लोकरंग की यादगार यात्रा ने विलुप्त होती संस्कृतियों की एक मार्मिक झलक दी

दीपक शर्मा

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मैं कुशीनगर के लोकरंग कार्यक्रम के बारे में बहुत दिनों से सुन रहा था। इसकी चर्चा कभी-कभी काशी हिंदू विश्वविद्यालय में शोधार्थी मित्रों एवं साथियों के बीच भी करता था। एमए की पढ़ाई के दौरान सुभाष चंद्र कुशवाहा के बारे में कुछ-कुछ पढ़ा था किंतु उनसे मेरा कोई संपर्क नहीं था। एमए की पढ़ाई पूरी होते ही मैं नौकरी में आ गया। उसके कुछ ही महीने बाद गाँव के लोग पत्रिका के संपादक रामजी यादव और कार्यकारी संपादक अपर्णा मैम से मेरा साहित्यिक परिचय हुआ। यह सिर्फ परिचय ही नही था। मुझे अपने जीवन में जिस चीज की तलाश थी, गाँव के लोग कार्यालय से सबकुछ मिलने लगा। सर ने एक गुरु के रूप में मेरा शिष्यत्व स्वीकार किया और मेरे लिखने-पढ़ने और अध्ययन करने की दिशा ही बदल दी। मैं उनसे बहुत गहनता और आत्मीयता से जुड़ गया। उनके कार्यालय में आने-जाने लगा।

पत्रिका लोकरंग-4 का विमोचन

वहां से मैंने सुभाष चंद्रजी की कहानियां और चौरी चौरा विद्रोह पुस्तक लेकर पढ़ी। लोकरंग तीनों भाग भी लेकर घर पर आया। जिसे पढ़ने के पश्चात मेरी इच्छा होने लगी कि मैं लोकरंग कार्यक्रम देखने जाऊंगा। सुभाष जी को मैंने फेसबुक पर ढूँढा और आभासी रूप से उनके मित्र सूची में शामिल हो गया। उस दौरान मैसेंजर के माध्यम से उनसे कुछ औपचारिक बातचीत भी हुई थी।  मैंने एक बार रामजी सर से इच्छा जाहिर की कि मुझे भी लोकरंग कार्यक्रम देखना है और सुभाष जी से भेंट करनी है। सर पिछले वर्ष 2021 में ही मुझे लोकरंग में ले चलने के लिए तैयारी कर लिए थे किंतु कुछ विभागीय कार्यों की वजह से मुझे ही अपना कार्यक्रम रद्द करना पड़ा था। इस बार सर ने कहा कि तुम्हें लोकरंग में ले चलेंगे, मुझे बहुत खुशी हुई और जाने के लिए में तैयारी करने लगा।

