Wednesday, May 29, 2024
होमसंस्कृतिभागोदेवी पंडाइन की कथा अर्थात किस्सा सिर्फ तोता और तोता उर्फ मैना...

ताज़ा ख़बरें

संबंधित खबरें

भागोदेवी पंडाइन की कथा अर्थात किस्सा सिर्फ तोता और तोता उर्फ मैना का घर में बनवास

सपने सिर्फ मुंगेरीलाल ही नहीं देखते, भागो लली भी देखती हैं लेकिन वे प्रायः दुःस्वप्न होते हैं  काश , कि वे सपने होते। काश! जब तक सांस के लिए हवा मिलती रहती है तो कोई भी पानी के बारे में नहीं सोचता लेकिन बढ़ता हुआ पानी सिर से ऊपर जाता ही है । तब निष्क्रिय […]

सपने सिर्फ मुंगेरीलाल ही नहीं देखते, भागो लली भी देखती हैं लेकिन वे प्रायः दुःस्वप्न होते हैं  काश , कि वे सपने होते। काश!

जब तक सांस के लिए हवा मिलती रहती है तो कोई भी पानी के बारे में नहीं सोचता लेकिन बढ़ता हुआ पानी सिर से ऊपर जाता ही है । तब निष्क्रिय से निष्क्रिय प्राणी भी हाथ-पाँव तो मारता ही है। भागोदेवी पंड़ाइन के साथ बिलकुल यही हुआ। छः बच्चों और नातियोंवाली भागोदेवी ने समिधा को सिर से ऊपर गुजरनेवाले पानी की तरह पहले देखा ही नहीं लेकिन एक दिन बंद आँखों से उन्होंने देख लिया कि अब अगर नहीं संभलीं तो डुबा दी जाएंगी। बस यही एक बिन्दु था।

पांड़े बगल में ही सोये पड़े थे। अब दोनों के संबंध इस स्तर तक पहुँच चुके थे कि एक ही बिस्तर पर एक दूसरे की ओर पीठ किए हुये सोते। एक दूसरे की ओर मुंह करके सोना एक इतिहास हो चुका था और चूमना तो चाँद की यात्रा की तरह दुर्लभ क्योंकि चंद्रयान कहीं था ही नहीं। ऐसा नहीं था कि उनकी साँसों से बदबू आती थी। बल्कि पांडे तो तीन-तीन बार माउथफ्रेशनर का उपयोग करते थे क्योंकि उन्हें पता था कि ऐसा न होनेपर समिधा बार-बार उनका मुंह दूर कर देती है ‘पंडीजी महाराज, ज़रा दूर से ही बात कर लीजिये।’ बस एक ही खराब आदत है – खर्राटे यूं लेते हैं गोया हवा खोलते हैं। बुढ़ऊ!!

भागोदेवी को एकदम से अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने अपनी आँखें मलते हुये इस बात की तस्दीक की क्या सच है? पांडे तकिये को कसकर पकड़े हुये फुसफुसा रहे थे –“ मेरी बात सुनो सम्मी। तुम इस घर में कैसे रह सकती हो? कभी-कभी आती जाती हो यह भी बहुत है लेकिन बेटे-बहुओं और बेटी-दामादों वाले इस घर में इसी बिस्तर पर तुम्हारा होना असंभव है। अब अगर तुम इस पर अड़ी खा जाओगी तो यह तुम्हारी ज्यादती होगी।

“अरे उसकी क्या बात कर रही हो। वह तो गाय है।

“नहीं नहीं सम्मी, सब कुछ के बावजूद तुम मेरे लिए निर्जला व्रत नहीं रह सकती हो।

“ह ह तुम मेरे लिए करवाचौथ रहोगी ? क्या मज़ाक करती हो । चाँद कहाँ देखोगी , क्या वह तुम्हारे कमरे में उगेगा। रहने दो यार। यह काम भागो ही ईमानदारी से कर सकती है। तुम तो बस उसी काम तक ठीक हो।

“इधर आओ मेरे पास। एकदम इधर ….

“अरे! तो कौन मुझे तुमसे शेयर कर सकता है। भागो तो बस एक नाम भर है।

“ क्या बेवकूफी की बातें करती हो? भागो को तकिये के नीचे दबा दूँ। सम्मी, तुम ऐसा कहकर अपनी अपराधी मानसिकता का सबूत दे रही हो। तुमसे उम्र में बड़ा हूँ। तुम्हारा गुरु रह चुका हूँ। क्या तुम मुझे अब भी नहीं समझ पाई। वह तो पहले से ही गूंगी हो गई है। संज्ञा में वह एक शरीरमात्र है लेकिन चेतना में पूरी तरह सीता है। मेरी देह पर तुम्हारी उँगलियों की छुअन को बर्दाश्त करके भी मेरा ही कल्याण चाहती है। अच्छा चलो अब आ भी जाओ।

“ अच्छा बाबा, अब आओ। किसी दिन मौका देखकर वह भी कर ही दूँगा …… अब तुम जो न करवा दो ….”

