बारात का रोमांच और किसलय जी के साथ बसंता जी के घर की ओर

डॉ गुलाबचंद यादव

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पहला हिस्सा

विगत वर्षों की भांति इस साल भी मैं नवंबर 2017 में लगभग 3 सप्ताह के लिए छुट्टी लेकर गाँव हो आया था। इसलिए जब मैंने अपने कार्यालय में फरवरी 2018 में पुन: गाँव जाने के लिए छुट्टी हेतु आवेदन किया और मित्रों से इसका जिक्र किया तो अधिकांश को थोड़ा अचरज हुआ। दरअसल इसके पीछे दो वजहें थीं। एक – पिछले चार वर्षों में घनिष्ठ मित्रों की मेरी सूची शामिल हुए हमारे ही जिले के प्रो. बसंता जी के मझले बेटे शिव गौरव का 24 फरवरी 2018 को विवाह तय हो जाना और दूसरी- फरवरी महीने में गाँव जाने की मेरी बलवती इच्छा। मैं जुलाई 1972 से मुंबई में रह रहा हूँ किंतु फरवरी-मार्च महीने में गाँव जाने का मौका आज तक नहीं मिल पाया था।

हमारे उत्तर भारत में नवंबर महीने से सर्दियां शुरू हो जाती हैं और दिसंबर-जनवरी में उग्र रूप धारण कर कंपाने लगती हैं। फिर 20 जनवरी के बाद शीतलहरी का कोप धीरे-धीरे कम होने लगता है और फरवरी में मौसम खूब सुहाना हो जाता है। फरवरी के चौथे सप्ताह से दिन का तापमान बढ़ने लगता है किंतु रात के समय हल्की ठंड मार्च अंत तक बनी रहती है। फिर अप्रैल से लेकर जून तक लू वाली तीव्र गर्मी और जुलाई से अक्तूबर तक उमस वाली चिपचिपी गर्मी बहुत अखरती है। जाहिर है हम प्रवासियों के लिए नवंबर से मार्च तक की कालावधि ही हर लिहाज से अनुकूल होती है। यह वह समय होता है जब सर्वत्र चैती खेती की फसलें और साग-सब्जियां लहलहाती रहती हैं। सरसों के पीले फूलों, अरहर, गन्ना, मटर, चना, प्याज, धनिया, लहसून आदि के खेतों की हरियाली और गंध तन-मन को खूब भली और मोहक लगती है। यह कारण है कि पिछले कई वर्षों से मैं इसी मौसम में गाँव जाना पसंद करता हूँ।

कालीन उद्योग मंदी के दौर से गुजर रहा है और निर्यात में कड़ी स्पर्धा का दौर है। भदोही के कई बड़े निर्यातकों ने अपने कारोबार राजस्थान और हरियाणा में स्थानांतरित कर लिए हैं। 1980 से 1995 तक भदोही का कालीन उद्योग अपने स्वर्णिम दौर में था जब भदोही के इर्द-गिर्द लगभग 30 कि.मी. के दायरे में हर गाँव के 80 प्रतिशत घरों में कालीन बुनाई के हथकरघे लगे थे और बुनकर और व्यवसायी दोनों खूब कमा रहे थे। बाद के दौर में पड़ोसी देशों से बढ़ती चुनौती, गुणवत्ता में गिरावट और मिलावट की प्रवृत्ति, बुनाई में बाल श्रमिकों को नियोजित किए जाने जैसे आरोपों के चलते विदेशी खरीदारों के विमुख होते जाने के कारण भदोही का कालीन उद्योग दिनोंदिन अपनी चमक खोता गया।

