मध्य प्रदेश में एक जगह सैलाना भी है जहां सैलानी मोहित हो जाता है

विनय कुमार

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पहला हिस्सा 

वैसे तो मध्य प्रदेश में बहुत से दर्शनीय स्थल हैं और ऐसे भी हैं जो बहुत प्रसिद्द हैं। उदहारण के तौर पर हम अगर सबसे मशहूर जगह की बात करें जहाँ सबसे ज्यादा विदेशी सैलानी भी आते हैं तो खजुराहो इसमें निर्विवाद रूप से सबसे आगे होगा। प्रदेश की राजधानी भोपाल के आस पास भी एक से बढ़कर एक दर्शनीय स्थल हैं जिनमें एक तरफ प्राचीन भोज मंदिर है तो दूसरी तरह भीम बैठका है जहाँ महाभारत कालीन गुफाएं हैं और बड़े-बड़े पत्थरों पर प्राचीन कालीन भित्तिचित्र बने हुए हैं। खैर इस प्रदेश में जहाँ भी जाइए, कुछ न कुछ दर्शनीय नजर ही आ जाता है लेकिन मशहूर जगहों के साथ एक बड़ी दिक्कत यह भी है कि वहां जाने पर भीड़ भाड़ का सामना करना पड़ जाता है। कोविड के पहले तो भीड़भाड़ से कोई परेशानी नहीं थी और चाहे कितनी भी भीड़ हो, लोग मजे में घूमते फिरते थे। लेकिन कोविड संकट के बाद सबसे बड़ा दर भीड़ को देखकर ही लगने लगा है और सभी लोग ऐसी जगहों से बचना चाह रहे हैं जहाँ जाने पर ज्यादा भीड़ का सामना करना पड़े।

अब ऐसे में एक चीज लोगों को खूब भा रही है और वह है ऐसी जगहों पर घूमना जहाँ भीड़भाड़ नहीं हो। कम से कम कोविड की चिंता तो नहीं रहेगी और घूमने फिरने का कोटा भी पूरा हो जाएगा जो पिछले लगभग डेढ़ सालों से बचा हुआ है। ऐसी ही जगह की तलाश में हमें याद आया रतलाम से लगभग 25 किमी दूर एक शांत लेकिन बेहद रमणीय जगह सैलाना जहाँ जाना तो हर सैलानी को चाहिए लेकिन बहुत कम लोग ही जाना पसंद करते हैं। दरअसल वहां न तो कोई ऐसा प्रसिद्द मंदिर है जहाँ भक्तों का सैलाब उमड़े और न ही कोई ऐसा हिल स्टेशन या प्राकृतिक पर्यटन स्थल जो बहुत मशहूर हो। इस जगह के बारे में वैसे तो मुझे पिछले दो साल से पता था और मैं पिछले साल एक बार दो-तीन घंटे के लिए वहां गया भी था लेकिन इसे पूरी तरह देखने का लोभ मन में बना हुआ था। खैर इस बार दो अक्टूबर को गाँधी और शास्त्री जयंती के कार्यक्रम के बाद रविवार पड़ा और फिर से इस रमणीक लेकिन बहुत कम मशहूर जगह जाने की इच्छा बलवती हो गयी। एक बार वहां मौजूद दोस्त से फोन पर बात हुई और जब उसने बताया कि वह भी सैलाना में ही मौजूद है तो फटाफट वहां जाने का कार्यक्रम बन गया।

दरअसल सैलाना शहरी भीड़भाड़ से दूर एक आदिवासी क्षेत्र है जहाँ प्रकृति अपने बेहद खूबसूरत और सौम्य रूप से मौजूद है। चारों तरफ न तो कोई शोरगुल और न ही कोई प्रदूषण, बस हरियाली, पहाड़, झरने, मंदिर और छोटी छोटी नदियां जो बरसात के मौसम में कलकल करती बहती रहती हैं और बाकी मौसम में सूख जाती हैं। सबसे पहले सैलाना के मशहूर कैक्टस गार्डन में जाना था लेकिन रास्ते में ही बाजार के मध्य में हमें रुकना पड़ गया। उस समय एक जुलूस निकल रहा था जो आसाराम बापू के लिए था। बाद में मुझे पता चला कि यहाँ पर आसाराम के बहुत से शिष्य हैं और उनके आश्रम में सैकड़ों बीघा जमीं इत्यादि भी है।