लोकरंग परिवार,कार्यक्रम के समापन के बाद यादों में सहेजने हेतु ली गई तस्वीर

रामजी सर ने अपर्णा मैम के साथ मेरा भी टिकट करा दिया। 14 अप्रैल को भोर में  पाँच बजे ही मैं सर के आवास पर पहुंच गया था, स्कूटी उन्हीं के गलियारे में खड़ी की। मैम के साथ सर यात्रा का पूरा सामान बाँधकर तैयार थे। उनके साथ किताब का एक बड़ा सा बैग भी था। सारा सामान लेकर हम लोगों ने उनके आवास से तीन सौ मीटर दूर सड़क पर आकर ऑटो लिया और कैंट रेलवे स्टेशन पर आ गये। ट्रेन आने से आधे घंटे का समय शेष था। देवरिया जाने वाली ट्रेन के लिए प्लेटफार्म नंबर दो पर काफी भीड़ थी। वहां कुछ बच्चे हाथ फैलाकर कर भीख मांगते हुए दिखे। जिनके प्रति मन में दया आ रही थी तथा मन में सवाल आ रहा था कि सरकार का ध्यान इन बच्चों पर कब जाएगा? क्या इन्हें छोड़कर सम्पूर्ण साक्षर भारत  बनाया जायेगा। सबका साथ सबका विकास में ये बच्चे कैसे छूट जाते हैं? क्या ये लोग इस देश से अलग नागरिक हैं? हम लोग आपस में इस तरह से कुछ बात कर रहे थे कि प्लेटफार्म नंबर दो पर गोरखपुर इंटरसिटी आकर खड़ी हो गयी। लोग एक दूसरे को धक्के देते हुए ट्रेन में घुसने लगे। चूँकि हम लोगों की सीट रिजर्व थी इसलिए हम लोगों ने कुछ देर इंतजार किया लेकिन भीड़ काफी होने के कारण बीच में हम लोगों को भी ट्रेन में चढ़ना पड़ा फिर अपनी सीट पर इत्मीनान से बैठ गए और लोकरंग तथा कुछ अन्य विषयों पर चर्चा परिचर्चा करते हुए साढ़े चार घंटे में देवरिया स्टेशन पर पहुँच गए। गर्मी और धूप बहुत तेज थी। ट्रेन में पंखे का कोई असर नहीं मालूम होता था।

सचमुच सारे दृश्य अति आकर्षक और खूबसूरत लग रहे थे। संभावना कला मंच की पूरी टीम विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों से है जो वर्षों से डॉ. राजकुमार सिंह के निर्देशन में कार्य करती आ रही है। दुर्भाग्य से इस वर्ष गंभीर बीमारी के कारण वे कार्यक्रम में नहीं आ सके थे लेकिन उनकी पूरी टीम मेहनत से काम में लगी हुई थी। उन लोगों ने मंच को भी बहुत सुंदर ढंग से सजाया था।

ट्रेन से उतरते ही रामजी सर के मोबाइल पर असलम नामक एक गाड़ी चालक का फोन आया, जो हम लोगों को लेने के लिए प्लेटफार्म पर आ चुके थे। वहाँ सुभाष जी ने हम लोगों के लिए सेवा वाहन की व्यवस्था पहले से कर रखी थी। असलम ने सामान को गाड़ी तक ले चलने में हमारी मदद की और हम लोग उनके साथ कुशीनगर के लिए रवाना हो गए। रास्ते में रुक कर एक जगह चाय पी गई। फिर डॉ पवन कुमार खरवार के कुशीनगर हॉस्पिटल पर पहुँचे, जहां से प्रो. चौथीराम यादव और राम प्रकाश कुशवाहा हम लोगों के पहुँचने के पाँच मिनट पहले ही जा चुके थे। वे लोग बनारस से हवाई जहाज से गोरखपुर होते हुए कुशीनगर आए थे। वहां पानी पीकर थोड़ी देर आराम किया। तत्पश्चात जोगिया जुनूबी  पट्टी के लिए गाड़ी में पुनः बैठ गए। इसी बीच रत्नाकर भंते जी से भी मुलाकात हुई। उनसे कुशीनगर कचहरी में बैठकर बौद्ध धर्म और वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक विषय पर काफी सार्थक और अच्छी चर्चा हुई। उन्होंने हम लोगों के लिए फल मंगवाया। इसी बीच अपर्णा मैम के मोबाइल पर प्रवीण यादव नाम के एक साथी का फोन आया। उन्होंने कहा कि मैं कुशीनगर ओवर ब्रिज के नीचे खड़ा हूँ यहां से जोगिया जुनूबी पट्टी के लिए कैसे जाना होगा? वहाँ पहुंचकर हम लोग उन्हें भी अपने साथ ले लिए।

