शोषण-अत्याचार एवं अमानवीय व्यवहार की अति एवं पराकाष्ठा ही उस व्यवस्था के विस्फोट का कारण बनती है (भाग एक)

सुप्रसिद्ध गज़लकार बी आर विप्लवी से अपर्णा की बातचीत

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पहला हिस्सा 

जीवन की कठिनाइयों  और मशक्कत के बाद ही विप्लवी जी गज़लकार बी आर विप्लवी बन पाये। इनकी गज़लों में  समाज के हाशिये पर ठहरे लोगों की पीड़ा है। लगातार 1978 से लिखते हुए अपनी रचनाओं को परिपक्वता प्रदान किये। बचपन बहुत गरीबी और संघर्ष में गुजरा। पिछड़े और दलित समाज  में जनम लेने वालों को उनके अधिकार आसानी से नहीं मिलते बल्कि उन अधिकारों को छीनकर लेना पड़ता है। इनके साथ भी ऐसा ही हुआ। पढ़ाई के दौरान  छात्रों और अध्यापकों ने  भेदभाव का व्यवहार किया लेकिन इन्होंने भागने की बजाय डॉ अंबेडकर इंजीनियरिंग स्टूडेंट्स एसोसिएशन नाम का एक संगठन बनाया, जिसके माध्यम से छात्रजीवन में मिलने वाले अधिकारों को हासिल कर सकें। अभी तक  इनकी छ:  किताबें प्रकाशित हुई हैं, जिसमें 3 ग़ज़ल संग्रह, एक खंडकाव्य और  एक आलोचनात्मक वैचारिकी तथा एक ग़ज़ल संग्रह शिकायत आसमां से नाम से विशेषांक के रूप में संवेद पत्रिका ने प्रकाशित किया है। रेलवे में अपनी सेवायें देते हुए 2019 में मुख्य संरक्षा अधिकारी पूर्वोत्तर रेलवे के पद से सेवा निवृत्त होने के बाद खुद के यूटूयब चैनल ग़ज़ल सराय को संचालित कर रचनात्मक गतिविधयों में सक्रिय हैं। पढ़िए, बातचीत के दौरान जैसा कि उन्होंने अपने बारे में अपर्णा को बताया-

गाज़ीपुर जैसे  सामंती जनपद में आपकी शिक्षा किस प्रकार शुरू हुई?

आपने बिल्कुल ठीक कहा।  ऐतिहासिक रूप से गाजीपुर एक सामंती या सामंतवादी जनपद रहा है। मेरा जन्म इसी जनपद की सैदपुर तहसील के एक छोटे से गांव जेवल में हुआ । इस जिले के ज़्यादातर गांवों /इलाक़ों में  आज भी कमोबेस उस ज़मीदाराना हेकड़ी के किंचित उच्छिष्ठ संस्कारगत मनोविज्ञान (मनोरोग?)को स्पष्टत: देखा एवं समझा जा सकता है।

भारतीय संदर्भ में सामंतवाद और ब्राह्मणवाद का गठजोड़ तो अत्यंत भयावह रहा है जो कि इस जनपद के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक एवं सांस्कृतिक बनावट एवं बुनावट में मौज़ूद है। ऐसे जनपद में जन्म लेने के बाद तो वह सारी कठिनाइयां आनी लाजिमी हैं जिस तरफ़ आपने इशारा किया है। लेकिन , इसका सकारात्मक पहलू यह है कि शोषण-अत्याचार एवं अमानवीय व्यवहार की अति एवं पराकाष्ठा हो जाने पर उस व्यवस्था में विस्फोट तो होता ही है जिसके बाद सारे मलबे ज्वालामुखी के लावा की तरह दूर-दराज़ तक बिखर जाते हैं – शेष बचा हुआ क्रेटर गलीज़ और गन्दे पानी का अनुपयोगी भंडार भर रह जाता है।

गाज़ीपुर के ज़मींदारी-सामंत शाही अत्याचार  के विरुद्ध भी, कई मौक़ों पर;  जगह-जगह विस्फोटक विद्रोह हुए। यहां के ग़रीब-गुरबा बेगारी-ग़ुलामी एवं बंधुआ मज़दूरी को टाटा,बाय-बाय कर के गांव छोड़कर कलकत्ता,बंबई,दिल्ली और सूरत जैसे कई महानगरों की ओर रुख करने लगा तथा अपनी सम्मानपूर्ण अस्मिता के लिए शहरों की गंदी बस्तियों में भी रहना क़ुबूल किया। यह पीढ़ी अपनी मेहनत-मशक्कत की कमाई गई छोटी सी पूंजी से गांव में घर बनाने, खेती की ज़मीन ख़रीदने तथा अपने बच्चों को स्कूल भेजने का काम करने लगी। इस पीढ़ी ने अशिक्षित होते हुए भी शहरों में शिक्षा का जलवा देखा और निश्चय किया कि अपने बच्चों को पढ़ाना ज़रूरी है। कुछ इसी तरह के माहौल में मेरी शिक्षा भी शुरू हुई जो सामंतवाद- ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद की तिकड़ी के आंख की किरकिरी होकर भी येन केन प्रकारेण परवान चढ़ती चली गई।

