लालू यादव की राजनीतिक हत्या के लिए चारा घोटाले का इस्तेमाल

विद्या भूषण रावत

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बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को फिर से जेल की सजा हुई है। रांची की एक अदालत ने उन्हे चारा घोटाले का दोषी पाया है। वैसे लालू यादव एक ही प्रकार के ‘अपराध’ के लिए इतनी सज़ाएँ भुगत रहे हैं वह केवल उदाहरण है कि सत्ताधारी कैसे आपको फँसाते हैं? और न्याय की हत्या करते हैं? अपनी विशिष्ट भाषा शैली और जनता से जुड़कर काम करने वाले लालू यादव भारत की राजनीति में सबसे प्रभावित करने वाली शख्सियत माने जाते हैं। लालू यादव पर चारा घोटाले के संदर्भ में पाँच अलग-अलग अदालतों में मामले लंबित थे और सभी में फैसला आ चुका है। आज डोरंडा ट्रेजरी से 139.5 करोड़ की अवैध निकासी के संबंध में उन्हें पाँच वर्ष के कारावास की सज़ा हुई और साठ लाख रुपये का जुर्माना भी लगा दिया गया। पांचों मामलों में उनकी कुल सज़ा साढ़े बत्तीस वर्ष की है। हालांकि चार मामलों में उन्हें बेल मिल चुकी है और शायद स्वास्थ्य के हवाले से इसमें भी बेल मिल जाएगी लेकिन लालू प्रसाद यादव अब राजनीति में अपनी पार्टी के जरिए ही प्रभावित कर पाएंगे। राजनीति में उनकी पकड़ बनी रहेगी लेकिन सत्ता पर सीधे पकड़ नहीं रह पाएगी।

लालू प्रसाद यादव जनता दल में विश्वनाथ प्रताप के नजदीकी बने रहे लेकिन धीरे-धीरे जब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपने स्वास्थ्य के कारण दलगत राजनीतिक मसलों में दिलचस्पी लेना बंद कर दिया तो जनता दल में बहुत से धड़े उसकी कमान संभालना चाहते थे।

लालू यादव ने 2 दिसंबर 1989 को बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी और उसके बाद अपनी कार्यशैली के लिए बिहार के सवर्णवादी वर्चस्ववादी मीडिया की नज़रों में खटकने लगे। उनका चरवाहा विद्यालय एक बिल्कुल नया कान्सेप्ट था जो अति दलित, अति पिछड़ी जाति के बच्चों के जीवन में बदलाव ला सकता था। गाँव के गरीब दलित-पिछड़े वर्ग के लोगों से उनके सीधे संपर्क के चलते लोगों मे एक नई आशा का संचार हुआ। जनता दल पार्टी की अंदरूनी राजनीति में लालू यादव ने अपने आपको पूरी तरह से तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ रखा। 7 अगस्त 1990 को संसद में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जब मण्डल आयोग की रिपोर्ट को स्वीकार करने की घोषणा की तो पार्टी दो फाड़ हो गई। चंद्रशेखर, देवीलाल, मुलायम सिंह यादव, यशवंत सिन्हा आदि लोग दूसरी और खड़े थे लेकिन लालू यादव ने न केवल उस दौर में सामाजिक न्याय की शक्तियों को ताकत दी अपितु 23 सितंबर 1990 को भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी की राम रथयात्रा को समस्तीपुर में रोक दिया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया। इसके नतीजे में  विश्वनाथ प्रताप सिंह की राष्ट्रीय मोर्चा सरकार अल्पमत में आ गई और फिर चंद्रशेखर के नेतृत्व में दूसरे धड़े ने समाजवादी जनता पार्टी बनाकर कांग्रेस की मदद से नई सरकार बनाई। मुलायम सिंह यादव की सरकार उत्तर प्रदेश में काँग्रेस के सहयोग से चली जबकि लालू यादव जनता दल  के साथ ही जुड़े रहे। मुलायम के ‘हिन्दी प्रेम’ के ठीक उलट लालू यादव ने सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी पढ़ाने को अनिवार्य किया ताकि गरीब बच्चे भी अंग्रेजी सीख सकें और आगे बढ़ सकें।

1990 में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालूप्रसाद यादव ने भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी की राम रथयात्रा रोक कर उन्हें गिरफ्तार किया

लालू प्रसाद यादव जनता दल में विश्वनाथ प्रताप के नजदीकी बने रहे लेकिन धीरे-धीरे जब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपने स्वास्थ्य के कारण दलगत राजनीतिक मसलों में दिलचस्पी लेना बंद कर दिया तो जनता दल में बहुत से धड़े उसकी कमान संभालना चाहते थे।

