका था।

मेरे माता-पिता गरीब किसान थे। इसलिए उन्हें मुझे और मेरे भाई को दूसरों के घर पर बोराई के रूप में भेजना पड़ा। बोराई उसे कहते हैं जो दूसरों के बच्चे संभालते हैं, उनकी देख – भाल करते हैं । मुझे बहुत दूर देहेरा में, अपनी बड़ी बहन के घर, बोराई की तरह भेज दिया गया था। मैं इतनी छोटी थी कि उसकीबच्ची को उठा भी नहीं पाती थी। मेरी बड़ी बहन मुझे पीटती थी। एक दिन तंग आकर मैं अपने माता – पिता के पास जाने के लिए निकल पड़ी। वहां पहुंचने में पूरा एक दिन लगता था, लेकिन मैं रुकी नहीं, चलती ही गई।

आधा दिन चलने, और लगभग आधा रास्ता तय कर चुकने के बाद मेरे जीजा ने मुझे पकड़ लिया और वापस लौटने के लिए जबरदस्ती की। मेरे मना करने पर बहुत पीटा और वापस ले गए। इस घटना के काफी समय बाद ही मैं अपने माता – पिता के पास लौट सकी ।

लेकिन मेरी सास का व्यक्तित्व अद्भुत था। वह मेरे बाल धोती, मेरे कपड़े धोती और मुझे सजाती। मुझसे कहती ‘ मेरे बेटे को छोड़कर मत जाना ’। नदी में स्नान कराने ले जाती और भोजन के समय सामने बिठाकर खिलाती। लेकिन विवाह का मतलब कुछ और भी होता है। मेरा मतलब है पति से ‘ बातचीत ’ करना। मेरे पति मुझसे ‘ बात ’ करना चाहते तो मुझे उनके साथ कमरे में बंद कर दिया जाता। मैं लगातार प्रतिरोध करती और वे मुझे पीटते। सुबह दरवाजा खुलते ही मैं दूर भाग जाती। इतनी बड़ी उम्र के आदमी ने मुझ पर उस समय जबरदस्ती की, जब मुझे माहवारी तक शुरू नहीं हुई थी ।

जब मैं घर लौटी, बरसात का मौसम शुरू हो गया था। घर में अनाज का एक दाना नहीं था। इसलिए मुझे दीवाली तक फिर से बोराई का काम करना पड़ा। बदले में उन्हें डेढ़ – दो मन चावल मिल गया जो दीवाली तक उनके लिए पर्याप्त था। मुझे खाना और कपड़ा भी मिलता था। बच्चे को गोद में उठाने के लिहाज से मैं बहुत छोटी थी, लेकिन पालने को झुला सकती थी  दीवाली के बाद मैं घर लौटी। तब मुझे मवेशी चराने के काम में लगा दिया गया।

मैं लगभग दस वर्ष की थी और विवाह के बारे में कुछ भी नहीं जानती थी। मैं दिन भर ढोर चराने में व्यसतरहती। एक भली सी औरत अपने बेटे को चावल देने बांदघर से बढ़चिरोली आया करती थी। एक दिन वेहमारे घर की ओर से गुजरी और मुझ पर उनकी नज़र पड़ गई। कुछ दिनों बाद वे अपने साथ चार-पांच लोंगों को लाई और अपने बेटे के साथ मेरा रिश्ता तय कर गई। मेरे मामा और चाचा ने मेरे पिता को समझाया कि इतनी छोटी उम्र में मेरी शादी न करें। लेकिन मेरे पिता नशे में इतना डूबे हुए थे कि उनकी सलाह सुनने की स्थिति में ही नहीं थे। मेरी सगाई हो गई पर मुझे इसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी। न मैने उस व्यक्ति को देखा था, जिसके साथ मेरा विवाह होना था।

वे मुझसे उम्र में बहुत बड़े थे, ठीक ठीक फर्क मुझे नहीं पता। जब वे स्कूल में भर्ती हुए, उनकी छोटी बहन दो बच्चों की मां थी। स्कूल की शिक्षा पूरी करके कुछ समय तक वे गाय चराने का काम करते रहे, फिर स्कूल मास्टर बन गये। वे संभवतः मुझसे बीच-पच्चीस वर्ष बड़े होंगे। शारीरिक दृष्टि से अपंग भी थे। उनका एक हाथ और एक पैर छोटा था। मेरा उनसे विवाह हो गया।