सुबह साढ़े आठ बजे उज्जैन से निकलने का कार्यक्रम बनाया गया था जो लगभग नियत समय पर ही प्रारम्भ हो गया. पहले तो यात्रा में हम तीन ही हुआ करते थे लेकिन पिछले आठ महीने से हमारा कुत्ता ‘सोबो’ भी हर सफर का हिस्सा बन गया है। दो घंटे के सफर के पश्चात हम जब रतलाम पहुँचने ही वाले थे तो इच्छा हुई कि चाय पीकर फिर आगे बढ़ा जाए। अब एक बार चाय की तलब लग गयी तो फिर बिना उसे पिए आगे बढ़ना थोड़ा मुश्किल हो जाता है। रास्ते में एक अच्छा सा होटल दिखा जहाँ रुक कर हमने पूछा कि क्या चाय मिलेगी तो रिसेप्शन पर बैठे कर्मचारी ने हाँ में सर हिलाया और रेस्टॉरेंट में न जाकर वहीं चाय पीने के लिए कहने लगा। हमारे लिए तो ठीक ही था, वहीं पर रखे बढ़िया सोफे पर बैठकर हम चाय का इन्तजार करते हुए आगे की यात्रा के बारे में बात करने लगे। थोड़ी देर में चाय आ गयी और चाय के साथ चीनी का पाउच भी प्लेट में रखा था। अब अगर अलग से चीनी का पाउच रखा हो तो हम यही सोचते हैं कि चाय बिना शक्कर की होगी। इस लिहाज से हमने एक पाउच फाड़ा और उसे चाय के कप में डाल दिया। इसी दरम्यान बेटी ने चाय का घूंट बिना शक्कर डाले लिया तो उसे चाय काफी मीठी लगी। उसने तुरंत मुझे टोका लेकिन तब तक मैं शक्कर चाय में डाल चुका था। अब मैंने भी चाय का घूंट लिया तो काफी मीठी चाय थी, बस गनीमत यही थी कि जो शक्कर मैंने डाली थी उसे कप में मिलाया नहीं था। अब मुझसे रहा नहीं गया और मैंने रिसेप्शन वाले से पूछ ही लिया कि अगर चाय पहले से ही मीठी थी तो अलग से पाउच क्यों दिया। और अगर अलग से दे भी दिया तो कम से कम बताना तो था कि चाय मीठी है, आप की इच्छा हो तो आप और शक्कर डाल सकते हैं। अब वह बेचारा क्या कहता, उसने रेस्टॉरेंट में फोन करके पूछा और बाद में झेंपते हुए बोला कि मैं आपके लिए दूसरी चाय बनवा देता हूँ। हमने भी हँसते हुए कहा कि कोई जरूरत नहीं है, चलो इसी बहाने कम से कम बढ़िया मीठी चाय तो पीने को मिली।

 

सैलाना का मशहूर केक्टस गार्डन

 

इसके बाद हम लोग अगले 45 मिनट में सैलाना पहुँच गए और फिर एक जगह नाश्ता करने के बाद हमारा सैलाना भ्रमण प्रारम्भ हो गया। दरअसल सैलाना शहरी भीड़भाड़ से दूर एक आदिवासी क्षेत्र है जहाँ प्रकृति अपने बेहद खूबसूरत और सौम्य रूप से मौजूद है। चारों तरफ न तो कोई शोरगुल और न ही कोई प्रदूषण, बस हरियाली, पहाड़, झरने, मंदिर और छोटी छोटी नदियां जो बरसात के मौसम में कलकल करती बहती रहती हैं और बाकी मौसम में सूख जाती हैं। सबसे पहले सैलाना के मशहूर कैक्टस गार्डन में जाना था लेकिन रास्ते में ही बाजार के मध्य में हमें रुकना पड़ गया। उस समय एक जुलूस निकल रहा था जो आसाराम बापू के लिए था। बाद में मुझे पता चला कि यहाँ पर आसाराम के बहुत से शिष्य हैं और उनके आश्रम में सैकड़ों बीघा जमीं इत्यादि भी है। खैर लोग आज भी आसाराम को गुनहगार मानने के लिए तैयार नहीं हैं, यह भी एक आश्चर्य का विषय है।