बहरहाल, बात हो रही थी इस बार फरवरी महीने में मेरे गाँव जाने के कारण की। प्रो. बसंता यादव से मेरा परिचय दिसंबर 2014 में फोन के जरिए हुआ था जब मैं तबादले पर बेंगलूरू में तैनात था। मेरे कार्यालय में ‘अखिल भारतीय साहित्य साधक मंच, बेंगलूरू’ का चार पृष्ठीय मानार्थ मासिक बुलेटिन आता था। इस पत्रिका के संपादक गाजीपुर के मूल निवासी किंतु लंबे समय से बेंगलूरू में बसे श्री ज्ञानचंद मर्मज्ञ जी हैं। श्री मर्मज्ञ शिक्षा से इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हैं और इसी क्षेत्र के सफल व्यवसायी भी हैं। किंतु आपकी पहचान एक सफल व्यवसायी की कम, एक अच्छे कवि, लेखक, वक्ता, संपादक और समाज एवं साहित्य सेवी के रूप में अधिक है। आप ओज रस के बहुत अच्छे कवि हैं और राष्ट्रीय स्तर के मंचों पर भी काव्यपाठ के लिए आमंत्रित किए जाते हैं। आपके 2 गीत संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। आपने अब गद्य लेखन की ओर भी कदम बढ़ा दिए हैं और आपका पहला निबंध संग्रह ‘संभव है’ खूब सराहा गया है और कई पुरस्कारों से नवाजा गया है। जब मैंने पहली बार इस चार पृष्ठीय पत्रिका (बुलेटिन) को देखा तो दंग रह गया कि महज चार पृष्ठों में ही कितने अद्भुत तरीके से पठनीय सामग्री शामिल की गई थी। सबसे पठनीय होता है इसका काव्यमय संपादकीय जिसे मर्मज्ञ खूब डूबकर लिखते हैं।

मैंने ई-मेल से पत्रिका के बारे में अपनी प्रतिक्रिया भेजी थी और अगली ही सुबह उन्होंने फोन कर मुझे धन्यवाद दिया और हमारे बीच परिचय का आदान-प्रदान हुआ। श्री मर्मज्ञ जितने अच्छे कवि-लेखक हैं उतने ही अच्छे और मिलनसार इंसान भी हैं जिनमें सौम्यता और सरलता कूट-कूटकर भरी हुई है। आपने बताया कि यह पत्रिका हार्ड प्रतियों से ज्यादा ई-मेल के जरिये देश-विदेश के सैकड़ों साहित्य अनुरागियों को भेजी जाती हैं। इसमें नवोदित रचनाकारों को भरपूर स्थान दिया जाता है। आपने मेरे बेंगलूरू प्रवास के दौरान मुझे बहुत स्नेह दिया और अपने खर्चे पर मेरे ललित निबंध संग्रह ‘क्षमा करें, मैं हिंदी अखबार नहीं पढ़ता’ के लिए अपनी संस्था ‘अखिल भारतीय साहित्य साधक मंच, बेंगलूरू’ के तत्त्वावधान में बेंगलूरु में लोकार्पण कार्यक्रम आयोजित किया। यह संस्था पिछले 12-13 वर्षों से प्रत्येक महीने के अंतिम रविवार को बेंगलूरू के जे पी नगर इलाके के लायन्स क्लब हॉल में ‘बहुभाषी कवि सम्मेलन’ का आयोजन करती है और यह क्रम आज भी जारी है। एक हिंदीतर भाषी महानगर में इस प्रकार का प्रयास और परंपरा कोई कम अचरज की बात नहीं है। अपने बेंगलूरू प्रवास के दौरान मैं भी ऐसी कई काव्य-गोष्ठियों में बतौर श्रोता उपस्थित रहा हूँ और कई अच्छे शायरों/गीतकारों को सुनने-गुनने का लाभ उठाया है। श्री मर्मज्ञ की साहित्य साधना और कर्मठता वास्तव में प्रशंसनीय ही नहीं अनुकरणीय भी है ऐसा मेरा मानना है।

प्रवासियों के लिए नवंबर से मार्च तक की कालावधि ही हर लिहाज से अनुकूल होती है। यह वह समय होता है जब सर्वत्र चैती खेती की फसलें और साग-सब्जियां लहलहाती रहती हैं। सरसों के पीले फूलों, अरहर, गन्ना, मटर, चना, प्याज, धनिया, लहसून आदि के खेतों की हरियाली और गंध तन-मन को खूब भली और मोहक लगती है।

