राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की जरूरत

आकांक्षा यादव

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हाल ही में कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा में महिलाओं को 40% टिकट देने की बात कहकर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। कुछ लोग इसे चुनावी जुमले के रूप में देख रहे हैं लेकिन कुछ लोग इसकी गंभीरता को भी समझ रहे हैं। राजनीति में महिलाएँ आज भी हाशिये पर हैं। न केवल उनकी संख्या कम है बल्कि राजनीतिक निर्णयों में उनकी भागीदारी अत्यल्प है। भारतीय राजनीति में आज भी महिलाओं की स्थिति संरक्षणवाद की शिकार है और जब भी वे स्वतंत्र निर्णय लेने की कोशिश करती हैं तब उन्हें चौतरफा हमले का सामना करना पड़ता है। लेकिन भारतीय राजनीति में महिलाओं ने सदैव अपने को बेहतर साबित किया है। इस तरह यह सवाल जटिलता का शिकार हो गया है लेकिन राजनीति में महिलाओं की भागीदारी अभी भी एक चुनौती है। इस मुद्दे पर विदुषी आकांक्षा यादव का यह लेख बहुत महत्वपूर्ण है गाँव के लोग 

चुनावों की सरगर्मी के बीच राजनीति में आधी आबादी की भागीदारी का सवाल फिर तेजी से उठने लगा है। देश के तमाम राजनैतिक दल भले ही अपने भाषणों और घोषणा पत्रों में नारी-सशक्तिकरण की बातें करते हों, पर वास्तविक धरातल पर यथार्थ कुछ और ही है। 17वीं लोकसभा चुनाव में कुल 8049 उम्मीदवार मैदान में थे, जिनमें 724 महिला उम्मीदवार थीं। 543 सदस्यों वाली 17वीं लोकसभा में कुल 78 महिलाएँ निर्वाचित हुईं थीं, जो कि अब तक का सर्वाधिक आंकड़ा है। महिला सांसदों की अब तक की इस सर्वाधिक भागीदारी के साथ ही लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या कुल सदस्य संख्या का 17 प्रतिशत हुई। महिला सांसदों की सबसे कम संख्या 9वीं लोकसभा में 28 थी।16वीं लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या मात्र 64 थी।

भारतीय राजनीति में तमाम महिलाएं शीर्ष पर स्थान बनाने में कामयाब हुई हैं। देश की राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, विपक्ष की नेता, कैबिनेट मंत्री और विभिन्न राज्यों में मुख्यमंत्री व राज्यपाल तक महिलाएं पदासीन रही हैं। भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांँधी, प्रथम महिला राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, प्रथम महिला केन्द्रीय मंत्री (स्वास्थ्य मंत्री) राजकुमारी अमृत कौर, प्रथम महिला विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, प्रथम महिला रेल मंत्री ममता बनर्जी, प्रथम महिला रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण, प्रथम महिला सांसद राधाबाई सुबरायण, राज्यसभा की प्रथम महिला उपसभापति नजमा हेपतुल्ला, लोकसभा की प्रथम महिला अध्यक्ष मीरा कुमार, लोकसभा में प्रथम महिला प्रतिपक्ष नेता सुषमा स्वराज, प्रथम महिला राज्यपाल सरोजिनी नायडू (उत्तर प्रदेश, 1947), प्रथम महिला मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी (उत्तर प्रदेश, 1963), प्रथम मुस्लिम महिला मुख्यमंत्री सैयद अनवरा तैमूर (असोम, 1980), प्रथम दलित महिला मुख्यमंत्री मायावती (उत्तर प्रदेश, 1995), प्रथम महिला विधायक मुत्तुलक्ष्मी रेड्डी, किसी राज्य की विधान सभा की प्रथम महिला स्पीकर शन्नो देवी जैसी तमाम महिलाओं ने समय-समय पर भारतीय राजनीति को नई ऊँचाइयाँ दी हैं। अभी तक भारत में 20 महिलाएं राज्यपाल बन चुकी हैं, जिसमें राजस्थान की पहली महिला राज्यपाल प्रतिभा पाटिल देश की पहली महिला राष्ट्रपति बनीं। विभिन्न राज्यों की मुख्यमंत्री के रूप में अब तक 15 महिलाओं ने गद्दी संभाली है। दलगत राजनीति की बात करें तो कांग्रेस पार्टी की प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष सरोजिनी नायडू रहीं तो कांग्रेस पार्टी में अध्यक्ष एवं संसदीय दल के नेता का दोहरा पदभार संभालने वाली प्रथम महिला नेता सोनिया गाँधी रहीं। बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती, तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी, अन्नाद्रमुक की अध्यक्ष स्वर्गीया जयललिता, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती सहित तमाम महिला नेत्रियों ने समय-समय पर अपने दलों का नेतृत्व किया है।