हुआ यूं कि ब्रिटिश शासन का उपनिवेश बनने के बाद भारत में कोलकाता को शुरुआती राजधानी बनाने के फलस्वरूप यहां एक उम्दा शिक्षा व्यवस्था तथा कल-कारखानों का संजाल बहुत जल्दी वज़ूद में आने लग गया । कोलकाता की जूट मिलों में भारी तादाद में मज़दूरों की आपूर्ति मुख्यतः पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार से होने लगी जिसमें ग्रामीण अंचल के स्त्री-पुरुषों को आसानी से रोज़गार मिल जाया करता था । क़रीब 103 जूट मिलें तो बंगाल में ही हुगली नदी के किनारों पर निर्मित हुईं जो 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में अच्छा-ख़ासा उत्पादन दे रही थीं। कलकत्ता के गार्डन रीच में ‘हुगली मिल्स’ का निर्माण भी सन्1890 में हो चुका था तथा कमरहट्टी जूट मिल्स भी इसी समय में उत्पादन दे रही थी। यही वह दौर है जब मेरी पिछली पुश्त के मेरे पूर्वज, गांव की ज़मींदारी ठसक को धता बताकर; कोलकाता की शरण में आ गए। यहां जूट मिलों में काम करते हुए उन्होंनेत शिक्षा के महत्व को बहुत नज़दीक से जाना-पहचाना तथा समझा। कोलकाता की ही देन है कि मेरे पितामह(बाबा) फेंकू उर्फ़ ठीकेदार के चाचा मूसन अक्षर- ज्ञान की रोशनी से किंचित परिचित होकर, अपने भतीजे को स्वयं पढ़ाने में विशेष रुचि लेने लगे थे। नतीजतन बाबा चिट्ठी-पत्री बांचने लगे। रामचरितमानस की चौपाइयां तो उन्हें कंठस्थ थीं। इसी पढ़ाई का नतीजा था कि बाबा ने अपने पुरखों की ज़मीन को मुक़द्दमा लड़-लड़ कर जमीदारों के चंगुल से छुड़ाया। ऐसे माहौल में, कलकत्ता से वापस आकर;बाबा अपने पूर्वजों की खेती संभालने लगे तथा मेरे पिता रामनारायण को उच्च शिक्षा हेतु बनारस हिंदू विश्वविद्यालय तक भेजा। अपनी तंग-दस्ती और बदतर आर्थिक हालात के बावज़ूद, बाबा ने अपने बच्चों को शिक्षित कराने का संकल्प लिया तथा उसे पूरा भी किया।मेरी दुधमुंही अवस्था में ही, पिता का साया सर से उठ जाने के बाद; मां और बाबा के संरक्षण में ही मैंने  प्राइमरी स्कूल, मिडिल स्कूल तथा हाईस्कूल के दसवीं तक की पढ़ाई गांव से ही की। इंटरमीडिएट साइंस की पढ़ाई के लिए घर से चौदह किलोमीटर दूर सैदपुर कस्बा में ऐडमिशन हुआ तथा रोज़ाना ट्रेन से आ-जा कर पढ़ाई पूरी की। इस दौरान ट्रेन यात्रा के अलावा घर से स्टेशन तथा स्टेशन से स्कूल का आना-जाना कुल मिलाकर 12 किलोमीटर पैदल चलना होता था। साइंस से इंटरमीडिएट  प्रथम श्रेणी में पास करने के बाद 1977 में मैंने बीएचयू अर्थात बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के साइंस फैकल्टी में बी एस सी में दाख़िला लिया( फिजिक्स मैथमेटिक्स एवं जियोलॉजी विषयों के साथ)।संयोगवश सन् 1978 में मेरा दाखिला मदन मोहन मालवीय इंजीनियरिंग कॉलेज गोरखपुर में होने के लिए बुलावा आ गया। इस प्रकार मैंने 1982 तक इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में प्रथम श्रेणी की उपाधि लेकर निकला।

