सभी जाति धर्म की स्त्रियों की तकलीफें एक जैसी हैं- सुगंधि फ्रांसिस (भाग -तीन)

सुधा अरोड़ा

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तीसरा और अंतिम हिस्सा

विवेक ने समाज को बदलने का जो बीड़ा उठाया था उसका एक रंग यह भी था कि स्वयं भी झोपड़पट्टी में रहकर झुग्गी – झोपड़ियों के बच्चों की पढ़ाई में मदद करना और उन झोपड़पट्टी में रहने वाले लोगों के बीच रहकर उनकी तरह ही जीना। विवेक अपने विचारों के पक्के थे। मेरी और विवेक की इच्छा थी कि इस मामले में घरवालों की सहमति होना भी जरुरी है। इसलिए जब विवेक ने अपने घरवालों से मेरे साथ शादी करने की बात कही तो उनके पिता ने तुरंत मंजूरी दे दी। लेकिन विवेक की मां ने इसके लिए सोचने का कुछ समय मांगा। कुछ एक महीने बाद विवेक की मां ने भी अपनी सहमति दे दी। विवाह के पहले मैंने अपने बच्चों से उनकी राय पूछी। बच्चे मेरे इस निर्णय से खुश थे।1990 में मेरा डॉ. विवेक मॉन्टेरो के साथ विवाह हुआ। विवेक के साथ शादी करते समय हमारे विचार एक जैसे थे, शादी के बाद काम भी एक जैसा हो गया।

विवेक से शादी करके मैं एकाएक एक बहुत पढ़े-लिखे, उच्च मध्यम वर्गीय संभ्रांत परिवार की बहू बन गई। पहले तो मुझे बहुत डर सा लगा कि क्या विवेक के परिवारवाले मुझे स्वीकार करेंगे। मैं इतने बड़े परिवार के लोगों के साथ कैसे निभा पाऊंगी। लेकिन जब मैंने उस परिवार के लोगों का स्वभाव देखा तो मैं बहुत प्रभावित हुई। मुझे भी अपना स्वभाव बदलना पड़ा, अपनी आदतें बदलनी पड़ी। झोपड़पट्टी में करीब चालीस साल गुजारने के बाद उच्च मध्यम वर्ग में जाना और उनके साथ निभाना – यह भी मेरे लिए एक नया अनुभव था ।

किसान कानून के विरोध में आन्दोलन करती सुगंधि फ्रांसिस

1990 में शादी के बाद हमारे कुछ साथियों ने हमसे कहा कि जिस समाज और जिस इलाके मे आप रहते हैं वह आपकी दूसरी शादी को स्वीकृति नहीं देगा। अचरज की बात है कि ऐसा कहने वाले लोग प्रगतिशील विचारों के थे। औरत कहीं भी अगर लीक से हटकर कुछ करने में सफल होती है तो उसे काफी जद्दोजहद से गुजरना पड़ता है, इस बात को मैंने सावित्राीबाई फुले के विचारों से जाना है। जिस इलाके में मैं बचपन से बड़ी हुई, जहां मैंने अपनी पहली शादी अपनी पसंद के लड़के से की और फिर उसी इलाके में विधवा हो जाने के बाद दुबारा शादी की लेकिन मेरे इलाके के लोगों को यह कहीं से गलत नहीं लगा पर कई प्रगतिवादी सोच रखनेवाले साथियों को अलबत्ता यह नया रिश्ता नागवार गुजरा। आज हम उसी इलाके में रहकर लोगों के दैनंदिन सवालों को लेकर आंदोलन करते हैं, उनकी छोटी- मोटी समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करते हैं और अब तो उस इलाके में हमारा काम बहुत बढ़ गया है। यह भी सच है कि मेरे इलाके की तीन विधवा महिलाओं ने मुझसे प्रेरणा पाकर पुनर्विवाह किया। स्त्री- पुरुष समानता के विचार बचपन से ही मेरे मन में थे लेकिन इन विचारों को आगे ले आने का मुझे कभी अवसर नहीं मिला और वे मन में दबे पड़े रहे, लेकिन जब 1989 में मैं एकदम आजाद होकर बाहर आ गई और जिस तरह का प्रोत्साहन मुझे संघटना और विचारों से मिला उसका मैंने पूरा फायदा उठाया।

मैं यही सोचती हूं कि अगर किसी भी महिला या लड़की को उसके विचार या सोच को स्वतंत्र रुप से आगे ले जाने का मौका मिले तो वह कभी भी पीछे नहीं हटेंगी।