जोगिया जुनुबी पट्टी के हर बखार और दीवार पर संभावना कला मंच द्वारा उकेरे गए चित्र

जोगिया जुनूबी पट्टी पहुंचते ही सुभाष जी ने सहर्ष हम लोगों का स्वागत किया। हम लोग अपना सामान लेकर उनके घर के प्रथम तल पर चले गए। वहाँ अतिथियों के ठहरने की उचित व्यवस्था थी। जहां राम प्रकाश जी, चौथीराम यादव जी, डॉ. संजय कुमार, डॉ रतनलाल आदि विद्वान पहले से ही ठहरे हुए थे। चौथीराम जी के लिए अलग कमरा था जिनके साथ शाम को राम पुनियानी जी के ठहरने की भी व्यवस्था थी। लोग हॉल में से निकल कर चौथीराम जी के कमरे में जा जाकर उनसे मिल रहे थे और उनके साथ फोटो खिंचवा कर गौरवान्वित महसूस कर रहे थे। अपर्णा मैम के ठहरने की व्यवस्था सुभाष जी के किसी पड़ोसी के घर में की थी जहां नेपाल से आई एक सोशल एक्टिविस्ट उषा जी पहले से ठहरी हुई थीं। रामजी सर ने कई वरिष्ठ लोगों से मेरा परिचय कराया। मुझे बहुत ही अच्छा लगा।

अगोरा प्रकाशन की किताबें अब किन्डल पर भी…

दोपहर के भोजन के पश्चात मैं प्रवीण जी के साथ जोगिया जुनूबीपट्टी गाँव भी घूम आया।  सुभाष जी के घर से लोकरंग का मंच करीब 3-4 सौ मीटर दूर था। हर जगह संभावना कला मंच द्वारा सुंदर चित्रकारी की गई थी। दीवारों पर बने पेंटिंग और चित्र काफी आकर्षक लग रहे थे। उस रास्ते में लोगों के घरों के सामने गोलनुमा मिट्टी की सुंदर-सुंदर आकृतियां थी। इसके ऊपर शंक्वाकार झोपड़ी थी। संभावना कला मंच द्वारा उस पर सुंदर चित्रकारी की गई थी। मैंने प्रवीण जी से इसके बारे में जाना कि इसे भिठार कहते हैं। जो पहले हर गाँव में हुआ करता था। कटाई-मड़ाई के बाद इसमें अनाजों को सुरक्षित रखा जाता है।

हजारों की संख्या में कुर्सियां लगी हुई थीं। सर के साथ हम आगे से दूसरी पंक्ति की कुर्सी पर बैठे। ठीक साढ़े आठ बजे कार्यक्रम का शुभारंभ हो गया। सुभाष चंद्र कुशवाहा जी ने दूर-दूर से आए विद्वानों, दर्शकों, श्रोताओं एवं कलाकारों का स्वागत किया एवं मंच संचालन की जिम्मेदारी प्रो. दिनेश कुशवाह को दे दी।

दोपहर 2 घंटे ऊपर वाले हाल में विश्राम किया। शाम को करीब पाँच बजे रामजी सर और अपर्णा मैम के साथ कैमरा लेकर हम लोग घूमने निकल गए। जहां-जहां कुछ सुंदर चित्र दिखता अपर्णा मैम उसे अपने कैमरे में कैद कर लेती थीं। इस प्रकार हम लोग लोकरंग के प्रांगण में जा पहुंचे, जहां शाम को होने वाले कार्यक्रम की तैयारी चल रही थी। संभावना कला मंच द्वारा दीवारें पर चित्रकारी की जा रही थी। सचमुच सारे दृश्य अति आकर्षक और खूबसूरत लग रहे थे। संभावना कला मंच की पूरी टीम विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों से है जो वर्षों से डॉ. राजकुमार सिंह के निर्देशन में कार्य करती आ रही है। दुर्भाग्य से इस वर्ष गंभीर बीमारी के कारण वे कार्यक्रम में नहीं आ सके थे लेकिन उनकी पूरी टीम मेहनत से काम में लगी हुई थी। उन लोगों ने मंच को भी बहुत सुंदर ढंग से सजाया था। इसे देखते हुए रामजी सर और अपर्णा मैम ने लोक कलाकरों, संभावना कला मंच के चित्रकारों तथा लोकरंग टीम के कुछ विशेष लोगों से कैमरे पर साक्षात्कार किया। सर के साथ  मुझे भी कदम कदम पर कुछ नया देखने और सीखने को मिल रहा था और अच्छा लग रहा था।