सन् 1972 के आसपास एक बड़ा दलित आंदोलन छेड़ा गया था जिसमें यह फ़ैसला किया गया कि कोई भी दलित मरे हुए डांगर या पशु को सवर्णों की यहां से नहीं उठाएगा तथा उनके घर पर जचगी में दाई गिरी के लिए दलित स्त्रियां भी नहीं जाएंगी। इस बारे में सवर्ण-जन पंचायत करके दलितों पर दबाव बनाना चाहते थे किंतु बाबा की अगुवाई में पूरी दलित बस्ती ने यह काम करने से साफ़ इंकार कर दिया। इस प्रकार यह अपमानजनक काम छोड़ने का जो फैसला हो रहा था उससे मुझे अतीव हर्ष का अनुभव हुआ क्योंकि इसके पहले से ही कहीं न कहीं मुझमें यह चेतना जाग गई थी कि ऐसा काम हम क्यों करें जिसके कारण लोग हमें छोटा और नीच समझते हैं

 कालेज के दिनों में बहुत बार जातीय भेदभाव का शिकार भी होना पड़ा किंतु अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और आगे बढ़ने की धुन के चलते मुश्किल राहों से भी अपने गंतव्य का रास्ता निकालता रहा। इंजीनियरिंग कॉलेज में तो ट्यूटोरियल्स में जानबूझकर कम नंबर देना प्रैक्टिकल्स तथा वायवा में कम नंबर देना प्राय: होता ही रहता था। इसके कारण दलित छात्रों में हतोत्साह एवं असंतोष का भाव उन्हें अक्सर निराश कर देता था।यह डिमारलाइजेशन इस हद तक कि  इसके कारण मेरे ही एक सहपाठी ने आज़िज़ आकर सन् 1979 में ट्रेन के सामने कूदकर आत्महत्या कर ली थी।

बाज़ूद इस सबके, हम लोगों ने जागृति की एक हल्की सी किरण देख ली थी तथा अधिकतर मामलों में हमने संघर्ष किया।अपने हक के लिए लड़ते हुए हम प्रशासन के कोप-भाजन भी बने। एक अन्य घटना 1979 की ही है जब एक सवर्ण छात्र ने दलित छात्र को जातिसूचक गाली दी थी। इसके बाद दलित छात्रों ने विरोध किया। कहासुनी होते- होते मामला मारपीट में तब्दील हो गया। उस समय सवर्ण छात्र को भारी चोट आई थी तथा हॉस्टल में सवर्ण वर्सेस दलित छात्रों के टकराव के चलते साईंन्ड आई(कालेज बंद कर के हास्टल ख़ाली कराने की अनुज्ञा) लगा दी गई थी तथा पीएसी की तैनाती हो गई थी। घटना के दिन दलित छात्रों को इतना डराया-धमकाया गया कि उन्होंने हॉस्टल पहले ही छोड़ दिया था। जिलाधिकारी तथा एसएसपी की पहल पर एस ओ गोरखपुर कैंट ने हम लोगों को अपनी गाड़ी से स्वयं की देख-रेख में हॉस्टल पहुंचाया था। इस प्रकार हमने जातीय भेदभाव के विरुद्ध अपना कड़ा प्रतिरोध दर्ज़ कराया। इसी के चलते हमने डॉ अंबेडकर इंजीनियरिंग स्टूडेंट्स एसोसिएशन नाम की संस्था का भी गठन किया जिसका मैं अध्यक्ष भी रहा। इस प्रकार आप देख सकती हैं कि आज़ादी के बाद भी, जब गणतंत्र और लोकतंत्र के लिए क़ानून लागू हो चुका था; क़ानून की अनदेखी करते हुए ज़मींदाराना सामंतवादी हरकतों से लोग बाज़ नहीं आ रहे थे। ऐसी अमानवीय परम्परा और सोच के विरुद्ध अपने संघर्ष के जरिए हमने रास्ता निकालने की लगातार कोशिश की है और आज भी उस पर क़ायम हैं।

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माता-पिताजी का आपके जीवन पर कितना प्रभाव पड़ा?

