खतरे में है देश की संप्रभुता  डायरी (28 जुलाई, 2021) 

नवल किशोर कुमार 

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समय बहुत मूल्यवान होता है। इसकी कीमत का कोई आकलन नहीं हो सकता। ऐसा मेरा मानना है। वहीं मैं यह भी मानता हूं कि समय का बहुत अधिक ख्याल नहीं रखा जाना चाहिए। समय से अधिक महत्वपूर्ण है धैर्य। आदमी को जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। खासकर तब जब चुनौतियां जटिल हों। कई बार ऐसा होता है कि आदमी जल्दबाजी में गलतियां कर बैठता है और उसे शिकस्त मिलती है। बात जब समाज की हो और देश की हो तब तो समय बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।

दरअसल, मैं दो दिनों से यह देख रहा हूं कि हिंदी के अखबार विपक्षी दलों को उपदेश दे रहे हैं। वैसे उपदेश देना कोई गलत बात नहीं है। लेकिन जनप्रतिनिधियों को कम करके आंकना भी सही नहीं है। कई बार मुझसे लोग करते हैं कि आजकल एमपी और एमएलए बनना बहुत आसान है। बस पैसा फेंकिए और तमाशा देखिए। उनकी बातों में दम होता है लेकिन बहुत ही कम ऐसे होते हैं जिनकी गांठ में इतना पैसा होता है और और वे पैसे के बल पर चुनाव जीत जाते हैं। राज्यसभा और विधान परिषद का सदस्य बनना अलग बात है। वजह यह कि राज्यसभा और विधान परिषद की सदस्यता की तिजारत खुलेआम होती है और इसका सदस्य बनने के लिए जनता के बीच नहीं जाना होता है। इसके बावजूद मैं यह मानता हूं कि राज्यसभा व विधान परिषद में बैठने वाला व्यक्ति सक्षम व्यक्ति होता है और उसका जनता से सरोकार होता ही है।

2009 का साल था। पहली बार मुझे पटना से प्रकाशित दैनिक आज की तरफ से विधान परिषद की रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी दी गयी। संपादक महोदय ने मुझसे पासपोर्ट साइज की दो तस्वीरें मांगी। फिर एक सप्ताह में ही उन्होंने एक परिचय पत्र दे दिया और साथ में यह जिम्मेदारी कि विधान परिषद के बजट सत्र की रिपोर्टिंग मुझे करनी है। वह पहला मौका था विधान परिषद के अंदर जाने का। मुख्यमंत्री सहित सूबे के तमाम बड़े नेता मेरे सामने थे। लेकिन पहले ही दिन विपक्ष ने जमकर हंगामा किया और कार्रवाही महज पांच मिनट तक चली। मैं बड़ा निराश हुआ कि आज तो कोई खबर ही नहीं बनी। फिर पत्रकार वाले दिमाग की बत्ती जली और मैंने उस सवाल को लेकर पक्ष और विपक्ष के कुछ नेताओं से उनकी प्रतिक्रिया ली, जिस सवाल को लेकर हंगामा हुआ था। कुल मिलाकर ढंग की रिपोर्टिंग की।

अखबार दो दिनों से यह बता रहे हैं कि संसद का बहुमूल्य समय जाया हो रहा है। उनके मुताबिक संसद के एक दिन कार्यवाही में इतने करोड़ रुपए खर्च होते हैं और ये पैसे जनता की गाढ़ी कमाई के पैसे होते हैं, लिहाजा विपक्ष को यह चाहिए कि वह संसद को चलने दे। हालांकि विपक्ष को उपदेश देने के बाद वे सत्ता पक्ष से गुहार भी कर रहे हैं कि विपक्ष जो सवाल उठा रहा है, उस पर बहस भी हो। लेकिन दोनों बातों में फर्क है।

क्या सरकारी विज्ञापनों के बदले जो उन्हें आमदनी होती है, वह जनता का पैसा नहीं है? यदि है तो फिर वे जनसरोकार की खबरों को महत्व क्यों नहीं देते?

