चोट जितनी बड़ी होती है, वह उतनी ही अपनी चुप्पी के खोल में सिमटी होती है- 2 ( मन्नू भंडारी – कुछ स्मृतियों के नोट्स

सुधा अरोरा

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दूसरा हिस्सा 

राजेंद्र जी की डायरी  —

शायद मेरी इस मानसिक छटपटाहट को मन्नू समझ रही है। वह बैठकर बातें करना चाहती है, और मैं टाल देता हूं। एक बार तो उसने कहा था कि अगर आपको लगता है कि इस जड़ता और अवरोध से आप यहां से बाहर जाकर निकल सकते हैं तो नगीना के साथ कुछ दिन रह लीजिए … दया और करुणा ही हुई सुनकर… यह बात उसने किस यातना बिन्दु पर पहुंचकर कही होगी …। लगता मुझे भी है कि शायद इस अंधे कुंए से वही साथ निकाल सकता है मगर हिम्मत नहीं पड़ी। मैं नगीना के साथ रहने दस दिनों को जाऊंगा यह कह कर मैं निकल सकता हूं ? चुपचाप चोरी छिपे जाऊं और भला मानुस बन कर लौट आऊं, यह तो हो सकता है। यही शायद होता भी रहा है। मगर कह कर खुलेआम जाना कैसा लगता है जाने … चला भी गया तो शाद लौटने का मुंह नहीं रहेगा। यहां भी सब चीजें, रहना – व्यवहार नार्मल नहीं रह पायेंगे ..       तद्भव: 11, पृष्ठ – 181

मन्नू जी की पंक्तियां 

मैं जानती हूं कि अपनी हर ग़लती और कमी को ढंकने के लिए शाब्दिक चमत्कारों में लिपटे सिद्धान्तों के ये ऐसे टोटके हैं, जिनका जादू सब पर चलेगा और ऐसा चलेगा कि सब वाह-वाह कर उठेंगे। आहत तो केवल वे ही हैं, जिन्होंने भोगा है। मैं यह भी जानती हूं कि राजेन्द्र के पाठक-प्रशंसक, मित्र-परिचित शायद ही कोई मेरे इस लिखे को गले उतार पाए – जिसमें न शाब्दिक चमत्कार है न साहित्यिक-सौष्ठव बल्कि जो राजेन्द्र के व्यक्तित्व के उस पक्ष को उजागर करता है जिससे वे बिलकुल अपरिचित हैं। कौन जाने उन्हें विश्वास भी न हो। हो सकता है कि राजेन्द्र भी इससे काफ़ी आहत हों, लेकिन समय और स्थितियों न जिन घावों पर पपड़ियां जमा दी थीं, उन्हें खुरचने की पहल तो राजेन्द्र ने ही की – अपने आत्मकथ्य में इस प्रसंग को उजागर करके, सो भी अपने नज़रिए से। ये शायद भूल ही गए कि खुरचे हुए घावों से तो केवल मवाद ही बहेगा !

आखिर एक संस्कारी जैन परिवार से आयी साठ साल की औरत का शादी के पैंतीस साल बाद अपने पति को अपने से अलग करने का निर्णय बहुत आसान तो नहीं रहा होगा। आज जब युवा लड़कियों को झट से अलगाव के निर्णय पर पहुंचता देखतें हैं तो हैरानी नहीं होतीं क्योंकि उनकी सहन करने की ताकत उतनी पावरफुल (कोलकाता में मेरी एक बंगाली कामवाली यह अक्सर कहा करती थी) नहीं रह गई है पर मन्नू जी की पीढ़ी के लिए ऐसा निर्णय सर से कितना पानी गुजर जाने के बाद  सेचुरेशन के किस बिंदु पर पहुँचकर संभव हो पाया होगा, समझ पाना आसान नहीं है।

देख, मैंने इतना भी नहीं लिखा होता - यह जो पूरक प्रसंग में तद्भव के लिए लिखा, अगर राजेंद्र ने इस कदर अपने प्रेम प्रसंग के बारे में आधा अधूरा सच खोलकर न लिखा होता। वह तो मैंने आहत होकर लिखा था। ... और किताब में भी न देती ... पर जब राजेंद्र की किताब में आ गया तो फिर मुझे कौन सी हिचक बाकी रह गई इसे शामिल न करने की ? ... सो मैंने किताब में दे दिया। बस्स !

