एक तरफ जहां केन्द्र की मोदी सरकार ‘हर घर जल’ योजना के माध्यम से देश के करोड़ों लोगों को पीने का पानी देने का दावा कर रही है वहीं दूसरी ओर नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में सूरत-ए-हाल यह है कि वनवासी समाज के लोग पीने के पानी की समुचित व्यवस्था न होने के कारण कुंए का गंदा पानी पीने को मजबूर हैं।
सेवापुरी ब्लॉक के बीरभानपुर गांव में नहर के पास वनवासियों की बस्ती है। इस बस्ती के लोगों के पास पेयजल का कोई साधन नहीं है। बस्ती में एक हैंडपम्प है जो कई वर्षों से खराब पड़ा हुआ है लेकिन उसे बनवाने की जहमत न तो गांव के प्रधान उठा रहे हैं और न ही जलकल विभाग उठा रहा है।
इस बाबत पूछे जाने पर बस्ती के सामू वनवासी कहते हैं, ‘दो सौ लोगों की आबादी में एक नल है, वह भी पिछले तीन साल से खराब है। कई लोग आए और फोटो खींचकर ले गए लेकिन अभी तक न तो दूसरा हैंडपम्प लगा और न ही पुराना हेंडपम्प ठीक हुआ। बस्ती में पानी पीने का दूसरा कोई साधन नहीं है।

ऐसे हालात में वनवासी बस्ती के निकट स्थित कुएं से रस्सी द्वारा पानी निकालते हैं। रात में पानी की जरूरत पड़ने पर क्या करते हैं ? इस सवाल के जवाब में सामू कहते हैं रात में पानी की जरूरत होने पर घर के पुरूष ही कुएं से पानी निकालने जाते हैं। रात में टॉर्च लेकर जाना पड़ता है। डर भी लगता है कि कहीं नींद में कुएं या फिर गड्ढ़े में घर के लोग गिर न जाएं क्योंकि कुएं के पास तालाबनुमा गड्ढा है। बच बचाकर बस्ती के लोग जाते हैं पानी लेने के लिए। सबसे ज्यादा दिक्कत बरसात के दिनों में होती है जब कुएं के चारों ओर पानी भर जाता है। ऐसे में कुएं तक पानी और कीचड़ में होकर जाना पड़ता है।
इसी बस्ती की रहने वाली लक्षना देवी पेयजल संबंधी समस्या पर कहती हैं, ‘गरीबों की सुनने वाला कोई नहीं है। यही दिक्कत कहीं ऊंची जाति के लोगों की बस्ती में हो रही होती तो बहुत पहले ही नया हैंडपम्प लग गया होता। यहां तो लोग केवल फोटो खींचने के लिए आते हैं और फोटो खींचकर चले जाते हैं उसके बाद आगे कुछ नहीं होता। अब तो जी करता है किसी अधिकारी को बस्ती में घुसने ही न दिया जाय। चुनाव आता है तो नेता लोग भी खूब आते हैं और चुनाव बीत जाने के बाद हमारी समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं देता। सब मतलबी होते हैं।’

उर्मिला देवी अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहती हैं, ‘घर परिवार चलाने के लिए हम बाहर काम करते हैं और शाम को जब थककर आते हैं तो पानी के लिए कुएं पर जाना पड़ता है। घर का सारा कपड़ा साफ करने के लिए बहुत अधिक पानी कुएं से निकालना पड़ता है। बच्चे अभी छोटे हैं इसलिए वह कुछ नहीं करते। जो करना होता है खुद से ही करती हूं।
बस्ती के लोगों में इस बात का भय हमेशा बना रहता है कि कहीं कुएं का मालिक इसे कटीले तार से बंद न कर दे। जिस दिन कुएं का मालिक इस कुएं को तार लगाकर घेर देगा उस दिन से इन लोगों को पीने का पानी कैसे मिलेगा?
बस्ती के लोगों का कहना है कि जिसका कुआं है वह कई बार धमकी भरे लहजे में इस कुएं को तार से घेरने की बात कर चुके हैं।

दलित वनवासियों की इस बस्ती में करीब 200 की आबादी हैं। 200 की आबादी में 176 वोटर भी हैं। लोकसभा, विधानसभा के अलावा प्रधानी के चुनाव में यह लोग वोट भी करते हैं। लेकिन पिछले तीन वर्षों से ये लोग कुएं से पानी निकाल कर पी रहे हैं लेकिन जिला प्रशासन या गांव के प्रधान की ओर से हैंडपंप को बनवाने या नया हैंडपंप लगवाने की कोई जरूरत महसूस नहीं की गई।
हैंडपम्प को बनवाने की बाबत गांव के प्रधान शिवकुमार बताते हैं, ‘हैंडपंप को बनाने के लिए मैंने कई बार मिस्त्री को भेजा। जब मिस्त्री वहां जाता है तो वे लोग उसकी कोई सहायता नहीं करते, इसलिए मिस्त्री वापस चला आता है।’
यही नहीं ‘हर घर जल’ योजना के बारे में पूछे जाने पर शिवकुमार ने बताया बीरभानपुर गांव में अभी तक ‘हर घर जल’ योजना शुरू ही नहीं हुई है। जल निगम की ओर से केवल बोरिंग करके छोड़ दिया गया है। उसके बाद कोई काम नहीं हुआ है।

केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई ‘हर घर जल’ योजना ‘जल जीवन मिशन’ का एक भाग है। यह योजना भारत सरकार के जल शक्ति मंत्रालय द्वारा 2019 में शुरू की गई थी। इसका मकसद ग्रामीण इलाकों में रहने वाले हर परिवार में प्रति व्यक्ति प्रति दिन 55 लीटर नल का पानी मुहैया कराना है। लेकिन दुःखद है कि यह योजना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र के लोगों की प्यास बुझाने में ही नाकाम साबित हो रही है।