मैं यह सोच रहा हूं कि यदि संसद का सत्र नहीं चल रहा होता है तो क्या संसद के उपर कोई खर्च नहीं होता? जवाब यह कि संसद हाथी की तरह है। आजकल हाथियों को शादी-बियाह और मरनी आदि में बुक किया जाता है। सबसे आगे घोड़े, उसके पीछे हाथी और उसके पीछे ऊंट। मैं संसद को हाथी की श्रेणी में रखता हूं। तो होता यह है कि जब साटा बुक नहीं होता है तब भी हाथी उतना ही खाना खाता है, जितना कि साटा के दिनों में। उसकी खुराक कम नहीं होती। यह बात मैं दावे के साथ कह सकता हूं क्योंकि पटना में मेरे एक रिश्तेदार के पास हाथी है। हाथी की खासियत यह है कि उसके पास बहुत बड़ा सिर होता है। संसद इस मामले में जरा अलग है। संसद के पास सात सौ से अधिक दिमाग होते हैं। लोकसभा में 545 और राज्यसभा में 245 सदस्य। मतलब यह कि जितने सदस्य उतने दिमाग।

खैर, सभी सदस्यों को मासिक वेतन दिया जाता है। पूर्व सदस्यों को भी ठीकठाक पेंशन मिलता है। इसके अलावा संसद के दोनों सदनों को सुचारू रूप से चलाने के लिए अधिकारियों और कर्मियों की आवश्यकता होती है। इनकी कुल संख्या कितनी है, यह मेरी जानकारी में नहीं है। फिर भी मेरा अनुमान है कि कम से कम दस हजार तो होंगे। अब इतने सारे लोगों के वेतन पर खर्च होता ही है। फिर चाहे संसद का सत्र चले या नहीं चले। सरकार संसद के सदस्यों और संसद के कर्मियों का वेतन यह कहकर तो नहीं रोक सकती है कि अभी संसद का सत्र नहीं चल रहा है तो आपको वेतनादि नहीं दिया जाएगा। वैसे भी ये सभी असंगठित क्षेत्र के मजदूर नहीं है जिनकी पगार उनके मालिक यह कहकर नहीं देते कि अभी काम नहीं है तो वेतन नहीं दिया जा सकता है।

कुल मिलाकर यह कि संसद का सत्र चले या फिर नहीं चले, संसद के उपर खर्च तो होता ही है। फिर ऐसे में यह तर्क देना कि संसद सत्र के दौरान जनता की गाढ़ी कमाई खर्च होती है तो नैतिकता को ध्यान में रखते हुए विपक्ष को संसद की कार्यवाहियां चलने देनी चाहिए।

यह बात पूरी सच्चाई के साथ स्वीकार अखबारों को स्वीकार करनी चाहिए कि जनप्रतिनिधियों की देश में बहुत ही खास भूमिका है और वे बेवकूफ नहीं हैं। कम से कम उन संपादकों से बहुत अच्छे हैं जो सरकारी कृपा पाने के लिए लालायित रहते हैं। रही बात संसद सत्र में विपक्ष की तो विपक्ष का काम ही जनता के सवालों को उठाना होता है। जब सरकारें जनता से जुड़े सवालों को इग्नोर करती हैं तो विपक्ष हंगामा करता ही है। वजह यह कि तब उसके पास कोई विकल्प नहीं होता। वैसे भी कोई भी जनप्रतिनिधि संसद में स्वयं को यही मानता है कि वह किसी थियेटर में कोई फिल्म देखने नहीं आया है और वह बेजुबान नहीं है और अंधा भी नहीं है।

हाथी की खासियत यह है कि उसके पास बहुत बड़ा सिर होता है। संसद इस मामले में जरा अलग है। संसद के पास सात सौ से अधिक दिमाग होते हैं। लोकसभा में 545 और राज्यसभा में 245 सदस्य। मतलब यह कि जितने सदस्य उतने दिमाग।

 

एक सवाल तो अखबार के मालिकों और संपादकों से पूछा जाना चाहिए कि वे जिस पैसे के बल पर अखबार निकालते हैं (अय्याशी करना कहना अशोभनीय बात होगी), क्या वह अपने घर का जमीन-जायदाद बेचकर लाते हैं? क्या अखबारों के उपर जो खर्च होता है, उसमें जनता की गाढ़ी कमाई का हिस्सा नहीं है? क्या सरकारी विज्ञापनों के बदले जो उन्हें आमदनी होती है, वह जनता का पैसा नहीं है? यदि है तो फिर वे जनसरोकार की खबरों को महत्व क्यों नहीं देते?