श्री मर्मज्ञ ने मुझे भी अपने इस बुलेटिन के लिए रचनाएं भेजने के लिए प्रेरित किया और जब भी मैंने अपनी रचनाएं भेजीं, उन्होंने सहर्ष छापी। ऐसे ही इस पत्रिका के अक्तूबर-नवंबर 2014 के अंक में मेरा एक लेख छपा था जिसमें मेरा मोबाइल नंबर भी दिया गया था। दिसंबर 2014 का कोई दिन रहा होगा जब देर शाम को मेरे मोबाइल की घंटी बजती है और सामने होते हैं – बिहार के कैमूर जिले के भभुआ कस्बे के सरदार वल्लभभाई पटेल महाविद्यालय  के अंग्रेजी विभाग के अध्यक्ष एवं प्रोफेसर श्री बसंता यादव। आपसे परिचय का आदान-प्रदान हुआ और आपने ‘साहित्य साधक मंच’ की पत्रिका में छपे मेरे लेख की प्रशंसा की। परिचय के क्रम में यह जानकर मुझे और भी अच्छा लगा कि आप भी मेरे ही जिले जौनपुर जिले के निवासी हैं। उसके बाद से आपसे फोन पर लगभग हर सप्ताह ही हाल-चाल होता रहता है। आप भी कवि हृदय व्यक्ति हैं और कविताएं भी लिखते हैं। आप कई बार मुझे भी अपनी कविताएं अवलोकन/प्रतिक्रिया के लिए भेजते हैं। आपकी मधुर वाणी, सरल स्वभाव और आत्मीयता ने मुझे बहुत प्रभावित किया और आप बहुत जल्द ही मेरे घनिष्ठ मित्रों की सूची में जुड़ गए। आपके परिवार में भाभीजी के अलावा तीन बेटे और एक बेटी है। बड़ा बेटा सौरभ एम.ए., एलएलएम है और इलाहाबाद में रहकर न्यायिक/प्रशासनिक परीक्षाओं की तैयारी में लगा है। वह विवाहित है और उसकी दो प्यारी बेटियां हैं। मझला बेटा शिव गौरव बी.टेक है और नोएडा की एक सॉफ्टवेयर कंपनी में कार्यरत है। सबसे छोटा बेटा शिव पुलक भी इंजीनियर है और नोएडा में कार्यरत है। इकलौती बिटिया सुमन बीएचयू, वाराणसी से कला संकाय में पोस्ट ग्रेजुएशन कर रही है। आपको साहित्य साधना के लिए ग्वालियर की एक साहित्यिक संस्था ने वर्ष 2017 में पुरस्कृत भी किया है। आपका कविता संग्रह प्रकाशनाधीन है। आप मेरे जरिये भदोही के साहित्य-समाजसेवी एवं कवि श्री  कर्मराज किसलय के भी मित्र बन गए हैं।

