बिहार के पिछड़ों का शैक्षिक संघर्ष और उपलब्धियां

रामनरेश यादव

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संघ लोक सेवा द्वारा आयोजित भारतीय सिविल परीक्षा 2020 के परिणाम में शुभम कुमार ने प्रथम स्थान हासिल कर बिहार का मान बढ़ाया है। एक बार फिर से बिहार अपनी मेधा शक्ति के उच्चस्तरीय प्रदर्शन के कारण सुर्खियों में है। हालांकि यह पहला अवसर नहीं है जब कोई बिहार का छात्र सर्वोच्च सेवा में प्रथम आया हो। 1960 से लेकर अब तक बिहार से सात छात्र इस गौरवपूर्ण उपलब्धि को हासिल कर चुके हैं। लेकिन यह पहला अवसर है कि कोई मध्यवर्ती किसान वर्ग का कोई विद्यार्थी इस मुकाम पर पहुंचा हो। शुभम के परीक्षा परिणाम से गैर-सवर्ण जातियों में खुशियों का माहौल है, वहीं संकीर्ण मानसिकता के लोगों की मन को पिछड़ों की यह बढ़त सुहा नहीं रहा है। ओबीसी कुशवाहा समाज के इस छात्र की अप्रतिम सफलता से पिछड़े-दलित वर्ग के छात्रों में आशा का संचार हुआ है तथा इस वर्ग के छात्रों का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर है। हर कोई एक-दूसरे को बधाई संदेश प्रेषित कर रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी ट्वीट कर शुभम को बधाई दी है। बिहार विधानपरिषद् के सभापति अवधेश नारायण सिंह ने शुभम को सम्मानित किया है।
          यूपीएससी टॉपर शुभम कुमार कटिहार के रहने वाले हैं। उनके पिता बैंक मैनेजर तथा मां गृहिणी हैं। उनके माता-पिता को अपने मेधावी पुत्र की शिक्षा के लिए बड़े जतन और त्याग करने पड़े हैं।‌ अपनी सुख सुविधाओं को तिलांजलि देकर अपने पुत्र की शिक्षा के लिए उन्होंने कोई कोर कसर बाकी नहीं रखा था। शुभम ने बताया कि उन्होंने दसवीं विद्या विहार रेजिडेंशियल स्कूल पूर्णिया से तथा 12वीं चिन्मया विद्यालय बोकारो से पास किया है। शुभम ने 2018 में आईआईटी मुंबई से सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की है।
        किसी समाज की उन्नति का पैमाना उसके शिक्षा के स्तर से मापा जाता है। रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने कहा था, ‘मेरा मानना है कि भारत के कलेजे पर गरीबी का जो बोझ पड़ा है, उसकी एकमात्र वजह है अशिक्षा। ‘सामाजिक प्रगति में शिक्षा का केन्द्रीय महत्त्व है। जब इसे रूढ़िवादी कारणों से उचित स्थान नहीं मिलता है तो समाज की आकांक्षाएं राजनीतिक परिवर्तन के माध्यम से प्रस्फुटित होती हैं। पिछले सदी के अंतिम दशक में हुए पिछड़ों के राजनीतिक उभार के साथ हुए परिवर्तन को वंचित समाज के लिए शिक्षा के क्षेत्र में प्रस्थान बिंदु माना जा सकता है। ऐसा अक्सर कहा जाता है कि बिहार में शिक्षा का स्तर पिछले तीन दशकों में गिरता गया है। लेकिन आंकडे़ और परिणाम कुछ और ही ईशारा करते हैं। जनगणना के आंकड़ों का विश्लेषण किया जाए तो स्थिति बिलकुल उलट है। 1981-91 के दशक में बिहार के साक्षरता दर में 4.82% की वृद्धि हुई थी जबकि उसके बाद के दशकों में यह रफ्तार दोगुनी-तीगुनी होती गई। मंडल के दौर 1991-2001 के दशक में साक्षरता वृद्धि दर 10.36% तथा 2001-2011 के दशक में 14.41% रही है। इन आंकड़ों में छुपी शैक्षिक चेतना पर मंडल युग की राजनीतिक जागरूकता की छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। परन्तु साक्षरता दर की वृद्धि से बिहार के शिक्षा व्यवस्था के स्तर को मापना सही नहीं होगा। बिहार के अभिभावकों को अपने बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए बड़े पापड़ बेलने पड़ते हैं। माता-पिता अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा अपने होनहारों की शिक्षा के लिए दांव पर लगा देते हैं।