भागोदेवी सन्न रह गईं । कमरा मानो चारों ओर घूमने लगा। सिर्फ कमरा ही नहीं पूरा वजूद हिलने लगा और फिर वह हो गया जिसका अंदाजा पंड़ाइन को भी नहीं था। उन्होंने तो सिर्फ तकिया लिया और पांडे के मुंह पर रखकर दबा दिया। गों-गों की आवाज करते हुये उन्होंने थोड़ा हाथ-पाँव पटका और शांत हो रहे। पंड़ाइन पसीने से लथपथ थीं। पांडे के शरीर का खून पानी में बदल रहा था।

सुधा अरोरा

‘अजब बात है। पंड़ाइन!! अरे बाप रे! कितनी गऊ दिखती थीं। पतिव्रता की कोई मिसाल देता तो इन्हीं की ओर संकेत होता। और अब यह छछन्न। ’ गाँव से शहर तक जो भी सुनता हक्का-बक्का रह जाता। अखबारों के पन्ने रंग जाते। पुलिस ने पंडाइन को रिमांड पर ले लिया । हफ़्तेभर की यातना के बाद चार्जशीट पेश की गई। मुकदमा पेश हुआ। जूरी के सामने जब पंड़ाइन पर चार्ज लगाया गया तो सुनते-सुनते वे बिफर पड़ीं –“चुपाय मारो साहेब। बस चुप्पई रहो। हम कबूलत हैं कि अपने आत्मा का दाग हम धोइन हैं। बाकी अपराधी हम नाहीं हैं।

“साहेब! का क़हत हैं कि मी लॉर्ड! अगर दुनिया मा कहूँ भगवान होय तौ साखी जानके हम ई बात कहित हैं जेका जिकिर हम सपना मा भी कोऊ से नाँय किए। भगवान से भी नाँय। लेकिन आज हम चुप नाहीं रहब।

“महरारून के आँख क पानी कब सूखत है? आँय ? जब आंखिन ते खून आवा लागत है। का हमरे सत्त क परीच्छा सिया माई से कम है! एक ठे सिया माई रहिन सुकुमारी जनक दुलारी बाकी का मिला जिनगी मा। खाली अपछया (लांछन) आऊर जंगल । एक ठे हम हैं भागो जेनका करम एस फूटा कि घरही मा बनबास काट दिया।

“साहेब! कभू-कभू धोखा आंखिन के सन्मुख होत रहत है बाकी सील-संकोच क जवन परदा आंखिन पर डार दीन गवा ऊ हटत बहुत देर मा है।

“इहै परदा हमरे आँख पर पड़ा रहा और एस पड़ा रहा कि हम देख ही नाँय पाये कि जो हमरी बेटी बन के हमके अम्मा-अम्मा क़हत घूमत रही ऊ सच मा सौतिया-छछन्द खेलत रही। बाकी त सब एक ठे ओट रहा खाली। औ ई धोखा भी कइसन? एकदम आँख मा सीधी अंगुरी डारि के।

“जवन बकठेठई हमसे भइ ऊ सच मा हमरे महतारी-बाप के सीख से भइ कि हमके अपने जबान के मुंह के अंदर दबा लेय के चाही । आँख मूँद लेय के चाही। हाथ से खाली सास-ससुर-भतार क गोड़ दबाये के चाही। तबै तो तेरह की बाली ऊमिर मा खाली इहै देखाय जात रहा कि लड़िका सहर मा पढ़त बा। सखी-सहेली, हम्मा-सुम्मा सब इहै कहे –पाहुन तो एकदम पोथी क सुसूड़ी ( चाँदी के रंग का एक कीड़ा जो किताबों को चट कर जाता है।) हैं। ई त चौबीस घंटा किताबिन मा मूँड़ी गाड़ के पड़े रहत रहे।