नारी सशक्तिकरण सिर्फ एक अमूर्त अवधारणा नहीं है बल्कि इसका किसी भी देश की राजनीति से गहरा संबंध होता है। यही कारण है कि इस पर जब भी चर्चा की जाती है तो अक्सर राजनीति में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व पर अफसोस जताया जाता है। वस्तुतः राजनीति में महिलाओं को बराबर की भागीदारी देने की बात विभिन्न राजनैतिक दलों, न्यूज चैनल्स से लेकर सार्वजनिक मंचों पर आए दिन होती है लेकिन उसके क्रियान्वयन के प्रति सभी राजनैतिक दल उदासीन ही रहते हैं।

 

उपरोक्त स्थिति देखकर किसी को भी भ्रम हो सकता है कि भारत में नारी सशक्तिकरण चरम पर है और महिलाएं न सिर्फ घर चला रही हैं बल्कि देश भी चला रही हैं। पर क्या वाकई ऐसा है या यह उपस्थिति प्रतीकात्मक मात्र है ? राजनैतिक स्तर पर ऊपरी तौर पर भले ही महिला प्रतिनिधित्व एक गुलाबी तस्वीर पेश करता है, पर इन सबके बीच भारत के संसदीय लोकतंत्र में महिलाओं की स्थिति कितनी कमजोर है, इसका पता दुनियाभर की संसदों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर अंतर्राष्ट्रीय संस्था इंटर पार्लियामेंट्री यूनियन (आईपीयू) द्वारा हर वर्ष अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर जारी आँकड़ों से चलता है। इसके अनुसार भारत की संसद या विधानसभा में महिला जनप्रतिनिधियों की काफी कम उपस्थिति महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण राजनीतिक मानसिकता का प्रतीक है। संसद के निचले सदन लोकसभा की बात करें तो महिला सांसदों के प्रतिशत के मामले में भारत विश्व में 193 देशों में 153वें स्थान पर है। आँकड़ों पर गौर फरमायें तो हम यूरोप, अमेरिका और दुनिया के अन्य विकसित देशों की संसदों में महिला जनप्रतिनिधियों की संख्या के मुकाबले बहुत पीछे हैं। हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, चीन और अफगानिस्तान भी हमसे कहीं आगे हैं।

संयुक्त राष्ट्र के मंच पर 22 मार्च, 2019 को संयुक्त राष्ट्र के लिये भारत के उप स्थायी प्रतिनिधि राजदूत नागराज नायडू ने बताया कि आज भारत में 14 लाख निर्वाचित महिला प्रतिनिधि हैं। निकाय स्तर पर चुने गये कुल प्रतिनिधियों में 44 प्रतिशित महिलाएं हैं जबकि भारत के गांवों में मुखिया के तौर पर 43 प्रतिशत महिलाएं चुनी गयीं हैं। इसके आगे नायडू ने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता में महिलाएं भले ही महत्वपूर्ण पदों पर हों लेकिन राष्ट्रीय संसद में उनका प्रतिनिधित्व अब भी कम बना हुआ है। पिछले आम चुनाव में निर्वाचित प्रतिनिधियों में मात्र 12 प्रतिशत महिलाएं चुन कर आईं। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम द्वारा तैयार एक रिपोर्ट में भी बताया गया है कि लैंगिक समानता के लिहाज 2018 में भारतीय संसद में महिलाओं की संख्या सबसे कम, महज 12 प्रतिशत है, जबकि सेनेगल जैसे देश की संसद में महिला प्रतिनिधियों की संख्या 42 प्रतिशत है।

