वरुणा की दूसरी यात्रा

अमन विश्वकर्मा

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वाराणसी। शुक्रवार की शाम रामजी भैया ने अचानक कहा- ‘अमन इस रविवार को नदी एवं पर्यावरण संचेतना यात्रा का दूसरा कार्यक्रम परसों रविवार को होगा।’ मैंने भी हामी भर दी और कार्यक्रम का नया पोस्टर बनाने के काम में जुट गया। अपर्णा मैडम ऑफिस में थी नहीं, लेकिन फोनिक माध्यम से उन्हें कार्यक्रम की सारी डिटेल दी जाती रही। इसी कड़ी में रामजी भैया ने अपने अन्य साथियों को भी मोबाइल पर निमंत्रण भेज दिया और फोन पर ही कार्यक्रम की रूपरेखा बनने लगी। पहली यात्रा की तरह ही चमाँव स्थित बाबाजी की मड़ई से दूसरी यात्रा की शुरुआत करने का फैसला हो गया। शनिवार को मैं प्रिंटर की दुकान से पोस्टर ले आया लेकिन उसी दिन बनारस की तपती धरती पर बारिश की बूंदों का आगमन हो गया। तेज हवाओं के साथ पानी की बूंदों ने मौसम को सुहाना बना दिया। रामजी भैया और मैं इस बात पर एक बार फिर चर्चा कर बैठे कि कहीं रविवार को भी पानी बरस गया तो जल यात्रा का क्या होगा? रामजी भैया ने कहा- ‘चलो इस बारिश के बहाने वरुणा का पानी थोड़ा साफ भी हो जाएगा।’

वरुणा नदी में जगह-जगह जमी काई

मैंने कहा- ‘वो तो है लेकिन वरुणा किनारे चलने लायक रास्ता नहीं मिलेगा। मिट्टी गिली हो जाएगी और फिसलन होगी वो अलग।

रामजी भैया ने कहा- ‘चलो देखा जाएगा…।’

उसी दिन रात में रामजी भैया ने फोन कर मुझे किसान नेता रामजनमजी को कार्यक्रम स्थल पर लाने की जिम्मेदारी सौंप दी।

ह्वाट्सएप पर उन्होंने रामजनमजी का नम्बर भेज कर दिया। मैंने तुरंत रामजनमजी को फोन कर अपना परिचय दिया। उन्होंने सुबह साढ़े पाँच बजे पांडेयपुर चौराहे पर मिलने की बात कहकर मोबाइल डिस-कनेक्ट कर दिया।

वरुणा नदी में गंदगी का आलम

अगले दिन ठीक सुबह उठते ही समय देखने के लिए मैं बिस्तर पर अपना मोबाइल खोजने लगा। याद आया कि मोबाइल तो चार्ज में लगा है। देखा पाँच बजकर पाँच मिनट हो रहे थे। रामजनमजी से तय समय के अनुसार साढ़े पाँच बजे पांडेयपुर चौराहे पर पहुँचना था। तुरंत नहाकर तैयार हुआ और पाँच बजकर 34 मिनट पर चौराहे पर पहुंच गया। रामजनमजी को फोन किया तो उन्होंने दस मिनट में आने की बात कही। शनिवार की बारिश के बाद मौसम में थोड़ी ठंडक थी और हवा भी चल रही थी इसलिए दस मिनट क्या घंटों का इंतजार भी कर सकता था। करीब 20 मिनट बाद रामजनमजी आ गए। अपनी दुपहिया से मैं उन्हें लेकर पत्रकारपुरम पहुँचा और मेन गेट से ही रामजी भैया को फोन किया- ‘हैलो, कहाँ हैं?’

‘अभी घर पर ही हूँ अमन। उठकर फिर सो गया था। आ जाओ घर पर ही।’ मैं और रामजनमजी उनके घर के नीचे खड़े हो गए। दो मिनट बाद रामजी भैया और और अलकबीरजी खड़े थे। रामजी भैया जल्दी-जल्दी अपनी दुपहिया पोछकर उसे बाहर निकालने लगे। तभी रामजनमजी ने कहा- ‘हड़बड़ाइए मत।’

‘नहीं, वहाँ कई लोग पहुँच गए होंगे।’

दरवाजा बंदकर दो दुपहिया पर हम चार लोग यानी मैं और रामजनमजी व रामजी भैया और अलकबीरजी निकल पड़े चमाँव स्थित कार्यक्रम स्थल पर।

करीब दस मिनट में गाँव पहुँचकर देखा तो वहाँ मात्र दो या तीन लोग थे। फिर भी हम लोगों के चहरे पर कोई चिंता नहीं थी क्योंकि हम जानते थे कि यात्रा की शुरुआत होते ही पिछली बार की तरह इस बार भी गाँव और आसपास के लोग धीरे-धीरे जुड़ने लगेंगे और हुआ भी कुछ ऐसा ही।

