भारत के नाम पर बाइडेन की हंसी का निहितार्थ (डायरी 27 फरवरी, 2022)  

नवल किशोर कुमार

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अकबर और बीरबल की कहानियां मैं तो बचपन में खूब पढ़ता था। मैं अपने बच्चों को देखता हूं तो उनमें अकबर-बीरबल को पढ़ने का चाव नहीं है। मेरे बचपन में तो तेनाली नामक एक ब्राह्मण की कहानियां भी खूब पढ़ी जाती थी। बचपन में ही सुना था एक शब्द– विदूषक। एक बार अपने एक शिक्षक से इसका मतलब पूछा तो वे फंस गए। फंस गए मतलब यह कि बता नहीं पाए। पहले मुझे लगा कि इस शब्द का मतलब नहीं जान सकूंगा, लेकिन दूसरे ही दिन शिक्षक महोदय ने इसका मतलब बता दिया– कामेडियन। अब कामेडियन का मतलब क्या? जवाब मिला– जोकर टाइप का आदमी।
खैर, अकबर और बीरबल के बारे में अब सोचता हूं तो विश्वास नहीं होता है कि वे कहानियां सच्ची होंगीं। वजह यह कि अकबर शाहंशाह था और एक तरह से कहिए तो आज के भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान तक उसका राज था। वह इतना बेवकूफ कैसे हो सकता है, जितना कि अकबर-बीरबल की कहानियों में बताया गया है? और बीरबल इतना चालाक कैसे हो सकता है?
दरअसल बीरबल एक ब्राह्मण विद्वान थे, और उनका अपना नाम महेश दास था। मैं तो विकीपीडिया पन्ना देखकर हैरान हूं, जो यह बता रहा है कि बीरबल या राजा बीबरल अकबर के दरबार में एक सारस्वत हिंदू भट्ट कायस्थ सलाहकार और सेना के मुख्य नायक थे। मैं विकीपीडिया को सही नहीं मानता। वजह यह कि इसके जरिए जो सूचनाएं उपलब्ध करायी जाती हैं, उसकी वैधता हमेशा संदिग्ध रहती है। अभी हाल ही में एक महान बिसखोपरा सामने आया। वह जबतक जेएनयू में रहा, तबतक सामाजिक न्याय आदि की बातें खूब करता था। अब जबकि वह कहीं नौकरी पा गया है तो उसने अपना चोला ही बदल दिया। उसने विकीपीडिया आदि के जरिए खुद को ऐसे प्रस्तुत किया है मानो वह बीरबल का चाचा हो।

उन्होंने बाइडेन से पूछा था कि भारत आपके महत्वपूर्ण सामरिक सहयोगी देशों में से एक है, तो क्या रूस के सवाल पर वह आपके साथ पूरी प्रतिबद्धता के साथ है? ललित झा के सवाल को पहली बार में या तो बाइडेन समझ नहीं पाए या फिर उन्हें लगा होगा कि भारतीय पत्रकार ने भूलवश ऐसा सवाल किया है। उन्होंने सवाल दुहराने काे कहा। ललित झा ने फिर वही सवाल दुहराया। बाइडेन ने बिना हंसते हुए कहा कि अभी तक तो भारत हमारा महत्वपूर्ण सामरिक सहयोगी नहीं बना है, वैसे इस मामले पर आज ही भारत से बात करता हूं। बाइडेन के इतना कहते ही सब हंस पड़े।

 

खैर, अकबर-बीरबल को छोड़ते हैं। न अकबर बेवकूफ थे और बीरबल इतने समझदार जितने कि कहानियों में बताए जाते हैं। यह तो भड़ास निकालने का तरीका है। लेकिन यह तो सच है कि जैसा राजा होता है, वह अपने हिसाब से भाट चाहता है। भाट मतलब उसके बारे में प्रशस्ति लिखनेवाले लोग।
दो दिन पहले की बात है। अमेरिका के राष्ट्रपति बाइडेन यूक्रेन-रूस के मसले पर व्हाइट हाउस में संवाददाता सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। वहां मौजूद एक भारतीय पत्रकार ने अजीबोगरीब सवाल किया और फिर जो जवाब बाइडेन की ओर से दिया गया, उसे सुनकर सब हंस पड़े। यह हंसी कुछ ऐसी थी जिससे भारत की छवि धूमिल हुई। दरअसल, सवाल ही ऐसा पूछा गया था, जिसका कोई आधार नहीं था। सवाल पूछने वाले पत्रकार का नाम था– ललित कुमार झा। अब झा शब्द से उनकी जाति की पहचान मुश्किल नहीं है। उन्होंने बाइडेन से पूछा था कि भारत आपके महत्वपूर्ण सामरिक सहयोगी देशों में से एक है, तो क्या रूस के सवाल पर वह आपके साथ पूरी प्रतिबद्धता के साथ है? ललित झा के सवाल को पहली बार में या तो बाइडेन समझ नहीं पाए या फिर उन्हें लगा होगा कि भारतीय पत्रकार ने भूलवश ऐसा सवाल किया है। उन्होंने सवाल दुहराने काे कहा। ललित झा ने फिर वही सवाल दुहराया। बाइडेन ने बिना हंसते हुए कहा कि अभी तक तो भारत हमारा महत्वपूर्ण सामरिक सहयोगी नहीं बना है, वैसे इस मामले पर आज ही भारत से बात करता हूं। बाइडेन के इतना कहते ही सब हंस पड़े।
दरअसल, भारतीय मीडिया अपने लोगों को अंधेरे में रखती रही है। फिर चाहे वह सामरिक मामले हों या फिर अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के संदर्भ में भारत के हैसियत की। वर्तमान में तो नरेंद्र मोदी ने तो मीडिया की रीढ़ ही तोड़ दी है। ललित कुमार झा पीटीआई के पत्रकार हैं और उन्हें व्हाइट हाउस द्वारा मान्यता प्राप्त पत्रकारों की सूची में शामिल किया गया है। अपने ट्वीटर पर उन्होंने व्हाइट हाउस की फोटो भी लगा रखी है।