नवंबर 2017 में मैं जब गाँव आया था तो आपने मुझे सपत्नीक अपने गाँव आने के लिए आमंत्रित किया था और मझले बेटे शिव गौरव की शादी तय हो जाने की सूचना थी। आपका गाँव पाली, मिर्जापुर-जौनपुर स्टेट हाइवे पर जौनपुर शहर से लगभग 6 कि.मी. पहले पड़ता है। प्राध्यापक होने और अपने मधुर स्वभाव के कारण इस गाँव का बच्चा-बच्चा आपको जानता है। यह अलग बात है कि अज्ञानतावश अधिकांश लोग आपको ‘बसंता मास्टरजी’ के रूप में जानते हैं जो हम जैसों को सुनने में अटपटा लगता है। गाँव में आज भी ऐसे लोगों की तादाद बहुत ज्यादा है जो पुलिस विभाग में दोरागा को और बैंक/कंपनी में ब्रांच मैनेजर को ही सबसे बड़ा अधिकारी मानते/समझते हैं। इसलिए डिग्री कॉलेज का प्रोफेसर या किसी बैंक/बीमा कंपनी का उप महाप्रबंधक (डीजीएम) का पद इनके लिए कोई खास मायने नहीं रखता है। जब शिव गौरव की शादी की तारीख 24 फरवरी 2018 निर्धारित हुई तो प्रो. बसंता जी ने फोन कर मुझे सूचित किया और शादी में आने के लिए बड़े स्नेह और आदर से आमंत्रित किया। इस प्रकार से फरवरी में गाँव आने का मुझे अवसर मिल ही गया। प्रो. बसंता जी ने भदोही के कर्मराज किसलय को भी आमंत्रित किया था। यह शादी 24 फरवरी यानी शनिवार को थी और अगले दिन यानी 25 फरवरी को मुझे दोपहर की फ्लाइट से वाराणसी से मुंबई लौटना था। मैं चौरी बाजार (परसीपुर) के पास अपने एक रिश्तेदार के पास ठहरा था और मेरी श्रीमती जी भी वहीं टिकी थीं। यह स्थान पाली गाँव से करीब 35-40 किमी. दूर था। पाली से बारात करीब 25 किमी दूर मछलीशहर क्षेत्र में कूढ़ा गाँव जाने वाली थी। अत: मुझे रात में ही द्वारपूजा के बाद लौट आना था।

मैंने इन बातों को ध्यान में रखते हुए बारात में शामिल होने और वहाँ से रात को लौटने की जो योजना बनाई वह इस प्रकार थी – मैं शनिवार (24 फरवरी) को दोपहर डेढ़-दो बजे कर्मराज किसलय जी के घर आ जाऊँगा और वहाँ से उनकी कार से पाली चल पड़ूँगा। पाली से हम विवाह स्थल यानी ग्राम कूढ़ा, गुलजारगंज,  मछलीशहर जाएँगे। रात को द्वारपूजा में शामिल होने के बाद हल्का भोजन या जलपान कर भदोही लौट आएंगे। मैं रात को कर्मराज जी के आवास पर ही विश्राम करुंगा और सुबह चाय के बाद कर्मराज जी के सुपुत्र भी संतोष कुमार मुझे अपनी कार से चौरी के पास मेरे रिश्तेदार के यहाँ पहुँचा देंगे। मैं वहाँ नहा-धोकर और दोपहर का भोजन ग्रहण कर पत्नी के साथ पहले से बुक कराई गई कार में बैठकर दोपहर 12 बजे वाराणसी एअरपोर्ट के लिए निकल पड़ूँगा।

बारात में जाने से पहले गुलाब जी अन्य लोगोंके साथ

बनारस या वाराणसी से करीब 45 कि.मी. पश्चिम दिशा में स्थित भदोही कस्बा अपने ऊनी कालीनों के लिए विख्यात है। भदोही के आसपास खमरिया, गोपीगंज, ज्ञानपुर, घोसिया, सुरियावां, रामपुर जैसे कस्बों और उनसे सटे सैकड़ों गांवों में के ऊनी कालीन के कई कारखाने/ हैंडलूम/मशीनी लूम/हथकरघे लगे हैं जहाँ सुंदर नक्काशीवाले ऊनी कालीन बनते हैं। ये कालीन विदेशों में निर्यात किए जाते हैं जिससे सालाना कई हजार करोड़ की विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है। कालीन उद्योग के महत्व को स्वीकार करते हुए भारत सरकार ने भदोही में भारतीय कालीन प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटीटी) की स्थापना की है जहाँ कालीन एवं वस्त्र प्रौद्योगिकी/डिजाइनिंग में बी.टेक एवं डिप्लोमा की पढ़ाई होती है। कहा जाता है कि दक्षिण एशिया में कालीन प्रौद्योगिकी पर केंद्रित यह इकलौता संस्थान है। पिछले दिनों सुनने में आया है कि अब इन संस्थान को बीएचयू का सहयोगी संस्थान बना दिया गया है।

