महाराष्ट्र में भाजपा की जीत की कही-अनकही कहानी (डायरी,30 जून, 2022)

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कल का दिन सियासत के लिहाज से यादगार दिन रहा। वैसे यह मेरे एक व्यक्तिगत कारण से भी महत्वपूर्ण था, लेकिन सियासती कारण अधिक महत्वपूर्ण है। कल महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने न केवल मुख्यमंत्री के पद से बल्कि विधान परिषद की सदस्यता से भी इस्तीफा दिया। उनका इस्तीफा सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद आया कि महाराष्ट्र के राज्यपाल के आदेश को चुनौती नहीं दी जा सकती है। दरअसल, राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने विधानसभा को आज ग्यारह बजे तक शक्ति परीक्षण का आदेश दिया था। इसे लेकर कल सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की अवकाशकालीन खंडपीठ ने कहा कि हम राज्यपाल के शक्ति परीक्षण के आदेश पर रोक नहीं लगा रहे हैं। हम रिट याचिका में नोटिस जारी कर रहे हैं। आप पांच दिनों में जवाब दायर कर सकते हैं। हम 11 जुलाई के अन्य मामलों के साथ मेरिट के आधार पर सुनवाई करेंगे।
दरअसल, यह पूरा मामला न्यायपालिका और विधायिका के बीच टकराव और इस टकराव में न्यायपालिका की जीत से जुड़ा है। हालांकि न्यायपालिका की यह जीत लोकतांत्रिक राजनीति के खिलाफ है। इसकी क्रोनोलॉजी बेहद दिलचस्प है। सुप्रीम कोर्ट में यह पूरा मामला तब पहुंचा जब महाराष्ट्र विधानसभा के उपाध्यक्ष ने एकनाथ शिंद के नेतृत्व में शिवसेना से विद्रोह करनेवाले 16 विधायकों को नोटिस जारी किया तथा 27 जून तक जवाब मांगा। परंपराओं के विपरीत बागी विधायकों ने हाई कोर्ट के बजाय सुप्रीम कोर्ट की शरण ली और सुप्रीम कोर्ट में उपरोक्त न्यायाधीश द्वय ने पहले उन्हें यह कहते हुए राहत दी कि वे पांच जुलाई को विधानसभा को जवाब दे सकते हैं।

यह एक ऐसा फैसला था, जिसने भाजपा के लिए आगे की राह को आसान कर दिया था। हालांकि इस मामले में महाराष्ट्र विधानसभा के उपाध्यक्ष यदि चाहते तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले को खारिज कर सकते थे और बागियों को मजबूर कर सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और संभवत: इस वजह से नहीं किया क्योंकि इसमें सुप्रीम कोर्ट परंपरा के विरुद्ध जाकर हस्तक्षेप कर चुका था।

यह एक ऐसा फैसला था, जिसने भाजपा के लिए आगे की राह को आसान कर दिया था। हालांकि इस मामले में महाराष्ट्र विधानसभा के उपाध्यक्ष यदि चाहते तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले को खारिज कर सकते थे और बागियों को मजबूर कर सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और संभवत: इस वजह से नहीं किया क्योंकि इसमें सुप्रीम कोर्ट परंपरा के विरुद्ध जाकर हस्तक्षेप कर चुका था।
खैर, भाजपा पहले से ताक में बैठी थी। महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने बिना कोई पल गंवाए विधानसभा को शक्ति परीक्षण कराने का आदेश जारी किया। यह भी बेहद दिलचस्प है क्योंकि राज्यपाल सामान्य मामलों में ऐसा नहीं करते। खासकर, तब तो बिल्कुल भी नहीं करते हैं जब मामला समान दल का हो। मतलब यह कि राज्यपाल के पद पर आसीन व्यक्ति और संबंधित राज्य की सरकार का दल एक हो। तब राज्यपाल शीतनिद्रा में बने रहते हैं। लेकिन जब मामला विपरीत दल का हो तो राज्यपाल का विवेक कुछ अधिक ही काम करता है।
तो यही हुआ महाराष्ट्र में। राज्यपाल का विवेक जागा और उन्होंने शक्ति परीक्षण का आदेश जारी कर दिया। यहां भी विधानसभा के पास यह ताकत है कि वह राज्यपाल के आदेश के अनुपालन पर रोक लगा सकती है। मसलन, विधानसभा के उपाध्यक्ष यह कह सकते थे कि पहले बागी विधायकों की योग्यता का फैसला हो जाय, तभी शक्ति परीक्षण हो सकेगा। लेकिन यहीं पर शिवसेना ने चूक कर दी। यह चूक इस वजह से भी संभव है कि उसके पास संसदीय राजनीति की गहरी समझ रखनेवाले लोग नहीं हों। शिवसेना के सचेतक सुनील प्रभु ने राज्यपाल के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी। यह अपने ही पाले में गोल दागना साबित हुआ और सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने भाजपा की जीत सुनिश्चित कर दी। हालांकि तब भी शिवसेना के पास यह मौका था कि उद्धव ठाकरे सीएम बने रह सकते थे। लेकिन ठाकरे स्वयं अनुभवहीन साबित हुए और उन्होंने स्वयं ही इस्तीफा दे दिया।

