Friday, June 14, 2024
होमविचारमोदी की गारंटी में किसानों के लिए कुछ भी नहीं, पुराने वादे...

ताज़ा ख़बरें

संबंधित खबरें

मोदी की गारंटी में किसानों के लिए कुछ भी नहीं, पुराने वादे भी नहीं किए पूरे

भाजपा 'मुद्दों' की जगह 'मोदी' और 'जवान-किसान' की जगह 'हिन्दू-मुसलमान' से काम चलाना चाहती है। पहले किसान को एम.एस.पी. देने का वादा और उनकी आमदनी डबल करने का वादा कर मोदी जी फंस गए थे। इसलिए इस बार तय किया गया है कि कोई भी ऐसा वादा न किया जाए जिसका बाद में हिसाब देना पड़े।

‘भाजपा का संकल्प: मोदी की गारंटी 2024’ नामक दस्तावेज किसानों के लिए खतरे की घंटी है। चुनाव के पहले चरण के मात्र चार दिन पहले जारी हुआ भाजपा का यह घोषणा पत्र किसानों के लिए खुली घोषणा है कि अगर भाजपा तीसरी बार सत्ता में आती है तो खेती और किसानों के लिए कोई उम्मीद नहीं है। आम तौर पर घोषणापत्र में पार्टियां अच्छी बातें कहती हैं, बढ़-चढ़ कर दावे और वादे करती हैं। इस बार भाजपा के घोषणा पत्र से पहले अन्य अधिकांश विपक्षी पार्टियां अपना घोषणा पत्र जारी कर चुकी थीं जिसमें उन्होंने किसानों के लिए अनेक ठोस वादे किए हैं। भाजपा चाहती तो इनमें से कुछ बिन्दुओं को अपना सकती थी या फिर उनसे दो कदम आगे जा सकती थी।

ऐसा करने की बजाय किसानों के तमाम मुद्दों और किसान आंदोलन की सभी मांगों पर भाजपा की चुप्पी से जाहिर है कि या तो किसान आंदोलन के हाथों हुआ अपमान मोदी जी भूल नहीं पाए हैं या फिर भाजपा को भरोसा है कि किसान का वोट लेने के लिए खेती और किसानी के बारे में कुछ भी कहने या करने की जरूरत नहीं है। भाजपा ‘मुद्दों’ की जगह ‘मोदी’ और ‘जवान-किसान’ की जगह ‘हिन्दू-मुसलमान’ से काम चलाना चाहती है। इस दस्तावेज की शुरूआत में ही भाजपा सरकार के ‘सर्वस्पर्शी समावेशी’ सुशासन और विकास के 10 वर्ष के बारे में कुछ दावे किए गए हैं और फिर अलग-अलग क्षेत्रों के बारे में कुछ वादे। यहां दावों के बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात है भाजपा की चुप्पी। वर्ष 2016 से भाजपा ने लगातार देश के किसानों को उनकी आय दोगुना करने की डुगडुगी बजाई थी। पिछले चुनावी घोषणा पत्र में भी इस वादे को दोहराया गया था। लेकिन इस 6 वर्षीय योजना की मियाद 2022 में पूरी होने के बाद भाजपा ने इस बारे में एक शब्द भी नहीं कहा है। न तो अपने वादे को दोहराया और न ही देश को हिसाब दिया कि आखिर यह वादा पूरा क्यों नहीं हो सका।

इसके बदले भाजपा ने 11 करोड़ किसान परिवारों को सालाना किसान सम्मान निधि के तहत 6000 रुपए देने का दावा दोहराया है। यहां भी सच में किफायत से काम लिया गया। यह नहीं बताया कि 14 करोड़ किसान परिवारों की घोषणा की जगह कभी 9 करोड़ कभी 10 तो कभी 11 करोड़ परिवारों को ही किसान सम्मान निधि क्यों मिली। इस बड़े सच से भी मुंह चुराया गया कि इस योजना की घोषणा के बाद से ही महंगाई का सूचकांक 33 प्रतिशत बढ़ गया है। यानी 2019 में 6000 रुपए की राशि की जो कीमत थी उसे बनाए रखने के लिए आज 9000 रुपए की जरूरत है। मीडिया में खबर चल रही थी कि मोदी सरकार या तो अपने अंतिम बजट में या फिर घोषणा पत्र में किसान सम्मान निधि की राशि बढ़ाने की घोषणा करेगी, लेकिन घोषणा पत्र में इस सवाल पर भी पूरी तरह चुप्पी साध ली गई है।

किसानों की आमदनी फसल के दाम से जुड़ी है। देश भर के किसान फसल के वाजिब दाम की गारंटी को लेकर आंदोलनरत हैं। इस सवाल पर विपक्षी पार्टियां अपना रुख साफ कर चुकी हैं। कांग्रेस का घोषणा पत्र साफ शब्दों में सभी किसानों को स्वामीनाथन कमीशन फार्मूले के हिसाब से सम्पूर्ण लागत पर डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एम.एस.पी. की कानूनी गारंटी देने का वादा करता है। साथ में कृषि मूल्य आयोग को वैधानिक दर्जा देने का आश्वासन भी देता है ताकि एम.एस.पी. तय करते समय उस पर सरकार का दबाव न रहे। यही वादा मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल  जैसे विपक्षी दलों के घोषणा पत्र में दोहराया गया है। समाजवादी पार्टी का घोषणा पत्र तो एक कदम आगे बढ़कर दूध और अन्य तमाम कृषि उत्पादों को भी न्यूनतम समर्थन मूल्य के दायरे में लाने का वादा करता है। इस बार पहली बार देश के प्रमुख राष्ट्रीय दलों के बीच किसान आंदोलन की इस महत्वपूर्ण मांग पर सर्वसम्मति बनती दिखाई देती है। लेकिन मोदी की गारंटी में इसके लिए कोई जगह नहीं है।