आज कालीन उद्योग मंदी के दौर से गुजर रहा है और निर्यात में कड़ी स्पर्धा का दौर है। भदोही के कई बड़े निर्यातकों ने अपने कारोबार राजस्थान और हरियाणा में स्थानांतरित कर लिए हैं। 1980 से 1995 तक भदोही का कालीन उद्योग अपने स्वर्णिम दौर में था जब भदोही के इर्द-गिर्द लगभग 30 कि.मी. के दायरे में हर गाँव के 80 प्रतिशत घरों में कालीन बुनाई के हथकरघे लगे थे और बुनकर और व्यवसायी दोनों खूब कमा रहे थे। बाद के दौर में पड़ोसी देशों से बढ़ती चुनौती, गुणवत्ता में गिरावट और मिलावट की प्रवृत्ति, बुनाई में बाल श्रमिकों को नियोजित किए जाने जैसे आरोपों के चलते विदेशी खरीदारों के विमुख होते जाने के कारण भदोही का कालीन उद्योग दिनोंदिन अपनी चमक खोता गया। केंद्र और राज्य सरकार इस उद्योग के पुनरुत्थान के लिए कदम उठा रही है। आशा की जानी चाहिए कि भदोही के कालीन उद्योग का परचम जल्द ही दुनिया में फिर से लहराएगा।

हमारे पारिवारिक मित्र और शुभचिंतक 73 वर्षीय श्री कर्मराज किसलय भारतीय स्टेट बैंक में कार्यरत थे और 2001 में भदोही शाखा से सेवानिवृत्त होने पर भदोही के मर्यादपट्टी मुहल्ले में आवास बनाकर यहीं बस गए। आपका मूल गाँव गोता, जौनपुर जिले की मड़ियाहूँ तहसील में आता है जो भदोही से लगभग 12 किमी. दूर है। आपका वहाँ आज भी मकान और खेतीबारी है जिसकी आप बराबर देखरेख करते हैं। आपकी तीन बेटियां और एक सुपुत्र हैं। तीनों बेटियां विवाहित हैं और सुपुत्र संतोष के भी 16 बरस की बेटी संतृप्ति और 9 साल का बेटा कृष है। आपकी बहू डॉ.. अर्चना भदोही क्षेत्र की लोकप्रिय महिला चिकित्सक हैं जो शहर के सरकारी अस्पताल में कार्यरत हैं। किसलय जी से मेरा परिचय वर्ष 2010 में हुआ था और समय बीतने के साथ-साथ यह और प्रगाढ़तर होता गया है। आपके बेटे-बहू की आतिथ्य भावना और मिलनसारिता प्रशंसनीय है। ‘किसलय’ आपका साहित्यिक उपनाम है। आप बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। आपके दो कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और एक कहानी संग्रह और एक कविता संग्रह शीघ्र प्रकाश्य है। आप भदोही की ‘अक्षर आरसी’ साहित्य एवं सांस्कृतिक संस्था के अध्यक्ष हैं और नगर एवं आसपास के क्षेत्रों में नियमित रूप से काव्य गोष्ठियां/ सम्मेलन आदि आयोजित कराते रहते हैं। मुंबई के जाने-माने साहित्यकार डॉ.. शोभनाथ यादव जी को आप अपना गुरु मानते हैं और उनसे प्रेरणा-प्रोत्साहन प्राप्त साहित्य साधना में लगे हुए हैं। आप कुछ सामाजिक संस्थाओं से भी जुड़े हैं और समय-समय पर सम्मानित भी किए गए हैं।