इस विवाह में ढेर सारे दुख भरे थे। लेकिन मेरी सास का व्यक्तित्व अद्भुत था। वह मेरे बाल धोती, मेरे कपड़े धोती और मुझे सजाती। मुझसे कहती ‘ मेरे बेटे को छोड़कर मत जाना।’ नदी में स्नान कराने ले जाती और भोजन के समय सामने बिठाकर खिलाती। लेकिन विवाह का मतलब कुछ और भी होता है। मेरा मतलब है पति से ‘बातचीत’ करना। मेरे पति मुझसे ‘बात’ करना चाहते तो मुझे उनके साथ कमरे में बंद कर दिया जाता। मैं लगातार प्रतिरोध करती और वे मुझे पीटते।  सुबह दरवाजा खुलते ही मैं दूर भाग जाती। इतनी बड़ी उम्र के आदमी ने मुझ पर उस समय जबरदस्ती की, जब मुझे माहवारी तक शुरू नहीं हुई थी।

हमारे समाज में महिलाओं को बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कुछ पुरुष बहुविवाह करते हैं। जब तक पुरुष जीवित रहता है तब तक सब ठीक रहता है। पति के मरते ही पत्नियों में लड़ाई-झगड़ा शुरू हो जाता है। बहुविवाह बंद करवाने के लिए हमने संघर्ष किया। दो पुरुषों को दूसरा विवाह न करने की बात मनवाने में हम सफल भी हुए। परंतु तीन और ऐसे थे जिन्होंने दो-दो विवाह किए। सभी हमारी बात नहीं मानते थे। अक्सर उनका तर्क होता था ‘ क्या तुम हमें खिलाती हो? हम कुछ भी करें , तुम्हें क्या! ’

एक दिन मैं जंगल में जाकर छुप गयी। मेघे , जो मेरे नंदोई और रिश्तेदार भी थे , टॉर्च लेकर मुझे ढूंढने निकले। जब मैं उन्हें मिल गयी तो वे बोले, ‘’अगर फिर से तुमने भागने की कोशिश की तो मैं तुम्हें गोली मार दूंगा। घर चलो और ठीक से रहो वरना जान ले लूंगा। मुझे तुम्हारे माता-पिता का कोई डर नहीं है।’ मैं लौटकर अपने माता – पिता के पास भी नहीं जा सकती थी, क्योंकि उन्होंने कह दिया था कि अब पति का घर ही मेरा घर है। घर छोड़कर भागने और पकड़ कर लाये जाने का सिलसिला चलता रहा।

जब मेरी सास की मौत हो गयी तब स्थिति और भी खराब हो गयी। जिस साल मेरी माहवारी शुरू हुई उसी साल मैंने एक बच्चे को जन्म दिया। बच्चा इतना कमज़ोर था कि पैदा होते ही मर गया। सास की मौत के बाद मेरी जेठानी ने मुझ पर सारे काम का बोझ डाल दिया। वे सब रोटी खाते और मुझे सुबह का पका हुआ अंबील देते, वह भी ढेर सारा पानी डालकर। मैं रोती और चुपचाप सहती क्योंकि मेरे पास और कोई चारा नहीं था। मेरे तीन बच्चे हैं , एक लड़की और दो लड़के।

अपने यहां के रिवाज  के अनुसार मैंने अपनी बेटी सविता का विवाह बारह वर्ष की उम्र में कर दिया। लेकिन जब उसके ससुर ने उसके साथ बुरा बर्ताव करना शुरू किया तो मैंने अपने दामाद से साफ कह दिया कि ‘ तुम अपने पिता के साथ रहो। मेरी बेटी मेरे साथ रहेगी। मैं उसकी देख – भाल कर सकती हूं। ’ मेरी बेटी के ससुर को शिकायत थी कि वह कुछ दहेज नहीं लायी। मेरा दामाद कोई काम नहीं करता था और न ही खेती करना जानता था। पर मेरे दामाद ने कहा कि वह अपनी मामी यानी मेरे साथ रहना पसंद करेगा। उसके बाद मेरी बेटी और दामाद मेरे साथ रहने लगे। मैंने दामाद को धीरे – धीरे सब काम सिखाया। अब वह खेत में काम करता है। मेरी बेटी के दो बच्चे हैं ।