नारी सशक्तिकरण सिर्फ एक अमूर्त अवधारणा नहीं है बल्कि इसका किसी भी देश की राजनीति से गहरा संबंध होता है। यही कारण है कि इस पर जब भी चर्चा की जाती है तो अक्सर राजनीति में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व पर अफसोस जताया जाता है। वस्तुतः राजनीति में महिलाओं को बराबर की भागीदारी देने की बात विभिन्न राजनैतिक दलों, न्यूज चैनल्स से लेकर सार्वजनिक मंचों पर आए दिन होती है लेकिन उसके क्रियान्वयन के प्रति सभी राजनैतिक दल उदासीन ही रहते हैं। भाषणों में नारी सशक्तिकरण तथा बराबरी की बात करनेवाले दलों की असलियत चुनावों में टिकट वितरण के दौरान ही सामने आ जाती है। अधिकतर महिलाएं जिन्हें टिकट मिलता है, वे भी ज्यादातर राजनैतिक परिवारों से ही संबंध रखती हैं। कई बार तो राजनैतिक दल प्रमुख महिला प्रत्याशी के खिलाफ महिला को ही मैदान में उतारते हैं। ऐसे में एक ही महिला चुनाव जीत पाती है और इस तरह बहुत सी प्रतिभावान महिलाएं संसद या विधानसभाओं में पहुँंचने से वंचित रह जाती हैं। यही कारण है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में विधायिका स्तर पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व अन्य देशों के मुकाबले काफी कम है।

दुनिया भर में राजनीतिक जीवन में महिलाओं द्वारा हासिल की गयी बढ़त और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ संघर्ष जारी रखने की प्रतिबद्धता के बीच संसद तक महिलाओं की पहुँंच कई कारणों से प्रभावित होती है जिसमें संसदों तक महिलाओं को पहुँंचाने में आरक्षण एक मुख्य माध्यम है। आईपीयू के अनुसार आरक्षण महत्वाकांक्षी, व्यापक होना चाहिए और उसे प्रभावकारी बनाने के लिए उसका क्रियान्वयन होना चाहिए।

 

महिलाओं की चुनाव प्रक्रिया में भागीदारी का विश्लेषण एक पिरामिड मॉडल के रूप में किया जा सकता है। इसमें सबसे ऊपर लोकसभा में उनकी 1952 में मौजूदगी (20 सीट) बढ़कर 2014 में 61 सीट तक आ गई है, जो कि 36 फीसदी वृद्धि को दर्शाता है। इस बढ़ती संख्या के बावजूद लैंगिक भेदभाव अब भी भारी मात्रा में मौजूद है और लोकसभा में दस में से नौ सांसद पुरुष हैं। 1952 में लोकसभा में महिलाओं की संख्या 4.4 फीसदी थी जो 2014 में करीब 11 फीसदी थी, लेकिन यह अब भी वैश्विक औसत 22 फीसदी से कम है। यदि चुनावों में खड़ी महिलाओं के सापेक्ष उनका प्रतिशत देखें तो दूसरे लोकसभा चुनाव में खड़ी होने वाली महिला उम्मीदवारों में 48.89 प्रतिशत, तीसरे चुनाव में 46.97, चैथे चुनाव में 43.28, पाँंचवें चुनाव में 24.49, छठें चुनाव में 27.14, सातवें चुनाव में 19.58, आठवें चुनाव में 25.15, नौवें चुनाव में 14.64, दसवें चुनाव में 11.51, ग्यारहवें चुनाव में 6.68, बारहवें चुनाव में 15.69, तेरहवें चुनाव में 17.25, चैदहवें चुनाव में 12.68, पंद्रहवें लोकसभा चुनाव में 10.61 प्रतिशत ने जीत दर्ज की।

