Wednesday, May 29, 2024
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जो मण्डल कमीशन का विरोधी वही बन रहा हितैषी

सरकार द्वारा लैट्रल इंट्री पर संयुक्त सचिव स्तर पर आईएएस में सीधी साक्षात्कार करके की जाने वाली भर्ती के विज्ञापन में एससी, एसटी, ओबीसी आवेदन के पात्र नहीं लिखा गया है। ऐसा करके हमें संविधान में दिया गया अवसर की समानता के अधिकार से वंचित किया गया है। जो हमारे मूल अधिकारों का हनन है और हम मोदी के गुणगान कर रहे हैं।

जब बोफोर्स घोटाले के मुद्दे पर वीपी सिंह ने कांग्रेस छोड़कर राष्ट्रीय मोर्चा का गठन किया तो सवर्ण जातियों ने उन्हें मिस्टर क्लीन की संज्ञा देते हुए नारा दिया था- ‘राजा नहीं फ़क़ीर है, देश की तक़दीर है।’ 7 अगस्त, 1990 को विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जब मण्डल आयोग की सिफारिश के अनुसार अन्य पिछड़े वर्ग की जातियों को सरकारी सेवाओं में 27 प्रतिशत कोटा देने का निर्णय लिया तो जनता दल सरकार को बाहर से समर्थन दे रही भाजपा इस निर्णय के विरोध में थी। जनता दल में सम्मिलित अनेक सवर्ण नेता जैसे स्व. चन्द्रशेखर, स्व. देवी लाल, सत्यप्रकाश मालवीय, चौधरी अजीत सिंह व अन्य इस फैसले के विरोध में थे। जिसका उन्होंने मुखर विरोध भी किया। लेकिन वीपी सिंह अपने निर्णय पर अडिग रहे।जनता दल ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में मण्डल कमीशन की सिफ़ारिश को लागू करने का संकल्प लिया था। जब 13 अगस्त, 1990 को मण्डल कमीशन की सिफारिश के अनुसार ओबीसी को 27 प्रतिशत कोटा की अधिसूचना जारी की गई तो सवर्ण जातियों ने धमाल मचा दिया। रातोरात नारा बदल गया- ‘राजा नहीं रंक है, देश का कलंक है, मान सिंह की औलाद है।

मण्डल कमीशन के विरोध में डीयू, बीएचयू, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, पटना विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय सहित 22 विश्वविद्यालयों के सवर्ण छात्र सड़कों पर उतर आये। अनेक शासकीय सम्पत्तियों में तोड़-फोड़ और आगजनी की गयी, क्योंकि भाजपा व सवर्ण नेताओं को 60% ओबीसी को नौकरियों में 27% की भागीदारी देना भी स्वीकार नहीं था। जैसा कि यदि जरा भी बुद्धि लगाओगे तो समझ में आयेगा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात सवर्णों द्वारा शासकीय एवं सार्वजनिक उपक्रमों में साक्षात्कार के बल पर अघोषित आरक्षण चलाया गया और पिछडों की हकमारी शुरू की गई। मण्डल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के विरोध में चलाया गया आन्दोलन स्वतंत्र भारत का जेपी आन्दोलन के अलावा सबसे बड़ा आन्दोलन था। पर वीपी सिंह के सामाजिक न्याय की दृढ़ इच्छाशक्ति के कारण पिछड़ों को न्याय मिला। मण्डल कमीशन के विरोध में सवर्ण संगठनों ने 42 याचिकाएं उच्चतम न्यायालय में योजित किया। जिस पर न्यायालय ने 10 अक्टूबर, 1990 को स्थगन आदेश जारी कर दिया। मण्डल कमीशन की पैरवी करने के लिए कोई सवर्ण वकील तैयार नहीं हुआ। अंत में लालू प्रसाद यादव ने क्रिमिनल लॉयर राम जेठमलानी को तैयार किया। इंदिरा साहनी व अन्य बनाम भारत सरकार (एआईआर 477 एससी) मामले में 9 न्यायाधीशों की पूर्ण संविधान पीठ ने दो-तिहाई बहुमत से 16 नवम्बर, 1992 को संवैधानिक करार देते हुए ओबीसी आरक्षण कोटे को वैध करार दिया।