मैंने अपने लड़कों को शिक्षा दिलवायी ताकि उनका भविष्य अच्छा बन सके। लेकिन पढ़ने में उनका मन न लगा। बड़ा लड़का बारहवीं फेल है और छोटा दसवीं फेल। वे कोई काम नहीं करते। बुरी संगत में पड़कर वीडियो फिल्म देखते रहते हैं। मेरे मना करने पर मुझे ही गालियां सुनाते हैं। उन्हें खेती के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं है। मेरे पति भी अब कुछ काम नहीं करते है। मैं उनसे यह भी नहीं कह सकती कि अगर वे काम नहीं करेंगे तो उन्हें खाने को नहीं दूंगी, क्योंकि मैं पूरा दिन खेत में रहती हूं और वे घर पर जो चाहे पकाते-खाते हैं। अब मेरा बड़ा बेटा भी शादीशुदा है। मेरी लड़की ही है जो मुझे खेत में और दूसरे काम काज में मदद करती है। मुझे समझ में नहीं आता कि क्यों लोग बेटों की कामना करते हैं और अपनी बेटियों को मार डालते हैं। मां की मदद हमेशा बेटियां ही तो करती हैं।

हमारे समाज में महिलाओं को बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कुछ पुरुष बहुविवाह करते हैं। जब तक पुरुष जीवित रहता है तब तक सब ठीक रहता है। पति के मरते ही पत्नियों में लड़ाई-झगड़ा शुरू हो जाता है। बहुविवाह बंद करवाने के लिए हमने संघर्ष किया। दो पुरुषों को दूसरा विवाह न करने की बात मनवाने में हम सफल भी हुए। परंतु तीन और ऐसे थे जिन्होंने दो-दो विवाह किए। सभी हमारी बात नहीं मानते थे। अक्सर उनका तर्क होता था ‘ क्या तुम हमें खिलाती हो?  हम कुछ भी करें , तुम्हें क्या! ’

बांदघर में एक और आदमी था। शादी के पांच वर्ष बाद वह अपनी पत्नी सविता से कहने लगा, ‘ तुम मां नहीं बन सकती,  मैं फिर से शादी करूंगा।’ वह उससे कहती रही कि हमें अस्पताल जाकर जांच करवानी चाहिए। लेकिन उसका एक ही जवाब था कि तुम बच्चे को जन्म नहीं दे सकती। असल में , उसने एक लड़की पसंद कर ली थी। एक दिन वह नयी दुल्हन को घर ले आया।

हमारे कोंकणी समाज में यह प्रथा है कि नयी दुल्हन के गृह प्रवेश के समय पहली पत्नी आरती उतारकर उसका स्वागत करती है । सविता ने बहुत सहा । हमने उसके हिस्से के घर और जमीन की मांग की। उसने हमें अपमानित करते हुए कहा, ‘तुम्हें क्या तकलीफ है ? तुम्हारा यहां क्या काम है ? मेरे घरेलू मामलों में दखल मत दो। मैं दो क्या दस बार शादी करूंगा, तुमसे क्या मतलब ?’ सविता का कोई और सहारा न था इसलिए उसी के साथ रहना पड़ा। एक बार उसने उसे खूब पीटा, वह गिर पड़ी और सिर पर चोट लगी, बहुत सा खून बहा। लेकिन वह उसके अत्याचार सहती रही, क्योंकि मेरी तरह उसके पास भी अपने भाई का सहारा न था। यह आदमी संघटना का सदस्य था, पर निष्क्रिय हो गया था।