“जब हमरी सादी भइ तो तेरह की रहिन । एही ऊमिर मा सबही की किस्मत तय हो जात रही। हमरी गांठ भी बाँध दीन गई। ऊ दिन आज याद आवत है त खाली हँसी नाहीं आवत है। ई बात पर आज गुस्सा के साथे कुफ़ुत भी होत है कि कहाँ से हम चले, कहाँ आय गए। एक समय ई रहा कि जब मौर बाँध के ई मड़वा मा आएन त हमरी सखी सहेली निकोटा-चिकोटी करे लगिन त ई बेचारु भकुआय गएन। आउर जब ई कोहबर मा आके बैठे तब हमरी फुआ, चाची, मौसी, मामी सब लगिन इनसे एनके नात-हित के लोगन का नाम पूछे। ई एकदम मौनी बाबा। सब सोचिन कहीं लड़ीकवा गूंग त नाहीं बा। ऊ सब भी कम नाहीं रहिन। लगिन बार-बार पूछै। पहिले त ई जपत किए रहेन लेकिन जब नाहीं रह गवा त लगेन भोकार फाड़ के रोन । एकदम अललाए लगेन। अब सब हैरान कि हैं, ई कइसन लडिका? डोका नियर रोअत बा। एक ऊ दिन रहा और एक ई दिन आया कि हमरे बगल मा रह के भी हमसे एतना दूर।

[bs-quote quote=”“जवन बकठेठई हमसे भइ ऊ सच मा हमरे महतारी-बाप के सीख से भइ कि हमके अपने जबान के मुंह के अंदर दबा लेय के चाही । आँख मूँद लेय के चाही। हाथ से खाली सास-ससुर-भतार क गोड़ दबाये के चाही। तबै तो तेरह की बाली ऊमिर मा खाली इहै देखाय जात रहा कि लड़िका सहर मा पढ़त बा। सखी-सहेली, हम्मा-सुम्मा सब इहै कहे –पाहुन तो एकदम पोथी क सुसूड़ी ( चाँदी के रंग का एक कीड़ा जो किताबों को चट कर जाता है।) हैं। ई त चौबीस घंटा किताबिन मा मूँड़ी गाड़ के पड़े रहत रहे।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

“चार साल बाद हम गौने आइन। तब्बो ई बहुत लजाधुर रहे। महीन्नन त अइसे ही बीत गए। हम इंतज़ार मा और किताब मा। बाकी जब खुलेन तब एस कि आवा जा घर तोहरइ बा। एकही पठौनी हम आई रहे और जब पीहर गई तब अपने भीतर भी एक जीव ले के गए। वो ही टाइम ई चले गएन बिल्लाइ ।

“अब ई त पढ़ावन खातिर छाएन बिदेस मा। आएन एकदम दुई साल के बाद। तब हमरी अप्पो (अपराजिता) ओन्नइस महिन्ना की हो गइ रहिन। अइसन हंसत रहिन और अइसन बकइयाँ चलै कि जे कहीं जात भी रहा उहो उठा लेय गोदी मा। ओ समय जब ई आएन त उ इहाँ-उहाँ डुगुर-डुगुर डोलइ लाग रहिन। दूय महिन्ना मा ई फिर उड़ गएन। ओह दफा तप्पो (तपस्या ) गोद मा आईन।

“अब त ई जब आएन त एक-एक ठे गदेली हमेशा गोद मा डार गएन। लप्पो (लोपा) , मन्नू (मुद्रा) , गग्गो (गार्गी) और जस्सो (अस्मिता) कुल छः जन होय गइन। हमरी तो फजीहत । कहीं अप्पो-तप्पो मारा-मारी कइ लेय। कहीं लप्पो-मन्नू। अबहिन ओनके ठीक करे तब तक पता लाग रहा कि जस्सो कपड़ा गीला कय दिहीन।  हमार त जीव नकुलिया जाय। का का करीं?

“बाकी खाली बच्चा सम्हारबे को त रहा नाहीं। सास ननद क गोभना भी सुनबे को रहा।  तप्पो भइन तबसे ई सब सुरू होइगा। अबहिन सौरी से बाहर भी नाँय आइन। छट्ठी भी नाँय बीती कि सब कपड़ा लिया के ननद सामने पटक देय – ला कचारा। अल्मात देह बा। ठार पड़त बा। ठंडी लाग जाइ त लड़की बेराम होय जाइ। एकर कौनों खियाल नाहीं। बस कपड़ा फेंचा। बरतन माँझा, झाड़ू-बुहारू करा। खाना बनावा। उप्पर से सास क गोड़ दबावा। सबेरे-सबेरे रोज बतावा जात रहा कि छ ट्ठे लड़की पैदा कय के हम कुल-बंस के ही नाहीं झुकाय दिहे बलुक घर खँड़हर करन क उपाय भी कय दिहीन हैं। हमरी हालत का रही का बताई। खाली एनकर खियाल कय के हमरे उप्पर हाथ नाहीं छोड़ा जात रहा। बाकी कवन करम नाहीं कीन गवा। कैसे हम रहेन हम का कहीं?