जब भी वे मुंबई आतीं और मेरे पास रुकतीं, अक्सर कहती रहतीं आज तक हमेशा यही कहती चली आई हैं -‘मैं इन सबसे उबर आई हूं, अब मुझे कोई तकलीफ नहीं।’ मुझसे कहने के बहाने से वे शायद अपने आप को भी समझाती चलती थीं – दूसरे के माध्यम से स्वयं अपने को ‘ऑटो सजेशन’ देना। तब मुझे अक्सर याद आता है – मनोविश्लेषक कहते हैं, आपमें भीतर तक डिप्रेशन धंसा रहता है पर आप उसका कारण किसी दूसरी-तीसरी चीज या रोजमर्रा की घरेलू मुश्किलों को ठहराते हैं क्योंकि आप खुद यह मानना नहीं चाहते कि यह जिस व्यक्ति के रिजेक्शन के कारण है, वह इसके मूल में है। इसे स्वीकार करना एक हार का अहसास देता है इसलिए हम उस हार को स्वीकार करने से इनकार करते हैं। …..और लगातार अपने हंसते खिलखिलाते बेपरवाह मुखौटे को अपने चेहरे पर बनाए रखते हैं, दूसरों से ज्यादा खुद को भरमाए रखने के लिए। इस मुखौटे को उतरने ही नहीं देते और यह एक स्थायी मुखौटा बन जाता है – जिसे मनोचिकित्सकीय शब्दावली में मास्क्ड डिप्रेशन कहते हैं। यह डिप्रेशन, वे मानने को कभी तैयार नहीं होंगी, पर उनमें लंबे अरसे तक रहा। हां, अब ज़रूर वे इससे उबर चुकी हैं और अपने एकांत को बड़े एहतियात से अपने इर्दगिर्द बनाए रखना चाहती हैं। यह भी सच है कि 1994 में राजेंद्र जी से अलग होने के बाद ही मन्नू जी ने अपने लिए जीना सीखा। बावजूद इसके कि हंस की संपादकीय कुर्सी के कारण राजेंद्र जी के इर्द गिर्द सहयोगियों और चाटुकारों की भी जमात बढ़ती गयी और मन्नू जी लगातार एकाकी होती चली गयीं ।

जब से मुबई-दिल्ली टेलीफोन सेवा लोकल हो गई है और बिना ज़ीरो लगाए स्थानीय फोन से भी दिल्ली से मुंबई फोन किया जा सकता है, मन्नू जी और मेरी दिन में कम से कम दो बार तो बात हो ही जाती है। रोज़ सुबह वे अपनी पिछले दिन की तकलीफें बयान करेंगी – नींद ठीक से आयी या नहीं आई। रात भर खुजली मचती रही, कंघी लेकर पूरी चमड़ी छिल गई। रात को घुटने का दर्द बढ़ गया। कभी सांस की तकलीफ बढ़ गई। सुबह आठ गोलियां, रात को आठ गोलियां। तंग आ जाती हूं। इस तरह के शरीर को ज़िन्दा रखने का फायदा क्या है।

लच्छेदार शब्दावली में अपनी ईमानदार स्वीकृतियों (गुनाहों) की ऐसी खूबसूरत लड़ी सजा देता है कि कला के ज़रदोज़ी वाले कीमखाबी लिहाफ के भीतर उसके सारे गुनाह भी छिप जाते हैं, पाठक वाह वाह कर उठता है। जो नहीं छिपते, वे स्वीकार के परचम तले बेहद आकर्षक लगने लगते हैं।

फिर सुबह – हर रोज़ – लिखने का इरादा करके कलम लेकर बैठती हैं -‘आज मैं अपनी लघुकथाएं पूरा करूंगी ही। आज मुझे  कमलेश्वर पर संस्मरण लिखना है। आज महादेवी पर लिखना है। महादेवी को तो इतना पढ़ाया है, पढ़ा है। पर सारा दिन कलम लेकर बैठी रही। एक अक्षर लिखा नहीं गया। फिर शाम को मैं रोने लगी।’ रोने की बात वैसे वे कम ही बताती हैं पर कलम लेकर सारा दिन बैठने और उसके बावजूद न लिख पाने की तकलीफ उनके लिए सारी मानसिक-शारीरिक तकलीफों से बड़ी है। जब कलम चलती थी, इस कलम के बूते पर ही अपने पति की दी हुई उपेक्षा, हृदयहीनता और बड़े से बड़े भावनात्मक आंधी तूफान को भी नज़रअंदाज़ कर पाई। उनमें अद्भुत जिजीविशा हमेशा मौजूद रही। प्रतिकूल परिस्थितियां इंसान में हमेशा  स्थितियों से लड़ने का, जीने का हौसला भरती हैं। यही मन्नू जी के साथ हुआ।