एक और ऐसा ही आदमी था, जिसकी राशन की दुकान थी । अपने व्यापार के दौरान उसका एक स्त्री से संबंध स्थापित हो गया । जब वह गर्भवती हुई, वह उसे घर ले आया। उसने सुनीता से बहुत बार कहा था कि वह बांझ है। जब कभी उसने अस्पताल जाने का सुझाव दिया, वह उसे स्थानीय भगत के पास ले गया। भगत ने उसके पेट को गर्म सलाख से दाग दिया और उस घाव को पनपते देखकर उसमें से मवाद निकालने को कहा कि इस प्रकार सारे बुरे तत्व बाहर निकल जायेंगे। हम इस दाग देने को ‘ दाम्ब ’ कहते हैं। सुनीता के पेट पर ऐसे सोलह दाम्ब के निशान हैं। ऐसे उफनते, जलते घावों के साथ उसे घर के रोजमर्रा के काम भी करने पड़ते थे। उसे साड़ी बांधने में भी बड़ी तकलीफ होती थी इसलिए वह अपने सीने के चारों ओर पेटीकोट बांधकर घर के काम करती थी। जब वह दूसरी स्त्री को घर ले आया तब वह अपने मायके चली गयी। लेकिन वह उसे वापस ले आया।

जब सुनीता जबरदस्ती लायी गयी तब हमने उसके पति के खिलाफ धारा 498-अ के तहत शिकायत दर्ज करवायी। लोगों ने कहा कि जब उसने पति पर मुकदमा दायर किया है तो उसे पति के साथ नहीं रहना चाहिए। लेकिन उसे उसी के साथ रहना पड़ा क्योंकि अब उसके माता – पिता फिर से उसे घर पर रखना नहीं चाहते थे।

संघटना में मैं संघर्ष के अन्य क्षेत्रों से भी जुड़ी हुई थी। हमारी लड़ाई का एक मुख्य क्षेत्रा था – जमीन। हमारे कुछ लोग जंगल की जमीन पर खेती करते थे, पर उनसे कहा जाता था कि वे ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि यह जमीन उनकी नहीं है। हम हाथों में पत्थर लेकर वन – अधिकारियों का दूर तक पीछा करते थे।

‘संघटना’ के गांव में लाए जाने के पहले औरतें अपने पतियों द्वारा प्रताड़ित की जाती थीं। वे खेतों में कड़ी मेहनत करती हैं और जब पति घर लौटती है तो पति हुकुम चलाते हैं - पानी लाओ, दारु लाओ, आदि। ऊपर से पीटते भी हैं। अब संघटना के कारण बांदघर मे हम पतियों से नहीं डरतीं और न ही पुलिस और वन अधिकारियों से। पहले पति मुझे पीटा करते थे। अब मैं उनसे सीधे कह देती हूं कि अगर मुझ पर हाथ उठाया तो मेरा भी हाथ उठ जायेगा। मुझे तुमसे डर नहीं लगता, मैं भी पलटकर जवाब दूंगी।

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संघटना के कार्यकर्ता के रूप में हमने राशन की दुकान के मालिक के विरोध में भी मोर्चा निकाला , जो हमारी चीनी और चावल रास्ते में ही अमीर मारवाड़ियों को बेच देता था । आज भी वे ऐसा ही करते हैं ।

हमारे समाज में दहेज प्रथा नहीं है। मैं सोचती हूं दहेज लेना बहुत बुरी बात है । आलसी और भिखारी जेसेलड़के ही दहेज मांगते हैं । लड़की को अपने ससुरालवालों के हाथों बहुत कुछ सहना पड़ता है । मुझे लगता है कि हमारी संस्था को इस बारे में बहुत दृढ़ता से काम करना चाहिए । हमें दहेज लेने वाले आदमी को पीटना चाहिए । मैं ऐसे व्यक्ति को मारने से पीछे नहीं हटूंगी । साथ ही मैं चाहती हूं कि औरतों में भी इस बारे में जागृति लायी जाए ।

स्वास्थ्य कार्यकर्ता के रूप में आने वाली एक औरत ने हमें बताया कि कुछ स्थानों पर लड़की के जन्म लेने पर रिश्तेदार दाई से कहते है कि हमे लड़की का मुंह मत दिखाओ और वे नवजात शिशु का सिर पानी में डुबाकर मार डालते हैं । उसने बताया कि छः लड़कियां इसी प्रकार मार दी गईं । जब लोगों ने उस परिवारके मकान के पिछवाड़े खोदा तो छोटी बच्चियों की अस्थियां मिली । मुझे यह सुनकर बहुत बुरा लगा।

यदि वे बच्चियां जीवित होतीं तो आज बड़ी होकर पढ़-लिख रही होतीं । कोई काम करके अपने पैरों पर खड़ी होतीं ।