नदी एवं पर्यावरण संचेतना यात्रा में शामिल लोग

कुछ ही देर में गोकुल दलित, सुरेंद्र सिंह आ गए। नन्दलाल मास्टर का फोन कई बार आ चुका था। रामजी भैया ने उन्हें फोन लगाया तो उन्होंने कहा कि वे महजिदिया घाट पर ही हैं। वे पश्चिम की तरफ मुंह करके बात कर रहे थे। रामजी भैया ने कहा कि जरा पूरब-उत्तर के कोने में देखिये। हाँ … थोडा सा इधर। फिर उन्होंने हाथ हिलाया। नन्दलाल मास्टर वहां से चल पड़े। तब तक सायकिल के कैरियर में फरसा फंसाए पसीने और मिट्टी से लथपथ तूफानीजी चले आये। रामजी भैया ने सबसे उनका परिचय कराया- यह तूफानी सरदार हैं। इनके ऊपर मैंने एक छोटा-सा उपन्यास लिखा था- तूफानी सरदार का घोड़ा। उन्होंने उनसे पूछा ‘तू उपन्यसवा पढ़ले हउवा?’ तूफानी सरदार मुस्कराकर बोले- ‘हँ, एक ठे आउर लिख देता।’

सभी लोगों का जुटान हो गया। बिना समय गँवाए यात्रा की शुरुआत हो गई। सबसे पहले गाँव की एक महिला और बच्ची यात्रा में शामिल हुए। उसके बाद तूफानी सरदार ने आकर पोस्टर थामकर यात्रा को चल पड़े। बाबाजी की मड़ई से पिछली बार बाईं तरफ यात्रा निकाली गई थी इस बार दाईं तरफ का कार्यक्रम तय था। रामजी भैया और राजूजी हाथ में पोस्टर थामकर चलते रहे, उनके पीछे-पीछे हम सभी लोग।

कीचड़ और उबड़-खाबड़ रास्तों पर नदी एवं पर्यावरण संचेतना यात्रा

कुछ दूर चलने पर तूफानी ने अपने डब्बा मोबाइल में संचित क्रांतिकारी बिरहा गायक नसुड़ी यादव का बिरहा लगा दिया. नन्दलाल मास्टर ने कहा – ‘अरे तनि अवजिया तेज करा।’ तूफानी बोले- ‘एसे जादा न तेज होई। एम्मन पराने एतना हौ।’ उन्होंने अपना मोबाइल नंदलाल मास्टर को थमा दिया। वे बिरहा सुनते हुए चलने लगे।’

मोबाइल वरुणा नदी में पानी कहीं-कहीं बहुत कम था, इतना कम कि दोनों किनारे पड़े खड़े होकर लोग सामान्य आवाज में बातें कर सकते थे। यात्रा में शामिल लोगों में सबसे उम्रदराज थे अलकबीर दादा जो अपनी उम्र के हिसाब से चल रहे थे और सबसे पीछे भी थे। उबड़-खाबड़ रास्तों पर चलते-चलते हम सब नदी की दशा और दुर्दशा पर बातें कर रहे थे, जो भी मिलता उसे यात्रा के बारे में जानकारी देते। अचानक दो ग्रामीण जिसमें एक का नाम मोहन था, ने पूछा- ‘भइया ई का होत हौ।’

मैंने कहा- ये नदी और पर्यावरण के लिए यात्रा निकाली जा रही है। ‘रामजी यादव को जानते हैं न।’

‘ऊ जवन आसमानी रंग क टी-शर्ट पहिनले हउवन न?’

‘हाँ।’

उन्होंने कहा- ‘हाँ जानली, मुलायम के घरे का हऊवन?’

‘नदी को आप लोग साफ-सुथरा रखते हैं न?’

‘हाँ, लेकिन अब नहाइला नाही, बकरी खाली पानी बदे आवलीन। पनिया गंदा हो गयल हौ न।’

बारिश के बाद जमीन से ऊपर निकल आई मेंढकों की टोली

नदी के किनारे के एक खेत में थोड़ा-सा पानी जमा हो गया था। कल की बारिश का ही पानी था। उसमें पीले-पीले मोटे-मोटे मेंढक टर्र-टर्र कर रहे थे। लोग बात करने लगे- अरे इतने मेढक। कहाँ से आये होंगे। नन्दलाल मास्टर ने कहा कि ज़मीन में ही रहते हैं लेकिन बारिश के बाद ऊपर आ जाते हैं। उनके रंगों की आकर्षकता देख मैंने उनकी फोटो भी अपने मोबाइल कैमरे में सुरक्षित कर लिया।