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मन्नू जी का व्यक्तिगत जीवन इतनी संष्लिश्टताओं से भरा है कि बहुत बार इस तानेबाने का हुजूम सा उलझ जाता है जिसे सुलझाने की कोशिश एक शोध से कम नहीं है। एक पढ़ी लिखी आत्मनिर्भर औरत क्यों बंद बक्से का ताला खोलती है और भीतर रखी प्रेम में सराबोर इबारतें पढ़कर आंसुओं से भीगती है, पर चाभी वैसे ही उसी जगह रखकर इसका आभास नहीं होने देती कि उसने ऐसा कुछ भी पढ़ा गुना है जिसने उसे भीतर तक छलनी कर दिया है, दिमाग में टनटन सी बजती उन शाब्दिक किरचों ने दिमाग की नसों को लहूलुहान कर दिया है। अन्ततः नसें उस तनाव को न झेल पाकर बगावत कर देती हैं और वह औरत एक दिन पढ़ाते हुए क्लास से बाहर निकल कर बेहोश हो जाती है। डायग्नोज़ होता है कि न्यूरोलजिया है। ऐसी  बीमारी जिसका कोई इलाज ही नहीं। बस, सेडेटिव खा खाकर अपने आप को सुलाए रखो, नसों को संज्ञाहीन कर दो । एस्थमा के नियमित अटैक और नेबोलाइज़र लेते रहना, न्यूरोलजिया में नर्व के भयंकर दर्द से मेजेटॉल 900 से 1300 मिलि ग्राम तक की डोज़ लेना – डॉक्टर खुद कहते हैं कि इतनी भारी मात्रा में दवा लेने से दिमाग शून्य पर नहीं, माइनस पर पहुंच जाता है। इन सबके बावजूद अपने विल पावर के बूते मन्नू जी का अपने को ज़िन्दा रख पाना एक चमत्कार से कम नहीं है।

मनोविश्लेषक कहते हैं, आपमें भीतर तक डिप्रेशन धंसा रहता है पर आप उसका कारण किसी दूसरी-तीसरी चीज या रोजमर्रा की घरेलू मुश्किलों को ठहराते हैं क्योंकि आप खुद यह मानना नहीं चाहते कि यह जिस व्यक्ति के रिजेक्शन के कारण है, वह इसके मूल में है। इसे स्वीकार करना एक हार का अहसास देता है इसलिए हम उस हार को स्वीकार करने से इनकार करते हैं। .....और लगातार अपने हंसते खिलखिलाते बेपरवाह मुखौटे को अपने चेहरे पर बनाए रखते हैं, दूसरों से ज्यादा खुद को भरमाए रखने के लिए।

मन्नू जी के आत्मविश्वास की किरचें बिखर चुकी हैं। ऐसी ही स्थिति में चौदह सालों में मन्नू जी अपनी तथाकथित आत्मकथा पूरी करती हैं – अपने लेखन से पूरी तरह निराश।

लगभग दो़ साल पहले मन्नू जी के पास दिल्ली गई थी तो उनकी किताब एक कहानी यह भी (तथाकथित आत्मकथा) की पांडुलिपि का फाइनल प्रूफ राजकमल से आया रखा था। रात को मैंने पढ़ने के लिए पांडुलिपि ली और सुबह चार बजे तक पढ़ती रही। पढ़ने के बाद मैंने उसी समय उन्हें एक खत लिखा क्योंकि मन्नू जी सो रही थीं और भूलने की आदत तो मुझे भी उनसे विरासत में मिल गई है, सो मेरी  प्रतिक्रिया उनके उठने का इंतजार नहीं कर सकती थी। उस किताब को पढ़ने के बाद मैं बेहद डिस्टर्ब हुई थी कि अपने पतिदेव को विशेषण तो उन्होंने जहां मौका लगा, थमा दिए, वैसे ही जैसे उनके साथ रहते हुए गाहे बगाहे गुस्से में कुछ भी बोल जाया करती थीं पर कारण और घटनाओं का ब्यौरा तो सिरे से नदारद कर दिया। अब पाठक उनके दिए गए विशेषणों का, अपने पति को बाहर करने का औचित्य कहां से ढूंढेगा?