कल ही ओवैसी की पार्टी के चार विधायकों ने राजद की सदस्यता ग्रहण कर ली और इस लिहाज से बिहार में सबसे बड़ी पार्टी राजद हो गई। लेकिन इस मामले में बिहार विधानसभा के अध्यक्ष विजय कुमार सिन्हा ने अड़ंगा डाल दिया है। उन्होंने ओवैसी की पार्टी के चार सदस्यों के राजद में शामिल होने को सहमति प्रदान नहीं की। अब यह भी विधानसभा के अध्यक्ष का विवेकाधिकार ही है कि वह चाहे तो सहमति दे या फिर नहीं दे। यह भी मुमकिन है कि विधानसभा के अध्यक्ष चूंकि भाजपाई हैं और वे यह समझते हैं कि सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद राजद के कौन-कौन से अधिकार मिल जाएंगे, इसलिए उन्होंने अबतक सहमति नहीं दी है।

अब इस पूरे मामले के सूत्रधार देवेंद्र फड़णवीस सामने आए हैं। कल ही उनकी एक तस्वीर सामने आयी, जिसमें उन्हें भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष चंद्रकांत पाटील मिठाई खिला रहे हैं।
बहरहाल, यह तो महाराष्ट्र की बात है। बिहार की सियासत की बात करता हूं। कल ही ओवैसी की पार्टी के चार विधायकों ने राजद की सदस्यता ग्रहण कर ली और इस लिहाज से बिहार में सबसे बड़ी पार्टी राजद हो गई। लेकिन इस मामले में बिहार विधानसभा के अध्यक्ष विजय कुमार सिन्हा ने अड़ंगा डाल दिया है। उन्होंने ओवैसी की पार्टी के चार सदस्यों के राजद में शामिल होने को सहमति प्रदान नहीं की। अब यह भी विधानसभा के अध्यक्ष का विवेकाधिकार ही है कि वह चाहे तो सहमति दे या फिर नहीं दे। यह भी मुमकिन है कि विधानसभा के अध्यक्ष चूंकि भाजपाई हैं और वे यह समझते हैं कि सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद राजद के कौन-कौन से अधिकार मिल जाएंगे, इसलिए उन्होंने अबतक सहमति नहीं दी है। वे चाहें तो सहमति नहीं भी दे सकते हैं और कानूनी विमर्श के नाम पर इसे टाल भी सकते हैं ताकि भाजपा की केंद्र सरकार इन चारों विधायकों के यहां ईडी और इनकम टैक्स आदि द्वारा छापे मरवा सके या फिर यह भी मुमकिन है कि वह इन्हें खरीदने की कोशिश भी करे।
बहरहाल, पूरी सियासत बेहद दिलचस्प है और निश्चित तौर पर अनुभवहीनों के लिए सियासत में कोई जगह नहीं होती। फिर चाहे वह उद्धव ठाकरे हों या फिर कोई और।

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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