Wednesday, May 22, 2024
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राम का नाम भी नहीं आया काम, नौ साल से सड़क बनाने के लिए जारी है संघर्ष

गाजीपुर जिले की सिधौना बाज़ार की मुख्य सड़क पिछले 8-10 वर्षों से उपेक्षा की शिकार रही है। उत्तर प्रदेश की वर्तमान बीजेपी की सरकार भले ही बारिश शुरू होने से पहले सडकों को गड्ढा मुक्त करने का फरमान जारी करती है लेकिन गड्ढा मुक्ति का उसका अभियान अभी फेल ही नजर आ रहा है।

गाजीपुर। ‘यह सड़क 9-10 सालों से खराब है। इसके पुनर्निर्माण के लिए लगातार प्रयास हो रहा है। शासन-प्रशासन से हर स्तर पर क्षेत्रवासियों के साथ हमने प्रयास किया। लगभग हर जनप्रतिनिधि से गुहार की पर हर जगह से सिर्फ आसश्वासन मिला। हर साल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तरफ से घोषणा होती है कि 25 जून से पहले सभी सड़कों को गड्ढा मुक्त कर लिया जाएगा, तब बहुत खुशी मिलती है और उम्मीद भी बनती है कि शायद इस बार इस सड़क के भी अच्छे दिन आ जाएँ पर दुर्भाग्य से इस सड़क के दिन, 9-10 सालों से खराब ही हैं।’ ये  बातें गाजीपुर जिले के युवा नेता और जिला पंचायत सदस्य कमलेश यादव उर्फ राय साहब ने सिधौना बाजार की सड़क को लेकर कही। उन्होंने  बताया कि ‘चूंकि सरकार राम के नाम पर देश-प्रदेश में बहुत कुछ बदल रही है। इसलिए सरकार तक अपनी गुहार पहुंचाने के लिए हम लोगों ने इस टूटी सड़क पर रामचरितमानस का पाठ करवाया पर अफसोस कि जिस राम नाम के सहारे भारतीय जनता पार्टी सत्ता तक आई थी उसी पार्टी की सरकार ने राम-नाम के आसरे एक सड़क के पुनर्निर्माण की मांग कर रहे लोगों को निराशा के सिवा कुछ भी नहीं दिया।’

कमलेश यादव के इन दावों की सच्चाई परखने के लिए गाँव के लोग की टीम उस सड़क पर पहुंची जिस सड़क को लेकर कमलेश यादव के मन में आक्रोश भरा हुआ है। हाइवे से टर्न लेकर जैसे ही हम लोग इस सड़क पर पहुंचे निःसन्देह उसी सच्चाई से रूबरू होना पड़ा जिसका दावा कमलेश यादव द्वारा किया गया था। उस सड़क पर लगभग 5सौ मीटर की दूरी तय करने में भी यह सोचना पड़ रहा था कि गाड़ी कहीं सड़क के गड्ढे में फंस तो नहीं जाएगी। फिलहाल बचते-बचाते हुये हमने 5 सौ मीटर की यात्रा तय की और बाजार के एक किनारे की तरफ गाड़ी पार्क करके राहगीरों और स्थानीय दुकानदारों से इस सड़क की दयनीय हालत और सड़क की जर्जरता की वजह से प्रभावित हो रहे जीवन और रोजगार के संकट पर लंबी बातचीत की। सड़क पर इतने ज्यादा गड्ढे थे कि दुपहिया वाहन, कार, ट्रक, ट्रैक्टर, और परिवहन विभाग की बस से लेकर सायकिल चलाने वाले तक सब परेशान थे।

जीतेश कुमार चौरसिया

स्थानीय दुकानदार जीतेश कुमार चौरसिया बताते हैं कि, ‘बहुत उम्मीद से यहाँ पर छोटी सी दुकान खोली थी पर सड़क के टूट जाने की वजह से गर्मी के मौसम में पूरी दुकान धूल से भर जाती है और थोड़ी सी बरसात हो जाने की वजह से सड़क पर पानी भरा हुआ है और कीचड़ जमा हो गया है, जिसकी वजह से लोग इधर से तभी आते-जाते हैं जब और कोई रास्ता ना हो। जब लोग ही नहीं आएंगे तो व्यापार कैसे चलेगा।’