मैं भी एक स्वास्थ्य – कार्यकर्ता हूं । ‘ सायबान ’ में एक सरकारी स्वास्थ्य केंद्र है । लेकिन वहां डॉक्टर मरीज को छूते तक नहीं और पुरानी बेअसर , दवाइयां देते हैं । पास के मेडिकल स्टोर से दवाएं खरीदने के लिए कहते हैं , जबकि वे हमें मुफ्त मिलनी चाहिए । कभी – कभी मरीज को कसेरा ले जाना पड़ता है , जहां पहुंचने के पहले ही मरीज दम तोड़ देता है । स्वास्थ्य केंद्र में मरीज को चाहे सरदर्द हो , या पेट दर्द या फिर कमजोरी , वे सभी को पानी का इंजेक्शन देते हैं।

हमने एक सरकारी अस्पताल के विरोध में मोर्चा निकाला, जहां मरीजों से पैसा वसूला जाता था। जब एक मेडिकल कैम्प आयोजित किया गया, जिसमें हमें मलेरिया , हैजा, पेटदर्द, सिरदर्द आदि बीमारियों के बारे में जानकारी दी गई। उनके उपचार व औषधियों का परिचय दिया गया। गरीब आदमी, जिनमें अधिकतर औरतें होती हैं, हमारे पास आती हैं। हमने एक सोसायटी बना ली। हर एक से 50 रुपये इकट्ठा करके जरूरी दवाइयां खरीदीं।

इस क्षेत्र में हमेशा से यौन – शोषण का जोर रहा है। अगर हम सन् 1940 की ओर पीछे देखें और गोदुताई परुलेकर की पुस्तक जेव्हा माणूस जागा होतो ( जब मनुष्य में जागृति आती है ) पढ़ें तो मालूम पड़ेगा कि उसमें उन्होंने जमीदारों के ‘ प्रथम रात्रि के अधिकारों ’ का उल्लेख किया है। यह एक रस्म और अधिकार दोनों है , क्योंकि विवाह के लिए आदमी अपने जमींदार से कर्ज लेता था। इसलिए विवाह की प्रथम रात्रि को ही उसे अपनी पत्नी को जमींदार की चौखट पर समर्पित करना होता था।

जमींदार जब तक इच्छा हो उसका उपभोग करता, फिर उसके पति को लौटा देता। ऐसे भी कई किस्से हैं, जब पति ने अपनी पत्नी को जमींदार के पास भेजने से इन्कार किया, तो उसे बुरी तरह सताया गया।

यहां की औरतें आजीविका की तलाश में गांव से बाहर जाती हैं और उनमें से कुछ लड़कियां गर्भ लेकर लौटती हैं। बलात्कारी उनकी जिम्मेदारी नहीं लेता। हर कोई स्त्री को छलता है। यदि औरत पुलिस स्टेशन चली जाए, तो साथ वाले आदमी को बाहर खड़ा करके पुलिस वाले स्त्री को अंदर बुलाते हैं।

वे भी उस पर जबरदस्ती करते हैं। कोई भी उसका शोषण कर सकता है, जमींदार, वन अधिकारी, ठेकेदार। पर कोई उससे विवाह के लिए राजी नहीं होता। वह अपने भाई के आश्रय में भी नहीं जा सकती, न जहर खाकर मर सकती है। इस तरह न वह जीती है , न मरती है।

हमारे गांव में अगर कोई बीमार पड़ जाता है, तो वे किसी भी औरत को डायन या चुड़ैल कहकर, उसे गालियां देते और पीटते हैं। मुझे डर है कि मुझे भी इसी श्रेणी में पहुंचा दिया जायेगा, क्योंकि मैं गलत लोगों का विरोध करती हूं, किसी न किसी संघर्ष मे लगी रहती हूं। ऐसा नहीं है कि मैं लड़ाकू हूं या बेवजह हर किसी से लड़ती रहती हूं।

कुछ विशेष किस्म की स्त्रियों पर ही भूतनी या डायन होने का आरोप लगाया जाता है। एक तो कमजोर औरतें- कमजोर से मतलब सामाजिक तौर पर निचले तबके की गरीब औरतें , वे विधवाएं और वृद्धाएं, जिन्हें किसी पुरुष का सहारा न हो। अक्सर ऐसी ही औरतें डायन के रूप में शोषण का शिकार होती हैं। वे दबंग और दृढ़ व्यक्तित्व वाली स्त्रियों को भी दबाने के लिए उन्हें भूतनी, डायन के नाम से बदनाम कर देते हैं।