खैर, मैं संसद और विपक्ष की बात करता हूं। शायद वह 2009 का साल था। पहली बार मुझे पटना से प्रकाशित दैनिक आज की तरफ से विधान परिषद की रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी दी गयी। संपादक महोदय ने मुझसे पासपोर्ट साइज की दो तस्वीरें मांगी। फिर एक सप्ताह में ही उन्होंने एक परिचय पत्र दे दिया और साथ में यह जिम्मेदारी कि विधान परिषद के बजट सत्र की रिपोर्टिंग मुझे करनी है। वह पहला मौका था विधान परिषद के अंदर जाने का। मुख्यमंत्री सहित सूबे के तमाम बड़े नेता मेरे सामने थे। लेकिन पहले ही दिन विपक्ष ने जमकर हंगामा किया और कार्रवाही महज पांच मिनट तक चली। मैं बड़ा निराश हुआ कि आज तो कोई खबर ही नहीं बनी। फिर पत्रकार वाले दिमाग की बत्ती जली और मैंने उस सवाल को लेकर पक्ष और विपक्ष के कुछ नेताओं से उनकी प्रतिक्रिया ली, जिस सवाल को लेकर हंगामा हुआ था। कुल मिलाकर ढंग की रिपोर्टिंग की। संपादक महोदय खुश हुए। उन्होंने संपादकीय विभाग में इसकी घोषणा भी की कि खबरें कैसे निकाली जाती हैं, यह नवल से सीखा जाना चाहिए। सच कहूं तो मेरा मन गुब्बारे की तरह फूल गया था।

मैं यह सोच रहा हूं कि अपने कार्यालय के अधिकारी के फोन की जासूसी क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं करवायी होगी या किसी और ने? यदि प्रधानमंत्री के कहने पर जासूसी करायी गयी तो यह संभव है कि उन्हें यह लगा होगा कि उक्त अधिकारी विपक्ष से मिला है या फिर किसी दूसरे देश के साथ गुप्त सूचनाएं शेयर कर रहा है

फिर एक दिन प्रेस लॉबी में कुछ सीनियर पत्रकार विपक्ष को गालियां दे रहे थे। उनके मुताबिक विपक्ष को संसदीय परंपरा की कोई समझ नहीं है। सदन की कार्यवाही को हर दिन बाधित करना गलत है। फिर एक ने कहा कि विपक्षी दलों को शून्यकाल का महत्व समझना चाहिए। यह बेहद जरूरी होता है। मेरे अल्पज्ञ मन ने कुछ आंकड़े इकट्ठे किए और मैंने अपनी खबर में लिखा कि पांच दिनों के अंदर शून्यकाल के बाधित होने से कितने सवालों पर विचार नहीं हो सका।

 

लेकिन मैं यह समझने की स्थिति में ही नहीं था कि शून्यकाल के दौरान जो सवाल उठाए जाते हैं, उनका महत्व उस सवाल से कम ही था जिसे लेकर हंगामा किया जा रहा था।

खैर, वर्तमान में लौटता हूं। मेरे सामने न्यूज वेबसाइट द वायर की अद्यतन खबर है। इसके मुताबिक पेगासस के जरिए प्रधानमंत्री कार्यालय के एक बड़े अधिकारी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के आप्त सचिव रहे वी के जैन के फोन की भी जासूसी की गयी। इसके अलावा कुछ उद्योगपतियों के फोन की जासूसी भी करायी गयी है।

 

मैं यह सोच रहा हूं कि अपने कार्यालय के अधिकारी के फोन की जासूसी क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं करवायी होगी या किसी और ने? यदि प्रधानमंत्री के कहने पर जासूसी करायी गयी तो यह संभव है कि उन्हें यह लगा होगा कि उक्त अधिकारी विपक्ष से मिला है या फिर किसी दूसरे देश के साथ गुप्त सूचनाएं शेयर कर रहा है। यदि यह वजह है तो यह बहुत खतरनाक है। मतलब यह कि प्रधानमंत्री कार्यालय खतरे में है। और यदि जासूसी प्रधानमंत्री के कहने पर नहीं हुई तो क्या यह काम केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने करवायी? यदि इस प्रश्न का उत्तर स्वीकारात्मक है तो यह तो नरेंद्र मोदी के लिए चेतावनी सरीखा है। और यदि अमित शाह के कहने पर भी पीएमओ के अधिकारी के फोन की जासूसी नहीं हुई तो क्या किसी दूसरे देश ने यह काम किया? यदि इसका उत्तर हां में है तो भारतीय संप्रभुता खतरे में हैं।

ऐसे में यदि विपक्षी सदस्य सरकार से स्पष्टीकरण चाहते हैं और इसकी मुकम्मल जांच चाहते हैं तो इसमें गलत क्या है?

 

कल दाग देहलवी को पढ़ रहा था। उनकी यह पंक्ति बेवजह नहीं लग रही।

 

कह दिया मैं ने हाल-ए-दिल अपना

इस को तुम जानो या ख़ुदा जाने

 

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं

 

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