देखिए माता-पिता का असर तो बच्चे की जीवन पर पड़ता ही है क्योंकि बच्चे का शुरुआती इंटरेक्शन अधिकतम उन्हीं के साथ रहता है ।मैं इसका अपवाद  कैसे हो सकता हूं। हां एक बात मेरे साथ थोड़ी अलग है कि मेरे जीवन में पिता नामक व्यक्ति की अनुपस्थिति रही। कारण यह था कि जब मैं एक माह का था उसी समय मेरे पिता की सर्प-दंश के कारण मृत्यु हो गई। मुझे मालूम नहीं कि पिता किसे कहा जाता है? इस मामले में मेरी मां ने एक ही समय एवं एक ही साथ मां एवं पिता दोनों का रोल अदा किया। यूं तो मां का प्राकृतिक तौर पर भी बच्चे के साथ जो आत्मीय संबंध होता है शायद वैसा पिता का नहीं होता। दुनिया में आते ही बच्चा अपनी मां से नालबद्धता तोड़ता है । मां को ही वह पहले से जानता है।वह मां ही होती है जो बताती है कि सामने वाला व्यक्ति तुम्हारा पिता है। इसलिए भी जाहिरा तौर पर मां ने सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली तथा हमें इस मुकाम तक पहुंचाया। हां मेरे पितामह जिन्हें हम बाबा कहते थे,उन्होंने भी अपनी छत्रछाया में हमें पूरी तरह सहारा देकर संभाला। बाबा ने हम दोनों भाइयों को पढ़ाई में आगे बढ़ने के लिए लगातार प्रेरणा दी।

विप्लवी जी की माता जी

मां अनपढ़ थीं किन्तु अशिक्षित या अज्ञानी नहीं थीं। मां को पिताजी की संगत में पढ़ाई का महत्व मालूम पड़ गया था। वैसे भी मेरे बाबा कबीरपंथी होने के नाते संत-संगत का माहौल; घर बाहर हर जगह,बनाए रहते थे। मां हानि-लाभ,सुख-दुख, एवं जीवन-मरण के बारे में ऐसी सम्वेदनशीलता एवं गहराई से बात करतीं कि मैं अपनी अल्प-मति के बावजूद कुछ-कुछ उसके क़रीब पहुंचने की कोशिश करता ।मां को जब मैं ऐसी आध्यात्मिक बातें करते सुनता तो आश्चर्यचकित होकर एक-एक बात को गांठ बांधता रहता। विशेष रूप से जीवन और मृत्यु को लेकर  वे सभी दुनियावी  चीज़ों की अनित्यता पर अपनी ठेंठ भाषा में  जैसी नज़ीर देतीं जैसा तर्क देतीं ,मेरे लिए उस वक़्त समझ के परे था ।आगे चलकर जब बुद्ध का ‘अनिच्चा’या अनित्यवाद पढ़ा तो लगा कि मां बुद्ध का नाम भले ही न जानती हों लेकिन श्रमण परम्परा की पारम्परिक विरासत का ही यह  नतीजा है। ऐसी बातों का मेरे जीवन पर अमिट प्रभाव पड़ा। मां कबीर पंथ की एक शाखा ‘शिवनारायणी पन्थ’में दीक्षित थीं।(शादी के समय ही मां एवं पिता जी इस पन्थ में दीक्षित हुए थे) इसलिए उनका आचार विचार रहनी संतों जैसी थी। हंसा जाए अकेला’ या ‘ना घर तेरा ना घर मेरा, दुनिया रैन बसेरा जी’या फिर सांप छोड़े ला सांप केंचुल हो गंगा छोडेलीं अरार;प्रान छोड़े ला गृही आपन हो इहां केहू ना हमार।लेई  चला, लेई चला, लेई चला हो, जहां केहू ना हमार। शायद इसी मज़मून को ग़ालिब ने यूं बयान किया है–  पड़िए ‘गर बीमार तो कोई ना हो तीमारदार; और ‘गर मर जाइए तो, नौहांखा कोई न हो।

बाबा ने फ़ौज़दारी का मुक़दमा दायर कर दिया। बाद में इसमें दीवानी के मुक़दमे भी जुड़ गए तथा कुल तीन किता केस लम्बे समय तक खिंचता चला गया। बाबा ने ठाकुर को मुकदमे में चुनौती देकर हमें आत्म-सम्मान से जीने का एक बड़ा सबक़ सिखाया था। हम लोग उन लोगों के यहां कभी नहीं जाते थे ताकि वह हमें किसी बहाने भी अपमानित न कर सकें। मैंने इस आत्मसम्मान को बचाने के लिए हर तरह से सोचना शुरू कर दिया था। मां किसी के खेत पर सीजनल कटाई के लिए जाती तो हमें बुरा लगता