“ जब चारीउ ओर से आदमी के उप्पर बादर घहराय लगे तब ऊ साँप के बिल मा भी सुरच्छा खोजे लागत है। बलुक ओहिपर गरुर भी करइ लागत है।

“ई एतने घुरमुसहा कि बस पूछो मत। लागत रहा कि एकदम गूंग। गिलास क पानी खतम –चुप। नमक बेसी पड़ गवा – चुप। तरकारी अलोन बा – चुप। कौनों सवाल नाहीं। हम सोचे कि हम केतना भाग्यशाली हैं। का एही से हमार नाम भागो रखि दीहिन का महतारी-बाप?

“हमें का पता कि आगे का होय वाला बा? हम त एही मा खुस कि पोर्फ़ेसर साहेब केतना बड़ा आदमी हैं। हमेसा एनके आगे-पाछे लडिका-लड़की चक्कर मारत रहेन। गुरुजी ई बात, गुरुजी उ बात। इहो अपने चेला-चेलिन क एतना हिरोही कि मत पूछा। पढ़ाई उ सब करत रहेन। पास होए क चिंता एनके रहत रही।

“और एक दिन ऊ भी आय गई – समिधा। घर में घुसतय गोड़ पकड़ लिहिस — प्रणाम माते। ऊ जइसे नाहीं रहा सीरियलवा महभारत। एकदम वैसे। अब माते भी का करें। करेजे से लगाय लिहिन। सकल भले बनरिया जइस रही होय बाकी लीला अइस कि अच्छे-अच्छे की आँख मूँद जाय।

“हमार आँख भी मूँद गयी। हम तो सोचे कि ई शोध करे के लिए आई है। डॉ साहेब भी कहेन कि बिना महतारी की लड़की है। जनम से ही दुख झेल रही है। बाप मजूर रहा। रोज कुआं खोदके पानी पीन वाला। काल का कौनों सपना नाहीं। बस बचपन में ही लड़की की बांह एक मजूर के हाथ में धरा दिया। उ अनपढ़ गंवार ई पढ़वैया। उ रोटी मांगे ई किताब ले के बैठी रहे।

“जल्दी ही मामिला ई होइगा कि उ एकर झोंटा खींच के लातन-मुक्कन मारे। ई बेचारी हियाँ लुकाय हुआं छिपे। अड़ोस-पड़ोस भी ऊब गया। एकरे ओर से कोई बोलेवाला नाहीं। आखिर मेहर-मनुस्स के झगड़ा मा के बोले औ का बोले। एकर फरज रहा कि ओके रोटी बनाय के देय। बाकी एकरे आवे तब न। एक दिन आटा मा आधा बाल्टी पानी डालके सानने लगी। अब एक तो घर मा आटा नाहीं ऊपर से ई गिलपोकना। एकर आदमी आया। एक त भूख के मारे आँख के आगे अंधेरा। बस ऊ लगा एके धोवे। जे सुने ऊ कहे कि ई कवन मेहरारू कि आटा भी नाहीं सान सकत। का कलट्टर बनी का? बस एकरे आदमी के त मिल गयल रोज-रोज कुटम्मस का साटिक-फिटिक। ऊ खूब फायदा उठाया।

“जिनगी नरक होय के रह गई। अब कौनों रास्ता निकाल लेब ज़रूरी होय गया। बस ई भी उहाँ से भाग चलल। भरसाई में जाय दुलहा। ई कहानी सुन के हमहूँ के बहुत दया लागी। करेजे से लगाय लिए। बाकी ओ समय का पता रहा कि हम आस्तीन के सँपोली के गले लगावत हैं।

“लेकिन जादू कैसा भी होय एकदिन खुल ही जात है। हम तो दया-माया मा पड़ के एह बनरिया के सीने से लगाय लिए औ ई लगी डॉ साहेब के सीने से लगे। अब का बताई कि गाँव-गिरांव क संस्कार औरत के केतना मोटी रस्सी मा बांध देत है। एक दिन एंकर एक चेला घर आया। आके पाँव छूके कहन लगा – माता पानी सिर से ऊपर जाय रहा। एही बखत लगाम कस लेना ठीक रहेगा। माता गुरुजी और समिधा को लेकर पूरे कैंपस में एक से एक किस्सा। बिलकुल लैला-मजनू वाला।

“बाकी कहा गया है कि आँख पर पर्दा पड़ जाय त अजगर भी पाइप लागत है।अशुतोशवा के मुंह से अपने डॉ के लिए एतना निकलते ही हम त उठाए झाड़ू। भाग मुंहझौंसा। भाग हियाँ से। बेचारा उल्टे पाँव चला भाग। हमरे समझ मा वोह बखत एही आय रहा कि हमरे डॉ साहेब ठहरे विभागाध्यक्ष। ज़रूर कौनों की चाल है कि अपछया लगा के ओनके बदनाम करके कुर्सी हथिया लेय। बस हम त अगियाबैताल हो गए कि देखूँ कौन डॉ साहेब का रोआं टेढ़ कर लेता है। पतिबरता नारी क इहे पहिचान कि आँख पर घूँघट काढ़ लेय। कान मा रुई ठूंस लेय।