यूपीएससी टॉपर शुभम कुमार कटिहार के रहने वाले हैं। उनके पिता बैंक मैनेजर तथा मां गृहिणी हैं। उनके माता-पिता को अपने मेधावी पुत्र की शिक्षा के लिए बड़े जतन और त्याग करने पड़े हैं।‌ अपनी सुख सुविधाओं को तिलांजलि देकर अपने पुत्र की शिक्षा के लिए उन्होंने कोई कोर कसर बाकी नहीं रखा था। शुभम ने बताया कि उन्होंने दसवीं विद्या विहार रेजिडेंशियल स्कूल पूर्णिया से तथा 12वीं चिन्मया विद्यालय बोकारो से पास किया है। शुभम ने 2018 में आईआईटी मुंबई से सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की है।

बिहार का अतीत शिक्षा के क्षेत्र में गौरवशाली हुआ करता था। प्राचीन काल में यहां नालंदा और विक्रमशीला विश्वविद्यालय हुआ करते थे, जहां के परिसर देसी-विदेशी शिक्षार्थियों से आबाद रहा करते थे। फिर ऐसा भी दौर आया जब शूद्रों-अतिशूद्रों को शिक्षा के अधिकार से वंचित रखा गया। अंग्रेजी शासन के दौर में यह शिकंजा ढीला जरूर हुआ परंतु पर्याप्त संख्या में स्कूल नहीं होने से वंचित जमात की बड़ी आबादी के लिए शिक्षा सपना ही बना रहा। भारतीय गणतंत्र की स्थापना के साथ ही पिछड़े वर्गों में उत्साह का संचार हुआ था वह जल्द ही मोहभंग का शिकार होने लगा था। प्रारंभिक शिक्षा को खास तवज्जो नहीं मिलना इसका कारण बना। शिक्षा प्राप्त करने के लिए अवसर‌ की कमी बड़ी बाधा थी। शिक्षा के सार्वभौमिकरण नहीं होने से खासकर वंचित तबकों पर इसका नाकारात्मक असर पड़ा। अभिभावक शिक्षा के प्रति उदासीन रहने लगे तथा पारंपरिक पेशों में उलझे रहे या मजदूर बनने को अभिशप्त रहे। संख्यात्मक और गुणात्मक रूप से पिछड़े वर्गो को उच्च शिक्षा के क्षेत्र में दस्तक देना चाहिए था वह दूर की कौड़ी बना हुआ था। अमर्त्य सेन इस निराशजनक स्थिति के लिए शासक वर्ग की वर्णव्यवस्था से अनुप्रेरित शिक्षा नीति को जिम्मेवार ठहराते हैं।
        बीसवीं सदी का अंतिम दशक में बिहार समाजिक, राजनीतिक और शैक्षिक जगत सहित अनेक क्षेत्रों में युगांकारी परिवर्तन का गवाह रहा है। बिहार में 1990 में पिछड़ों की वर्चस्व वाली सरकार बनी तब जाकर निराशा का यह दौर समाप्त हुआ। वंचित समाज की राजनीतिक चेतना का असर शिक्षा के क्षेत्र में भी दिखने लगा। पिछड़ों के राजनीतिक सशक्तीकरण के उस दौर में वंचित समाज के छात्रों का आत्मविश्वास लौटने लगा था। बड़ी संख्या में छात्र उच्च शिक्षा के क्षेत्र में पहुंचने लगे थे। अंगुठा काटने के लिए बदनाम द्रोणाचार्यों की जमात थोड़े सहमे-सहमे रहने लगे थे। दशकों से शिक्षण संस्थानों पर कुंडली मारे गिरोह बिखर गए थे। भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता आने लगी थी। अब वंचित समाज के छात्र निर्भय होकर शहरों में रह सकते थे। उस दौर में शहरों का जनांकिकी समावेशी होने लगा था। पिछड़े वर्गों का एक तबका शहरों में आवास बनाने लगा था, जिससे शहरों में रहकर पढ़ाई करने में गैर-सवर्ण छात्रों को सुविधा होने लगी थी। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ों की बड़ी मात्रात्मक दस्तक को शिक्षण संस्थान संभाल नहीं पाए थे। उसी दौर में राष्ट्रीय शिक्षा नीति,1986 के क्रियान्वयन से नीजी शिक्षण संस्थानों की बाढ़ आ गई थी। भारत और इंडिया की खाई बढ़ने लगी थी। कोचिंग और ट्यूशन को अत्यधिक महत्व मिलने लगा था। वंचित वर्ग की मध्यम वर्गीय जातियों के छात्रों और अभिभावकों का शैक्षिक उत्साह खतरे में पड़ता दिखाई दे रहा था। लेकिन यह वर्ग शिक्षा की डगर पर एक बार चल पड़ा तो पीछे लौटना मुनासिब नहीं समझा। इस वर्ग के एक तबके ने हर चीज दांव पर लगाया, खेती-पथारी और पालतु पशु से लेकर स्वयं तक। लेकिन बच्चों की पढ़ाई के लक्ष्य को ओझल नहीं होने दिया। इस वर्ग को यह समझ आ चुका था कि उनके संततियों की उन्नति का रास्ता शिक्षा के प्रांगण से होकर गुजरता है। वे हार नहीं मानने वाले थे। यह वर्ग ठान चुका है कि आधी रोटी खाएंगे, फिर भी स्कूल जाएंगे