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 ऐसे जाने कितने पद उनकी ज़बान पर चढ़े हुए थे। वे हमेशा शील-सदाचार का बोध कराती रहती थीं तथा हमें बार बार जीवन की क्षणभंगुरता की याद दिलाती रहती थीं। उनके भजन और आध्यात्मिक गीतों को सुनकर हम लोग आत्म विभोर हो जाया करते थे। हमारी मार्गदर्शक, हमारी सखी, हमारी अभिभावक एवं हमारी गुरु सब कुछ थीं। हमारी  पढ़ाई  के लिए वे कृतसंकल्प थीं कि ‘जो कुछ थोड़ा गहना-गुरिया है उसे भी बेचकर भी तुम लोगों को पढ़ाऊंगी’। यद्यपि गहना के नाम पर जो एक-एक थान चांदी का हंसली-गुजहा था उससे क्या रुपया मिलता यह अनुमान लगाया जा सकता है। किंतु  हमारे लिए उनका जज़्बा और हौसला वह शय थी जिससे हम पूरी दुनिया फ़तेह कर सकते थे। बाबा भी हमारी पढ़ाई को लेकर उतने ही प्रेरक थे। भाऊ बनिया की दुकान पर जब हम दोनों भाइयों के पढ़ाई की तारीफ़ ‘बड़के लोग’ भी करते तो बाबा की बातछें खिल जातीं। वे घर लौटकर दादी से पूरा वाक़्या बयान करते तो बात हमारे कानों में भी पड़ती। बाबा हमारी तारीफ़ कभी सीधे नहीं करते।शायद उन्हें लगता होगा कि तारीफ़ से इतरा कर बच्चे बिगड़ जाएंगे।

इस प्रकार मेरी मां और बाबा ने हमारी ज़िन्दगी को सफल बनाने के लिए बड़ी संज़ीदगी से हमें निखारा।

अपने बचपन को टटोलिए।आप कब से समाज को देखने समझने लगे ?

अपने बचपन को कई तरह की यादों के झरोखे से झांकते हुए मुझे अनेकानेक दृश्य नज़र आते हैं जो कहीं न कहीं मुझे गंभीर अंतर्दृष्टि देते रहे। वास्तव में मां का बाइस-तेइस साल की उम्र में वैधव्य एक ऐसी घटना है जिसने हमें अंदर तक अति संवेदनशील बना दिया। ग़रीबी, जातीय प्रताड़ना और वंचना झेलती हुई एक युवा दलित-विधवा के मन- मस्तिष्क पर जो झंझावातों के थपेड़े लगते रहे उनसे मां अक्सर निराश, उदास और कई बार हतोत्साहित होकर हताशा में एकांत में बैठकर रोने लगती थीं। मेरा मन कहीं गहरे तक द्रवित हो उठता। वेदना- संवेदना ने मुझे अंतरतम तक बेहद संवेदनशील बना दिया। अपना  घरेलू काम झाड़ू-बुहारू, जानवरों को सानी-पानी और गोबर आदि को अंधेरे मुंह निबटा कर, रोटी-पानी का इंतज़ाम कर, कई बार मां को दूसरे के खेतों में दिहाड़ी मजदूरी या बन्नी पर कटनी करने जाना होता था। शाम को घर लौट कर उनकी थकान मिटने की बजाय; दिन भर के अपने घर के बाकी बचे काम को समेटते हुए अधिक बढ़ जाती। रात में मैं मां का हाथ-पैर दबाता, सर की मालिश करता। हड्डियों के कंकाल नुमा ढांचे पर कभी ज़ोर पड़ता तो वे चीख उठतीं। थककर आने के बाद उनका हाल पूछने मात्र से वे अपना आधा दुख भूल जातीं। मुझे ढेरों आशीष से नवाज़ती रहतीं। कई बार दिन भर की हाड़ तोड़ मेहनत-मज़दूरी के बाद घर लौट कर भूखे पेट सोने की नियति हमारी धैर्य परीक्षा करती रहती थी। ऐसे में बचपन में ही बड़ों जैसा सोचने लगता था। मैं सोचता कि आखिर हमारी मेहनत-मजूरी में तो कोई कमी नहीं, फिर भी हमें पेट भर खाना और ढंग का कपड़ा क्यों नसीब नहीं होता?