एक मंदिर पर यात्रा का थोड़ी देर के लिए ठहराव हुआ। इस मंदिर के आसपास काफी शांत माहौल था जिसे हम लोगों ने भंग कर दिया था। यह रैदास का मंदिर था। नीचे दो लोग नदी में स्नान कर रहे थे। उनमें से एक सज्जन गमछे की लुंगी बांधे ऊपर आये। उन्होंने पूछा ई का? तूफानी ने उनसे कुछ मजाक शुरु किया। उन सज्जन ने हम लोगों को सम्मान के साथ रुकने के लिए कहा। देखते में लग रहा था वे कहीं-कहीं साफ वरुणा नदी के पानी में स्नान कर पूजा-पाठ की तैयारी कर रहे थे।

फैक्ट्री के पास जमा कचरा जो नदी में ही डाल दिया जाता है

नदी के उस पार कोई फैक्ट्री लगी थी। सही जानकारी नहीं मिल सकी। एक-दो लोग मुर्गी फॉर्म का अंदेशा जता रहे थे। फैक्ट्री के बाहर कचरे फेंके गए थे। कुछ जगहों पर कचरे को गड्ढा कर छिपाया गया था।

संत रैदास मंदिर के पास यात्रा का ठहराव

मंदिर की दीवारों पर रविदासजी के कुछ दोहे लिखे थे-

रविदास जन्म के कारनै, होत न कोउ नीच।

नर कूँ नीच करि डारि है, ओछे करम की कीच।।

इसका अर्थ मुझे पता है- जन्म से कोई ऊँच-नीच नहीं होता, अपने कर्म से ही मनुष्य महान या निम्न बनता है।

और

जाति-जाति में जाति हैं जो केलन के पात।

रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।

इस दोहे में केलन की जगह केतन लिखा था। रामजी भैया ने कहा – केतन नहीं केलन है। इस पर रामजनमजी बोले- पढ़े-लिखे लोग शहर भागेंगे तो सही स्पेलिंग कौन लिखेगा रामजी भाई?

संत रैदास मंदिर की दीवारों पर लिखे दोहे

खैर, अलकबीरजी अब काफी पीछे थे, मुझे लगा कि वे इस मंदिर तक आ गए तो यहाँ का शांत माहौल उन्हें इससे आगे नहीं जाने देगा, वे थक भी गए होंगे और हुआ भी कुछ ऐसा ही। आते समय वे मंदिर पर मौजूद सज्जन से बातचीत में लीन हो गए।

यात्रा के दौरान हम सब लोगों में गपशप जारी था। पिछले दिन बारिश से नदी और गाँव दोनों छोर काफी सुखद अनुभूति करा रहे थे। नदी किनारे और खेतों में होते हुए यात्रा में शामिल लोग आगे बढ़ रहे थे। इसी दौरान गोकुलजी ने पूछा- कविजी (रामजी) जाना कहाँ तक है।’

‘कोरउत पुल तक, बस पास में ही है।’

सब रामजी भैया और उनके चचेरे भाई राजू के पीछे-पीछे चल रहे थे। तूफानी की उम्र और यात्रा में शामिल लोगों के जोश को देखते हुए अभी-अभी राजू ने पोस्टर का एक सिरा अपने हाथ में पकड़ लिया था। नंदलाल मास्टर अपने मोबाइल पर बिरहा सुन रहे थे। कोरउत घाट के पास पहुँचते ही मैंने देखा एक कच्चे नाले से पानी की मोटी धार वरुणा नदी में गिर रही है। यात्रा में शामिल मुलायम यादव से पूछने पर पता चला कि यह सीवर का पानी है। फेमिली ब्रेड से लेकर कई और जगहों का पानी इस नाले में आता है।

नदी में गिरता कचरा

असल में यह पुराने समय में बना बराज था जिसके नीचे से आनेवाले इस नाले में तरना, गणेशपुर, भेलखा आदि गाँवों से बारिश का पानी वरुणा में गिरता था लेकिन जलवायु परिवर्तन के चलते अब कहाँ बारिश और कहाँ का पानी लेकिन नाले में सीवर का पानी जरूर आता है। मुझे एक कहावत याद आई – बैरगिया नाला जुलुम जोर.… नाला दो-ढाई फुट चौड़ा था और मिट्टी फिसलन भरी थी। पार करने का कोई और रास्ता नहीं था। या तो हलकर पार करें या छलांग लगाकर। सबसे पहले रामजी भैया छलांग लगाकर पार हुए फिर राजू और क्रमशः सभी लोग पार हुए। तूफानी नाले की चौड़ाई देख उसी पार रुक गए। बोले- ‘लउटानी में मिलल जाई।’

