दो बहादुर बेटियों की दास्तान (डायरी, 28 जुलाई, 2022) 

नवल किशोर कुमार

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जड़ताएं खत्म होनी ही चाहिए। ऐसा माननेवाला मैं दुनिया में कोई अकेला नहीं हूं। मुझ जैसे असंख्य लोग होंगे, जिन्हें वर्चस्ववादी परंपराओं पर प्रहार सुखद अनुभूति देता होगा। असल में मानव होने की शर्त ही यही है। भारतीय समाज के संदर्भ में बात करें तो वर्चस्ववादी परंपराओं के मूल में जातिभेद और पितृसत्ता है। लेकिन कल दो खबरें मिलीं, जिनसे सुकून महसूस हुआ। दोनों खबरों में समानताएं भी हैं और भिन्नता भी। एक खबर में नायिका है एक आदिवासी समुदाय की छात्रा और दूसरी खबर में दलित छात्रा। लेकिन दोनों का साहस अलहदा है।

पहली खबर महाराष्ट्र के नासिक जिले की है। शिकायत करनेवाली छात्रा जिले के त्र्यंबकेश्वर तालुका के देवगांव में माध्यमिक और उच्च माध्यमिक आश्रम स्कूल में पढ़ती है। इस छात्रावास सह स्कूल में उसके जैसी करीब पांच सौ छात्राएं पढ़ती हैं। बीते दिनों इस स्कूल में पौधरोपण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। लेकिन जिस शिक्षक ने इस आयोजन को अंजाम दिया, उसने उन लड़कियों को पौधरोपण करने से रोक दिया, जिनका मासिक धर्म चल रहा हो। यहां तक कि उन लड़कियों को पेड़ों के पास जाने से भी रोक दिया। शिक्षक ने तर्क यह दिया कि उनके छूने से पेड़ सूख जाएंगे।

जड़ताएं खत्म हो रही हैं, यह महसूस किया जा सकता है। इसे दूसरे अर्थों में कहें तो जो समुदाय शोषित रहा है, वह अब धीरे-धीरे सशक्त हो रहे हैं। इसकी बड़ी वजह हमारे देश का संविधान है। यदि संवैधानिक प्रावधानों को लागू करनेवाला तंत्र और न्याय देनेवाला तंत्र और अधिक गंभीर और ईमानदार होता तो निश्चित तौर पर जो सशक्त होने की गति बहुत तेज होती।

जाहिर तौर पर यह एक दकियानूसी बात है। माहवारी महिलाओं के लिए सामान्य प्रक्रिया है और इसका शुद्धता अथवा अशुद्धता से कोई संबंध नहीं है। लेकिन सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर देखें तो संबंध ही संबंध हैं। केरल के एक प्रसिद्ध मंदिर में तो यह आज भी बड़ा मसला है। इस मंदिर में रजस्वला महिलाओं को प्रवेश की इजाजत नहीं है। जबकि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट तक कह चुका है कि रजस्वला महिलाओं को मंदिर प्रवेश से नहीं रोका जा सकता है।

हालांकि यह केवल केरल के एक मंदिर का मसला नहीं है या फिर केवल एक हिंदू धर्म से जुड़ा मसला भी नहीं है। दो दिन पहले ही एक मुसलमान मित्र से सामान्य बातचीत के दौरान यह जानकारी मिली कि उनके यहां भी रजस्वला महिलाओं के लिए कुछ प्रतिबंध हैं। वे स्वास्थ्य संबंधी तर्क दे रहे थे, जो कि वास्तव में कुतर्क ही थे।

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खैर, नासिक जिले की आदिवासी छात्रा ने अपने शिक्षक का विरोध किया। शिक्षक ने उसे धमकी भी दी कि यदि उसने शिकायत की तो वह उसे परीक्षा में फेल कर देगा। लेेकिन छात्रा ने हार नहीं मानी और उसने स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता भगवान मधे से संपर्क किया। इस सामाजिक कार्यकर्ता ने इस बाबत शिक्षा महकमे के एक बड़े अधिकारी को दी। इसके बाद छात्रा की शिकायत को दर्ज किया गया और फिलहाल पूरे मामले की जांच करने की बात कही जा रही है।

दूसरी घटना भी एक स्कूली छात्रा की बहादुरी की है। यह घटना मध्य प्रदेश के शाजापुर की है। बीते शनिवार को वहां बावलियाखेड़ी नामक गांव के दलित परिवार की छात्रा को गांव के ऊंची जातियों के लोगों ने स्कूल जाने से रोका। घटना के समय छात्रा अपने स्कूल जा रही थी। आरोपियों ने उसका बस्ता छीनकर फेंक दिया और उसे धमकी दी कि अगर वह स्कूल गयी तो इसका अंजाम बुरा होगा। छात्रा ने साहस किया और घर पर आकर उसने इस घटना की जानकारी अपने परिजनों को दी। इसके बाद परिजनों ने छात्रा को साथ ले जाकर मामले की शिकायत दर्ज करवाई। अब वहां यह मामला सामने आ रहा है कि ऊंची जाति के लोगों ने न केवल दलित समुदाय की, बल्कि अपनी जातियों की लड़कियाें को भी स्कूल जाने से रोक रखा है। वह तो दलित छात्रा और उसके परिजनों की बहादुरी है, जिनके कारण अब शायद बावलियाखेड़ी गांव की लड़कियां स्कूल जा सकेंगीं।

बावलियाखेड़ी नामक गांव के दलित परिवार की छात्रा, जिसने गाँव के ऊँची जातियों के लोगों ने स्कूल जाने से रोकने पर विरोध किया

दरअसल, जड़ताएं खत्म हो रही हैं, यह महसूस किया जा सकता है। इसे दूसरे अर्थों में कहें तो जो समुदाय शोषित रहा है, वह अब धीरे-धीरे सशक्त हो रहे हैं। इसकी बड़ी वजह हमारे देश का संविधान है। यदि संवैधानिक प्रावधानों को लागू करनेवाला तंत्र और न्याय देनेवाला तंत्र और अधिक गंभीर और ईमानदार होता तो निश्चित तौर पर जो सशक्त होने की गति बहुत तेज होती।

बावलियाखेड़ी नामक गांव के दलित परिवार की छात्रा को गांव के ऊंची जातियों के लोगों ने स्कूल जाने से रोका। घटना के समय छात्रा अपने स्कूल जा रही थी। आरोपियों ने उसका बस्ता छीनकर फेंक दिया और उसे धमकी दी कि अगर वह स्कूल गयी तो इसका अंजाम बुरा होगा।

बहरहाल, यह क्या कम है कि भारत के वंचित समाजों की बेटियां संघर्ष कर रही हैं। वह पढ़ना चाहती हैं और इसके लिए वह पितृसत्ता का मुकाबला कर रही हैं। मैं तो आनेवाले पचास साल के बारे में सोच रहा हूं। तब मुमकिन है कि मैं जिंदा नहीं रहूं, लेकिन आज का वंचित समाज आज के जैसे शोषित और उत्पीड़ित नहीं रहेगा। यह तो मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं।

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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