सुभाषजी के घर पर एक मेज पर पुस्तकों का स्टॉल लगा हुआ था जहां लोकरंग व सुभाष जी द्वारा लिखित अनेक पुस्तकें थी। रामजी सर ने उन पुस्तकों में वृद्धि करते हुए अगोरा प्रकाशन की पुस्तकों को भी शामिल कर दिया। जो और अधिक आकर्षक लगने लगा। वहां दूर-दूर से आये अतिथियों ने काफी संख्या में पुस्तकों की खरीदारी की। कुछ पुस्तकें मैंने भी खरीदी।

ताल,भागलपुर की टीम द्वारा झिझिया नृत्य का प्रदर्शन

शाम को खाना खाने के बाद हम लोग लोकरंग सांस्कृतिक कार्यक्रम वाले प्रांगण में पुनःजा पहुंचे। वहां हजारों की संख्या में कुर्सियां लगी हुई थीं। सर के साथ हम आगे से दूसरी पंक्ति की कुर्सी पर बैठे। ठीक साढ़े आठ बजे कार्यक्रम का शुभारंभ हो गया। सुभाष चंद्र कुशवाहा जी ने दूर-दूर से आए विद्वानों, दर्शकों, श्रोताओं एवं कलाकारों का स्वागत किया एवं मंच संचालन की जिम्मेदारी प्रो. दिनेश कुशवाह को दे दी। सबसे पहले मंच पर चौथीराम यादव और राम पुनियानी जी को लाया गया, जिससे पूरा लोकरंग कार्यक्रम गौरवान्वित हो रहा था। उनके छोटे से वक्तव्य से कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत हुई। फिर सुमाष चन्द्र कुशवाहा द्वारा संपादित पुस्तक लोकरंग-4 का लोकार्पण हुआ। लोकार्पण के दौरान मंच पर प्रो.चौथीराम यादव, राम पुनियानीजी, प्रो. दिनेश कुशवाह, बीआर विप्लवी, प्रोफेसर सूरज बहादुर थापा, डॉ. रतनलाल, डॉ. संजय कुमार, रामप्रकाश कुशवाहा, रामजी यादव,  अपर्णाजी,  मनोज कुमार सिंह, उषाजी और राजमोहनजी सहित कई वरिष्ठ विद्वानों की उपस्थिति थी।

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सांस्कृतिक कार्यक्रम की शुरुआत बलिया के रंगकर्मी आशीष त्रिवेदी की टीम संकल्प के पारंपरिक लोकगीतों से हुई फिर राजन गोविंद राव का सुंदर बांसुरी वादन हुआ। पूरा प्रांगण दर्शकों श्रोताओं से भर चुका था। लोग अपने अनुसार कार्यक्रम का आनंद ले रहे थे। इसके पश्चात ताल नृत्य संस्थान भागलपुर बिहार द्वारा झिझिया, गोदना और जट जटिन लोक नृत्य तथा डोमकच और विदेशिया नृत्य की नाटिका प्रस्तुत की गई। जिसकी निर्देशिका श्वेता भारती थीं। इस प्रकार के नृत्य और लोक कला का प्रदर्शन साक्षात आंखों से मैंने पहली बार किसी मंच पर देखा। इसके पश्चात आम्रपाली लावणी डांस ग्रुप नागपुर द्वारा लावणी नृत्य प्रस्तुत किया गया। मुझे भाषायी दिक्कत आई लेकिन प्रस्तुति शानदार लगी। तत्पश्चात भुंगर खान मांगणियार एवं साथी कलाकारों द्वारा राजस्थानी लोकगीत एवं नृत्य की प्रस्तुति हुई। पहले दिन के कार्यक्रम के अंत में अभिषेक पंडित के निर्देशन में बोधू सिंह अहीर नाटक का मंचन हुआ। यह नाटक 1857 की एक घटना पर आधारित ऐतिहासिक नाटक गुमनाम योद्धा बोधू सिंह अहीर पर केंद्रित था।