“अब जेकरे आगे कौनों गर-गोसइयाँ नाहीं ऊ त छुट्टा साँड़ होई जात है। अनबोलता मनई के चार बात सुना के सब कोई अपने के बीर-बहादुर समझत है। इहे खिस्सा इहाँ भी चलत रहे बाकी हम एक दिन जान गए कि दाल मा बहुत काला बा। समिधा जब भी घर आए तो इनसे एतना सट के रहे कि आन्हर से आन्हर आदमी भी एक दफा चिहुँक जाय कि ई गुरु-चेली हैं कि आउर कौनों बात है? लेकिन जब तक ऐन खटिया पर न पकड़े जांय तब तक कैसे ऊ बात कहीं जवन मन मा बवंडर उठा देत है।

“लेकिन शंका क बीज पड़ तो गया न जी। आखिर डॉ साहेब एतना सीधा काहें बने रहेन कि मोट-पातर खा के भी कभी कौनों शिकायत नाहीं किहेन? जरूर ओनकी कोई और दुनिया रही जहां ऊ अपने जीभ का स्वाद पूरा करत रहेन। हमरी गोद मा छह-छह गदेली डार तो दिहेन बाकी कभी ई नाहीं ध्यान दिहेन कि ऊ सब कैसे रहत हैं? बस कमा के घर मा दे देत रहे बाकी सारी जिम्मेवारी हमरी। रसोई से लेके लड़किन के स्कूल तक सब हमरे ऊपर। घर-भर का कपड़ा-लत्ता, सेवा-सभाखन सब हमरे ऊपर। दिन भर फेंफिया होके चकरघिन्नी की तरह हम इहाँ से उहाँ नाचित रही। ई साहेब डार से फूल तक नाहीं तोड़ सकत रहे। आज अगर हम अपने तनख़ाह का सौ रुपया महिन्ना भी लगाएँ तो कई हज्जार बन जात है लेकिन बिना पैसा के अब तक खटत रहे।

“आज तो ई अपने पर हो गएन तो कौनों सास-ननद का गोभना नाहीं बा लेकिन एक जमाना ऊ भी रहा कि सौर मा रहीं और अबहीन छट्ठी भी नाँय बीती कि सारा कपड़ा लिया के हमरे सामने सब पटक देत रहीं कि लेव सब धो डारो। लडिका नाहीं बियाई  हो कि बरही भर हाथ-गोड़ दबावा जाय। हरदी-अछवानी पियावा जाय। लड़की जनी हो । साड़ी-बियाह करे मा घर बेच के खंडहर होय जाई। ऐसा आगम बुझात बा। हमार करेजा छलनी होय जात रहे। बाकी हम अलमात शरीर लेके सब कपड़ा धोएँ। हमके ठन्ढी लग जाये। बच्ची की जान चाहे संकट मा पड़ जाय बाकी काम न छूटे। तब का समय अब देखित हैं तब समझ मा आवत है कि ई एतना घुरमुसहा बेमतलब नाहीं रहेन। मतारी-बाप सादी-बियाह करि दिहेन कि लडिका कब्जे मा रही।

[bs-quote quote=”“बाद मा हमें पता चला कि डॉ साहेब एके पहिला नंबर देवे के खातिर सबसे जोग्ग लडिका के दूसरे नंबर पर कइ दिहेन। एक से बढ़के एक खिस्सा पानी मा गोबर के जैसे उतरा गया। हम ऊ सब बरदास कर लिए। तीसरे पन मा डॉ साहेब बोल-बतियाब हमसे छोड़ दिये। जब साथ बैठ भी जांय तो ई हरक्कत कि एकदम अनसोहन होय जाय। हम सब बरदास कर गए कि चलो सुबह का भूला कभी तो घर आएगा ही।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

 

“अइसे ही एकबार जब हम माई के हियाँ जाए लगेन तब एनकर बहिन-मतारी हमरे बक्से की तलाशी लेन लगीं कि कहीं हम कौनों सामान तो नाहीं ले के जा रहे। बाकी जब कुछ नाहीं मिला तो खिसियान लगीं। हें हें हें। तब से हमें एतना गुस्सा रहा कि जब भी मायके गईं तो एक बार बक्सा-डोलची सब उलट के देखा के गईं कि लो देख लो। मायका गरीब है एका मतलब हुआं सब चोरी का नाहीं खात हैं। तब ई खिसियात हैं। हें हें हें।