लालू यादव चाहते थे कि देवगौड़ा उनके विरुद्ध जांच को कम करें और यू सी विश्वास को सी बी आई के क्षेत्रीय ब्यूरो से स्थानांतरित कर दें। लालू की मुश्किल इसलिए ज्यादा हुई क्योंकि विश्वास दलित वर्ग से आते थे और बहुत ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों में गिने जाते थे इसलिए उन्हें इस संदर्भ मे राजनीति करने का अवसर नहीं मिला। यूँ कह सकते हैं कि देवगौड़ा ने उनसे बड़ी राजनीति की।

सामाजिक न्याय के खिलाफ हथियार बन गया चारा घोटाला 

1990-1995 के बीच बिहार में चारा घोटाले की खबर आई और पशुपालन विभाग के खातों से अलग-अलग ट्रेजरी से करीब 950 करोड़ रुपये निकालने की खबरें आईं और ऐसी कंपनियों के नाम थे जो केवल कागजों पर थीं। घटना पर राजनीतिक दवाब के चलते लालू यादव ने  इसकी जांच के आदेश दिए। ये वह समय था जब वह दोबारा मुख्यमंत्री बन कर आए थे लेकिन इस सवाल पर उनके विरोधियों ने एक पटना हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर दी थी जिसके मार्च 1996 के  एक निर्णय के फलस्वरूप केस सीबीआई को चला गया। जून 1997 मे जब सीबीआई ने चार्जशीट दायर की तो लालू यादव को एक आरोपी बनाया गया। उसके चलते व्यापक राजनीतिक दवाब में उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा और उन्होंने अपनी पत्नी श्रीमती राबड़ी देवी को बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया। उस समय लालू बहुत ताकतवर थे लेकिन उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल में उनके नेतृत्व को लेकर बहुत विरोध था। 30 जुलाए 1997 को उन्हें न्यायालय में आत्म समर्पण किया लेकिन सीबीआई उस समय सेना तक की मदद लेने की कोशिश की क्योंकि बिहार पुलिस कुछ नहीं कर पा रही थी और लालू एक शक्तिशाली राजनेता थे इन्हें इतनी आसानी से गिरफ्तार नहीं किया जा सकता था।

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उत्तर भारत की राजनीति में यदि लालू सफल हो जाते तो बहुत बड़े बदलाव को जन्म दे सकते थे लेकिन जनता दल के अति महत्वाकांक्षी लोगों की राजनीति के चलते उन्हें फँसाया गया। अभी हम यह कह सकते हैं कि भाजपा और सवर्ण लॉबी ने उनके एक ही केस के अनेक मामले बना अलग-अलग अदालतों में  उन्हें फँसाया जो बेहद छोटे दर्जे की राजनीति है। एक ही मामले के लिए उन्हें अलग-अलग जिलों में आरोपित कर उनको राजनैतिक तौर पर मारने का षड्यन्त्र किया गया लेकिन इसमें सभी दोषी थे। हकीकत यह है कि घोटाला लालू यादव के शासन में आने से पहले से चल रहा था और इसीलिए जगन्नाथ मिश्र भी इसमें एक आरोपी थे लेकिन वह छूट गए। लालू यादव के विरुद्ध केस को ‘मजबूती’ से करने के लिए यू सी विश्वास नामक अधिकारी का इस्तेमाल किया गया। पूरा मामला बिना केन्द्रीय नेतृत्व की अनुमति के संभव नहीं था। तत्कालीन प्रधानमंत्री देवगौड़ा जानते थे कि लालू यादव बहुत सशक्त हैं और वह प्रधानमंत्री पद की चाहत भी रखते हैं  इसलिए लालू को नियंत्रित करने के लिए कोर्ट के नाम पर सारे काम किए गए। लालू यादव चाहते थे कि देवगौड़ा उनके विरुद्ध जांच को कम करें और यू सी विश्वास को सी बी आई के क्षेत्रीय ब्यूरो से स्थानांतरित कर दें। लालू की मुश्किल इसलिए ज्यादा हुई क्योंकि विश्वास दलित वर्ग से आते थे और बहुत ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों में गिने जाते थे इसलिए उन्हें इस संदर्भ मे राजनीति करने का अवसर नहीं मिला। यूँ कह सकते हैं कि देवगौड़ा ने उनसे बड़ी राजनीति की।

प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा और लालू प्रसाद यादव

सीबीआई केस के चलते लालू पर शिकंजा कसता चला गया जिसे उन्होंने अपनी ‘जनशक्ति’ के चलते रोकने के प्रयास किया लेकिन बिहार में नीतीश और रामविलास ने उनके विरोध की मुहिम को हवा दी। सभी नेताओं की अपनी-अपनी शिकायतें थीं लालू यादव को बिहार में यादव-मुस्लिम समीकरण पर जरूरत से ज्यादा भरोसा था और इसके चलते उन्होंने किसी की नहीं सुनी।