धर्मदेव

चौरसिया से बात कर ही रहा था कि लगभग दो किलोमीटर दूर से आये हुये धर्मदेव बहुत गुस्से से भर कर खड़े हो जाते हैं और कहते हैं ‘भैया हम बताते हैं, सावन का महीना चल रहा है इस रास्ते से काशी विश्वनाथ और मार्कन्डेय महादेव पर जल चढाने के लिए रोज सैकड़ो श्रद्धालुओं को आना जाना पड़ता है। रोज चार-छह लोग इन गड्ढों में गिरते हैं। जब अखिलेश यादव की सरकार थी तब सावन से पहले इस पूरे रास्ते पर समतलीकरण करते हुये गड्ढे पाट कर पैच-अप कर दिया जाता था पर योगी जी की सरकार बस पोस्टर लगाती है कि हर सड़क गड्ढा मुक्त होगी पर अब आप खुद ही देख लीजिये कि सड़क में सड़क कम गड्ढे ज्यादा हैं। किसी जन प्रतिनिधि को इस सड़क से जैसे कोई लेना देना ही नहीं हैं। विधायक अंकित भारती से भी कई बार बात की गई उन्होंने आश्वासन दिया पर कुछ हुआ नहीं। यहीं के नेता  राय साहब ने सड़क बनवाने के लिए बहुत प्रयास किया। कितना दौड़े। थक-हारकर उन्होंने इसी सड़क पर रामचरित मानस का पाठ भी करवा दिया। घंटी, ताली-थाली सब कुछ बजी पर सड़क बनवाने का आश्वासन ही मिला सड़क आज भी जस की तस बनी हुई है।’

ख़राब सड़क पर आवागमन करते लोग

सत्ता ने कहा था अब सब अच्छा होगा। जनता ने भी सोचा था की जब सत्ता की मंशा है कि सब अच्छा होगा तो जरूर सब अच्छा होगा। सब अच्छा होने के इंतजार में  जनता अपनी उम्मीद को बस सींचती रही और कई ऋतुचक्र गुजर गए। सत्ता की दी हुई उम्मीदें जल्दी नहीं सूखती पर यहाँ इंतजार में आँखें और उम्मीदें दोनों पथरा चुके हैं। गाजीपुर के सिधौना बाजार की जनता एक सड़क के पुनर्निर्माण को लेकर परेशान है। सिधौना बाजार से गाजीपुर और आजमगढ़ को जोड़ने वाली यह सड़क है इतनी खराब हो चुकी है कि लोगों को अब यह सड़क, सड़क कम दुर्घटना का मार्ग ज्यादा लगती है। सड़क बहुत पुरानी है और सिधौना में उस सड़क के किनारे एक बड़ा बाजार भी विकसित हो गया है। चार-पाँच किलोमीटर के दायरे के लोग इस बाजार से जीवन यापन के सामान सुगमता से खरीद लेते थे। दुकानदार भी मौज में थे। धंधा अच्छा चल रहा था। फिर धीरे-धीरे सड़क टूटने लगी। गड्ढे बढ़े तो आस-पास से आने वाले लोगों ने रास्ता बदल लिया। जब बाजार में लोगों का आना जाना कम हुआ तब दूकानदारी प्रभावित होने लगी। स्थानीय लोगों ने सरकार और जिला प्रशासन के सामने अर्जी रखी। सरकार और प्रशासन ने कहा जल्दी ही सब ठीक कर दिया जाएगा। जनता खुश हो गई और सब ठीक होने का इंतजार करने लगी। इंतजार बढ़ता रहा और सड़क और भी ज्यादा टूटती गई। दुकानदार और सड़क से गुजरने वाले राहगीर दोनों थक गए। सड़क के खराब होने से दूकानदारी इतनी प्रभावित हुई की दुकान का किराया चुका पाना भी भारी होने लगा। थकी हारी जनता के मन में आक्रोश तो पनप रहा था पर इतना नहीं कि वह बगावत करे।

हम धर्मदेव से बात करके सड़क पर पंहुचते हैं तभी 25-30 सवारियों के साथ एक रोडवेज की बस बड़ी मुश्किल से चलते हुये हमारी ओर आती है। गड्ढे से भरी सड़क पर वह इस तरह आगे बढ़ रही है कि देखकर डर लगता है कि कहीं पलट ना जाये। हम बस ड्रायवर को हाथ से रुकने का इशारा करते हैं। चूंकि बस की स्पीड 10 किलोमीटर प्रतिघंटा से भी कम ही रही होगी और चालक भी इस मुश्किल सड़क पर बस चलाते हुये जैसे थक चुका था। बस और ड्रायवर जैसे दोनों ही कुछ देर की राहत चाहते हैं। दोनों रुक जाते हैं। बस चालक जंग बहादुर अपनी खुली हुई खिड़की से हमसे मुखातिब होते हैं। हम जब उनसे पूछते हैं कि इस सड़क पर कैसे गाड़ी चलाते हैं ड्रायवर साहब? तो ऐसे लगता है जैसे उनके मन के जख्म को हमने कुरेद दिया हो और इस कुरेदे हुये जख्म का दर्द अचानक ज़ोर से टीस उठा हो।

