Friday, May 24, 2024
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जातिवादी समाज ने चिड़ियों की भी जाति बना दी है

नवंबर 2018 किसी दोपहर को मैं अपने गाँववाले घर के बरामदे में बैठकर निठल्ले चिंतन में मशगूल था कि सामने निगाह पड़ी और बरबस ठहर गई। मैंने देखा कि एक छोटी गौरैया बरामदे की सीढ़ियों पर रखी बाल्टी में मौजूद पानी को पीने के लिए प्रयास कर रही थी। शायद पानी की सतह उसकी चोंच […]

नवंबर 2018 किसी दोपहर को मैं अपने गाँववाले घर के बरामदे में बैठकर निठल्ले चिंतन में मशगूल था कि सामने निगाह पड़ी और बरबस ठहर गई। मैंने देखा कि एक छोटी गौरैया बरामदे की सीढ़ियों पर रखी बाल्टी में मौजूद पानी को पीने के लिए प्रयास कर रही थी। शायद पानी की सतह उसकी चोंच की पहुँच से दूर थी। मैं चुपके से दबे पाँव सीढ़ियों के पास बाएं खंभे की ओट में खड़ा हो जाता हूँ ताकि इस दृश्य को अपने मोबाइल में कैद कर सकूं। सावधानी से बिना हिले-डुले अपने मोबाइल से दो तस्वीरें खींच पाने में कामयाब हो जाता हूँ। गोरैया ने शायद अपनी प्यास बुझाने में सफलता पा ली थी क्योंकि वह उड़कर कहीं जा चुकी थी।अब मेरी चिंतन दिशा मुंबई की ओर मुड़ जाती है। पिछले कुछ वर्षों में यह पाया गया है कि महानगरों/शहरों में गौरैया और उसकी जैसी अन्य प्रजातियों के पक्षियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। कहा जा रहा है कि महानगरों/शहरों में लगे हजारों मोबाइल टॉवरों से निकलनेवाली घातक विकिरणों (रेडिएशन) से ये छोटे पक्षी असमय ही काल-कवलित हो जाते हैं। मोबाइल टावरों से निकलनेवाले रेडिएशन के प्रभाव को लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं और मामला न्यायालय और पर्यावरण नियामकों तक पहुँच गया है। कारण चाहे जो भी हो गौरैया जैसे मासूम और छोटे पक्षियों की हमारे महानगरों/शहरों से बढ़ती अनुपस्थिति वास्तव में चिंता और अफ़सोस की बात है। शुक्र है कि गांवों-देहातों में गौरैया,कोयल, तोते, कबूतर और मोर जैसे तमाम पक्षी अभी भी मौजूद हैं।

गुलाबचंद यादव

पानी पीने के लिए कोशिशें करती गौरैया को देखना मेरे मन को गुदगुदा जाता है। मैं सोचता हूँ जब एक नन्हीं गौरैया अपनी प्यास बुझाने के लिए इतना यत्न/जद्दोजहद कर सकती है तो हम मानव अपनी जरूरतों/लक्ष्यों को पूरा करने के लिए पूरा प्रयास क्यों नहीं कर सकते (ऐसे अभागों में इन पंक्तियों का लेखक भी शामिल है)? क्यों हम बहुत जल्दी हार मान लेते हैं या “शॉर्टकट” के चक्कर में पड़ जाते हैं। शायद हमने अपनी जरूरतें/आकांक्षाएं इस सीमा तक बढ़ा ली हैं कि उसकी पूर्ति हमें हमेशा अधूरी या अपर्याप्त ही लगती है। पशु-पक्षियों में होड़, बैर और लोभ-लालच बहुत कम होता है और शायद इसीलिए वे अपने संक्षिप्त जीवन को भी पूर्णता से जी लेते हैं।

मेरी माताजी पास बैठी हैं और हम सुबह की गुनगुनी धूप का आनंद लेते हुए गाँव के हालचाल और नई घटनाओं/समाचारों को साझा कर रहे हैं। प्रसंगवश, उल्लेख कर दूँ कि मेरी माताजी का अधिकांश समय गाँव में ही बीता है। आप 1979 से 1983 तक हमारे साथ मुंबई में रही हैं और शेष सारी उम्र गांव मे ही बीती है। गांव और गांव की आबो-हवा, मिट्टी-पानी, खेती-बारी और गाय-गोरु मानों आपकी धमनियों में बसते-बहते हैं। बीच-बीच में मांगलिक अवसरों पर शामिल होने अथवा स्वास्थ्य संबधी कोई दिक्कत पेश होने पर हम इन्हें मुंबई बुला लेते हैं। हमारे पिताजी 24 अक्टूबर 2009 को गोलोक वासी हो गए हैं। अब घर पर हमारी माताजी और उनकी देख-भाल के लिए हमारी भांजी कुमकुम साथ रहती है। लगता है चर्चा के मूल विषय यानी गौरैया पुराण से मैं फिर भटक गया।