दैनिक भास्कर में छपे पत्रकार संकर्षण ठाकुर की पुस्तक द मेकिंग ऑफ लालू यादव के हवाले से लिखा है : ‘तत्कालीन जनता दल के अध्यक्ष लालू और PM देवगौड़ा के बीच तीखी बहस हुई। लालू ने कहा था – का जी देवगौड़ा, इसीलिए तुमको PM बनाया था कि तुम हमारे खिलाफ केस तैयार करो? बहुत गलती किया तुमको PM बना के।  लालू यादव ने देवगौड़ा के आधिकारिक 7 रेस कोर्स निवास पर घुसते हुए यह टिप्पणी की। देवगौड़ा ने भी वैसा ही जवाब दिया था, ‘भारत सरकार और CBI कोई जनता दल नहीं है कि भैंस की तरह इधर-उधर हांक दिया। आप पार्टी को भैंस की तरह चलाते हैं, लेकिन मैं भारत सरकार चलाता हूं।’ हालांकि इस बातचीत का कोई पुख्ता सबूत नहीं है लेकिन राजनीति के गलियारों में नेताओं के जरिए ये खबरें पत्रकारों तक पहुँचती थीं। उस दौर को नजदीकी से जानने के कारण मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि जनता दल में कर्नाटक की लॉबी ने लालू का पार्टी में दबदबा खत्म करने के लिए यह कोशिश की। लालू प्रसाद की रामकृष्ण हेगड़े के साथ भी नहीं बनी क्योंकि हेगड़े जैसे लोग भी सामाजिक न्याय की राजनीति के विरोधी थे। देवगौड़ा कभी भी सामाजिक न्याय आंदोलन के सिपाही नहीं रहे। और बाकी सभी लोग भी अपनी-अपनी राजनीति कर रहे थे। सीबीआई केस के चलते लालू पर शिकंजा कसता चला गया जिसे उन्होंने अपनी ‘जनशक्ति’ के चलते रोकने के प्रयास किया लेकिन बिहार में नीतीश और रामविलास ने उनके विरोध की मुहिम को हवा दी। सभी नेताओं की अपनी-अपनी शिकायतें थीं लालू यादव को बिहार में यादव-मुस्लिम समीकरण पर जरूरत से ज्यादा भरोसा था और इसके चलते उन्होंने किसी की नहीं सुनी। नीतीश कुमार और रामविलास पासवान ने जब अलग-अलग जातियों का ध्रुवीकरण कर दिया तो राजद की राजनीति को नुकसान पहुंचा, हालांकि लालू यादव अकेले दम पर एक ताकतवर नेता बने रहे लेकिन यह अकेली ताकत उन्हें सत्ता में नहीं ला पाई।

पत्रकार संकर्षण ठाकुर की पुस्तक द मेकिंग ऑफ लालू यादव

गुजराल के प्रति लालू यादव का विशेष सहयोग रहा और उन्होंने गुजराल को पहले पटना से चुनाव लड़वाया लेकिन उसके स्थगित होने के कारण फिर बिहार से ही इंदर कुमार गुजराल को राज्यसभा में भिजवाया। गुजराल हालांकि लालू प्रसाद यादव के नजदीकी थे लेकिन हकीकत यह है कि वह कोई मंडलवादी नहीं थे और उन्हें अपने राजनीतिक भविष्य के लिए लालू प्रसाद यादव पर निर्भर रहना था।