युवावस्था में विप्लवी जी

  दरअसल हमारी कंगाली के पीछे एक बड़ा कारण यह था कि बाबा ने अपने सम्मान एवं अस्मिता की रक्षा के लिए गांव के ज़मींदार ठाकुर के विरुद्ध एक मोर्चा खोल दिया था या यूं कहें कि उस दबंग ठाकुर राजपूत ने ही मजबूर कर दिया। उसके साथ बाबा की मुकदमे बाज़ी लगभग पन्द्रह साल  तक चली। हमारी खेती की उपज और मेहनत मज़दूरी की कमाई मुकदमे की भेंट चढ़ता जाता था। मेरे चाचा एयरफोर्स में मुलाज़िम थे। बहरहाल उनके द्वारा मनीआर्डर से भेजे प्रतिमाह के सौ रुपए भी घर का ख़र्च संभाल नहीं पाते। सर उठाकर जीने के एवज़ में ग़रीबी-भूख और फ़ाका ही हमें मिलता रहा। यह मुक़द्दमा भी ठाकुर साहब ने ही हम पर थोपा था।

शेखपुर के मियां मोइउद्दीन की छ:बिस्वा ज़मीन बाबा ने क़बाला कराया था। जब उसमें सात कमरे का कच्चा मकान बनवाया जाने लगा तो बाबू साहब (रियाया उन्हें बाबू जी कहती थी) को यह बात नागवार गुज़री कि चमार का लड़का एयरफोर्स में सरकारी नौकरी क्या पा गया, इन लोगों का दिमाग़ आसमान पर जा पहुंचा।यह इनकी हिमाक़त देखिए कि ये ठाकुरों-बाभनों की तरह सात घर की बखरी बनाकर हमारी मर्यादा  को ठेस पहुंचा रहे हैं।फिर क्या था? बाबू साहब ने फावड़ा लेकर हमारा बनता हुआ घर गिरा दिया। अपने मजदूर-बनिहार (मेरी ही दलित बस्ती के बिरादरान) से ख़बर भिजवा दिया कि यह घर उनकी ज़मीन पर बढ़कर बन रहा है अतः तुरंत रोक दिया जाय। इसके विरुद्ध बाबा ने फ़ौज़दारी का मुक़दमा दायर कर दिया। बाद में इसमें दीवानी के मुक़दमे भी जुड़ गए तथा कुल तीन किता केस लम्बे समय तक खिंचता चला गया। बाबा ने ठाकुर को मुकदमे में चुनौती देकर हमें आत्म-सम्मान से जीने का एक बड़ा सबक़ सिखाया था। हम लोग उन लोगों के यहां कभी नहीं जाते थे ताकि वह हमें किसी बहाने भी अपमानित न कर सकें। मैंने इस आत्मसम्मान को बचाने के लिए हर तरह से सोचना शुरू कर दिया था। मां किसी के खेत पर सीजनल कटाई के लिए जाती तो हमें बुरा लगता तथा मैं सोचता की हम कब वह संपन्नता प्राप्त कर सकेंगे कि हमें दूसरों के यहां मज़्दूरी न करनी पड़े।

इसी सिलसिले में यह बताना ज़रूरी है कि सन् 1972 के आसपास एक बड़ा दलित आंदोलन छेड़ा गया था जिसमें यह फ़ैसला किया गया कि कोई भी दलित मरे हुए डांगर या पशु को सवर्णों की यहां से नहीं उठाएगा तथा उनके घर पर जचगी में दाई गिरी के लिए दलित स्त्रियां भी नहीं जाएंगी। इस बारे में सवर्ण-जन पंचायत करके दलितों पर दबाव बनाना चाहते थे किंतु बाबा की अगुवाई में पूरी दलित बस्ती ने यह काम करने से साफ़ इंकार कर दिया। इस प्रकार यह अपमानजनक काम छोड़ने का जो फैसला हो रहा था उससे मुझे अतीव हर्ष का अनुभव हुआ क्योंकि इसके पहले से ही कहीं न कहीं मुझमें यह चेतना जाग गई थी कि ऐसा काम हम क्यों करें जिसके कारण लोग हमें छोटा और नीच समझते हैं। इसी बावत वे हमें बात-बात पर अपमानित करते रहते हैं ।

 मुझे याद है कि पहली और आख़िरी बार एक मौक़े पर  हमारी गंवहाई में एक जचगी का केस आया। रात का पहला पहर ही रहा होगा। उस घर से एक व्यक्ति आकर दाई के लिए बाबा से मांग किया । अमूमन बस्ती से किसी महिला को बाबा डिपूट करवा दिया करते थे। किंतु घरेलू खींच-तान के चलते इस बार दादी ने मां को इस काम के लिए जाने का दबाव बनाया। एक तरह से मां को जाने पर मजबूर किया गया जिसका हम दोनों भाइयों ने डटकर विरोध किया तथा बाद में हमने इस काम को छुड़वाकर ही दम लिया। इस प्रकार हमारे भीतर आत्मसम्मान की भावना हमें लगातार समाज के इस पक्ष पर सोचने को मजबूर करती थी जिसमें मज़दूर-कामगार स्त्री(दाई) के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता था। दाई को जच्चा का मल-मूत्र से भरी हंडिया अपने हाथ उठाकर दूर बंसवारी में फेंकना होता था । यह बात हमें नागवार लगती थी।