वह बताते हैं कि ‘जब बरसात नहीं थी तब सिर्फ गड्ढा था। किसी तरह हीलते-झूलते हुये गाड़ी पार हो जाती थी। अब बरसात हो जाने से बराबर अंदाज ही नहीं लगता है कि कहाँ ज्यादा गड्ढा है और कहाँ कम। ऊपर से सवारियों की ज़िम्मेदारी रहती है। हमारी कोशिश रहती है कि कर्म की मर्यादा न टूटने पाये। इसलिए जितना बन पड़ता है उतनी सावधानी से बस चलाते हैं। यह सड़क आगे 8-9 किलोमीटर तक ऐसी ही है। बड़े, बूढ़े बच्चे सब बस में रहते हैं। सबका ख्याल रखना पड़ता है। हम कोई सरकार तो हैं नहीं कि गड्ढा, समतल सबको एक ही बराबर समझें। जिस रास्ते को हम 20 मिनट में तय कर सकते हैं उसे तय करने में 1 घंटे से ज्यादा का समय लग जाता है।’

शारदा गोस्वामी

हम चालक से बात कर रहे होते हैं तभी अंदर से एक बुजुर्ग माता जी की आवाज सुनाई देती है। माता जी कहती है कि ‘हे बाबू तनी अंदर चलि आवा।’ उनके बुलावे पर हम बस के अंदर जाते हैं। वह बताती हैं कि ‘बहुत दिक्कत है बेटा। और बरसात में त और दिक्कत है बेटा। बस अइसन हीलत-डोलट चलेला, एकदम डगर-मगर होकर गड़हा मा चलि जाला, का बताएं बेटा एकदम मन घबरा जाला।’ उनका नाम शारदा गोस्वामी है। हमसे बात करते हुये उनकी आँखों में एक उम्मीद की रोशनी दिखती है, यह रोशनी जाने कितनी बार छली गई होगी यह हम नहीं जानते पर हम इन्हें कोई गलत आश्वासन नहीं देना चाहते हैं इसलिए उनसे सादर माफी मांग लेते हैं कि माँ जी हम सिर्फ आपकी बात आगे बढ़ा सकते हैं, लिख सकते हैं, शेष हमारे हाथ में कुछ नहीं हैं। यहीं समझ में आता है कि  निराशा के दौर में आशा की एक छोटी सी चिंगारी भी चिराग सी महसूस की जा सकती है।

माया मिश्रा

इसी बस में माया मिश्रा भी बैठी हुई थी। उनका रोज का आना-जाना है, वह रोज इस समस्या से जूझती हैं। वह बताती हैं कि ‘जब से आ जा रही हूँ कभी इस सड़क को न बनते देखा ना ठीक देखा।’ इसी बस में सियाराम भी अपने परिवार के साथ यात्रा कर रहे हैं। वह कहते हैं कि ‘हम खुद भी गाड़ी चलाते हैं पर इतनी खराब सड़क होने की वजह से इस सड़क पर गाड़ी लेकर निकलने का मन नहीं करता है। इतने गड्ढे हैं रोड पर कि कितना भी संभाल कर चलाये पर कहीं ना कहीं गाड़ी में काम आ ही जाता है। बस पर सवार हर यात्री हमें इस उम्मीद से देखता है कि जैसे हम उसको इस कीचड़ और गड्ढे से भरी सड़क के संकट से उबारने आए हैं।’

वीरेंद्र पाठक

वहाँ से आगे बढ़ने पर वीरेंद्र पाठक बताते हैं कि ‘यह सड़क 8-9 साल से खराब है। इस सड़क पर चलने पर बहुत सी परेशानियां आती हैं। सिधौना से बिहारीगंज तक यह सड़क इसी जर्जर हालत में है।’ वह कहते हैं कि ‘हमें भाजपा सरकार से बहुत उम्मीद थी पर इस सड़क पर उसने तो जैसे आँखें ही बंद कर ली हैं।’ वहीं पर मौजूद राकेश कहते हैं कि ‘इस सड़क पर बाइक चलाना बहुत मुश्किल होता है। मैं कई बार खुद भी दुर्घटना का शिकार हो चुका हूँ।’ वह अपना घुटना दिखते हुये कहते हैं कि यह निशान इसी सड़क पर गाड़ी गड्ढे में गिर जाने की वजह से हुआ है।

नाज़िम हुसैन

 

