Friday, February 27, 2026
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पूर्वांचल का चेहरा - पूर्वांचल की आवाज़

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मुझे निजी ग्लैमर से ज्यादा सांस्कृतिक सामूहिकता पसंद है – राकेश

https://www.youtube.com/watch?v=9JvxqcU3s8o&t=1281sभारत में आंदोलनधर्मी अभिनेता-नाटककार और निर्देशक के रूप में राकेश का नाम बहुत आदर से लिया जाता है। उनके अनौपचारिक और मिलनसार व्यक्तित्व के...

वैचारिकी तिरोहित होती गई और प्रतिनिधित्व का सवाल प्रमुख बनता गया — वीरेंद्र यादव

https://www.youtube.com/watch?v=0e7bZiyCTDE&t=502sसुप्रसिद्ध आलोचक वीरेंद्र यादव समाज में होनेवाली घटनाओं-परिघटनाओं पर अपनी पैनी नज़र रखते हैं। वर्तमान भारत के संक्रमणकालीन और परिवर्तनकामी राजनीति के बदलते केन्द्रकों...

भागीदारी की बात बाहर चाहे जितनी हो लेकिन महिलाओं को घर में ही समेटने की कोशिशें होती हैं !

https://www.youtube.com/watch?v=HR0Aw2ob9qw&t=19sजागृति राही बनारस के सामाजिक कार्यकर्ताओं में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। एक गांधीवादी परिवार से निकलने वाली जागृति को समाज में उतरकर काम...

कोरोना ने साफ़ तौर पर बता दिया कि ईश्वर कुछ नहीं है

https://www.youtube.com/watch?v=Um5zMYiUGoo&t=4sआठवें-नौवें दशक के महत्वपूर्ण कवियों में शुमार मदन कश्यप की कविताओं में एक पूरा दौर झाँकता है। खासतौर से बदलते हुये मनुष्य, मानवीय प्रवृत्तियों...

एक पीढ़ी का अत्याचार दूसरी पीढ़ी की परंपरा बन जाती है – शूद्र शिवशंकर सिंह यादव

https://www.youtube.com/watch?v=ImCWMF3UPXQ&t=1631sशूद्र शिवशंकर सिंह यादव का नाम ही ब्राह्मणवादी व्यवस्था में अपनी जाति पर गर्व करने वालों को असहमत होने और गाली देने के लिए...

कॉम्पटीशन नंबर का प्रेशर बच्चों की ग्रोथ के लिए हानिकारक है

https://www.youtube.com/watch?v=Ofs8bBRFWcs&t=2sश्वेता गुप्ता ने अपने जीवन की पारी की शुरुआत शिक्षिका के रूप में की। शुरू में वे लखनऊ में पढ़ाती थीं लेकिन शादी के...

भारत-पाकिस्तान संबंध और बॉलीवुड की फिल्में

भारत में दो चीजें क्रिकेट और बॉलीवुड बहुत लोकप्रिय है और बात जब भारत पाकिस्तान के बीच आ जाये तो क्लाइमेक्स नये आयाम स्थापित...

जी-20 का संकल्प और आंखिन-देखी सच्चाई (डायरी 1 नवंबर, 2021) 

मेरा अपना अनुमान है कि अगले पचास साल में भारत में औसत तापमान में 4-5 डिग्री का इजाफा हो जाएगा। यह मुमकिन है कि...

ग्लोबल हंगर इंडेक्स को लेकर भी असहिष्णु सरकार

कुपोषण और भुखमरी के यह हालात तब हैं जब राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून(2013) का कवच हमारे पास है जिसके जरिए हम 75 प्रतिशत ग्रामीण आबादी और 50 प्रतिशत शहरी आबादी को खाद्य और पोषण की सुरक्षा दे रहे हैं। इसके अतिरिक्त फरवरी 2006 से अस्तित्व में आई मनरेगा जिसका प्रारंभिक उद्देश्य कृषि क्षेत्र की बेरोजगारी से मुकाबला करना था, आज कोविड-19 के कारण शहरों से वापस लौटे प्रवासी मजदूरों को भी रोजगार मुहैया करा रही है।

‘गैंगस्टर’ पूंजीपतियों के देश में भुखमरी का सवाल  

यह भी समझाना जरूरी है कि भारत में भूख और कुपोषण की समस्या को देखते हुये खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 एक सीमित हल पेश करता ही है, उपरोक्त चारों हकदारियां खाद्य असुरक्षा की व्यापकता को पूरी तरह से संबोधित करने के लिये नाकाफी हैं और ये भूख और कुपोषण के मूल कारणों का हल पेश नही करती हैं।

पाकिस्तान के नाम से आरएसएस के भड़कने का निहितार्थ (डायरी 27 अक्टूबर, 2021)

सियासत की एक खासियत रही है कि इसने अपने मकसद में कभी बदलाव नहीं किया है। हालांकि सियासत ने अपने रूप जरूर बदले हैं।...

भारत भूख पर सवार है

अर्थशास्त्री लुकास चांसेल और थॉमस पिकेटी द्वारा किये गये अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि 1922 के बाद से भारत में आय की असमानता का स्‍तर उच्‍च स्‍तर पर पहुंच गयी है।  इसी प्रकार से इस साल के शुरुआत में ऑक्सफैम द्वारा जारी किये गये रिपोर्ट से पता चलता है कि भारतीयों की महज 10 प्रतिशत आबादी के पास कुल राष्ट्रीय संपत्ति का 77 प्रतिशत हिस्सा है। दरअसल भारत में यह असमानता केवल आर्थिक नहीं है, बल्कि कम आय के साथ देश की बड़ी आबादी स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा जैसे मूलभूत जरूरतों की पहुंच के दायरे से भी बाहर है। 

बिहार के पिछड़ों का शैक्षिक संघर्ष और उपलब्धियां

संघ लोक सेवा द्वारा आयोजित भारतीय सिविल परीक्षा 2020 के परिणाम में शुभम कुमार ने प्रथम स्थान हासिल कर बिहार का मान बढ़ाया है।...

काबुल का फ़ितना

तालिबान वापस आ गये हैं, इस बार पहले से अधिक मजबूती और स्वीकार्यता व वैधता के साथ। नाइन इलेवन के ठीक पहले उनकी यह...

उफ्फ! एक दशक बाद अब आसाम में एक और भजनपुरा डायरी (24 सितंबर 2021)

बाजदफा यह सोचता हूं कि क्या किसी एक मुल्क में एक ही मजहब को मानने वाले लोग हो सकते हैं? यदि हां तो क्या...

‘बलचनमा’ का पुनःपाठ जरूरी है

जयंती पर विशेष नागार्जुन के उपन्यास ‘बलचनमा’ के लेखन-प्रकाशन  के लगभग सात दशक बाद इसका यह  पुनः पाठ महज एक उपन्यास पर पुनर्विचार न होकर...

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