पिछड़ी जातियों की नासमझी व विडम्बना है कि ये दोस्त व दुश्मन को पहचान नहीं पा रहा है। जो मण्डल कमीशन का विरोधी है उसी को हितैषी मान विरोधी की नाव का खेवनहार बना हुआ है। वर्तमान में ओबीसी, एससी के नेता निजस्वार्थ में अपनों की हकमारी करा रहे हैं। दुश्मन की सेना के शिखण्डी बने हुए हैं। ‘हमें अपनों ने लूटा, दूसरे में कहाँ दम था, हमारी कश्ती वहाँ डूबी, जहाँ पानी कम था… कहावत को स्वार्थी नेता व नीलवर्ण श्रृंगाल ओबीसी प्रधानमंत्री चरितार्थ कर रहे हैं। प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित होने के बाद नरेन्द्र मोदी ने 11 अक्टूबर, 2013 को कोच्चि के माता अमृतानन्दमयी देवी के आश्रम में कहा था- ‘हम पिछड़ी जाति के हैं और राजनीति में बहुतों के लिए अछूत हैं, लेकिन अगला 10 वर्ष पिछड़ों, दलितों का होगा।’ लेकिन इनके प्रधानमंत्री बनते ही लम्बे संघर्षों की बदौलत पिछड़ों को मिले अधिकारों पर कैंची चलने लगी।

मण्डल विरोधी भाजपा को मजबूती पिछड़ों, दलितों की ही बदौलत मिली है। भाजपा को सत्ता शिखर पर पहुंचाने में पिछड़ों का ही योगदान है, लेकिन पिछड़ों के वोटबैंक से सत्ता हथियाने वाली भाजपा एक-एक कर पिछड़ों की हकमारी कर रही है। पिछड़ा-दलित विरोधी भाजपा की सेना में पिछड़े वर्ग के हुक़ूमदेव नारायन यादव, लक्ष्मीनारायण यादव, भूपेन्द्र यादव, नित्यानंद राय, गंगाराम अहीर, रामकृपाल यादव, धर्मेन्द्र प्रधान, उमा भारती, साक्षी महाराज, स्वतंत्र देव सिंह, साध्वी निरंजन ज्योति, साध्वी प्राची, धर्मपाल सिंह लोधी, धर्मपाल सिंह सैनी, राव वीरेन्द्र सिंह, शिवराज सिंह, किरनपाल सिंह गुजर, केशव प्रसाद मौर्य, संजय निषाद, अनुप्रिया पटेल, राकेश सचान, संजीव बालियान, एसपी सिंह बघेल आदि शिखण्डी बनकर पिछड़ों, दलितों के संवैधानिक अधिकारों पर डाका डलवा रहे हैं।

देश की वर्तमान मोदी सरकार ने पिछड़ों के विरुद्ध जिस कूटनीतिक चाल से उनकी जड़ें खोद डालीं, उसे 60% ओबीसी समझ ही नहीं पा रहा है। वह रामराज्य ला रहा है, जिसमें उसे शिक्षा ग्रहण करने, यहां तक कि जप-तप करने पर प्राणों की बलि देनी पड़ती थी। वह राम मन्दिर बनने से खुश, धारा 370 हटने से खुश, कांवड़ यात्रा, परिक्रमा, आरती, दीपोत्सव, मन्दिरों के कॉरीडोर निर्माण, मुसलमानों के मनोबल टूटने से खुश, हर हर मोदी-घर घर मोदी का नारा लगाने व दुर्गा पंडाल सजाने में जुटा है। एक मोदी ने तो तुम्हें 50 साल पीछे कर दिया, आगे देखो होता क्या है?