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कर्मराज किसलय जी में युवकों जैसा जोश और उत्साह हमेशा दिखाई देता है। आपकी सक्रियता और ऊर्जा विस्मित करती है। आप दुपहिया और चार पहिया वाहनों के कुशल चालक हैं और इस उम्र में भी अपनी पुरानी बाइक पर खूब फर्राटे भरते हैं। आपने सन् 1985 में एम्बेसडर कार खरीदी थी जिसे आपने आज भी बड़े जतन से मेन्टेन कर अपने आवास पर रखा है। आप आज भी अपनी इसी एम्बेसडर में आसपास और दूर-दराज के क्षेत्रों की यात्राएं करते हैं। परिवार में जब बहू व्यस्त चिकित्सक हो और बेटा दवाइयों का थोक सप्लायर हो तो भला इस पुरानी एम्बेसडर से कैसे काम चलता। बेटे-बहू ने कुछ मौकों पर इस पुरानी गाड़ी को डिस्पोज कर नए मॉडल की कार खरीदने का सुझाव दिया तो कर्मराज जी ने कोई उत्साह नहीं दिखाया। किंतु समय का तकाजा था कि अब एक नई कार घर में होनी चाहिए।

बेटे संतोष और बहू अर्चना ने मई 2016 में नई कार खरीदने की गुपचुप योजना बनाई। 18 मई संतोष एवं डॉ.. अर्चना की बिटिया संतृप्ति उर्फ हनी का जन्मदिन पड़ता था। घर में उन्होंने यह बात किसी और को नहीं बताई और 18 मई 2016 को शाम को संतोष ने अपने पिता किसलय जी को फोन कर माताजी के साथ एक बताये पते पर तुरंत आने का अनुरोध किया और फोन काट दिया। किसलय जी चिंतित और परेशान हुए कि कोई दुर्घटना तो नहीं हो गई है। वे तुरंत पत्नी के साथ लेकर अपनी बाइक से बताए हुए स्थान पर पहुँचे जो शहर की एक मशहूर कार एजेंसी के पास था। वहाँ पहुँचने पर संतोष उनके पास आये और अपने माता-पिता के पैर छूकर पिता के हाथों में चाबियों का गुच्छा पकड़ा दिया। उन्होने सामने खड़ी नई-चमचमाती मारूति सुजुकी सेलेरियो कार की ओर इशारा करते हुए बताया कि आज हमने यह नई कार खरीदी है और बिटिया हनी के जन्मदिन पर यह आपके लिए हमारी ओर से भेंट है। यह सुन-देखकर किसलय जी कुछ देर के लिए निशब्द हो गये। वे तय नहीं कर पाए कि इस उपहार पर वे खुशी प्रकट करें या बच्चों की नाफरमानी और बिना उनसे परामर्श से लिए गए इस फैसले पर रोष और गुस्सा प्रकट करें। तब उनके कवि हृदय कुरेदा, “क्यों दु:खी हो भाई? जमाने को नहीं देख रहे हों? क्या जमाने की मांग और समय की जरूरत को यूं ही नजरअंदाज करते रहोगे? कब तक पुरानी थाती से चिपके रहोगे?”  किसलय जी ने आपत्ति नहीं की। संतोष ने कहा, “पिताजी आज घर तक इस गाड़ी को आप ड्राईव करेंगे।“ किसलय जी भावुक हो गए और कांपते हाथों से चाबी बेटे को यह कहकर लौटाने लगे कि, “मुझसे यह नहीं होगा। कहां यह नये मॉडल की कार कहां मेरी बरसों पुरानी एम्बेसडर? कैसे चला पाऊंगा मैं?”  बेटे संतोष ने कहा, “आप ड्राइविंग सीट पर बैठें, मैं आपके साथ वाली सीट पर रहूँगा और गाइड करूँगा।“ किसलय जी को बेटे-बहू का आग्रह मानना ही पड़ा।