बीच बीच में कुछ ईंट के बिना पलस्तर के मकान भी बने दिखाई दिए और पूछने पर पता चला कि ये मकान राज्य सरकार के द्वारा चलाये गए एक योजना के तहत बैंकों से ऋण देकर बनवाये गए हैं। उन मकानों को देखकर सहज ही अंदाजा लग जाता है कि किसी भी राज्य सरकार या केंद्र सरकार की योजना का क्या हश्र होता है। भ्रष्टाचारी बाबुओं के चलते शायद ही कोई योजना उस तरह से लागू हो पाती है जिसकी कल्पना उसकी योजना बनाते समय की जाती है।

सैलाना पैलेस का कैक्टस गार्डन, जो न सिर्फ मध्य प्रदेश का सबसे बेहतरीन गार्डन है (एक समय में यह एशिया का सबसे अच्छा कैक्टस गार्डन माना जाता था), बल्कि हिन्दुस्तान का सबसे पुराना भी है। यह सैलाना महल के पीछे के हिस्से में मौजूद है जिसकी एक बार फिर से देखभाल की जा रही है ताकि ज्यादा से ज्यादा संख्या में लोग यहाँ देखने के लिए आएं। वैसे महल का एक हिस्सा भी अब होटल के रूप में तब्दील किया जा रहा है जिससे कि रतलाम में रुकने वाले लोग भी सैलाना के महल में ही रुकें और पुराने वैभव को महसूस कर सकें। गार्डन में लगभग 45 मिनट बिताने के बाद हम लोग वहां से निकले और सबसे पहले अडवानीय केदारेश्वर मंदिर गए जो जमीं से लगभग 100 मीटर अंदर स्थित है। मंदिर के पास जाते समय ही एक झरने की आवाज आने लगी और जैसे ही हम नीचे पहुंचे, एक खूबसूरत झरना मंदिर के सामने स्थित तालाब में गिर रहा था। मौसम भी अब काफी सुहावना हो गया था और बादलों के चलते धूप का नामोनिशान नहीं था। मंदिर पर लगभग 25 लोग ही मौजूद थे और इस लिहाज से उसे भीड़ नहीं कहा जा सकता था। बस माहौल ऐसा था कि वहां से हिलने का मन नहीं कर रहा था, झरना, पहाड़, मंदिर के घंटे की आवाज और आँखों को सुकून देती हरियाली। लेकिन अभी सैलाना को पूरा देखना था और लगभग 12 बज रहे थे तो वहां से मन मारकर निकलना ही पड़ा। इस बीच वहां खूब सारे फोटो खींचे गए और वहां की यादों को मन में सजोंकर हम आगे बढ़े। अब आगे सैलाना के आस पास के पहाड़, जंगल और हरियाली को देखना था और किसी रमणीक स्थल पर भोजन करने का लुत्फ़ भी उठाना था। हम लोग केदारेश्वर से भेरूघाटा की तरफ बढ़े जहाँ एक घाटी जैसी जगह से पूरा नीचे का क्षेत्र एक हरे भरे कैनवास की तरह दिखाई पड़ रहा था। चारों तरफ हरियाली, पहाड़, बीच में पानी से लबालब एक डैम ऐसे दिख रहा था जैसे किसी चित्रकार ने अपनी कूंची से एक बेहतरीन चित्र बनाया हो। हम लोग काफी देर ताका वहां खड़े होकर इस बेहतरीन और बिलकुल शांत खूबसूरती को निहारते रहे। लगभग आधे घंटे खड़े रहने के दरम्यान न तो कोई गाड़ी वहां से गुजरी और न ही कोई शोर शराबा, अगर कुछ था तो हवा की सरसराहट, पक्षियों की आवाज और वहीं पास के एक आदिवासी के झोपड़े के पास खेलते हुए कुछ बच्चों की कुतूहल भरी आवाज। बच्चे भी कौतुहल से हमें देख रहे थे और शायद आपस में एक दूसरे से पूछ भी रहे थे कि यहाँ हमारी शांति को भंग करने ये कौन से लोग आ गए हैं।

 