औरतों की तकलीफों में कोई फर्क नही होता है। चाहे वह औरत डॉक्टर हो, इंजीनियर हो, बैंक या स्कूल, कॉलेज में काम करती हो या घर में बर्तन- कपड़े धोनेवाली नौकरानी हो। औरत किसी भी जाति या धर्म की हो सबकी तकलीफें एक जैसी होती हैं। यह बात मैने जनवादी महिला संघटना की तरफ से वचलाए जा रहे महिला उत्पीड़न के अनगिनत मामलों में देखी है।

 

मुझे जिन कठिनाइयों का लंबे अरसे तक सामना करना पड़ा वह मैं ही जानती हूं। यहां पर एक बात मैं जरूर कहूंगी कि बड़े-बड़े मंचों पर बैठकर भाषण देना, परिसंवादों में चर्चा करना बहुत आसान है लेकिन जब मुझ जैसी कोई महिला अगर समानता की बात आचरण में लाती है या पुनर्विवाह का निर्णय लेती है तो यही लोग इस बात को पचा नहीं पाते हैं। कई लोग सिर्फ कहने भर के लिए प्रगतिशील विचारधारा के हैं पर उनकी कथनी और करनी में काफी फर्क नजर आता है।

विवाह के बारे में यह सच है कि विवाह चाहे मां-बाप के द्वारा कुंडली- पत्री देख कर हो या लड़का-लड़की अपनी मर्जी से करें, दोनो में कोई फर्क नहीं है क्यों कि दोनो ही स्थिति में औरत को ही तालमेल बिठाकर (एडजस्ट करके) रहने को कहा जाता है। ऐसा कभी नहीं कहा जाता कि घर-संसार, बच्चों की जिम्मेदारी संभालना पुरुषों का भी काम है। सब कुछ औरत को ही करना पड़ता है। इस तरह के पारिवारिक-सामाजिक शोषण के विरोध में अगर औरत आवाज़ उठाए तो उसे जान तक गवां देनी पड़ती है। इन्हीं सवालों को लेकर मेरे मन में विचार आया कि मैं औरतों के बीच जाकर काम करुं। उन्हें इस बात के लिए प्रेरित करुं कि वे हताशा को छोड़कर शोषण के विरोध में खड़ी हों और इसके लिए ज़िन्दा रहना पहली शर्त है। आत्महत्या किसी भी संकट का इलाज नहीं है।

सुगंधि फ्रांसिस के साथ सुधा अरोडा

औरतों की तकलीफों में कोई फर्क नही होता है। चाहे वह औरत डॉक्टर हो, इंजीनियर हो, बैंक या स्कूल, कॉलेज में काम करती हो या घर में बर्तन- कपड़े धोनेवाली नौकरानी हो। औरत किसी भी जाति या धर्म की हो सबकी तकलीफें एक जैसी होती हैं। यह बात मैने जनवादी महिला संघटना की तरफ से वचलाए जा रहे महिला उत्पीड़न के अनगिनत मामलों में देखी है।

एक बार एक महिला हमारे सेंटर मे आई और कहने लगी कि उसके पति उसे मारते पीटते हैं और उसे रात-रात भर घर के बाहर खड़ा रखते हैं। वह महिला एक डॉक्टर है और उसकी एक डिस्पेंसरी भी है।

एक महिला शादी के इकतीस साल बाद हमारे कार्यालय में आई और शिकायत करने लगी कि मेरे पति मुझे बहुत मारते हैं। मेरे बच्चों की शादी हो गई है और अब वे कहते हैं, कि तुम घर छोड़ कर चली जाओ। तीस साल तक मैं उस आदमी के साथ रही, अब मैं कहां जाऊं।

एक दिन एक पढ़ी – लिखी इंजीनियर महिला हमारे कार्यालय मे आकर शिकायत करती है कि मैने अपनी पसंद से शादी की है। मेरी तनख्वाह बीस हजार रु. महीना है, लेकिन मेरे पति, मेरे ससुरालवाले मुझे मारते-पीटते हैं। मेरी पूरी तनख्वाह ले लेते हैं और सिर्फ बीस-पच्चीस रु. मुझे रोजाना खर्च के लिए हाथ में धर देते हैं। बताइए मैंं क्या करुं?