दुनिया भर में राजनीतिक जीवन में महिलाओं द्वारा हासिल की गयी बढ़त और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ संघर्ष जारी रखने की प्रतिबद्धता के बीच संसद तक महिलाओं की पहुँंच कई कारणों से प्रभावित होती है जिसमें संसदों तक महिलाओं को पहुँंचाने में आरक्षण एक मुख्य माध्यम है। आईपीयू के अनुसार आरक्षण महत्वाकांक्षी, व्यापक होना चाहिए और उसे प्रभावकारी बनाने के लिए उसका क्रियान्वयन होना चाहिए। भारत में महिलाओं के मुद्दों के प्रति राजनीतिक दलों की गंभीरता महिला आरक्षण बिल को पास करने में असफलता से ही साफ हो जाती है। पिछले कुछ चुनावों के प्रमुख राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों पर नजर डालने से साफ हो जाता है कि उनमें लैंगिक मुद्दे प्रमुखता रखते हैं। महिला सशक्तिकरण यानी उन्हें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आधार पर बेहतर स्थान देने के वादे कमोबेश हर राजनीतिक दल के पिटारे में है। मगर सच्चाई इन लोक-लुभावन वादों से कोसों दूर है। संसद और विधानसभा में राजनीतिक दल महिला आरक्षण बिल पारित करने की हुंकार जरूर भरते हैं, लेकिन जब राजनीतिक नुमाइंदगी की बात आती है तो 10 फीसदी टिकट भी महिलाओं को नहीं दिये जाते। महिला उम्मीदवारों को जीतने लायक नहीं माना जाता। जिन महिलाओं को टिकट दिया भी जाता है उनमें से ज्यादातर किन्हीं राजनीतिक दल के नेताओं की सगी-संबंधी होती हैं। ऐसे में आर्थिक और सामाजिक बंधनों से मुक्त होने के लिए संघर्ष कर रही आम महिलाओं को वाजिब प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता। महिलाओं का राजनीतिक स्तर सुधारने के उद्देश्य से उठाये गये पहले कदम के रूप में सरकार द्वारा 1992 में 73 वें और 74 वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा क्रमशः पंचायतों और नगर पालिका स्तर पर महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण का प्रावधान किया गया। इससे प्राथमिक स्तर पर राजनीति में महिलाओं की भागीदारी तो सुनिश्चित हो गई किन्तु इससे आगे संसद में कोई फर्क नहीं पड़ा। तब संसद में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए एक नये विधेयक की जरूरत महसूस की जाने लगी। यदि महिला आरक्षण कानून लागू हो जाये, तो लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या स्वतः 179 हो जायेगी।

महिला आरक्षण विधेयक को सर्वप्रथम 12 सितम्बर, 1996 को 81वें संविधान संशोधन के साथ एच.डी. देवगौड़ा की संयुक्त मोर्चा सरकार ने लोकसभा में पेश किया, लेकिन 1997 में 11वीं लोकसभा भंग होने के साथ ही यह विधेयक भी ठंडे बस्ते में चला गया। अंतिम बार महिला आरक्षण विधेयक, 2008 (108वाँ संविधान संशोधन विधेयक) को राज्यसभा ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के एक दिन बाद 9 मार्च 2010 को पारित किया था, लेकिन 9 साल बीतने के बाद भी यह लोकसभा से पारित नहीं हो पाया है। लोकसभा का कार्यकाल पूरा हो जाने की वज़ह से यह विधेयक रद्द हो जाता है। इस विधेयक में महिलाओं के लिये लोकसभा और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है। व्यावहारिक तौर पर देखें तो राजनैतिक दल स्वयमेव अपने स्तर पर भी टिकट बँटवारे के समय महिलाओं को आरक्षण दे सकते हैं, पर आज तक किसी राजनैतिक दल ने इस संबंध में कदम नहीं उठाया। आज तक के विधानसभा व लोकसभा चुनावों का चार्ट देखा जाय तो इन पार्टियाँ ने 33 प्रतिशत कौन कहे, 10 प्रतिशत भी महिलाओं को टिकट नहीं दिया।