बहरहाल हम लोग वहां से आगे बढ़े और थोड़ी दूर जाने पर एक और आदिवासी गांव पड़ा। लगभग सभी घर कच्चे थे, बीच बीच में कुछ ईंट के बिना पलस्तर के मकान भी बने दिखाई दिए और पूछने पर पता चला कि ये मकान राज्य सरकार के द्वारा चलाये गए एक योजना के तहत बैंकों से ऋण देकर बनवाये गए हैं। उन मकानों को देखकर सहज ही अंदाजा लग जाता है कि किसी भी राज्य सरकार या केंद्र सरकार की योजना का क्या हश्र होता है। भ्रष्टाचारी बाबुओं के चलते शायद ही कोई योजना उस तरह से लागू हो पाती है जिसकी कल्पना उसकी योजना बनाते समय की जाती है। यकबयक ही अपने भूतपूर्ण प्रधानमंत्री स्व. श्री राजीव गाँधी का एक बहुचर्चित कथन याद आ गया जो इसी सिलसिले में कहा गया था।

जितनी सवारी अंदर उतनी ही बाहर सफ़र का आनंद लेते ..

उसी समय एक टेम्पो ने ध्यान भंग किया और जब साथ वाले व्यक्ति ने उस पर बैठे लोगों की संख्या की तरफ ध्यान दिलाया तो ऑंखें खुली की खुली रह गयी। जितने लोग टेम्पो के अंदर बैठे थे, उससे ज्यादा टेम्पो के ऊपर बैठे थे और मैंने आजतक एक टेम्पो में इतने ज्यादा व्यक्ति बैठे हो सकने की कल्पना भी नहीं की थी, देखना तो दूर की बात है। अंदाजन लगभग 30 लोग तो रहे ही होंगे उस टेम्पो में और जितने भी बैठे थे, सब ख़ुशी ख़ुशी जा रहे थे, किसी को भी इस तरह से सफर करने का कोई अफ़सोस नहीं था। साथ चल रहे मित्र ने बताया कि यह क्षेत्र राजस्थान का बॉर्डर है और यहाँ पर चाहे टेम्पो हो या जीप हो, सभी पर ऐसे ही लोग सफर करते हैं। बाद में हमें ऐसी तमाम जीपें जाती दिखाई पड़ीं जिसमें जितने लोग नीचे बैठे थे, कमोबेश उतने ही लोग ऊपर भी बैठे थे। एक दो किस्से भी याद आ गए, पहला किस्सा तो बिहार का था जहाँ हमने बस पर सबसे पहले लोगों को ऊपर ही बैठते देखा था। मतलब जैसे ही वहां बस रूकती थी, लोग सबसे पहले ऊपर छत पर जाकर बैठते थे, बाद वाले बस के अंदर बैठते थे। वह दृश्य भी हमारे लिए बिलकुल गुरुत्वाकर्षण बल के विपरीत जैसा ही था क्योंकि मैं जहाँ से हूँ, वहां लोग अव्वल तो बस के छत पर यात्रा करते ही नहीं हैं और अगर करते भी हैं तो पहले लोग बस के अंदर घुसते हैं और जगह नहीं होने की स्थिति में ही बस की छत का रुख करते हैं। दूसरा किस्सा हमारे नौकरी के दरम्यान का ही याद आया जब बनारस में हमारे एस्टीम कार में लगभग 15 बच्चे बैठकर एक हॉस्टल गए थे और जब वहां एक एक करके बच्चे बाहर निकलने लगे तो लोगों का हँसते-हँसते बुरा हाल हो गया था।

किसान ने बताया कि उसका ऋण खाता सैलाना में ही स्थित किसी और बैंक में है और जिस एजेंट ने उसे ऋण दिलवाया था, उसने एक बड़ी रकम रिश्वत के तौर पर हड़प ली थी। उस किसान की स्थिति को देखने के बाद मुझे लगा कि जिसने भी ऐसे व्यक्ति से रिश्वत लिया होगा, वह निश्चित रूप से इंसान तो नहीं ही होगा, अलबता उसे भेड़िया जरूर कहा जा सकता है। खैर मैंने अपने मित्र को कहा कि वह उसकी बैंकिंग सम्बन्धी जो भी मदद हो सकती है, वह जरूर करे और हम मन में एक टीस लेकर आगे बढ़ गए।