ऐसी औरतों की तो कोई गिनती ही नहीं है जो रोज़ पाच-छः घरों का काम करके घर का खर्च चलाती हैं, बच्चो का पेट पालती हैं, उन्हें स्कूल भेजती हैं और ऊपर से मार खाकर रात-रात भर घर से बाहर बैठी रहती हैं।

जनवादी महिला संगठन में बतौर कार्यकर्ता आए दिन मेरे सामने ऐसे कई मामले आते हैं। इन सभी औरतों की बातें सुनकर मुझे अपनी आप बीती याद आती है और मैं सोचती हूं कि शादी चाहे जैसी हो, मां-बाप के पसंद की हो या फिर अपनी पसंद की, औरतों की तकलीफें एक जैसी ही होती हैं।

इन सब परेशानियों से तंग आकर अगर महिला आत्महत्या कर लेती है या पति को छोड़ने का साहस करती हैं तो समाज उस औरत को ही दोषी करार देता है, उसके पति या ससुरालवालों को कोई कुछ नहीं कहता। कई बाते हैं जो देखने में बहुत मामूली लगती हैं, पर हैं महत्वपूर्ण जैसे कि लड़की अगर घर में है तो उससे कहा जाता है कि पहले पिता या भाई को खाना दो उसके बाद तुम भोजन करना। यह बात आगे जाकर ससुराल में भी जारी रहती है। वहां ससुराल के सभी लोगों को खिला- पिला कर ही घर की बहू अपने लिए दो रोटी खा पाती है। लड़कों से या पतियों से कभी नहीं कहा जाता कि वे अपनी बहन या बीवी के काम में हाथ बंटायें। औरत तमाम उम्र दूसरों की मर्जी पर चलने के लिए मजबूर होती है।

बचपन से जवानी तक मां-बाप या भाई की मर्जी पर, शादी के बाद पति या ससुरालवालों की मर्जी पर और बुढ़ापे में बेटों या पोतों की मर्जी पर निर्भर रहना पड़ता है। उसका अपना कोई वजूद नहीं होता। इन सभी बातों को देखकर मुझे लगा कि इन सवालों को लेकर महिलाओं के बीच काम करना चाहिए।

बचपन से जवानी तक मां-बाप या भाई की मर्जी पर, शादी के बाद पति या ससुरालवालों की मर्जी पर और बुढ़ापे में बेटों या पोतों की मर्जी पर निर्भर रहना पड़ता है। उसका अपना कोई वजूद नहीं होता। इन सभी बातों को देखकर मुझे लगा कि इन सवालों को लेकर महिलाओं के बीच काम करना चाहिए।

 

औरतों की मुसीबतों और उनकी समस्याओं का कोई अंत नहीं। यह सिलसिला जारी रहता है। एक दिन एक ब्राम्हण परिवार की औरत आकर मेरे पास रोने लगी कि मेरी बेटी को कुछ मुस्लिम लड़के उठाकर ले गये हैं। मेरी तो नाक कट गई। अब मैं इस इलाके में नहीं रहूंगी। हालांकि उनकी बेटी वापस मिल गई, पर उन्हें लगता था कि वे इस समाज में कैसे रहें। हमने उन्हें समझाया कि वे लोग सिर्फ तुम्हें परेशान करने के मकसद से तुम्हारी बेटी को ले गये, ताकि तुम इस जगह को छोड़कर चली जाओ। तुम जहां भी जाओगी, तुम्हे ऐसे लोग हर जगह मिलेंगे। तुम भागने के बजाय ऐसे लोगों से मुकाबला करना सीखो। आज वह औरत वहीं पर टिकी- बसी है। उसकी बेटी की शादी भी उन्हीं के समाज में हो गई है। आज उसे महसूस होता है कि उसे सही रास्ता दिखाया गया। औरतों की समस्याओं पर काम करते हुए मैंने पाया कि उच्चवर्गीय महिलाएं अपनी समस्याओं को घर में बरतन कपड़ा धोने वाली औरतों की समस्याओं से अलग हटकर देखती हैं। वे अपने सवालों को आम औरतों के सवालों से जोड़कर नही देखती हैं। नतीजतन उच्चवर्गीय महिलाएं संगठित नही होती हैं जबकि गरीब और निम्न वर्ग की महिलाएं संगठित होकर अपने अधिकारों के लिए लड़ती हैं। मेरे सबसे छोटे बेटे का दो साल पहले सन् 2002 में पच्चीस साल की उम्र में सड़क दुर्घटना में देहांत हो गया। उसकी एक दोस्त थी जिससे वह शादी करने वाला था। लड़की के घरवालों की आपत्ति और नामंजूरी के कारण वह अपना घर छोड़ आई थी। मेरे बेटे के देहांत के बाद उस लड़की के परिवार वाले उसे बुलाने के लिये आये लेकिन लड़की जाना नहीं चाहती थी, तब हमने सोचा कि अगर यह हादसा शादी के बाद होता तो हम क्या करते। इसलिये हमने उसे अपने साथ रहने के लिये कहा। आज वह हमारे साथ हमारे घर के सदस्य की तरह रह रही है। जब हम आम लोगों को और खासकर महिलाओं को आंदोलन में लाने की बात करते हैं तो हम यह भूल जाते हैं कि कोई भी बात सिर्फ एक व्यक्ति से नहीं पूरी हो सकती। इसके लिए एकता की दरकार है। चाहे झोपड़पट्टी में घरों का सवाल हो या राशनकार्ड में अनाज, केरोसीन, चीनी की आपूर्ति का सवाल हो, या राष्ट्रीय स्तर पर भारत बंद जैसे आंदोलन की बात हो, मैं इन तमाम मोर्चो पर और आंदोलनों में शामिल रही हूं। 1989 के भारत बंद मे मेरी बेटी भी शामिल हुई थी और उसने अपनी गिरफ्तारी भी दी थी।