कार्यक्रम समाप्त होने के बाद हमने कुछ विद्वानों के साथ फोटो खिंचवाया फिर साथियों के साथ हम लोग विश्राम करने के लिए चले गए।

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कार्यक्रम का दूसरा दिन भी आनंदमय था। सुबह चाय-नाश्ता के बाद 11:00 बजे विचार गोष्ठी आरंभ हुई गोष्ठी का विषय था- लोक संस्कृति का जन जागरूकता से रिश्ता था। इस विषय पर करीब तीस वक्ताओं ने अपनी बात रखी जिसमें एक छोटा-सा वक्तव्य मेरा भी था। कार्यक्रम की अध्यक्षता आदरणीय चौथीराम यादव कर रहे थे एवं मुख्य अतिथि राम पुनियानी जी थे। मंच पर आसीन विद्वानों में दिनेश कुशवाह, संजय कुमार, डॉ सूरज बहादुर थापा, चौथी राम यादव और राम पुनियानी जी थे। विचार गोष्ठी का संचालन वरिष्ठ कहानीकार रामजी यादव ने किया। मंचासीन विद्वानों के अतिरिक्त बृजेश यादव, डॉ रतनलाल, मनोज कुमार सिंह, बसंत ऋतुराज, डॉ. महेंद्र प्रसाद कुशवाहा, मोतीलाल, राम प्रकाश कुशवाहा, उषा, प्रवीण आदि अनेक लोगों ने विषय पर अपनी बात रखी। इससे पहले सुभाष चंद्र कुशवाहा ने अतिथियों का स्वागत करते हुए विषय पर शानदार बीज वक्तव्य दिया। अंत में धन्यवाद ज्ञापन के साथ विचार गोष्ठी के समापन की घोषणा हुई और हम लोग भोजन करके विश्राम करने के लिए चले गए।

लोक संस्कृति का जन जागरूकता से रिश्ता विषय पर परिचर्चा का आयोजन

शाम को खाना खाने से पहले दूर-दूर से आए हुए विद्वानों से मुलाकात और औपचारिक बातचीत होती रही। रात्रि ठीक 8:30 बजे लोकरंग सांस्कृतिक मंच पर दूसरे दिन का भी कार्यक्रम आरंभ हुआ। सुभाषजी के स्वागत वक्तव्य के बाद पूरी लोकरंग टीम की एक साथ फोटोग्राफी हुई। तत्पश्चात दिनेश कुशवाह ने मंच पर कलाकारों को बुलाना आरंभ किया। सबसे पहले नाद पटना के भोजपुरी लोकगीत कलाकारों की सुंदर प्रस्तुति हुई। इसके बाद दुई मुट्ठी मजूरी  जैसी ऐतिहासिक गिरमिटिया कृति के रचनाकार नीदरलैंड के सरनामी भोजपुरी गायक राजमोहन जी की शानदार प्रस्तुति हुई। राजमोहन जी को सुनने के लिए बेताब दर्शकों ने आत्मसंतोष का अनुभव किया। उनके गीतों में गिरमिटिया मजदूर के रूप में भारत देश के प्रति गहन पीड़ा थी। इसके पश्चात इप्टा आजमगढ़ द्वारा जांघिया और पांवरिया लोक नृत्य की प्रस्तुति हुई। इसके गायक कलाकार  बैजनाथ गँवार थे। इसके बाद कुछ और लोकनृत्य को प्रस्तुत किए गए। अंत में अखिलेश कुमार जयसवाल द्वारा लिखित नाटक मृदंगिया का मंचन हुआ, जिसके निर्देशक मोहम्मद जानी थे। यह नाटक बहुत ही मार्मिक एवं ज्वलंत सामाजिक मुद्दे पर था। तत्पश्चात धन्यवाद ज्ञापन के साथ लोकरंग 2022 का समापन हुआ।

