लोक संस्कृति की वास्तविक पहचान करनी होगी

समीर

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छब्बीस अक्टूबर को जन संस्कृति मंच का 37वाँ स्थापना दिवस गोरख पांडेय स्मृति सभागार, बी.एम.क्लासेज (दरभंगा) में आयोजित किया गया।
जनसंस्कृति मंच के स्थापना दिवस के साथ ही प्रतिरोध की संस्कृति के बुलंद राजनीतिक स्वर भोजपुर आंदोलन के दुर्धर्ष योद्धा कॉमरेड रामनरेश राम के स्मृति दिवस के मौके पर  उनकी तस्वीर पर माल्यार्पण कर इंक़लाबी नारों के साथ उनकी क्रांतिकारी विरासत को ज़िंदा रखने का संकल्प लिया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता जिलाध्यक्ष डॉ. रामबाबू आर्य ने की।
चार सत्रों में संपन्न स्थापना दिवस समारोह के पहले वैचारिक सत्र की शुरुआत जसम दरभंगा के संस्थापक जिलाध्यक्ष प्रो.अवधेश कुमार सिंह के शुभकामना संदेश से हुई। उन्होंने अपने सन्देश में कहा कि पूरे देश में फ़ासीवाद के खिलाफ प्रतिरोध की संस्कृति की अगुआई जन संस्कृति मंच कर रहा है। निःसन्देह दरभंगा में भी सांस्कृतिक आंदोलन तीव्र हुआ है। आने वाले दिनों में जनता को दिग्भ्रमित करने वाले सत्ता सम्पोषित उत्सवों-महोत्सवों के बरअक्स जन सांस्कृतिक महोत्सव आदि मनाने की शुरुआत की जाए। आज समाज में एक बड़े परिवर्तनकारी सांस्कृतिक आंदोलन की जरूरत है।
जसम दरभंगा के जिला सचिव समीर द्वारा जन संस्कृति मंच के संस्थापक राष्ट्रीय महासचिव गोरख पांडेय के आलेख जनसंस्कृति की अवधारणा का पाठ किया गया तथा प्रथम राष्ट्रीय कार्यकारिणी का परिचय कराया गया।
समारोह के दूसरे सत्र में जनसंस्कृति मंच की जरूरत क्यों है? विषय पर बोलते हुए जसम राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य डॉ. सुरेंद्र सुमन ने जन संस्कृति मंच के इतिहास और वैचारिकी पर बात करते हुए कहा कि जन संस्कृति प्रतिरोध की संस्कृति है। पूँजीवादी और ब्राह्मणवादी संस्कृति आम जनता को रुढ़िवादी, दकियानूस बनाए रखने में मुख्य भूमिका निभाती है। समाज को विभाजित करती है। इसके खिलाफ़ जन संस्कृति जनता के हक़-हुक़ूक़ की लड़ाई के साथ जनचेतना को विकसित कर देश को वास्तविक आज़ादी दिलाने की हिमायती है। जिस वास्तविक आज़ादी के लिए हमारी महान जनता ने हमेशा संघर्ष किया है।

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तीसरे सत्र जन संस्कृति मंच: उद्देश्य और कार्यक्रम में डॉ. रामबाबू आर्य ने कहा कि जसम साम्प्रदायिक फ़ासीवाद, साम्राज्यवाद, अंधराष्ट्रवाद और ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक सामंती सोच का विरोध करता है। जन संस्कृति श्रमिकों के श्रम का मूल्य पहचानने की संस्कृति है। समाज में वर्चस्वशाली शक्तियों की संस्कृति को ही सबकी संस्कृति घोषित कर दिया जाता है। यह घोषित सांस्कृतिक संहार है। जन संस्कृति संघर्षशील आम अवाम की सांस्कृतिक-सामाजिक अभिव्यक्ति है। इसकी रक्षा और विकास का दायित्व समतामूलक समाज का स्वप्न देखने वाले तमाम लोगों का है।
कार्यक्रम के समापन सत्र में जसम दरभंगा के वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी कॉमरेड भोला  द्वारा गोरख पांडेय का गीत  जनता के आबे पलटनिया प्रस्तुत किया गया।

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धन्यवाद ज्ञापन करते हुए डॉ. संजय कुमार ने कहा कि एक प्रतिगामी संस्कृति के सामने एक प्रति संस्कृति खड़ी करने की बात है। ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद के जबरदस्त गठजोड़ ने देश की सांस्कृतिक बहुलता को नष्ट किया है। इसी प्रतिगामी संस्कृति का प्रभाव है कि नई शिक्षा नीति-2020 के जरिये सरकार शिक्षा को सर्वसुलभ के बजाए कुछ विशेष वर्गों तक सीमित करना चाह रही। आमजन को प्रबुद्ध बनाने के लिए शिक्षा नहीं दी जा रही बल्कि कुशल कारीगर बनने की तालीम दी जा रही। वर्ण व्यवस्था का यह नवीकरण भयानक है। इस सांस्कृतिक हमले के खिलाफ बड़ी एकजुटता की दरकार है। जन संस्कृति मंच प्रतिरोध की तमाम लोकतांत्रिक आवाजों को एकजुट होने का आह्वान करता है। यह अवसर देश बचाने का है। संविधान बचाने का है। आम जन को बचाने का है।
कार्यक्रम में अरविंद कुमार, डॉ. जे.एस.पी.यादव, मिथिलेश कुमार, अनिल कुमार, मंजू कुमार सोरेन, मयंक कुमार यादव  के साथ अन्य लोग भी उपस्थिति थे।
समीर जसम (दरभंगा) के जिला सचिव हैं ।
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