1989 में एक बार मुझे किसी औरत के मुकदमे में गवाही देने के लिए कोर्ट में बुलाया गया। चूंकि मेरा नाम सुगंधि फ्रांसिस था इसलिए मेरे सामने बाइबल रखी गई और मुझसे कहा गया कि आप बाइबल पर हाथ रखकर कसम खाओ। मैने अपने मन में सोचा, जब मैं भगवान या धर्म में विश्वास नहीं रखती तो बाइबल पर हाथ रखकर कसम क्यों खाऊं। मैंने जज से कहा कि मैं भगवान को नहीं मानती, आप किसी और चीज की कसम खाने को कहो। जज ने पूछा कि तुम किस चीज पर विश्वास करती हो। मैंने कहा कि देश के संविधान की किताब हो तो मैं उसे साक्षी मानकर गवाही दे सकती हूं। तब जज ने झुंझलाकर मराठी में कहा – अरे , ह्या बाईला ती घटने ची पुस्तक द्या रे ! ( इस औरत को वह संविधान की किताब दे दो ) धर्म के बारे में बड़े-बड़े लोग कई बातें करते हैं, पर मैंने जो सीखा वह यह कि धर्म एक व्यक्तिगत आस्था की चीज़ है, उसे सड़क पर ले आने से लोगों की जिंदगी बर्बाद ही होती है और इसमें सबसे ज्यादा नुकसान औरत का होता है या यूं कहें कि इस बर्बादी में औरत की ही बलि चढ़ाई जाती है। 1992-93 के दंगों की कुछ घटनाएं मुझे याद आती हैं। मैं और मेरी बेटी अपनेे घर की छत पर बैठकर देखते कि यहां पर कोई दंगा करने या मुस्लिम लोगों को मारने तो नहीं आ रहा है, क्यों कि हमारे घर के ठीक सामने दो मुस्लिमपरिवार रहते थे, जो आज भी हैं। अलग-अलग टोलियां दोनो घरों को लूटने, मारने के मकसद से आयीं। टोली के लड़के हमारे ही इलाके के थे। हमने उनको वहां से वापस लौट जाने को कहा और उन दोनों मुस्लिमपरिवारों की मदद की। ऐसे अवसर पर चाहे गुंडे हों या पुलिस, हमें डर नहीं लगता क्योंकि हम जानते हैं कि हम सही काम कर रहे हैं।महिलाओं के सवालों को लेकर काम करते हुए मैंने सोचा कि इसके लिए किसी संगठन या किसी राजनैतिक विचार धारा से जुड़ने की जरुरत है। जनवादी महिला संघटना में काम करते समय मुझे एक विश्वास और संतुष्टि मिली कि मैं जिस मकसद से काम करना चाहती हूं वह हो रहा है। जब हम रोजमर्रा के सवालों को लेकर आंदोलन करते हैं तो हमें बहुत सीखने को मिलता है। कॉमरेड. बी. टी. रणदिवे कहते थे कि महिलाओं की भागीदारी या सहभागिता के बगैर कोई भी आंदोलन सफल नहीं हो सकता और किसी भी उद्देश्य में सफलता नहीं मिल सकती।

sudha arora

 

 

 

 

सुधा अरोड़ा जानी-मानी कथाकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

1 Comment
  1. Dr sumitra Mehrol says

    भारतीय समाज में स्त्रियों की वास्तविक स्थिति का सटीक बयान करता हुआ रोचक और प्रेरक आत्मकथ्य.. सुगंधी जी के मनोबल, प्रयासों, और सुदृढ़ इरादों के लिए उन्हें साधुवाद… सुगंधी जी की कथा को हम तक पहुंचाने के लिए वरिष्ठ लेखिका सुधा अरोड़ा जी को धन्यवाद

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