लालू यादव की चूकें 

लालू यादव की गलती उतनी ही है जितनी राजनेताओं की होती है। जब वे सत्ता में होते हैं तो अत्यंत आत्मविश्वासी हो जाते हैं। फिर वे किसी भी प्रोटोकॉल आदि को नहीं मानते। लालू यादव बहुत मुश्किल और मेहनत के बल पर आगे आए थे लेकिन सत्ता के समय उन्हें भी अहंकार था कि उनके बिना सत्ता चल नहीं सकती। देवगौड़ा भी कोई कागजी शेर नहीं थे। कर्नाटक में उन्होंने अपने दम पर जनता दल को खड़ा किया था, इसलिए ये उम्मीद करना कि प्रधानमंत्री उनकी किसी भी बात को नहीं टाल सकेंगे, गलत था। बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र भी इसमें आरोपित थे लेकिन बाद में उन्हें  साक्ष्यों के अभाव में छोड़ दिया गया। रिहा होने के बाद, अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने साफ कहा कि लालू प्रसाद यादव को बीजेपी ने नहीं अपितु देवगौड़ा ने फँसाया। देवगौड़ा की सरकार गिरने के बाद इन्द्र कुमार गुजराल को भी ऐसे ही हाँकने की कोशिश की गई। हालांकि लालू यादव चाहते थे कि सीबीआई के डायरेक्टर जोगिंदर सिंह, जो कर्नाटक कैडर के थे, इसकी जांच करें लेकिन हकीकत यह है कि देवगौड़ा यह समझ गए कि लालू उनको ह्यूमिलिएट कर रहे हैं और उन्होंने उनकी सरकार बचाने की कोई कोशिश नहीं की। इसलिए जब इन्द्र कुमार गुजराल की सरकार आई तो भी जोगिंदर सिंह ने लालू प्रसाद यादव के विरुद्ध अपनी कार्यवाही जारी रखी और यू के विश्वास को लगातार आगे किए रहे। क्योंकि इंदर कुमार गुजराल की सरकार लालू जी के समर्थन पर चल रही थी इसलिए जोगिंदर सिंह को सीबीआई से ट्रांसफर कर दिया गया। हालांकि विश्वास के ट्रांसफर पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी। गुजराल के प्रति लालू यादव का विशेष सहयोग रहा और उन्होंने गुजराल को पहले पटना से चुनाव लड़वाया लेकिन उसके स्थगित होने के कारण फिर बिहार से ही इंदर कुमार गुजराल को राज्यसभा में भिजवाया। गुजराल हालांकि लालू प्रसाद यादव के नजदीकी थे लेकिन हकीकत यह है कि वह कोई मंडलवादी नहीं थे और उन्हें अपने राजनीतिक भविष्य के लिए लालू प्रसाद यादव पर निर्भर रहना था।

अटल विहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार के समय भी उनके विरोधी सक्रिय हो चुके थे। राम विलास पासवान और नीतीश कुमार उनसे राजनीतिक तौर पर नहीं लड़ पा रहे थे इसलिए दोनों ने भारतीय जनता पार्टी से हाथ मिलाया और अपने जीवनपर्यंत ‘धरनिरपेक्षता’ और ‘समाजवाद’ के सिद्धांतों को गर्त में फेंक दिया।

भूराबाल को की ताकत बन गए नीतीश और रामविलास 

हालांकि उनका शासन गरीब लोगों के लिए अच्छा था लेकिन विपक्षियों ने उन पर ये आरोप लगाए के वह ‘जातिवादी’ हैं और ‘यादववाद’ फैला रहे हैं। भूमिहार, कायस्थ, ब्राह्मणों की लॉबी ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया। केंद्र में सीबीआई के निदेशक जोगिंदर सिंह थे। जब लालू यादव को पहली बार 30 जुलाई 1997 को जेल जाना पड़ा तो उन्हें पार्टी के अंदर अलग-थलग कर दिया गया था। बिहार मे पार्टी उनकी अपनी पार्टी थी और इसलिए जेल जाने से पहले ही उन्होंने 5 जुलाई 1997 को जनता दल से अलग होकर राष्ट्रीय जनता दल की स्थापना कर दी।

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अटल विहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार के समय भी उनके विरोधी सक्रिय हो चुके थे। राम विलास पासवान और नीतीश कुमार उनसे राजनीतिक तौर पर नहीं लड़ पा रहे थे इसलिए दोनों ने भारतीय जनता पार्टी से हाथ मिलाया और अपने जीवनपर्यंत ‘धरनिरपेक्षता’ और ‘समाजवाद’ के सिद्धांतों को गर्त में फेंक दिया। नीतीश जानते थे के उनका बिहार का  मुख्यमंत्री बनने का सपना लालू यादव के मजबूत रहते कभी पूरा नहीं हो पाएगा और इसलिए उनका सवर्णों के साथ गठबंधन जरूरी था और इसमें उन्हें बिहार के भूमिहार, ब्राह्मणों और कायस्थों ने पूरा सहयोग किया लेकिन तब भी वे सब मिलकर लालू यादव को बिहार से नहीं मिटा पाए। लेकिन अति आत्मविश्वास और यह धारणा कि किसी भी प्रकार से किसी को भी गद्दी पर बैठा देंगे तो लाभ होगा – बार-बार सफल नहीं होता। जब लालू प्रसाद यादव ने अपने जेल जाने की स्थिति में राबरी देवी को मुख्यमंत्री बनाया जिनका राजनीतिक अनुभव बिल्कुल शून्य था। तो ऐसे में सत्ता के दलाल हावी हो जाते हैं।

चारा घोटाले के चलते वह पहली बार जेल जुलाई 1997 में गए और 137 दिन की न्यायिक हिरासत के बाद 12 दिसंबर, 1997 को रिहा हुए। फिर उन्हें 28 अक्टूबर 1998 को बेउर जेल मे भेजा गया। एक बार फिर 28 नवंबर 2000 को उन्हें फिर जेल भेजा गया लेकिन उनकी तुरंत ही जमानत हो गयी। लेकिन मुकदमे चलते रहे।