चंद कदमों की दूरी पर कोरउत पुल था। किनारे के नदी के उस पार दो बच्चे कटिया लगाकर मछली मार रहे थे और एक पत्थर पर एक ग्रामीण स्नान कर रहा था। यात्रा में शामिल सभी लोगों के साथ मैं भी फिसलन से बचते-बचाते पुल के नीचे पहुँच गया। यहाँ भी नदी की दुर्दशा को  मोबाइल कैमरे में कैद किया गया।

पानी की गंदगी के कारण किनारे पर ज्यादातर सिर्फ जानवर ही आते हैं

कुछ देर के बाद यह निर्णय हुआ कि नदी से थोड़ा ऊपर जो रास्ता है वहाँ से चला जाए। सभी के जूते और चप्पलों में गीली मिट्टी की मोटी-मोटी परत चिपक गई थी। मैं अपने जूते की मिट्टी को छुड़ाने लगा। तभी रामजी भैया ने कहा- ‘अमन, उसे छुड़ाओ मत चलते-चलते साफ हो जाएगा।’

यात्रा के बाद वापसी करते लोग

ऊपरी रास्तों से होते हुए सभी फिर एक साथ हो लिए। इस बार की यात्रा काफी लम्बी हो गई थी। इस बात की आशंका गोकुल दलित और सुरेंद्र सिंह ने जताई। वे लोग किलोमीटर का अंदाजा लगा रहे थे। अनुमानित चार-साढ़े चार किलोमीटर की दूरी थी। अब उतना ही और वापस जाना था। लोग दूरी को लेकर अपने-अपने अनुभव सुना रहे थे। राजू ने बताया कि यूपी कॉलेज के मैदान में हम लोग आठ सौ मीटर के हिसाब से बारह-तेरह राउंड लगाते थे लेकिन एक दिन ही किलोमीटर में हांफने लगे तब भेद खुला कि तीन-चार चक्कर में हम दरअसल गिनती भूल जाते थे। गोकुलजी ने कहा कि हमलोग भी आठ किलोमीटर तो रोज घूम ही आते हैं। सुरेन्द्रजी बोले – ‘अरे ऊ समतल मैदान है और ई इतनी उतार-चढ़ाव की यात्रा।

पुल के निचे टूटे हुए पत्थर अज तक नहीं हटाये गए

रामजी भैया ने कहा कि ‘यह फिडिपिडीज का मैराथन हो गया। ऐसे ही रहा तो अगली बार से लोग आएँ ही न।’

गोकुलजी ने हँसते हुए कहा- ‘ ऊहे हम कहई जात रहे कविजी। अगली बार सिर्फ एक किलोमीटर आना और एक किलोमीटर जाने की यात्रा हो। थकावट हो गयल हौ मालिक। मड़ई पर चलके गोष्ठी में कुछ बोल न पाइब।’

सभी के कपड़े पसीने से हल्के-हल्के भींग गए थे। नंदलालजी बिरहे में मस्त थे लेकिन यात्रा में पूरी सहभागिता थी।

तूफानी और रामजनमजी मिलकर अपनी मित्रता को और मजबूत करने लगे। बाकी सब लोग रामजी भैया के पीछे-पीछे चल रहे थे।

आते समय एक युवक ने नदी के उस पार से पूछा- ‘यह कौन यात्रा निकल रही है?’ मैंने भी चिल्लाकर कहा- ‘नदी यात्रा।’

सामने ही बाबाजी की मड़ई दिख रही थी। सुरेन्द्रजी ने पूछा कि इधर गन्ने की खेती नहीं होती क्या? गोकुल ने कहा कि अब कहाँ का गन्ना और कहाँ का गुड़। अब वही पिसनहिया भेली है किस्मत में।

वरुणा नदी में गिर रहे नाले के पानी को निहारते तूफानीजी

हम लोग मड़ई पर पहुँच चुके थे। आकर गोष्ठी की तैयारी होने लगी। सभी लोग थक चुके थे। जूते-चप्पलों की मिट्टियाँ साफ हो गई थी। पीछे-पीछे तूफानी और रामजनमजी भी आये और घोषणा कि अरे इनसे तो मेरी बहुत नजदीकी है भाई। रिश्तेदारी निकल आई। सब लोग हँस पड़े। तूफानी ने रामजनमजी के गाँव भगवानपुर का पुराना नाम तक बता दिया- खातापर।

यात्रा के दौरान एक जगह तूफानीजी अपनी चप्पल जमीन पर उतारकर नदी का पानी अपने ऊपर छिड़कर बोले थे- जय वरुणा माई

अमन विश्वकर्मा पत्रकार हैं, वाराणसी में रहते हैं।

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2 Comments
  1. Deepak Sharma says

    बढ़िया रिपोर्टिंग

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