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पहले सुप्रीम कोर्ट से आरक्षण पर फैसला यदि आरक्षित वर्ग में आवेदन है तो 27% आरक्षित सीट में ही सीट मिलेगी। चाहें आप टापर हों सीट आरक्षित घेर लेंगे, मार्जिन के अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के दौरान 40 से 50% अंक देकर बाहर कर ही दिया जायेगा। आरक्षित वर्गों के लिए क्वालीफाइंग कट ऑफ भी तय। यदि सभी पद नहीं भरे तो रिक्त रह गये पद सामान्य श्रेणी में जोड़  दिये जायेंगे। अब कोई बैकलॉग भर्ती नहीं होगी। गलत क्रीमीलेयर नीति व साक्षात्कार के द्वारा पिछड़ों को पीछे किया जा रहा है।

उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की 2011 के विज्ञापन के आधार पर 14 अगस्त, 2013 को घोषित अंतिम परिणाम के बाद भाजपा ने 86 में 56 यादव एसडीएम बनाने का ऐसा मीडिया ट्रायल व दुष्प्रचार कराया कि सारी गैर यादव जातियाँ यादवों को अपना दुश्मन मानकर ‘असली दुश्मन’ के पाले में चली गईं, जिनकी बदौलत सत्ता हथियाने के बाद पिछड़ों की हकमारी की जा रही है और सत्ता की मलाई खा रहे पिछड़े, दलित वर्ग के ज़मीर हीन नेता मुँह पर जाब लगाए चुप्पी साधे हुए हैं। भाजपा के ओबीसी, एससी नेता ‘अपना भला भला जगमाहीं’ के अनुसार वर्गीय भावना को त्याग शत्रु को मजबूत करने में जुटे हुए हैं। बताते चलें कि 1951 से 2017 तक कभी 86 एसडीएम के पद विज्ञापित ही नहीं हुए तो 86 में 56 यादव जाति के एसडीएम कहाँ से हो गए। जब 86 में 56 यादव एसडीएम का प्रोपगंडा किया गया, उस समय 30 में 5 यादव एसडीएम चयनित हुए थे। पुण्य प्रसून बाजपेयी ने 86 में 56 यादव एसडीएम के मुद्दे पर आजतक पर दस्तक नाम से 1 घंटे का कार्यक्रम चलाकर पिछड़ों में नफ़रत की भावना भरने का काम किया। पिछड़ों की विडंबना है- कउआ तेरा कान ले गया… तो ये अपना कान नहीं देखते, पेड़ की डाल पर देखते हैं कि कउवा कान लेकर कहाँ गया।

सरकार द्वारा संसद में आर्थिक पिछड़े वर्ग के नाम पर 12-13% सवर्ण जनसंख्या के लिए 10% पद आरक्षित जिनके लिए कोई क्वालीफाइंग मेरिट नहीं, जिसके कारण उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में 3 अंक पाकर ईडब्ल्यूएस सवर्ण अभ्यर्थी चयनित, उत्तराखण्ड में पीसीएसजे में 2020 में 30 अंक पाने वाले सवर्ण जज बन गए। पिछले महीनों हरियाणा व मध्यप्रदेश में न्यायिक सेवा में ओबीसी, एससी, एसटी के लिखित में सफल अभ्यर्थियों को साक्षात्कार में कम नम्बर लेकर बाहर कर दिया गया। आज हर परीक्षा में ओबीसी की मेरिट सामान्य से अधिक जा रही है। निजीकरण की राह पर चलकर पिछड़ों की नौकरी से छुट्टी तय कर दी गयी है। आश्चर्य होता है कि 12-13% जनसंख्या के लिए 10% आरक्षण कोटा के निर्णय पर संसद में दो-चार नेताओं के विरोध के अलावा कोई शोर शराबा नहीं, कोई सड़कों पर नहीं उतर सका। आर्थिक पिछड़ेपन की आय सीमा ओबीसी के क्रीमी लेयर के बराबर, यहां तक कि उत्तर प्रदेश के पूर्व बेसिक शिक्षा मंत्री के भाई इस कैटेगरी में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर चयनित हो गये। कई विश्वविद्यालयों व संस्थानों में ईडब्ल्यूएस को निर्धारित 10% कोटा के अतिरिक्त पद आबंटित किये जा रहे हैं और ओबीसी को कोटा से भी बाहर कर दिया जा रहा है।