आज देश में कुल मतदाताओं की संख्या में आधी संख्या महिला वोटरों की है, पर उनकी संख्या के हिसाब से उन्हें समान आधार पर नेतृत्व कभी नहीं मिला। सवाल यह उठता है कि एक तिहाई आरक्षण का आधार क्या है और एक तिहाई आरक्षण ही क्यों ? अगर जनसंख्या को आधार बनाना है तो यह आरक्षण स्त्री-पुरुष अनुपात के हिसाब से होना चाहिए। साथ ही यह आरक्षण केवल लोकसभा और विधानसभाओं में ही क्यों?

 

भारत में महिला आंदोलन इस वक्त संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के सवालों पर सकारात्मक कार्रवाई को लेकर बँंटा हुआ है। यह मूलतः दो बातों पर केंद्रित है- पहला कुल मिलाकर महिला आरक्षण का कोटा बढ़ाने को लेकर और उसमें पिछड़ी जाति की महिलाओं को लेकर और दूसरा अभिजात्यवाद के मुद्दे पर। निस्संदेह संसदीय सीटों पर मिले आरक्षण में जिस प्रकार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को शीर्ष स्तर पर पहचान मिली है, उसी प्रकार विधायिका में महिलाओं को आरक्षण मिलने से उनकी राजनीतिक और सामाजिक हैसियत में भी सकारात्मक बदलाव आएगा। समाज के दलित-पिछड़े वर्ग से आने वाली महिला प्रतिनिधियों के साथ कैसा व्यवहार होता है, किसी से नहीं छुपा है। बिहार से मुसहर जाति की एक सांसद को टी.टी. ने ट्रेन के वातानुकूलित कोच से परिचय देने के बावजूद इसलिये बाहर निकाल दिया क्योंकि वह वेश-भूषा से वातानुकूलित कोच में बैठने लायक नहीं लगती थीं।

दुनिया भर में महिलाओं को भेदभाव, हिंसा, पार्टियों के ढांचे, गरीबी और धन की कमी के चलते संसदों से दूर रखा जाता है। लोकसभा और फैसले लेने वाली जगहों, जैसे कि मंत्रिमंडल में महिलाओं का कम प्रतिनिधित्व सीधे-सीधे राजनीतिक ढांचे से उनको सुनियोजित ढंग से बाहर रखने और मूलभूत लैंगिक भेदभाव को रेखांकित करता है। आईपीयू के मुताबिक सरकार में मंत्री पद संभालने के मोर्चे पर भारत दुनिया में 37वें नंबर पर है। नरेंद्र मोदी के 27 केंद्रीय मंत्रियों के मंत्रिमंडल में छः महिलाओं को जगह मिली है। यह 22.2 फीसदी है। दुनिया के 273 सदनों में से 43 (15.8 फीसद) में अध्यक्ष पद महिलाओं के हाथ में है। इनमें लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन भी हैं। हालांकि महिलाएं राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर ठीक-ठाक संख्या में राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व करती हैं लेकिन इन राजनीतिक दलों में भी उच्च पदों पर महिलाओं की उपस्थिति कम ही है।