“बाकी अलावा इसके तो ई ठीक ही रहेन। पहिले हम एनका ऊपर बहुत नाज़ करत रहीं कि एक से एक लड़िकिन एनके पास आवत रहीं बाकी ई कभी एहर-ओहर नाहीं देखे। ई देख के हमका हरदम लगा किया कि डॉ साहेब कितने सतवन्ते हैं। एकदम राम की तरह । बाकी ई सुपनखा जादू डार दिहीस । तो सम पुरुस न मो सम नारी।

“कभी-कभी हमें लागत है कि जे सोना, हीरा-जवाहिर देख के भी लालच मा नाँय आया ऊ पीतल पर कैसे ललचा गया? बाकी अब लागत है कि सोना लेवे की हिम्मत नहीं रही। जब अपने पर भरोसा नाहीं होत तो हर चीज कीमती ही लागत है सिवाय अपने आप के।

“हमार तो माथा ठनक गया जब हम एक दिन देखे कि डॉ साहेब पैंसठ की उमिर मा हमरे बिस्तर मा आए गए। सब लड़िकी भी लड़कोर होय गईं और बुढ़ऊ को जवानी छाय रही!! अब तो हमरे गाल पर झुर्री आय गई है। लप्पो का बेटा तो जब भी हियाँ आवत है दौड़ के हमारी गोद मा आके लागत है खीचने – नानी को देखो, नानी को। सचमुच अगर हम एनके साथ बाज़ार जाएँ तो कोई भी एनके हमार छोटका देवर ही कहे। अब जिनगी के सात्विक बेला मा ई खेला का अच्छा लागत है?

“बस, कदम डगमगा गया। बहाना भी मिल गया। बाकी धुआँ तो रुका नाहीं। खबर भी धुआँ के माफिक फैलने लगी। दबी जबान से निकली बात भी एक दिन बम होय जात है।

“लेकिन हम का करें। समझ लिया कि जैसे हम घर मा नीचे बैठ के पोछा नाहीं लगा सकते हैं। उसके लिए एक नौकरनी लगावत हैं ही। वैसे ही अब रखैल की तरह नखरा तो नाहीं कर सकत हैं। अब आराम का दिन ज़रूरी हैं औ ई साहेब चाहें कि बिछौने मा कलैया मारें तो ई तो हमसे न सफरी। बस हमहूँ ढील दे दिहे। एका चाहे हमार गलती कहो चाहे अपराध।

“जब एक बार रास्ता साफ होय जात है तो आदमी बड़ा बेशरम बन जात है। अब ऊ जवन करतब निभावत रही ओकरे बदले ई साहेब ओकर लेख लिखें। थीसिस लिखें। छपवाएन। ओके कहीं बोले के जाए के रहा तो ओकर तैयारी कराएं। बस इहे कारोबार चौबीसों घंटा। इहाँ तक कि कहीं एनकर बुलाहट होय तो कह देय कि हमरे पास तो टाइम नाहीं बा। समिधा को बुला लो। उसे इनकरेज करो।

“ऊ घबरा के कहती – सर हमें तो इस विषय मा कछु आवत नाहीं तो ई साहेब कहने लगते – अरे पगली हुआं कवन बिदमान बिराजत हैं। ससुरा एक से एक गदहा हैं सब। हम लिख देते हैं सब। जाके बस बोल आ। थोड़ा स्पेशल ट्रीट का मज़ा भी ले। वह तो अइस नखरेली कि एह बात पर अहसान से दोहरी होय जाय – सर , सर आपका सब आशिरबाद है। का नाहीं मिला जीवन मा।  रुपया-पैसा, नर-नौकरी सब मिला। बस थोड़ी सी मान-प्रतिष्ठा चाहती हूँ। ई बेचारे तो लहालोट। मन मा तो खीर पकने लगती।

“मन अइसे ही बढ़ाए। ऊ इनका। ई उसका। माई-धिया गवनहर बाप-पूत बजनियाँ। ऊ बनरी इनके हृदय पर लोटे और इनका गाल एकदम लाल। ई ओह समय एतना बड़ा दानी कि आपन करेजा निसार के दे देय। बोले- तू घबड़ाती काहें हो। सब होय जायी बस हमारे ऊपर भरोसा रखो।

“बचपन मा जब कोई कौनों मेहरारू के तिरिया चरित्तर की बात करे तो हमका बहुत अपमान बुझाय बाकी समिधा के देखके समझ मा आय गया कि तिरिया चरित्तर का होत है? ऊ हमारे सामने दोहरी चौहरी होय के सर और माते का गोड़ छूए लागि तब एक तरफ तो हमरी चुन्नी मा आग लग गयी बाकी दूसरी ओर ई हंसी छूटे कि कहे की बात नाहीं। मन मा हम कहे कि पसार लो गुण लल्ली बाकी जे तोहार छछन्न न बूझे ओहके सिखाव ई सब। का हम आन्हर हैं जो डॉ साहेब को पिता समान पिता समान किए जात हो।