लीजिए लौटता हूँ मूल विषय पर।

मैं माताजी से पूछता हूँ कि हमारी पुरानी बखरी (घर) के पिछवाड़े मौजूद ‘बसवारी’ और बइर  (बेर) के झुरमुटों में भोर और देर शाम को जो रोज चिड़ियों का कलरव सुनाई देता है (मुझे तो यह बॉलीवुड के नये संगीत की तुलना में कर्णप्रिय लगा) उसमें किन चिड़ियों का समावेश होता है? माताजी बताती हैं कि इन “कलरवधर्मी” पक्षियों में किलाटा, चरखी, हुर्रैया, पेड़ूकी और शुक्लाइन प्रमुख हैं (सुधी पाठको, इनके खड़ी बोली के पर्याय मुझे भी नहीं पता हैं, अतः इनके किताबी नाम कृपया अपने स्रोतों से ज्ञात करने का कष्ट करें)।

[bs-quote quote=”कारण चाहे जो भी हो गौरैया जैसे मासूम और छोटे पक्षियों की हमारे महानगरों/शहरों से बढ़ती अनुपस्थिति वास्तव में चिंता और अफ़सोस की बात है। शुक्र है कि गांवों-देहातों में गौरैया,कोयल, तोते, कबूतर और मोर जैसे तमाम पक्षी अभी भी मौजूद हैं। ” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

 

माताजी यह भी स्पष्ट करती हैं कि हमारे समाज की तरह इन पंक्षियों को भी हमारे ग्रामीण समाज से वर्ण व्यवस्था से आबद्ध कर दिया है। शुक्लाइन, हुर्रैया और पेड़की उच्च वर्ग में आती हैं जिनकी बोली शुभ और प्रीतिकर मानी जाती है जबकि किलाटा और चरखी निचले वर्ग में आती हैं। माताजी ने एक और बात यह बताई कि शुक्लाइन पक्षी का बोलना शगुन का द्योतक माना जाता है। जिसके घर-मकान की छत-मुंडेर पर बैठकर शुक्लाइन पक्षी बोलता है उस घर में उस दिन कोई न कोई शुभ समाचार अवश्य घटित होता है या मिलता है। मैं चाहकर भी उसकी इन मान्यताओं को काट नहीं पाया और उससे यह नहीं कह पाया कि शुभ-अशुभ अपने क्रम, गति और नियति से घटित होते हैं और उनका पूर्वानुमान लगभग असंभव होता है। गांवों में अभी भी ऐसे लाखों लोग मिल जाएँगे जो अपनी परंपराओं, मान्यताओं, रीति-रिवाजों और आस्थाओं को मानकर-संजोकर चलते हैं। मेरी माताजी भी शायद उन्हीं में से एक हैं। अतः उनकी इन बातों को मुस्कुराकर टाल जाता हूँ बिना कोई तर्क या बहस किए।

इस बार गाँव की इस यात्रा में कुछ अशुभ घटनाएँ भी देखने-जानने को मिलीं। मेरे पड़ोस की बस्ती के निवासी और हमारे शुभचिंतक श्री राजनाथ यादव जी दमे की लंबी बीमारी के चलते 26.11.2017 को गोलोक को प्रयाण कर गए। दो और शुभचिंतक श्री सरबजीत राम (आप डाक्टरी करते थे) और  श्री ब्रजमोहन पाल जी कैंसर की बीमारी (अंतिम स्टेजवाली) के चलते अत्यंत गंभीर रूप से बीमार  होकर खाट पकड़ चुके हैं। मुझे बहुत कम आशा है कि सन 2018 की अगली यात्रा में मेरी इन दोनों से भेंट हो पाएगी। मुझे इनकी स्थिति से बहुत दुःख है किन्तु क्या किया जाए? यह जीवन तो एक यात्रा ही तो है। जब जिसका अंतिम पड़ाव (गंतव्य) आ जाता है वह अपने स्टेशन उतर जाता है और हमसे हमेशा के लिए बिछुड़ जाता है। किंतु इन स्वजनों, मित्रों- शुभचिंतकों की सदाशयता, इंसानियत और इनके सद्गुण हमारी स्मृतियों में लंबे समय तक न केवल बने रहते हैं बल्कि हमें रोशनी भी दिखाते हैं। मैंने इन्हें तहेदिल से शुभकामनाएं दी कि इनकी आयु और लंबी हो।

गाँव के लोग
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