आज देश में कुल मतदाताओं की संख्या में आधी संख्या महिला वोटरों की है, पर उनकी संख्या के हिसाब से उन्हें समान आधार पर नेतृत्व कभी नहीं मिला। सवाल यह उठता है कि एक तिहाई आरक्षण का आधार क्या है और एक तिहाई आरक्षण ही क्यों ? अगर जनसंख्या को आधार बनाना है तो यह आरक्षण स्त्री-पुरुष अनुपात के हिसाब से होना चाहिए। साथ ही यह आरक्षण केवल लोकसभा और विधानसभाओं में ही क्यों? इसके साथ ही इसका प्रावधान राज्यसभा और विधान परिषदों में भी होना चाहिए। संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण एक तस्वीर बदलने वाला मुकाम साबित हो सकता है क्योंकि यह कदम न सिर्फ पितृसत्तात्मक सोच को बदलेगा बल्कि इससे महिला-समर्थक कानूनों को भी बढ़ावा मिलेगा। इससे कन्या शिशु के बारे में भी धारणा बदलेगी। फिलहाल पंचायती राज में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण देने की बात चल रही है। जब संसद में महिलाएँ सशक्त बनती हैं, और वह भी बड़ी संख्या में, तो वह ज्यादा से ज्यादा लोगों की प्रतिनिधि हो जाती हैं। ऐसे में महिलाओं को बोझ समझने वाली पूरी सोच को ही बदला जा सकता है। यदि संसद में 33 प्रतिशत महिलाएंँ हैं तो वे महिलाओं के हितों और जरूरतों को आगे बढ़ाने के लिए तेजी से पार्टी लाइन में आगे बढ़ेंगीं। 33 प्रतिशत आरक्षण तो बस एक शुरुआत है और असली लक्ष्य बराबरी होना चाहिए। तभी स्त्रियों के अधिकारों उनकी समस्याओं, स्त्री विमर्श तथा उनकी मुक्ति संबंधी विषयों पर संसद में खुलकर बहस हो सकती है।

वक्त के साथ महिलाओं ने सफलता के तमाम नए आयाम रचे हैं। शिक्षा, नौकरी, पैतृक सम्पत्ति में बराबरी का हक पाने के साथ ही आई.टी. एवं विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी अपनी योग्यता सिद्ध की है। ऐसे में इसमें कोई शक नहीं कि महिलाएं राजनीति में बेहतर कर सकती हैं। संभवतः पितृसत्तात्मक राजनीति में इसे स्वीकार करने का माद्दा नहीं है। यही वजह है कि महिलाएं तमाम विरोध के बावजूद अगर टिकट पा भी जाती हैं तो उनके पक्ष में उनकी पार्टी के लोगों को कई बार खड़े होने में हिचक होती है। कई बार राजनीति के प्रति उदासीनता भी महिलाओं को इस क्षेत्र में आगे बढ़ने से रोकती है। व्यवस्था परिवर्तन के लिए राजनीति एक सशक्त माध्यम माना गया है। इसमें उन्हें अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। राजनैतिक दलों की पहल पर ही महिलाओं की राजनीति में भागीदारी आसानी से बढ़ सकती है। दलों के संगठनात्मक ढाँचा खड़ा करने से लेकर टिकट वितरण तक महिलाओं का स्थान तय करना होगा। अब महिलाओं को अपनी मंजिल खुद तय करनी होगी और इस मंजिल को पाने के लिये खुद ही रास्ते तलाशने होंगे। सत्ता में महिलाओं की भागीदारी का अनुपात किसी भी देश की सार्थक प्रगति का मापदंड है। अब समय आ गया है कि हमारे देश की राजनीति और राजनेता महिलाओं के प्रति अपनी सोच को उदार बनायें और उन्हें समुचित स्थान दें।

आकांक्षा यादव एक कॉलेज में प्रवक्ता रही हैं। आधी आबादी के सरोकार  सहित उनकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हैं। 

1 Comment
  1. अवनीश कुमार सिंह says

    *जी… बेहतर समसामयिक बातो के परिप्रेक्ष्य मे पढने को मिलते है… ?

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