2004 में यूपीए की सरकार आई तो लालू यादव केन्द्रीय रेलमंत्री बने 2009 तक वह इस पद पर बने रहे। उनके रेल बजट की बहुत तारीफ हुई क्योंकि उन्होंने यात्री किराया बढ़ाने से मना कर दिया था और रेलवे को लाभ की स्थिति में ले आए थे। 2009 मे लालू यादव ने यूपीए से नाता तोड़ बिहार में राम विलास पासवान और समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया लेकिन उनकी पार्टी बुरी तरह से चुनाव हार गई और मात्र 4 सांसदों के साथ लोकसभा में आई। 2014 में आरजेडी ने पुनः यूपीए के साथ गठबंधन किया लेकिन उसका परिणाम भी बहुत अच्छा नहीं रहा। इस बीच बिहार में नीतीश कुमार के एनडीए के साथ आने के कारण उनकी स्थिति बहुत मजबूत हो गई। 2015 मे बिहार में लालू यादव ने नीतीश कुमार के साथ गठबंधन किया और 80 सीटों पर विजय प्राप्त की। नीतीश कुमार की जनता दल (यू) को 71 सीटे और काँग्रेस को 27 स्थानों पर विजय मिली। गठबंधन की सरकार में नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने। लालू प्रसाद यादव ने अपने छोटे बेटे तेजस्वी को मंत्रिमंडल में उपमुख्यमंत्री पद पर मनोनीत करवा दिया। उन्हें बड़े बेटे तेज प्रताप को भी मंत्रिमंडल में रखा गया। लालू के परिवार को महत्वपूर्ण पद देने के चक्कर में नीतीश सरकार का भविष्य अधर में था और इसलिए जुलाई 2017 में नीतीश कुमार ने आरजेडी से गठबंधन तोड़कर भाजपा के साथ समझौता किया और फिर सरकार बनाई। 2021 में आरजेडी ने काँग्रेस और वामपंथी दलों के साथ चुनाव लड़ा लेकिन बहुमत नहीं प्राप्त कर सके और नीतीश कुमार पुनः बिहार के मुख्यमंत्री बन गए।

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लालू यादव की जेलयात्राएँ

लालू प्रसाद यादव पहली बार जेल तो आपातकाल के दौरान गए थे लेकिन जेल से रिहा होने पर 1977 मे संसद के लिए चुन लिए गए। चारा घोटाले के चलते वह पहली बार जेल जुलाई 1997 में गए और 137 दिन की न्यायिक हिरासत के बाद 12 दिसंबर, 1997 को रिहा हुए। फिर उन्हें 28 अक्टूबर 1998 को बेउर जेल मे भेजा गया। एक बार फिर 28 नवंबर 2000 को उन्हें फिर जेल भेजा गया लेकिन उनकी तुरंत ही जमानत हो गयी। लेकिन मुकदमे चलते रहे। केंद्र और बिहार में एनडीए की सरकार के बाद उनकी मुसीबतें बढ़ गईं।

लालू परिवार क्योंकि राजनैतिक तौर पर मजबूत है इसलिए वह लड़ाई लड़ सके अन्यथा अधिकांश लोग तो ऐसी लड़ाई लड़ ही नहीं सकते। 14 नवंबर, 2014 को झारखंड उच्च न्यायालय के जज राकेश रंजन प्रसाद ने कहा के पूरा चारा घोटाला एक साजिश है और एक अपराध के लिए अलग-अलग सजाएँ नहीं दी जा सकतीं। हालांकि जस्टिस प्रसाद ने पहले इसी मामले में कहा था कि अलग-अलग ट्रायल होने चाहिए क्योंकि उनके लाभार्थी अलग-अलग हैं।

लालू यादव को अभी तक चार मुकदमों में सजा हुई है। उन्हें पहली सज़ा चाईबासा ट्रेजरी से अवैध तरीके से पैसा निकालने के आरोप पर 2013 में पाँच वर्षों की कैद की सजा हुई और उनके चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने भी उनकी दलील खत्म कर दी, हालांकि उन्हें बेल मिल गई। दूसरे केस में उन्हें 23 दिसंबर 2017 को देवघर ट्रेजरी से करीब 90 लाख रुपये की अवैध निकासी के लिए साढ़े तीन वर्ष की सज़ा हुई। उनको तीसरी सज़ा, 24 जनवरी 2018 को चाईबासा ट्रेजरी से 33.67 करोड़ की अवैध निकासी पर पाँच साल की सज़ा हुई। 4 मार्च 2018 को दुमका ट्रेजरी से 3.13 करोड़ रुपए की निकासी पर 14 वर्षों की सज़ा सुनाई गई और 60 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया गया। अब पाँचवीं सजा डोरंडा ट्रेजरी के 139 करोड़ रुपये के घोटाले के सिलसिले में है।

क्या लालू को जान-बूझकर फँसाया गया?