दूसरे दिन उनसे इस विषय में सारा दिन लंबी बात होती रही पर उनकी एक ही जिद -‘मैं चौदह साल से इस एक किताब पर काम कर कर के तंग आ चुकी हूं। बस, किसी तरह मर मरा के पूरी कर ली है, अब तू उसमें यहां वहां जोड़ने को कह रही है।’

और फिर एक ही बात की रट कि यह मेरी आत्मकथा नहीं है, यह तो मेरी लेखकीय यात्रा है ।

मैंने कहा -‘मन्नू दी, प्रकाशक इसे आत्मकथा कहकर ही बेचेगा और पाठक आपसे सवाल नहीं पूछ पाएगा तो आपके निर्णय पर संदेह करेगा, आप खुलकर तो लिखिए।’

यह भी सच है कि चोट जितनी बड़ी होती है, वह उतना ही अपनी चुप्पी के खोल में सिमटी होती है। जो चोट देता है, उसके लिए शब्दजाल का एक खूबसूरत मोहक आवरण (मायाजाल) रचना बहुत आसान होता है। जो आहत होता है, उसे पीड़ा से बाहर आने में बरसों लग जाते हैं।

मन्नू जी का वह सख्त निर्णयात्मक स्वर तो मैं कभी भूल नहीं सकती – ‘देख, मैंने इतना भी नहीं लिखा होता – यह जो पूरक प्रसंग में तद्भव के लिए लिखा, अगर राजेंद्र ने इस कदर अपने प्रेम प्रसंग के बारे में आधा अधूरा सच खोलकर न लिखा होता। वह तो मैंने आहत होकर लिखा था। … और किताब में भी न देती … पर जब राजेंद्र की किताब में आ गया तो फिर मुझे कौन सी हिचक बाकी रह गई इसे शामिल न करने की ? … सो मैंने किताब में दे दिया। बस्स !! इससे ज्यादा और कुछ नहीं लिखूंगी मैं।’

मेरी आधा दिन उन्हें समझाने की कवायद, मेरी तमाम दलीलें कोई काम नहीं आईं – दो -चार लाइनें उन्होंने जोड़ीं, कुछ लंबे लंबे वाक्यों को और पैराग्राफ को तोड़ा, बस। बाकी जस का तस गया। वे अच्छी तरह जानती थीं – वे अपने को इससे ज्यादा खोल नहीं पाएंगी। उनकी शालीनता, उनके पारंपरिक संस्कार, शायद अपने गलत चुनाव का अपराधबोध और उससे जुड़ा हार का अहसास भी – आड़े आ रहा था । उन्हें बदला नहीं जा सकता था ।

यह भी सच है कि चोट जितनी बड़ी होती है, वह उतना ही अपनी चुप्पी के खोल में सिमटी होती है। जो चोट देता है, उसके लिए शब्दजाल का एक खूबसूरत मोहक आवरण (मायाजाल) रचना बहुत आसान होता है। जो आहत होता है, उसे पीड़ा से बाहर आने में बरसों लग जाते हैं। मन्नू जी ने चौदह साल पहले आत्मकथा लिखनी शुरू की। उसका एक हिस्सा समकालीन हिन्दी साहित्य में छपा भी। यह हिस्सा वहां आकर रुक गया, जहां से उनके व्यक्तिगत जीवन की निजी तकलीफ की एक रेखा उभर कर सामने आती है। उसके बाद मन्नू जी की कलम एक लंबे अरसे तक रुकी रह जाती है। लेकिन वह कलम कभी न कभी तो आगे चलेगी ही, इस पूर्वाभास से झट दूसरा पक्ष न सिर्फ सक्रिय हो जाता है बल्कि स्वेच्छा से ‘कन्फेशन बॉक्स’ में जाकर खड़ा हो जाता है और लच्छेदार शब्दावली में अपनी ईमानदार स्वीकृतियों (गुनाहों) की ऐसी खूबसूरत लड़ी सजा देता है कि कला के ज़रदोज़ी वाले कीमखाबी लिहाफ के भीतर उसके सारे गुनाह भी छिप जाते हैं, पाठक वाह वाह कर उठता है। जो नहीं छिपते, वे स्वीकार के परचम तले बेहद आकर्षक लगने लगते हैं। यार दोस्त सिर माथे पर उठा लेते हैं क्योंकि सभी अपनी चादरों के सूराखों को ऐसे ही ढंकना चाहते हैं। फिर चढ़ते सूरज को नमस्कार करने का चलन सदियों से है। राजेंद्र यादव का यह कीमखाबी लिहाफ मुड़ मुड़ के देखता हूं नाम से ‘तोते की जान’ के तमगों से लैस होकर बाजार में आ जाती है।

क्रमशः

sudha arora

 

 

 

 

सुधा अरोड़ा जानी-मानी कथाकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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