परिणाम आज सबके सामने है। वंचित समाज के बच्चे आज ज्ञान-विज्ञान और अनुसंधान के हरेक क्षेत्र में अपने मेधा शक्ति का लोहा मनवा रहे हैं। हालांकि अभी भी इस वर्ग की एक बड़ी आबादी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित है। जिस दिन वंचित बहुजनों की विशाल आबादी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पाने की हसरत पूरी हो जाएगी, उस दिन बिहार के पिछड़ेपन का कलंक भी मिट जाएगा और बिहार सिर उठाकर प्रगति के रास्ते पर चल पड़ेगा।

 

केन्द्रीय सेवाओं में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए 27% आरक्षण की घोषणा ने छात्रों के बीच जो उमंग और उत्साह की लहर पैदा की उसका सुखद परिणाम अब सामने आ रहा है। शुभम कुमार का टापर बनना पिछड़ों की उस जागृति का परिणाम है, जो मंडल दौर में प्रारंभ हुआ तथा अब परवान चढ़ रहा है। मंडल आरक्षण की घोषणा के बाद बड़ी संख्या में ओबीसी छात्र यूपीएससी सहित उच्च स्तरीय परीक्षाओं में शामिल होने लगे। मंडल आरक्षण लागू होने से पहले के दौर की उच्चस्तरीय परीक्षाओं में मध्यवर्ती जातियों के छात्र कम ही सफल हो पाते थे, जिसका कारण था आत्मविश्वास की कमी और भेदभाव का सांस्थानिक रूप। मंडल पूर्व दौर में मध्यवर्ती जातियों के छात्रों का सफल होना अपवाद माना जाता था। लेकिन मंडल आरक्षण लागू होने के बाद इस स्थिति में तेजी से बदलाव आया है। आरक्षण के संबल से भर्ती परीक्षाओं में जोखिम लेने वाले छात्रों की संख्या में न सिर्फ अभूतपूर्व वृद्धि हुई है बल्कि संतोषप्रद संख्या में सामान्य सूची में भी जगह बना रहे हैं। मंडल आयोग के चेयरमैन बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल ने रिपोर्ट में ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देने का सुझाव देते हुए लिखा था- ‘सामाजिक पिछड़ेपन को दूर करने की जंग को पिछड़ी जातियों के ज़हन में जीतना ज़रूरी है। भारत में सरकारी नौकरी पाना सम्मान की बात है। ओबीसी वर्ग की नौकरियों में भागीदारी बढ़ने से उन्हें यकीन होगा कि वे सरकार में भागीदार हैं। पिछड़ी जाति का व्यक्ति अगर कलेक्टर या पुलिस अधीक्षक बनता है, तो ज़ाहिर तौर पर उसके परिवार के अलावा किसी और को लाभ नहीं होगा, पर वह जिस समाज से आता है, उन लोगों में गर्व की भावना आएगी, उनका सिर ऊंचा होगा कि उन्हीं में से कोई व्यक्ति ‘सत्ता के गलियारों’ में है। ‘शुभम कुमार का टॉप करना पिछड़ों की प्रगति की दिशा में एक पड़ाव भर है। आगे हमें ऐसी सफलता की खबर सुनने की आदत डालनी होगी।