“और एक दफा तो हम सन्मुख ही कह दिये कि अरे बउआ! तनिक आपन अँचरा सम्हार लेओ। बार-बार ढरक जात है।

“औ ऊ सतभतरी का बोली – हमरी माय भी यही क़हत रही हरदखम। आप भी तो हमरी हैं। आप नहीं कहेंगी तो कौन कहेगा।

“हम तो सनक गईं। महतारी तो एकर बचपन मा ही गुजर गई। दस-बारह साल की छोड़ के का तब से ही एकर ई चाल बा का। पक्की सिकारिन है ई तो। एक बार तो बहुत दया भी आय गई कि कौन कलमुंहा एकर बान खराब किहेस? बाकी दया भी कोई केतना कर सके ओकरे उपर जे खुद दया करे वाले के घर मा आग लगाए। बस ऐसेही फोड़ा बढ़ के कंसर होय गया। पानी सिर से ऊपर चला गया। हमरे मूरख भतार डॉ साहेब के एक बार ई कीचड़ मा खिची तो बस ऊ सर से पाँव तक लथपथ। एकदम थापकथइया। न लोक की लाज न परलोक की लिहाज।

“पीएच डी ऊ कर रही औ थीसिस हमरे साहेब लिख रहे हैं। इहाँ तक जी जान लगाय दिये कि ओके पीएच डी पर गोल्ड मेडल मिल जाय। ई निबहुरी के तो पता था कि बिना गोल्ड मेडल मिले न रहे। ओहि समय डॉ साहेब चार-पाँच दिन हर्निया के ऑपरेशन करा के अस्पताल मा पड़ा रहे। ई ऊ सेवा किएस कि का दूसर मेहरारू करें।

“हम जब गईं तो देखा कि ऊ सेव, संतरा, नासपाती, आलू बुखारा और का का हेन-तेन लिया के डॉ साहेब के खिलाये। अपने हाथ से छील-छील के ऐसे खिलाये जैसे ई कौनों बबुआ होंय। सोचो कि एक सत्तर बरिस का आदमी सात साल का बच्चा होय के गुबुर-गुबुर फल खा रहा है और ई लुच्ची लहक के सेवा कर रही है।

“बाद मा हमें पता चला कि डॉ साहेब एके पहिला नंबर देवे के खातिर सबसे जोग्ग लडिका के दूसरे नंबर पर कइ दिहेन। एक से बढ़के एक खिस्सा पानी मा गोबर के जैसे उतरा गया। हम ऊ सब बरदास कर लिए। तीसरे पन मा डॉ साहेब बोल-बतियाब हमसे छोड़ दिये। जब साथ बैठ भी जांय तो ई हरक्कत कि एकदम अनसोहन होय जाय। हम सब बरदास कर गए कि चलो सुबह का भूला कभी तो घर आएगा ही।

“हम यहीं तो खा गएन धोखा। हम सोचत रह गए कि ई हमसे ही प्रेम करत हैं मुंह चाहे जिसके दुआरी मारें। ई ज्ञान और शरीर का रिस्ता है। ज्ञान चेतन्त होई तो घर लौटे और शरीर जायी मसान पर। शरीर सेवा करे तो ज्ञान भी सुग्गा बन ही जात है।

[bs-quote quote=”पड़ाइन भूल गई थीं कि मेहर हो चाहे मनुस अगर काछ का कच्चा हो गया तो किसी एक का तो हो ही नहीं सकता। समिधा अपने मतलब के लिए उनका इस्तेमाल करती रही लेकिन ये तो डॉ साहब थे। विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष। बहुत मोटी तंख्वाह और अनेकों सुविधाओं का सेवन करने वाले। मानित-सम्मानित। छात्रों से पाँव पुजवाने वाले। ये क्यों अपने चरित्र से गिर गए। क्या ये भीतर से इतने कमजोर थे। या जन्म के लंपट थे। क्या थे ये कि समझ नहीं पाई और इनकी कुशलता के लिए निर्जला व्रत रखती रही?” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

 

“बाकी ई बात बताओ साहिब! घर ही मा बनबास सह लिए। बाकी सब कुछ बरदास करे का मेवा का मिला? तकिया से मुंह दबवे की साजिश। आज नाहीं तो काल दूनों मिल के हमार काम तमाम कर देते। वोही काम हमरे हाथ से होय गया तो कौन गुनाह होय गया? बताओ साहेब … बताओ ….. बताओ?”