कल सुरक्षा परिषद में रूस के खिलाफ लाए गए अमेरिका के प्रस्ताव पर वोटिंग के दौरान भारत और चीन ने अनुपस्थिति दर्ज करायी। या कहिए कि दो महत्वपूर्ण एशियाई देशों ने मध्य मार्ग का रास्ता चुना। चीन के बारे में तो चीन के लोग बताएंगे, लेकिन भारत के संदर्भ में हम इतना तो कह ही सकते हैं कि आज भी भारत इतना सक्षम नहीं है कि वह रूस और अमेरिका में किसी एक का भी विरोध कर सके।

 

सवाल यह है कि जब तथाकथित ‘चीफ यूएस कारेपांडेंट’ ललित कुमार झा स्वयं ही इतने कंफ्यूज हैं फिर वे जो खबरें वहां से भेजते हैं, वे कितने विश्वसनीय होते होंगे? सवाल यह भी है कि क्या उन्होंने बाइडेन से उपरोक्त सवाल भारत सरकार की मर्जी से पूछा था या फिर ऐसा करके उन्होंने चापलूसी की होगी?
बहरहाल, उपरोक्त प्रकारण से भारतीय प्रतिभा की साख को नुकसान पहुंचा है। यह एक सबक भी है भारतीय मीडिया जगत के लिए कि वह अपनी साख को बचाए।
रही बात यूक्रेन-रूस के बीच युद्ध की तो अब महज औपचारिकता ही शेष है। कल सुरक्षा परिषद में रूस के खिलाफ लाए गए अमेरिका के प्रस्ताव पर वोटिंग के दौरान भारत और चीन ने अनुपस्थिति दर्ज करायी। या कहिए कि दो महत्वपूर्ण एशियाई देशों ने मध्य मार्ग का रास्ता चुना। चीन के बारे में तो चीन के लोग बताएंगे, लेकिन भारत के संदर्भ में हम इतना तो कह ही सकते हैं कि आज भी भारत इतना सक्षम नहीं है कि वह रूस और अमेरिका में किसी एक का भी विरोध कर सके। कल ही यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने नरेंद्र मोदी से फोन पर बातचीत की और उनसे रूस के खिलाफ कूटनीतिक सहयोग मांगा।
अब यह भी पर्दे के भीतर ही है कि नरेंद्र मोदी ने जेलेंस्की को असल में क्या कहा? वैसे क्या कह सकते हैं नरेंद्र मोदी? अब वे यह तो नहीं कह सकते कि हम आपको सैन्य सहयोग दे रहे हैं या फिर रूस से हम अपने संबंध तोड़ने जा रहे हैं? तो फिर क्या कहा होगा नरेंद्र मोदी ने?
इसे अब यही छोड़ता हूं। एक कविता सूझ रही है–
एक रोज ऊंचे पहाड़ पर
होगी बारूदी गंध के बदले
गुलबूटों की महक
और चूल्हों पर सीझेगा भात,
तवे पर सेंकी जाएंगीं रोटियां
और गरम मसाले की गमक फिर से 
नीचे मैदान तक पहुंचेगी।
एक रोज संसद की नींद खुलेगी
तब कटघरे में खड़ा होगा राजा
अपराधियों की तरह सिर झुकाए
और संसद के बाहर हंसेंगे बच्चे
गाएंगे खुशियों के गीत फिर से
और मांदर की थाप पर
नाचेगी गांव की गोरी
और उसकी पाजेब से
कोयल करेगी ईर्ष्या।

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

 

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