आम्रपाली लावणी डांस ग्रुप नागपुर द्वारा लावणी नृत्य की प्रस्तुति

रात्रि विश्राम के पश्चात सुबह हम लोग जल्दी उठ गए थे। रामजी सर ने अपने कैमरे पर राजमोहनजी का साक्षात्कार किया। साक्षात्कार के कुछ देर बाद छत पर उषा जी तथा दो और शोध छात्राएं भी आईं। हम लोग वहां बैठकर करीब 2 घंटे तक हंसी-मजाक और कुछ गंभीर मसलों पर बातचीत करते रहें। यह बातचीत अनौपचारिक थी। जिसका मजा ही कुछ अलग था। ग्यारह बजे हम लोगों का सेवा वाहन सुभाषजी के गेट पर आ चुका था। गाड़ी में सामान रखा गया और हम लोग सुभाषजी से विदा लेते हुए कुशीनगर के लिए रवाना हो गए। इस बार हमारे साथ बसंत ऋतुराज भी थे। गाड़ी में बैठकर हम लोग एक दूसरे से आज के राजनीतिक हालात पर चर्चा परिचर्चा करते हुए कब कुशीनगर पहुंच गए पता ही नहीं चला। बसंत जी बस स्टैंड पर उतर गए, वहां से उन्हें गोरखपुर के लिए जाना था और हम लोग कुशीनगर स्थित महात्मा बुद्ध का परिनिर्वाण स्थल तथा जहां उन्हें जलाया गया था उस गोलनुमा स्तूप देखा। फिर ऑटो रिक्शा द्वारा देवरिया रेलवे स्टेशन पर आ गए। जहां एक होटल में भोजन करने के पश्चात प्लेटफार्म पर आ गए। ट्रेन आने में ढाई घंटे का समय था। हम लोगों ने प्रतीक्षालय गृह में इंतजार किया, फिर रात 8:00 बजे तक मुंबई सुपरफास्ट से बनारस वापस आ गए। इस प्रकार हमारी यात्रा संपन्न हुई। लोकरंग ने दिल पर गहरी छाप छोड़ी। अगले लोकरंग का इंतजार रहेगा….

दीपक शर्मा युवा कहानीकार और शिक्षक हैं।

किताब ‘लोकरंग 4’ अमेज़न पर भी…

2 Comments
  1. Gulabchand Yadav says

    बहुत बढ़िया सजीव और रोचक रिपोर्टिंग लोकरंग के आयोजन की। ऐसा लगा जैसे पाठक भी सहयात्री/सहभागी रहा हो इस विख्यात कार्यक्रम का। सचमुच में श्री सुभाषचंद्र कुशवाहा जी के कुशल मार्गदर्शन/संयोजन में यह कार्यक्रम दुर्लभ और अविस्मरणीय होता है। जो एक बार सहभागी हो लेता है वह हर साल इसमें उपस्थित रहने की कामना करता है और जो सोशल /प्रिंट मीडिया या अन्य माध्यमों से इसकी यशोगाथा से परिचित होता है वह मन मसोस कर रह जाता है जैसे मुंबई महानगर में रहने वाले मेरे जैसे लोग। बहरहाल लोकरंग आयोजन की जितनी भी तारीफ़ की जाए वह कम होगी। श्री सुभाष जी की इस तपस्या/साधना के क्या कहने। हार्दिक बधाई। दीपक भाई को भी इस बढ़िया रिपोर्टिंग/वृत्तांत के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

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