 सातवीं क्लास में मुझे किसी सज्जन द्वारा चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु तथा ललई सिंह यादव द्वारा लिखी हुई क्रांतिकारी कृतियां रामधारी सिंह दिनकरपढ़कर एक नई दृष्टि मिली। उसके बाद तो सामाजिक चेतना लगातार विकसित होती गई तथा समाज को देखने समझने का एक तार्किक नज़रिया हथियार बनता गया।

माता जी और बड़े भाई साहब के साथ विप्लवी जी

1982 में मेरे इंजीनियरिंग कॉलेज से निकलते ही बाबा की मौत हो गई। दलित बस्ती के हमारे भाई-बिरादरों ने कहा कि चूंकि उन लोगों को दी जाने वाली मेरी शादी की एक पार्टी (भात) बाकी है अतः वे लोग बाबा की अंत्येष्टि में शामिल नहीं होंगे। अंत्येष्टि के बाद आयोजित बिरादरी-भोज भी खाने से उन लोगों ने इंकार कर दिया। इस पर मैंने भरी पंचायत में यह कहा कि ‘जो समाज किसी भाई-बिरादर की मरी हुई मिट्टी में शामिल नहीं होता है, मैं ऐसे समाज से संबंध रखने का इच्छुक नहीं हूं’ इस बात से सनसनी फ़ैल गरी तथा घर-बाहर दोनों जगह मेरी मज़म्मत की गई। काफी मान- मनौवल के बाद लोगों ने खाना स्वीकार किया। किंतु खाना खिला कर हमने पुनः घोषणा कर दी कि इसके बाद ऐसे लोगों से हमारा सरोकार नहीं होगा जिनमें मानवीय संवेदना नहीं है। इस प्रकार हम लोग बरसों तक बिरादरी से काट दिए गए तथा कोई न हमें निमंत्रण देता न कोई हमारे यहां आता ही था। हम लोगों ने कभी भी सिद्धांतों के साथ समझौता नहीं किया वह चाहे अपनी बिरादरी के साथ हो या ग़ैर बिरादरी के साथ। आगे चलकर  हम लोगों(दोनों भाइयों ) ने अपनी अच्छी पढ़ाई के बलबूते ऊंचे से ऊंचा पद प्राप्त किया तथा हमारी बस्ती के  लोगों को अपनी भूल का किंचित एहसास हुआ, तब  जाकर संबंध सामान्य हो पाया। इस प्रकार कह सकते हैं कि मैंने सामाजिक बुराइयों को शुरू से ही पहचानना शुरू कर दिया था तथा आगे चलकर इस दिशा में अधिक बहुआयामी दृष्टि विकसित होती गई।

आपको कब लगा कि लिखना चाहिए ?

मुझे लिखने का शौक तो स्कूली जीवन से ही था। किंतु उन दिनों की तुक बंदियों से होते हुए बात कविता तक पहुंची और इससे बड़ी बात यह हुई कि जब मैं छुप-छुपाकर कविताएं लिखता था कि कहीं घर से डांट न सुननी पड़े, मेरे अग्रज ने मेरी चोरी पकड़ी और उसी दिन से वे मेरी कविताओं की  प्रसंशा करने लगे। फिर क्या था। मेरी कविता और साहित्य में जो दिलचस्पी पैदा हुई वह दिनों-दिन बढ़ती ही गई। नौवीं कक्षा में आकर मैंने जो पहली कविता लिखी वह  स्कूल की स्मारिका ऋतम्भरा में छपी जिसका असर हमारे प्रधानाचार्य महोदय पर ऐसा हुआ कि उन्होंंने मुझे पत्रिका का छात्रसंपादक नियुक्त कर दिया।इस तरह मैं साहित्य की दुनिया में आगे ही आगे बढ़ता गया।

रात में मैं मां का हाथ-पैर दबाता, सर की मालिश करता। हड्डियों के कंकाल नुमा ढांचे पर कभी ज़ोर पड़ता तो वे चीख उठतीं। थककर आने के बाद उनका हाल पूछने मात्र से वे अपना आधा दुख भूल जातीं। मुझे ढेरों आशीष से नवाज़ती रहतीं। कई बार दिन भर की हाड़ तोड़ मेहनत-मज़दूरी के बाद घर लौट कर भूखे पेट सोने की नियति हमारी धैर्य परीक्षा करती रहती थी। ऐसे में बचपन में ही बड़ों जैसा सोचने लगता था। मैं सोचता कि आखिर हमारी मेहनत-मजूरी में तो कोई कमी नहीं, फिर भी हमें पेट भर खाना और ढंग का कपड़ा क्यों नसीब नहीं होता?