पाली जाने के लिए हमारी योजना यह बनी थी कि संतोष ही हमें अपनी कार में बिठाकर वहाँ ले जाएँगे और हमारे साथ ही वापस आएंगे। इस बीच इसी दिन इनके एक रिश्तेदार के यहाँ एक मांगलिक कार्यक्रम निर्धारित हो गया जिसमें संतोष और अर्चना का जाना अनिवार्य था। तय हुआ कि चौरी बाजार से एक ड्राईवर बुलवा लिया जाएगा जो नई वाली कार में हम दोनों को पहले पाली और फिर ग्राम कूड़ा,  मछलीशहर ले जाएगा और ले आएगा। किंतु जब मैं दोपहर दो बजे किसलय जी के आवास पर पहुँचा तो फोन करने पर पता चला कि उस ड्राईवर को किसी अर्जंट काम से बनारस जाना पड़ा है और वह हमारी सेवा के लिए नहीं आ पाएगा। संतोष ने कहा कि पापा मैं गाड़ी ड्राईव करता हूँ और आप लोगों के साथ चलता हूँ। किंतु दूसरे कार्यक्रम को ध्यान में रखते हुए किसलय जी ने संतोष को मना किया और कहा कि वे इस कार को पहले भी एक-दो बार चला चुके हैं, अत: थोड़ा अभ्यास हो चुका है। उन्होंने संतोष से इस कार की प्रमुख आटोमेशन विशेषताओं, गियर, दरवाजा खोलने-बंद करने की पद्धति और कुछ अन्य जरूरी बातें पूछ लीं और आश्वस्त किया कि यह कार चलाने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं होगी।

उस दिन किसलय जी से मिलने के लिए जौनपुर से उनकी मझली बेटी गीता भी आई हुई थी। तय हुआ कि हम उसे पाली में ड्रॉप कर देंगे जहाँ से वह ऑटो लेकर जौनपुर चली जाएगी। लगभग ढाई बजे हमने प्रस्थान किया और हुलासपुर मार्ग से निकलकर भदोही-जौनपुर रोड पर हमारी कार चल पड़ी। किसलय जी बड़े बतरसी हैं और धाराप्रवाह बोलने के शौकीन हैं। गाड़ी चलाते वक्त भी वे अपने ड्राइविंग अनुभव एवं कौशल पर लगातार प्रकाश डालते जा रहे थे और बीच-बीच में मोबाइल पर आनेवाली कॉलों को भी अटेंड करते जा रहे थे। मैं कोई वाहन जैसे मोटरसाइकिल कार आदि चलाना तो नहीं जानता हूँ किंतु पास या पीछे बैठकर यात्रा करते समय वाहन चालक की दक्षता और अनुभव का अंदाजा लगा लेता हूँ।

मैंने तीन कि.मी. दूरी तक आते-आते ही महसूस कर लिया कि आज मुश्किल घड़ी का दिन है। किसलय जी से कार कभी कुछ ज्यादा तेज हो रही थी तो कभी जरूरत से ज्यादा धीमी। स्पीड ब्रेकर आने पर तो साफ पता लग गया कि इस कार पर किसलय जी का हाथ सधा हुआ नहीं है। कई मौकों पर तेज गति से सामने आने वाले ट्रकों को देखकर डर लगा कि ये श्रीमान कहीं कार को भिड़ा न दें।  रास्ते में एक-दो स्पीड ब्रेकरों पर गियर बदलने और एक्सिलेटर के सही तालमेल के अभाव में कार बंद भी पड़ गई। मैं चाहता था कि कर्मराज जी ड्राईव करते समय बात न करें, मोबाइल कॉल अटेंड न करें और केवल ड्राइविंग पर ध्यान दें, किंतु संकोचवश कहने का साहस नहीं जुटा पाया। मैं सोच रहा था कि जब देर शाम को हम टूटी-फूटी और घुमावदार सड़कों से होकर मछलीशहर की ओर जाएँगे तो हमारी क्या गति होगी। यह सब सोचकर मेरा दिल बैठता जा रहा था। उस पर कोढ़ पर खाज यह कि पिछली शाम से शुरू नजले और जुकाम ने भी मुझे तंग करना शुरू कर दिया था और कार के एसी के कारण मुझे छींके आने लगी थीं।