इस हैरतअंगेज नज़ारे को देखकर हम लोग उसी सड़क पर आगे बढ़े और हमारी मंजिल पर बोरखेड़ा तथा सकरवाड़ा था। बोरखेड़ा से आगे बढ़ते ही सड़क के दोनों तरफ ऊँचे ऊँचे पहाड़ नजर आये जिसपर मंदिर बने हुए थे। अब सोचा गया कि इन्हीं पहाड़ों में से किसी एक पर चढ़ा जाए और जाने के रास्ते की जानकारी के लिए वहीं सड़क के किनारे स्थित एक किसान के घर के सामने हम लोग रुके। पुरानी किताबों में वर्णित किसी भी आम किसान का घर जैसा होता है बिलकुल वैसा ही घर था उस किसान का। घर के सामने कुछ मुर्गे-मुर्गियां टहल रही थी, एक तरफ कुछ बकरियां भी घास चार रही थीं और दो भैंस तथा कुछ गायें भी घर के सामने बंधी हुई थीं। चारों तरफ खेत और हरियाली तथा उसके बीच अपने घर में सर पर पगड़ी बांधे मौजूद वह किसान। उसने बड़े प्यार से एक पहाड़ी पर जाने का रास्ता समझाया और इसी बीच मैंने उससे उसके बैंकिंग के बारे में भी पूछ लिया। खैर इस बातचीत में जो बात मुझे पता चली उसने मन को गुस्से और दर्द से भर दिया जो बहुत देर तक मुझे सालता रहा. दरअसल उसने बताया कि उसका ऋण खाता सैलाना में ही स्थित किसी और बैंक में है और जिस एजेंट ने उसे ऋण दिलवाया था, उसने एक बड़ी रकम रिश्वत के तौर पर हड़प ली थी। उस किसान की स्थिति को देखने के बाद मुझे लगा कि जिसने भी ऐसे व्यक्ति से रिश्वत लिया होगा, वह निश्चित रूप से इंसान तो नहीं ही होगा, अलबता उसे भेड़िया जरूर कहा जा सकता है। खैर मैंने अपने मित्र को कहा कि वह उसकी बैंकिंग सम्बन्धी जो भी मदद हो सकती है, वह जरूर करे और हम मन में एक टीस लेकर आगे बढ़ गए।

थोड़ी दूर पर ही पहाड़ी थी और उसके बगल से ऊपर जाने के लिए एक कच्चा रास्ता था। उस रास्ते पर जीप ही जा सकती थी और हमारे मित्र की एस यू वी भी बड़े आराम से ऊपर चली गयी। हम लोग तो पैदल ही आनंद लेते हुए ऊपर पहाड़ी पर पहुंचे जहाँ से एक बार फिर चारों तरफ का दृश्य इतना खूबसूरत था मानों हम सब चम्बा में आ गए हों। थोड़ी देर बाद ही नजर पड़ी मंदिर के आसपास बकरी और गाय भैंस चराते बच्चों पर जो मजे में वहां खेल रहे थे और उनके जानवर अपने हिसाब से हरी घास का सेवन कर रहे थे। पहाड़ी के ऊपर से चारो तरफ घूम घूमकर हमने सैलाना की हरियाली को निहारा और फिर यह निश्चित हुआ कि भोजन भी वहीं उस शानदार वातावरण में किया जाए। ऊपर एक हैंडपम्प भी लगा हुआ था जिसे चलने पर ठंडा जल निकला जो पीने में बहुत बढ़िया था। अभी हम लोग साथ लायी दरी को बिछाने ही जा रहे थे कि मौसम ने एकदम से करवट लिया और बूंदाबांदी होने लगी। दूर दूसरी पहाड़ी के पीछे काले काले बादल दिखाई पड़ रहे थे जिससे यह स्पष्ट था कि उस तरफ बरसात हो रही थी और यहाँ भी किसी भी वक़्त मूसलाधार बरसात हो सकती है। अब हम लोग थोड़ा उदास हो गए कि शायद इस पहाड़ी पर भोजन करने का सूख नहीं मिल पायेगा। लेकिन चंद मिनटों में ही बूंदाबांदी कम हो गयी और वहीं पर मौजूद एक पेड़ के नीचे हम लोगों ने चटाई बिछायी और फटाफट भोजन के लिए बैठ गए।

क्रमशः

विनय कुमार कहानीकार हैं और फ़िलहाल बैंक में कार्यरत हैं ।

3 Comments
  1. Gulabchand Yadav says

    रोचक और खूबसूरत यात्रा वृत्तांत। बधाई।

    1. विनय कुमार says

      धन्यवाद

  2. Parminder Singh Jassal says

    ब बढ़िया भाषा शैली, रोचक वृतांत

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