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भाजपा व उसके आनुषांगिक संगठन गैर यादव व गैर जाटव जातियों में नफ़रत पैदा करने के लिए माहौल बनाया, सपा सरकार को एक जाति विशेष की सरकार बताकर बदनाम किया। अतिपिछड़ों, अतिदलितों की बदौलत सत्ता में आते ही भाजपा सवर्ण कार्ड खेलने लगी। योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद उच्चतर न्यायिक सेवा चयन आयोग के घोषित परिणाम में 61 में 52 सवर्ण जज बन गए। गोरखपुर विश्वविद्यालय में 71 प्राध्यापक नियुक्ति में 38 ठाकुर, 24 ब्राह्मण सहित 66 सवर्ण प्रोफेसर भर्ती हुए तो कोई हो-हल्ला नहीं हुआ। अभी पिछले महीने शिक्षा संकाय में 4 प्रोफेसर की भर्ती हुई जिसमें सभी ठाकुर ही हुए। बाँदा कृषि विश्वविद्यालय में 13 प्राध्यापक भर्ती में 11 ठाकुर जाति के ही थे। उच्च शिक्षा विभाग द्वारा वनस्पति विज्ञान विभाग में 13 प्रोफेसर भर्ती में 11 सवर्ण चयनित हुए। रोस्टर के आधार पर भी भर्ती हुई होती तो 3 ओबीसी के चयनित होते। जननायक चन्द्रशेखर विश्वविद्यालय बलिया में 13 प्रोफेसर पद पर हुई भर्ती में 9 ब्राह्मण व 3 भूमिहार ब्राह्मण का चयन किया गया, लेकिन यह जातिवाद नहीं रामराज है और रामराज में तो निर्दोष शम्बूक की गर्दन कटवाई गयी। आज उसी नीति का पालन हो रहा है।

उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग भर्ती परीक्षा परिणाम 12 अप्रैल, 2021 के अनुसार 290 पदों के सापेक्ष 263 स्नातक व स्नातकोत्तर महाविद्यालयों में प्राचार्य पद पर चयन किया गया। जिसमें 222 सवर्ण (84.41%) जिसमें 78 ब्राह्मण, 54 राजपूत, 11 कायस्थ, 16 वैश्य, 4 भूमिहार प्राचार्य चयनित हुए। ओबीसी के 72 पदों के सापेक्ष मात्र 19 (7%) ओबीसी व 50 पदों के सापेक्ष मात्र 7 (2.66%) एससी प्राचार्य चयनित हुए। खुलेआम ओबीसी के 53 व एससी के 43 प्राचार्य पदों की हकमारी की गई और 50 प्रतिशत ओबीसी, एससी, एसटी को मात्र 9.66 प्रतिशत ही हिस्सेदारी मिली, 40.34 प्रतिशत यानी 96 पदों की हकमारी की गई। उपनिरीक्षक गोपनीय एवं सतर्कता विभाग उत्तर प्रदेश पुलिस की 2022 की 156 पद पर भर्ती में ओबीसी को 41/42 पद के सापेक्ष मात्र 3 पद देकर 39 पदों की हकमारी की गई। इसी तरह एससी को 32 पद के सापेक्ष मात्र 11 पद देकर 21 पद व एसटी को 3 के सापेक्ष शून्य रखकर 3 पद की हकमारी की गई।

69 हजार शिक्षक भर्ती में 18 हजार ओबीसी के पदों पर सवर्ण चयनित कर लिए गए, कितना बड़ा अंधेर है। लेकिन हमें आर्थिक पिछड़े आरक्षण के अंर्तगत सभी वर्गों के अभ्यर्थियों को आरक्षण क्यों नहीं दिया गया। क्या यह भेदभाव नहीं है।

सरकार द्वारा लैट्रल इंट्री पर संयुक्त सचिव स्तर पर आईएएस में सीधी साक्षात्कार करके की जाने वाली भर्ती के विज्ञापन में एससी, एसटी, ओबीसी आवेदन के पात्र नहीं लिखा गया है। ऐसा करके हमें संविधान में दिया गया अवसर की समानता के अधिकार से वंचित किया गया है। जो हमारे मूल अधिकारों का हनन है और हम मोदी के गुणगान कर रहे हैं।

वर्तमान भाजपा सरकार तानाशाही पर उतर आई है, यदि अब भी ओबीसी भाजपा को वोट देता है तो हम उसे कुलघाती ही कहेंगे जिसे आने वाली पीढ़ियां माँफ नहीं करेंगी।

गाँव के लोग
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