मैंने महसूस किया कि जो आशंकाएं/चिंताएं किसलय जी के ड्राइविंग कौशल को लेकर मेर मन में थी वही सब कार की पीछे वाली सीट बैठी उनकी बेटी गीता के मन में भी थी। वह भी शायद अपने पिताजी की ड्राइविंग में इस कार में पहली बार बैठी थी। बीच में संतोष का फोन आने पर उसने कहा कि, ‘भैया, मैं पाली उतरने पर आपको खुद फोन करूंगी।’ बाद में पता चला कि वहाँ उतरने पर उसने संतोष से कहा, ‘भैया, प्लीज! पापा को दुबारा यह कार ड्राईव करने के लिए मत देना। नहीं तो कुछ गड़बड़ हो सकती है।’ जब हमारी कार प्रो. बसंता जी के आवास के पास पहुंची तो अचानक न जाने क्या हुआ कि कार के शीशे और दरवाजे खुलने से मना कर दिए। कार के आसपास 6-8 लोग जुट गए और उनमें से एक-दो ने सांकेतिक भाषा में स्टियरिंग की दाहिने ओर बनी बटनों को दबाने का इशारा किया। खैर। थोड़ी जद्दोजहद के बाद कार के दरवाजे खुले और हम बाहर निकलकर प्रो. बसंता जी के घर आए।

प्रो. बसंता जी हमारे आने से बहुत प्रसन्न हुए। पिछले कुछ महीनों से उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा था और वे बीएचयू से दवा करा रहे थे। आपका वजन भी काफी कम हो गया था किंतु उत्साह में कोई कमी नहीं थी और चेहरे पर तैरती हुई खुशी साफ दिखाई दे रही थी। आपने हमें बर्फी खिलाकर पानी पिलाया और हालचाल का आदान-प्रदान हुआ। अब हम उनके घर के सामने स्थित कटहल के एक पेड़ के नीचे रखी कुर्सियों पर बैठ गए क्योंकि दुल्हे को तैयार किए जाने और बारात विदा करने की रस्में संपन्न की जा रही थी। समय भी 4 बजने के करीब था। मेरा जुकाम बढ़ता जा रहा था और बहती नाक और लगातार आती छींकों से मैं परेशान था। हमें चाय की तलब भी हो चली थी। मैंने प्रो. बसंता जी से कहा कि यदि कोई नवयुवक उपलब्ध हो तो पाली बाजार जाकर मेरे लिए दो खुराक जुकाम की दवा ले आ दे। उन्होंने पता किया और बताया कि उनके घर का एक नौजवान अभी बाजार में कुछ सामान खरीद रहा है तो उसे दवा लाने के लिए कह दिया गया है।

अब पौने पांच बज गए थे और बारातियों को ले जाने वाली कारें एक-एक कर सड़क किनारे पार्क होने लगी थीं। बाराती नए-नए परिधानों में सज-धजकर तैयार होकर यहाँ-वहाँ टहल रहे थे।

जब 5 बज गए तो मैंने दवा के बारे में पूछताछ की तो उस नौजवान ने बताया कि बाजार में दवा नहीं मिली। यह सूचना निराशाजनक होने के साथ-साथ अविश्वसनीय लगी क्योंकि पाली बाजार अच्छी-खासी बाजार है और दवा की दुकानें आज किस बाजार में नहीं है। जुकाम की गोली-कैप्सूल तो किराना की दुकानों पर भी मिल जाती हैं और यह भाई कह रहा है कि उसे दवा ही नहीं मिली।

 

उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के कूसा गाँव में जन्मे गुलाब जी फिलहाल आईडीबीआई बैंक, मुंबई में  उपमहाप्रबन्धक (राजभाषा) हैं। उनकी दो किताबें क्षमा करें, मैं हिन्दी अखबार नहीं पढ़ता  और आधे रास्ते का सफर प्रकाशित हो चुकी ।

 

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