इसमें कोई शक नहीं कि 950 करोड़ रुपये से अधिक के घोटाले में पशुओं की फर्जी खरीद और फिर उनके लिए चारे के बिल के भुगतान का फर्जीवाड़ा हुआ और ये बिहार के जिलों में किया गया था। इसके लिए एक जांच कमिटी बैठाकर उसके आधार पर कार्यवाही की जा सकती थी। लेकिन जो सबसे बड़ी चालाकी या जानबूझकर परेशान करने वाली चाल थी वह थी कि अलग-अलग जगहों पर एफआईआर कर अलग-अलग मुकदमों मे लालू यादव को फँसाया गया। जब मामला एक ही तरह का है तो अलग-अलग मुकदमे क्यों? यह बात हम सभी आज के दौर में समझ सकते हैं जब किसी भी व्यक्ति को परेशान करने के लिए देश के किसी भी हिस्से में मुकदमा दर्ज हो जाता है और कई मुकदमे दर्ज जो जाते हैं। लालू परिवार क्योंकि राजनैतिक तौर पर मजबूत है इसलिए वह लड़ाई लड़ सके अन्यथा अधिकांश लोग तो ऐसी लड़ाई लड़ ही नहीं सकते। 14 नवंबर, 2014 को झारखंड उच्च न्यायालय के जज राकेश रंजन प्रसाद ने कहा के पूरा चारा घोटाला एक साजिश है और एक अपराध के लिए अलग-अलग सजाएँ नहीं दी जा सकतीं। हालांकि जस्टिस प्रसाद ने पहले इसी मामले में कहा था कि अलग-अलग ट्रायल होने चाहिए क्योंकि उनके लाभार्थी अलग-अलग हैं। 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आ चुकी थी और उन्होंने इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और जस्टिस अरुण मिश्र ने झारखंड हाईकोर्ट के निर्णय को न केवल उलट दिया अपितु जस्टिस प्रसाद के विरुद्ध सख्त भाषा का इस्तेमाल भी किया। बिहार भाजपा नेताओं ने जस्टिस प्रसाद के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था और सुप्रीम कोर्ट कालेजियम से उनके विरुद्ध कार्यवाही की मांग की।

लालू यादव अब शारीरिक तौर पर स्वस्थ नहीं हैं और यह साफ है कि वर्तमान सरकार ने उन्हें स्वास्थ्य के आधार पर भी ज़मानत का विरोध किया। उनकी बेहद खराब सेहत के चलते उन्हें दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान मे लाया गया था। उनके परिवार के बहुत अनुरोध पर बहुत मुश्किलों के बाद लालू यादव को जमानत मिली थी लेकिन अभी वह पुनः रांची जेल में हैं क्योंकि अंतिम केस में भी उन्हें सज़ा हुई है।

भाजपा सबसे ज्यादा लालू से भयभीत है 

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि लालू भाजपा की राह के सबसे बड़ा रोड़ा थे। उन्होंने विपक्षी एकता के बहुत से प्रयास किए और यह उनकी राजनीति का ही नतीजा है कि भाजपा आज भी बिहार में स्वतंत्र रूप से मजबूत नहीं हो पाई है। भाजपा नेताओ को लालू से इतना भय था कि उन्होंने उनके अधिकांश मामलों की सुनवाई झारखंड में स्थानांतरित करवा दी और रांची जेल में भी उनके साथ दुर्व्यवहार करने की कोशिश की गई। सभी जानते हैं कि लालू एक प्रमुख राजनैतिक व्यक्ति हैं और उनसे मिलने लोग आएंगे लेकिन उन्होंने हर बात को इस तरह से प्रस्तुत किया जैसे लालू यादव कोई अपराधी हों। इतना बड़ा चारा घोटाला क्या कोई मुख्यमंत्री व्यक्तिगत तौर पर कर सकता है ? जब यह घटनाक्रम लालू यादव के पहले से चल रहा था तो क्यों दूसरे लोग इसकी चपेट में नहीं आए? अलग-अलग मुकदमों में लालू यादव को फंसा कर उनके राजनीतिक जीवन को लगभग समाप्त कर दिया गया। लालू यादव अब शारीरिक तौर पर स्वस्थ नहीं हैं और यह साफ है कि वर्तमान सरकार ने उन्हें स्वास्थ्य के आधार पर भी ज़मानत का विरोध किया। उनकी बेहद खराब सेहत के चलते उन्हें दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान मे लाया गया था। उनके परिवार के बहुत अनुरोध पर बहुत मुश्किलों के बाद लालू यादव को जमानत मिली थी लेकिन अभी वह पुनः रांची जेल में हैं क्योंकि अंतिम केस में भी उन्हें सज़ा हुई है।

