बेघर हुए मुसहर बिरादरी ने की प्रतिज्ञा; जमीन वापस पाने तक नहीं मनायेंगे कोई पर्व-त्योहार

भुवाल यादव, संवाददाता, गाँव के लोग डॉट कॉम

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खुशियों का त्योहार है दीपावली। इस पर्व की खूबी भी यही है कि जिनके हिस्से में कम रोशनी है, उनके घर भी इस दिन जगमगा उठते हैं और दीपक से निकलने वाला प्रकाश पुंज भी एकरूपता का संदेश देता है। प्रशासन की लीला देखिए कि पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के करसड़ा गांव में मुसहरों की एक बस्ती हैं; जहाँ दीपावली के दिन खुशियों की जगह जिंदगी का संघर्ष ज्यादा नजर आता है। आपकी जानकारी के लिए बताना चाहता हूॅ कि करसड़ा गाँव के मुसहरों के घर को प्रशासन द्वारा बीते शुक्रवार को उजाड़ दिया गया था।
मुसहर बस्ती में बेघर किए गए लोग
प्रशासन द्वारा उजाड़े गये बस्ती से बेघर हुए लोगों का कहना था कि इस बार की दीपावली हमारे लिए खुशियों का त्योहार नहीं है, बल्कि मातम का त्योहार बन गया है।कटी-फटी तिरपाल और बबूल के पेड़ों के नीचे जीवन गुजर रहे हैं। दीपावली की रात भी ऐसे ही गुजर जाएगी। टूटे घरों के गम में दिल दीपावली मनाने की इजाजत नही दे रहा है। लेकिन उम्मीद है कि खुशियों का रौनक एक-न-एक दिन उन घरों के छोटा-सा हिस्सों
तक भी जरूर पहुँचेगा; जहां आज गमगीन का माहौल है और यहां के लोग परेशान एवं हताश हैं। पीड़ित लोगों ने यह भी कहा कि बाँस और रस्सी देखकर तो ऐसा मन करता है, जैसे ठठरी बाँध लें और खुद हमेशा के लिए सो जाएँ। बाकि क्या कहियेगा, बच्चो का मुँह देखकर ऐसा भी नही कर सकते। सात दिन बीतने वाले हैं। ठंड का मौसम झेल रहे हैं, लेकिन हमारे पुश्तैनी ज़मीन पर हमें पुनः आवास बनाने और दोषियों के खिलाफ अब तक कोई ठोस कार्यवाही नहीं हुई। ऐसे में दीवाली क्या मनाएँगे, जब किस्मत में ही अँधेरा लिखा है।
आंख में आँसू लिए बुद्धु राम मुसहर ने कहा कि बस ये मुसीबत जिस दिन मर जाएगी, उस दिन हम समझेंगे कि हमारी दीवाली आ गयी। बुद्धु राम बता रहे थे कि पिछले सात दिनों से सब काम-धंधे बंद हैं। सामाजिक संस्थाओं और राजनैतिक दलों से मिलने वाले सहयोग से दिन कट रहा है, लेकिन इ कब तक चलेगा। ऐसे में तो परिवार का पेट भी नहीं भरता; जिस दिन भर पेट खा लेंगे, उसी दिन समझ लेंगे कि परिवार के साथ दीपावली मना ली।
घर उजाड़े जाने के बाद खुले आसमान के नीचे
दीपावली के दिन पीड़ित परिवारों ने कहा कि हमारी पुश्तैनी ज़मीन प्रशासन द्वारा जबरन छीनी जा रही है। इसलिए हम लोगों ने शासन-प्रशासन के खिलाफ विरोध स्वरूप दीपावली नहीं मनाया है। जब घर ही नहीं है, तो दीवाली किस बात की। पीड़ित परिवारों के भोजन की व्यवस्था रोटी बैंक कर रहा है, जो पिछले सात दिन से सभी पीड़ित परिवारों को भोजन करा रहा है। कल उन्हें भी प्रशासनिक अमला धमका रहा था। प्रशासन के दबावों और इंसानियत की तौर पर तमाम समाजसेवी इन परिवारों के साथ खड़े हैं और इनकी पूरी रखवाली भी कर रहे हैं। सामाजिक संगठनों के सदस्यों को भी प्रशासन द्वारा प्रताड़ित और झूठे मामले में फँसाने की धमकियाँ दी जा रही है।
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