     परिणाम आज सबके सामने है। वंचित समाज के बच्चे आज ज्ञान-विज्ञान और अनुसंधान के हरेक क्षेत्र में अपने मेधा शक्ति का लोहा मनवा रहे हैं। हालांकि अभी भी इस वर्ग की एक बड़ी आबादी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित है। जिस दिन वंचित बहुजनों की विशाल आबादी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पाने की हसरत पूरी हो जाएगी, उस दिन बिहार के पिछड़ेपन का कलंक भी मिट जाएगा और बिहार सिर उठाकर प्रगति के रास्ते पर चल पड़ेगा।
उच्च पदों पर भर्ती परीक्षाओं में पिछड़ों की यह दस्तक उतरोत्तर बढ़ता जाएगा। लेकिन कई चीजें अब भी इस वर्ग के खिलाफ जा रही हैं, जिनमे से एक हैं साक्षात्कार के अंक देने में वंचित समाज के छात्रों से भेदभाव। यह भेदभाव 1950 से जारी है। भारतीय गणराज्य कें प्रथम केन्द्रीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा में अछूतानंद दास को लिखित परीक्षा में सर्वाधिक अंक मिले थे, परंतु साक्षात्कार में औसत से भी कम अंक दिया गया। फलस्वरूप वे आजाद भारत के पहले टापर बनने से वंचित रहे। शुभम के साथ भी यही हुआ है। शुभम को पहले दस स्थान प्राप्त करने वाले सफल अभ्यर्थियों में सबसे कम अंक हासिल हुआ है। क्या यह अनायास हुआ है? सोचनीय बात है। शीर्ष पदों पर बैठे लोगों को जातीय पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर प्रतिभाओं को पुष्पित पल्लवित होने का मौका देना चाहिए तभी हम समृद्ध राष्ट्र की कल्पना को साकार कर सकते हैं।
मीडिया रिपोर्ट

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अभी बिहार में कक्षा 1 से 12 वीं कक्षा के लिए लगभग 78,000 स्कूल हैं, जिसमें कुल 2.5 करोड़ छात्र हैं। विभाग ने चार बिंदुओं की पहचान की है, जहां से बच्चे अक्सर ड्रॉप आउट करते हैं। ड्रॉप आउट के अधिकतर मामले कक्षा 5वीं व 8वीं के बाद मिले हैं। जब एक छात्र को क्रमशः प्राथमिक से माध्यमिक और माध्यमिक से उच्च माध्यमिक कक्षाओं में बदलना पड़ता है। वहीं कक्षा 10 और कक्षा 12 बोर्ड के बाद भी ये मामले देखने को मिलते हैं।

शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव संजय कुमार ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया, ‘कक्षा 1 से 12 वीं कक्षा तक के छात्रों के नामांकन में गिरावट हमारे लिए चिंताजनक विषय है। राज्य सरकार के 2018-19 के लेटेस्ट आंकड़ों के अनुसार, हमने कक्षा 1 में 24,03,526 छात्रों का नामांकन किया था। लेकिन कक्षा 10 में यह संख्या गिरकर 15,37,628 हो गयी। करीब 9 लाख की यह गिरावट दर्ज की गयी है। वहीं कक्षा 12 वीं में यह 6,31,379 तक पहुंच गयी है। प्रधान सचिव ने कहा कि यह संख्या कक्षा 12 के बाद 4 लाख से भी कम छात्रों तक पहुंच गई।

रामनरेश यादव अध्यापक और प्रसिद्ध लेखक हैं। मधुबनी में रहते हैं।

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