थोड़ा आगे बढ़ने पर हमारी मुलाक़ात पैथोलॉजी सेंटर चलाने वाले नाज़िम हुसैन से होती है वह बताते हैं कि ‘सैंपल क्लेक्ट करने के लिए हमें इस सड़क से कई बार आना जाना पड़ता है। सड़क खराब होने से आने-जाने में जहां बहुत समय लग जाता है वहीं खुद को सुरक्षित रखना भी किसी चुनौती से कम नहीं होता है।’ वह बताते है कि ‘इस सड़क पर प्रतिदिन तीन-चार हादसे होते रहते हैं। सड़क की वजह से अब काम आधा ही हो पाता है।’

राजू

राजू बगल के गाँव के रहने वाले हैं वह भी वहीं मिल जाते हैं। उनका लगभग रोज का आना जाना है वह स्थानीय लोगों के साथ शासन, प्रशासन से मांग करते रहे हैं कि इस सड़क का पुनर्निर्माण हो जाये पर यह प्रयास कभी रंग नहीं लाया। वह बताते हैं कि इधर से गुजरने वाले लोग तो बस गाली देते हुये गुजरते हैं पर अब तक इस सड़क के पुनर्निर्माण में राम का नाम काम आया है ना लोगों की लानत मलामत।

हरिद्वार

हरिद्वार उधर से गुजरते हुये रुक जाते हैं। वह भी उसी दुख से पीड़ित दिखते हैं जिस पर हम मरहम लगाने की कोशिश कर रहे थे। वह कहते हैं ‘मैं सड़क से ज्यादा अपने उन प्रतिनिधियों से असंतुष्ट हूँ जिन्हें हमने चुना है। यहीं के दया शंकर मिश्रा मंत्री हैं, इसी सड़क से उनका भी आना जाना है। आते-जाते देखते हैं कि जनता कैसे परेशान हो रही है पर किसी को कोई परवाह नहीं है। विधायक अंकित भारती भी इस सड़क के लिए कुछ करते नहीं दिख रहे हैं।

हम वहाँ से आगे बढ़ते हैं जिला पंचायत सदस्य कमलेश यादव भी आ जाते हैं वह हमें सड़क पर वह जगह भी दिखाते हैं जहां उन्होंने रामचरित मानस का पाठ करवाया था। वह हमें सड़क के एक गड्ढे की ओर ले जाते हैं और सड़क के गड्ढे में बड़ी संख्या में मौजूद लाल ईंट के टुकड़े दिखाते हैं और कहते हैं कि शायद इससे पहले आपने लाल ईंट के टुकड़ों से बनी काली सड़क नहीं देखी होगी। वह और उनके साथ मौजूद तमाम स्थानीय लोग बताते हैं कि अगर इस लाल ईंट की जांच हो जाये तो बड़ा खेल देखने को मिलेगा। ईंट के टुकड़े डालकर काली सड़क को कभी ठीक नहीं किया जाता है पर पिछले सात आठ सालों में इस सड़क के पुनर्निर्माण के नाम पर बस लाल ईंट के टुकड़े फेंकने का गोरखधंधा किया गया है। वह बताते हैं कि PWD के माध्यम से इस रोड को लेकर बजट पास हुआ था,  लेकिन इस बजट में यहाँ के ठेकेदारों और विभागों में मिली भगत से बंदरबाँट हो गई। कमलेश यादव उर्फ राय साहब अपनी बात की सच्चाई दिखाने के लिए हमें काफी दूर तक सड़क पर ले जाते हैं और लगभग पूरी सड़क उसी हालत में दिखती है।

राजेन्द्र सिंह यादव भी इस सड़क का पुनर्निर्माण ना होने से खासे नाराज दिखते हैं । जिस सड़क से जिंदगी के सफर को आसान होना था उस सड़क ने सफर की दुश्वारियां बढ़ा दी हैं। यह दर्द इस राह से गुजरने वाले हर व्यक्ति का है। सड़क के टूटी होने से किसान भी परेशान है और जवान भी परेशान है। कई ट्रैक्टर चालक और टेम्पो चालक भी सड़क के टूटी होने को लेकर परेशान दिखते हैं। गड्ढों की वजह से ट्रैक्टर की ट्रालियाँ कई बार पलट चुकी हैं। दुपहिया वाहन भी बड़ी संख्या में दुर्घटना ग्रस्त होते रहते हैं।

प्रमोद कुमार

रोडवेज बस के उपचालक प्रमोद कुमार भी सड़क की इस खस्ता हाल स्थिति से दुखी हैं। वह बताते हैं कि ‘कई बार जब बस में सवारी ज्यादा होती है तब गाड़ी लेकर इस सड़क से गुजरने में बहुत डर लगता है। कभी गाड़ी की कमानी टूट जाती है तो कभी कुछ और खराबी आ जाती है। बस इस राह का सफर कई सालों से ऐसे ही चल रहा है। जाने सरकार कभी इसकी सुध लेगी भी या नहीं।’

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