 शुरुआत में आपने क्या लिखा?

मैं शुरू से ही कविता की ओर विशेष आकर्षित था। मैं रामधारी सिंह दिनकर की कविता एवं उनकी जनवादी सोच से बहुत प्रभावित था ।

 बी एच यू में बीएस सी पार्ट- 2 में अध्ययन के दौरान गर्मी की  छुट्टियों में मेरे मन में विचार आया कि क्यों न दलित-जीवन की वंचना के बारे में कोई काव्य- पुस्तक लिखी जाय। इसी क्रम में हिन्दू पुराणों एवं शास्त्रों में मिथकीय चरित्रों के बारे में ख़्याल आया तथा इनमें दलित-वंचना की पहचान के रूप में समुद्र मंथन को लेकर लिखने का विचार बन गया ताकि दलितों के साथ हुए छल को उभारने-उकेरने का काम किया जा सके। किंतु यह योजना बदल कर अन्ततोगत्वा रामायण के एक पात्र ‘बालि’ के जीवन पर आधारित खंडकाव्य के रूप में दिलो-दिमाग में विकसित होने लगी।  सन् 1978 में मैंने यह खंडकाव्य प्रवंचना नाम से लिखकर पूरा कर डाला। यह पुस्तक लिखने की प्रेरणा मुझे रामधारी सिंह दिनकर की कृति रश्मिरथी से मिली थी। मैं रामधारी सिंह दिनकर के खंडकाव्य रश्मिरथी तथा विचार काव्य कुरुक्षेत्र से अत्यंत प्रभावित था। इसके बाद मैंने एक लेख भी निर्णायक भीम पत्रिका हेतु लिखा था जिसमें रामचरितमानस के शूद्र-स्त्री विरोधी चेहरे को उजागर किया गया। इसके बाद तो मैंने समय-समय पर वैसे कई आलेख लिखे। डॉक्टर अंबेडकर के जीवन और लेखन से मैं गहरे तक प्रभावित हुआ था। ज्योतिबा फुले एवं सावित्रीबाई फुले, ललई सिंह यादव,रामस्वरूप वर्मा एवं चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु के जीवन तथा लेखन लेखन ने हमेशा जनोन्मुखी एवं सामाजिक न्याय की दिशा में काम करने के लिए प्रेरित किया।

खंडकाव्य प्रवंचना (1978 को प्रकाशित )

उस समय कैसा माहौल मिला?

  जैसा मैंने पहले ज़िक्र किया कि मुझे लेखन के मामले में स्कूली जीवन-काल से ही प्रोत्साहन एवं संवर्धन मिलता रहा। घर में मेरे अग्रज हमेशा मेरी कविताओं की तारीफ़ करते थे तथा विद्यालय में मेरे प्रिंसिपल बद्रीनाथ सिंह, अध्यापक राम शरण पांडेय जी, झगरू प्रसाद जी, इंद्रदेव  पांडे जी, संकठा प्रसाद सिंह जी, झारखंडे सिंह जी आदि। मेरे हाई स्कूल के प्रिंसिपल मुझे  शाम को स्कूल की छुट्टी होने के बाद रोक लेते थे तथा लाइब्रेरी ले जाकर रविवार, दिनमान जैसी पत्रिकाएं पढ़ने को देते थे।वे हमेशा प्रेरित करते थे तथा घर पर पढ़ने की सलाह देते थे। मेरे गुरुजन लोगों की मंशा थी कि मैं वाद-विवाद प्रतियोगिता में स्कूल का नाम रोशन करूं। और ऐसा हुआ भी कि मैं कई बार इस प्रतियोगिता में उच्च स्तरीय सम्मान प्राप्त कर स्कूल का नाम आगे बढ़ाया। हाई स्कूल में ‘सम्मान सहित उत्तीर्ण’ तथा सर्वोच्च अंक प्राप्त करने के कारण हम दोनों ही भाइयों को सम्बन्धित परीक्षा-वर्ष में प्रधानाचार्य ने गोल्ड मेडल देकर सम्मानित किया वह भी उन दिनों जब उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड में सम्मान सहित उत्तीर्ण होना तो दूर प्रथम श्रेणी में पास होना भी बहुत बड़ी बात मानी जाती थी। कुल मिलाकर मेरे लिए स्कूल का माहौल बहुत ही उत्साहवर्धक था।

क्रमश:

अपर्णा गाँव के लोग की कार्यकारी संपादक हैं।

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