अच्छा होता कि परिवार के कुछ सदस्य अपने आप को सामाजिक और व्यावसायिक क्षेत्र में स्थापित करते और एक बड़ा मीडिया खड़ा करते तो आज वह स्थिति नहीं होती। बाबा साहब अंबेडकर, जोतिबा फुले, पेरियार आदि के आंदोलनों से सीख लेकर यदि हम समाज-बदलाव को अपना हिस्सा बनाते तो ऐसी स्थिति न होती। वर्षों बीत जाने के बाद भी सामाजिक आन्दोलनों के नायकों को लोग नहीं भूल पाते लेकिन राजनेताओ को भूलने में ज्यादा समय नहीं लगता।

राजनैतिक मतभेदों के चलते विरोधियों को खत्म करने की साजिश हमारी राजनीति का अभिन्न हिस्सा है लेकिन वर्तमान दौर में  भाजपा ने इसका रंजिशन इस्तेमाल किया। देश में बड़े-बड़े घोटालों के बादशाह आराम से फ्रॉड करके चले जा रहे हैं। काँग्रेस सांसद राहुल गांधी ने कुछ दिनों पूर्व कहा था कि मोदी सरकार के समय 5 लाख 35 हज़ार करोड़ से ऊपर के बैंक घोटाले हो चुके हैं लेकिन अभी तक एक को भी सज़ा नहीं हुई। गुजरात स्थित एबीजी शिपयार्ड और उसके निदेशक ऋषि कमलेश अग्रवाल पर 22,842 करोड़ का बैंक फ्रॉड का केस सीबीआई ने अभी दर्ज किया है। इसमें 22 बैंकों का पैसा शामिल है। गुजरात के ही बड़े व्यापारी मेहुल चौकसी पंजाब नैशनल बैंक को 14,000 करोड़ रुपये का चूना लगाकर अब विदेश में आराम की जिंदगी जी रहा है। गुजरात के ही व्यापारी नीरव मोदी और उसकी फार्म गीतांजलि ज्वेलर्स पर तीस बैंकों के साथ 11,400 करोड़ रुपये का फ्रॉड करने का आरोप है। वह भी अपने परिवार सहित यूरोप में आलीशान जिंदगी जी रहा है। शहंशाही जिंदगी जीने वाले विजय माल्या 10 हजार करोड़ के फ्रॉड के साथ लंदन में आनंद के साथ है। राफेल से लेकर पीएम केयर फंड हो या भाजपा के पास अरबों का चन्दा और दिल्ली के दिल में स्थित फाइव स्टार बिल्डिंग – इन पर कोई प्रश्न नहीं खड़े होते। मोदी के आने के बाद, नोटबंदी के तुरंत आगे-पीछे भाजपा ने उत्तर प्रदेश, बिहार और देश के अन्य हिस्सों के विभिन्न जिला मुख्यालयों में पार्टी के विशालकाय कार्यालय बनाए। अयोध्या में  राम मंदिर के नाम पर उठे चंदे और उसके बाद जमीन के बड़े घोटालों की कोई चर्चा भी नहीं होती। हालांकि कोई भी भ्रष्टाचार का समर्थन नहीं करता लेकिन दुर्भाग्यवश जातिवादी मीडिया को दलित-पिछड़े-आदिवासी नेताओं के छोटे भ्रष्टाचार बड़े नजर आते हैं।

राजनीति में भी लालू यादव हमेशा साधारण तरीके से ही रहे। नरेंद्र मोदी की तरह तड़क-भड़क उनमें कभी नहीं थी। जयललिता से लेकर जगनमोहन रेड्डी, प्रमोद महाजन, अमर सिंह, अरुण जैटली आदि सभी के हाथ इतने बड़े थे कि कोई हाथ नहीं लगा पाया और सभी ‘ईमानदार’ ही बने रहे। आज भी संसद में मौजूद बहुत से सांसदों के पास खरबों की संपति है लेकिन कोई सवाल नहीं। सवाल उठेंगे कैसे जब उन्हें उठाने वाले ही खुद भ्रष्टाचार के दलदल में हों। आज के दौर के बहुत से चैनल मामूली पत्रकारों ने बनाए और आज वे खरबों के पैसे पर बैठे हैं। क्या यह बिना भ्रष्टाचार के संभव है ? इलेक्टोरल बॉन्ड में पैसे कौन दे रहा है इसके विषय में कुछ खबर नहीं है। लेकिन देश के ब्राह्मणवादी तंत्र के लिए लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, मायावती भ्रष्टाचार के प्रतीक हैं। हर्षद मेहता खरबों रुपये डकार गया और अभी नैशनल स्टॉक एक्सचेंज की एक पूर्व निदेशक के विषय में खुलासा हुआ कि वह कोई भी निर्णय हिमालय में स्थित एक बाबा के कहने पर करती थी और सारी गुप्त जानकारियाँ उनसे शेयर करती थी। क्या इस पर चर्चा हो रही है कि इतने खतरनाक खिलाड़ी कौन हैं?