भाजपा का घोषणा पत्र सिर्फ यह दावा करता है कि हमने प्रमुख फसलों के लिए एम.एस.पी. में अभूतपूर्व वृद्धि की है। हम समयबद्ध तरीके से ही एम.एस.पी. में वृद्धि को जारी रखेंगे। दरअसल मोदी सरकार द्वारा एम.एस.पी. में अभूतपूर्व वृद्धि का दावा झूठा है। सच यह है कि 23 में से 22 फसलों में एम.एस.पी. की बढ़ौतरी की दर मोदी सरकार की तुलना में मनमोहन सिंह सरकार में कहीं ज्यादा थी। भाजपा के घोषणा पत्र की भाषा से स्पष्ट है कि वह न तो एम.एस.पी. के स्वामीनाथन कमीशन के फार्मूले को मानने को तैयार है और न ही एम.एस.पी. को किसान का कानूनी हक बनाने के लिए तैयार है। यह घोषणा पत्र देश को दालों और खाद्य तेलों में आत्मनिर्भर बनाने और दुनिया के लिए मोटे अनाज का उत्पादन करने की बात करता है, लेकिन यहां भी किसानों को कम से कम इन फसलों में एम.एस.पी. दिलाने के वादे से भी गुरेज करता है। इस सवाल पर ‘इंडिया’ गठबंधन किसान आंदोलन के साथ खड़ा है और भाजपा उसके खिलाफ।

इसी तरह भाजपा का घोषणा पत्र किसानों पर कर्ज के बोझ के सवाल पर भी पूरी तरह चुप्पी साध गया है जबकि सरकार के अपने दस्तावेज बताते हैं कि देश के बहुसंख्यक किसान कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं। जहां समाजवादी पार्टी का घोषणा पत्र कर्ज मुक्ति की बात करता है तो कांग्रेस का घोषणा पत्र कर्ज का स्थायी समाधान करने के लिए एक आयोग स्थापित करने का वादा करता है जो समय-समय पर कर्ज के बोझ का मूल्यांकन कर इस बोझ को कम या खत्म करने का काम करेगा।

फसल के नुकसान की समस्या को लेकर भाजपा का घोषणा पत्र आश्वस्त दिखाई देता है कि फसल बीमा योजना से ही उसका समाधान कर दिया गया है, रहा-सहा काम बेहतर तकनीक से कर दिया जाएगा। जबकि हकीकत यह है कि इस नई योजना के आने के बाद फसल बीमा पर सरकारी खर्च और बीमा कम्पनियों का मुनाफा तो बढ़ा है लेकिन इसका लाभ उठाने वाले किसानों की संख्या पहले से भी कम हुई है। कांग्रेस का घोषणा पत्र इस तथ्य को स्वीकार करते हुए सभी किसानों को फसल बीमा के दायरे में लाने और नुकसान के 30 दिन के भीतर बीमे का भुगतान करने का वादा करता है।

देश के किसानों की इन प्रमुख मांगों पर कुछ ठोस वादा करने की बजाय इस घोषणा पत्र के चार पन्नों में मोदी सरकार ने उन सब जुमलों को दोहराया है जिनके जरिए उसने पिछले साल से किसानों का पेट भरने की कोशिश की है। श्री अन्न सुपरफूड, नैनो यूरिया, इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टोरीज क्लस्टर फसलों का विविधीकरण और प्राकृतिक खेती का विस्तार, लेकिन यहां भी भाजपा ने ध्यान रखा है कि किसी भी बिन्दू पर कोई ठोस वादा न किया जाए। बस हर मुद्दे को गिना दिया है तथा दावा किया है कि भाजपा सरकार ने इस विषय में बहुत कुछ किया है और बस कह दिया है कि आगे और भी बहुत कुछ किया जाएगा।

जाहिर है मोदी जी ने अपनी पिछली गलतियों से सबक लिया है। पहले किसान को एम.एस.पी. देने का वादा और उनकी आमदनी डबल करने का वादा कर मोदी जी फंस गए थे। इसलिए इस बार तय किया गया है कि कोई भी ऐसा वादा न किया जाए जिसका बाद में हिसाब देना पड़े। अब सवाल यह है कि क्या पिछले 10 सालों से इस जुमलेबाजी का बोझ झेल रहा किसान भी कोई सबक सीखेगा या नहीं। शायद पिछले कुछ दिनों से ही हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के किसानों द्वारा भाजपा से हिसाब मांगने और उसके नेताओं का प्रवेश रोकने की खबरें कुछ इशारा कर रही हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

लोकप्रिय खबरें