ऊंची आवाज़ में बोलती , हाँफती हुई पड़ाइन की नींद खुल गई।

अपने बेडरूम में वे अकेली जाग रही थीं। बगल में सोये पांडे सप्तम सुर में खर्राटे भर रहे थे। बीच-बीच में उनका पेट ऐसे गुड़गुड़ा उठता गोया कोई बूढ़ा हुक्का खींच रहा हो। पड़ाइन ने चारों ओर देखा और अपना माथा पकड़ लिया क्योंकि यह सोचकर उनका माथा घूमने लगा था कि क्या यह सब सच भी हो सकता है?

उनका मन रोने-रोने को हो आया लेकिन बेआवाज वे लेट गईं। लगा जैसे आँख से देखकर भी धोखा खाते रहना ठीक नहीं था। वे जीवन भर वही करती रहीं जो हर भारतीय नारी करती है। घर को संभालना। अपनी अनिच्छाओं को भी पति की इच्छा से ढँक देना और मुंह बंद रखना। और उसका सिला क्या है? उपेक्षा! बहिष्कार!! घर निकाला!!!

पड़ाइन उम्र भर धोखा पाले रहीं कि उनके मोहतरम जनाब डॉ प्रोफेसर गिरधारी लाल पांडे उनके हैं। सिर्फ उनके। वे चाहे जिस खेत चर लें लेकिन प्यार तो वे बस मुझसे ही करते हैं। लेकिन सच यह था कि वे सिर्फ और सिर्फ नटवर नागर होकर रह गए थे।

पड़ाइन भूल गई थीं कि मेहर हो चाहे मनुस अगर काछ का कच्चा हो गया तो किसी एक का तो हो ही नहीं सकता। समिधा अपने मतलब के लिए उनका इस्तेमाल करती रही लेकिन ये तो डॉ साहब थे। विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष। बहुत मोटी तंख्वाह और अनेकों सुविधाओं का सेवन करने वाले। मानित-सम्मानित। छात्रों से पाँव पुजवाने वाले। ये क्यों अपने चरित्र से गिर गए। क्या ये भीतर से इतने कमजोर थे। या जन्म के लंपट थे। क्या थे ये कि समझ नहीं पाई और इनकी कुशलता के लिए निर्जला व्रत रखती रही?

पड़ाइन के दिमाग में बवंडर चल रहा था । पता नहीं कब उनकी आँख लगी।

बदलाव बहुत धीरे से होता है। वैसा ही हुआ।

इस बार आखा तीज पर पांडे घर ही रहे। हर साल यह दिन पड़ाइन के लिए खास होता रहा है। पचास साल से मुसलसल। पांडे भी गर्व से फूल जाते। आखिर ऐसे गुलाम मिलते कहाँ हैं, जो लात खाकर भी मारने वाले की ज़िंदगी की शुभकामना करें!

लेकिन उस दिन पांडे को कहीं कुछ सुगबुगाहट नज़र नहीं आई। उन्होने सोचा कि उम्र की वजह से सुस्त पड़ी होंगी। पड़ाइन को अचंभे में डालने के लिए वे बाज़ार से सामान लाने चले गए। बहुत कुछ खरीद लेने के बाद उन्हें इलहाम हुआ कि कुछ खास ले चलना चाहिए। वे तुरंत ही फ्लोरिस्ट की दूकान पर जा पहुंचे। एक दमकता हुआ लाल सुर्ख गुलाब चुनने में उन्हें देर न लगी।

पांडे घर लौटे । वे पड़ाइन को चकित कर देना चाहते थे। लेकिन उन्हें स्वयं चकित होना पड़ा। पड़ाइन चाय पीते हुये आलू के चिप्स चुभला रही थीं।

सकपकाई हुई आवाज में पांडे बोले—“अरे! का हो। आज तो आखा तीज है। व्रत नाहीं बाड़ू का?”

“न्ना।” पड़ाइन ने चाय की चुस्की लेते हुये कहा।

“क्का काहें?”

“बस ऐसे ही। मन न हुआ। क्या होगा व्रत से?”

पांडे के हाथ से सारा सामान नीचे गिर पड़ा………

कुछ दिनों बाद ही पता चला कि समिधा ने डी लिट के लिए रजिस्ट्रेशन करवा लिया है। इस बार उसके गाइड प्रोफेसर गिरधारी लाल पांडे के ही पट्ट शिष्य डॉ त्रिनेत्र चतुर्वेदी हैं। समिधा को उम्मीद है यहाँ भी उसे गोल्ड मेडल मिलेगा।

गाँव के लोग
गाँव के लोग
पत्रकारिता में जनसरोकारों और सामाजिक न्याय के विज़न के साथ काम कर रही वेबसाइट। इसकी ग्राउंड रिपोर्टिंग और कहानियाँ देश की सच्ची तस्वीर दिखाती हैं। प्रतिदिन पढ़ें देश की हलचलों के बारे में । वेबसाइट की यथासंभव मदद करें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

लोकप्रिय खबरें