लालू यादव के एक सबक भी हैं ?

सत्ताधारी पर्सेप्शन पर काम करते हैं। किसको ईमानदार बनाना है और किसको बेईमान दिखाना है, यह उनके हाथ में है। लालू यादव उत्तर भारत में बहुजन समाज के सबसे बड़े स्तम्भ हैं और वह देश के प्रधानमंत्री बन सकते थे इसलिए उनको किसी भी तौर पर बदनाम करना और उनकी राजनीति को पूरी तरह से खत्म करने का एजेंडा था। ईमानदारी का ‘अन्ना’ आंदोलन किसके द्वारा प्रायोजित था? यह जगजाहिर है और उसकी उपज के ‘ईमानदार’ लोग – अरविन्द केजरीवाल, वी के सिंह, किरण बेदी और दूसरे बहुत से महत्वाकांक्षी किधर बैठे हैं? यह बताने की आवश्यकता नहीं है। हाँ, इनमें से कोई भी ईमानदारी के लिए वी पी सिंह, मधु दंडवते, सुरेन्द्र मोहन, इंद्रजीत गुप्ता, रामधन, राम नरेश यादव, राम स्वरूप वर्मा आदि का नाम लेने को तैयार नहीं है।

लालू प्रसाद यादव की कमी यही रही कि परिवार मोह और अति आत्मविश्वास में उन्होंने अपने नजदीकी लोगों की परवाह नहीं की। चाहे अब्दुल बारी सिद्दीकी हों या रघुवंश प्रसाद सिंह, सभी अंत तक उनसे जुड़े रहे लेकिन अपने परिवार के बाहर भी नेतृत्व विकसित करने का जज़्बा हमारे ‘लोकतान्त्रिक’ नेताओं में नहीं हो पाया। लालू से लेकर मुलायम तक उसका शिकार रहे और इसके चलते ही इन पार्टियों में फूट पड़ी। राजनीति में परिवार से अलग हटकर नेतृत्व विकसित करने का सबसे बढ़िया उदाहरण कांशीराम  हैं, जिन्होंने मायावती को स्थापित कर यह जताया कि यदि आप वाकई समाज के प्रति जिम्मेवार हैं तो आपको परिवारवाद से दूर रहना होगा। यह कोई नहीं कह रहा है कि परिवार के सदस्यों को राजनीति में आने का हक नहीं है लेकिन अगर परिवार के सभी सदस्य पार्टी को अपनी जागीर समझेंगे तो उसमें नए लोग नहीं आएंगे और जनता समय आने पर जवाब दे देती है। अच्छा होता कि परिवार के कुछ सदस्य अपने आप को सामाजिक और व्यावसायिक क्षेत्र में स्थापित करते और एक बड़ा मीडिया खड़ा करते तो आज वह स्थिति नहीं होती। बाबा साहब अंबेडकर, जोतिबा फुले, पेरियार आदि के आंदोलनों से सीख लेकर यदि हम समाज-बदलाव को अपना हिस्सा बनाते तो ऐसी स्थिति न होती। वर्षों बीत जाने के बाद भी सामाजिक आन्दोलनों के नायकों को लोग नहीं भूल पाते लेकिन राजनेताओ को भूलने में ज्यादा समय नहीं लगता।

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बिहार में लालू यादव को उनके विरोधी खत्म नहीं कर पाए क्योंकि आज तेजस्वी यादव के नेतृत्व में पार्टी मजबूत है लेकिन जरूरी है कि पार्टी अब लांग टर्म सोचे। दक्षिण भारत के मॉडल के आधार पर यदि अपना मीडिया और प्रचारतंत्र होता जिसमें अंबेडकर, फुले,  पेरियार की विचारधारा के आधार पर सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलन की मजबूती होती तो आज हमारे नेताओं की ऐसी स्थिति नहीं होती। केवल नेताओ के मुख्यमंत्री बनने से समाज नहीं बदलता उसके लिए जब तक सामाजिक न्याय की विचारधारा का मंत्र आगे नहीं होगा तब तक हमेशा वही लोग आपको सलाह देते रहेंगे जिन्होंने शोषण किया है इसलिए आवश्यक है कि ये दल बौद्धिक लोगों और सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों को भी मजबूत करें क्योंकि संघ परिवार का मुकाबला करने के लिए बहुजन सामाजिक-सांस्कृतिक-साहित्यिक आंदोलन को मजबूत करना होगा तभी वे आने वाली चुनौतियों का मुकाबला कर पाएंगे।

vidhya vhushan

विद्या भूषण रावत लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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