मैं हमेशा उन लोगों से उलझती हूं जो दो पत्नियां रखते है या पत्नी से दुर्व्यवहार करते हैं। वे लोग शराब पीते हैं। बहुत संभव है कि अचानक एक दिन वे मेरी ओर घूम कर घोषित कर दें कि सखू डायन हैऔर मुझे दबाने के लिए, मेरा विरोध करने के लिए लोगों को भड़का दें।  हमारी सभी महिला कार्यकर्ताओं को डायन कहलाए जाने का अनुभव है। मुझे भी डायन कहा गया। मुझे आपत्ति भी नहीं है। मुझे याद है लगभग आठ साल पहले जव्हार में हमने बालविवाह के विरोध मे लड़ाई छेड़ी थी । वहां की औरतें भी बालविवाह का कड़ा विरोध कर रही थीं।

संस्था के एक नेता के बेटे का विवाह एक दूसरे नेता की बेटी से हो रहा था। लड़की की मां और दादी इस विवाह के सख्त खिलाफ थी। उस समय हमने पुरुषों के दबाव को बड़ी शिद्दत से महसूस किया। चारों ओर कानाफूसी चल रही थी कि शिराज बाई भूतनी है, जो आकर हमारी औरतों के सिर पर भूत चढ़ा देती है। हम इसका तो कुछ नहीं कर सकते पर अपनी औरतों की हमें खूब धुनाई करनी चाहिए ताकि उनके सिर से भूत भागे। इस बारें में और गहराई से देखने की जरूरत है ( मैं ऐसी कई स्थितियों से परिचित हूं जहां औरतों की विशेषकर विधवाओं की, जिनके बच्चे बहुत छोटे हों, लोग जमीन हड़पने की ताक में लगे रहते हैं ।) उनके लिए सबसे सुविधाजनक यह होता है कि वे उस औरत के डायन होने की अफवाह फैला दें।

कैनाड गांव का यह मेरा सबसे पहला अनुभव है जहां का यह जमींदार था। कचहरी में किराये की जमीन को नियमित करने का मामला चल रहा था कि उस औरत के पति की मृत्यु हो गयी। उसकी जमीन हथियाने का सबसे अच्छा उपाय उन्हें यही सूझा कि गांव में उसके डायन होने की अफवाह फैला दी जाये। इस अफवाह के स्रोत तक पहुंचकर हमने गांव वालों के सामने उसकी कलई खोल दी। औरतों को डायन कहलवाने के कारणों में से ये कुछ प्रमुख कारण है। स्वास्थ्य कार्यक्रमों की अधिकता और कार्यान्वयन के कारण अब ज्यादा लोग बीमार नहीं पड़ते और न ही डायन का उपद्रव बढ़ता है। लेकिन अब भी मुझे डर है कि ये शराबी लोग कभी भी मेरी ओर अंगुली उठाकर मुझे डायन के नाम से विभूषित कर सकते हैं।

एक संस्था का कुछ अलग ही प्रभाव पड़ता है। हमारे गांव में कष्टकरी संघटना के शुरू हो जाने से बहुत से परिवर्तन आये। ‘संघटना’ के गांव में लाए जाने के पहले औरतें अपने पतियों द्वारा प्रताड़ित की जाती थीं। वे खेतों में कड़ी मेहनत करती हैं और जब पति घर लौटती है तो पति हुकुम चलाते हैं – पानी लाओ, दारु लाओ, आदि। ऊपर से पीटते भी हैं। अब संघटना के कारण बांदघर मे हम पतियों से नहीं डरतीं और न ही पुलिस और वन अधिकारियों से। पहले पति मुझे पीटा करते थे। अब मैं उनसे सीधे कह देती हूं कि अगर मुझ पर हाथ उठाया तो मेरा भी हाथ उठ जायेगा। मुझे तुमसे डर नहीं लगता, मैं भी पलटकर जवाब दूंगी।

सुधा अरोड़ा जानी मानी कथाकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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