सीवर की लिंटर गिरने से दो मजदूरों की मौत (डायरी 12 अगस्त, 2022) 

नवल किशोर कुमार

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जहाँ पूरे देश में प्रधानमंत्री ने स्वच्छता अभियान जोर-शोर से चलाया  वहीँ वास्तिवक सीवर मजदूरों के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है।सीवर मजदूरों को गटर में उतरकर सफाई करने की सख्त मनाही है, वहीँ सीवर का काम मशीन से किये जाने का प्रावधान है। लेकिन सरकार  किसी भी तरह के कोई उपकरण उनके लिए उपलब्ध नहीं कराती। साल भर में सीवर की सफाई के दौरान मरने वालों आंकड़ा सौ के करीब है। 
देश का तंत्र हर क्षेत्र में मजदूरी करने वालों के प्रति घोर लापरवाही बरतने में कोई कोताही नहीं करता।
चेतना का महत्व जीवन में होता ही है। आदमी अपनी चेतना के हिसाब से ही व्यवहार करता है। मेरे हिसाब से चेतना के कारण आदमी अपने लिए वैल्यू सिस्टम का निर्माण करता है। कहने का आशय यह कि वह वामपंथी बनेगा या दक्षिणपंथी, यह भी उसकी चेतना पर ही निर्भर करता है। लेकिन चेतना की कोई एक परिभाषा नहीं हो सकती है। यदि चेतना में करुणा और न्याय शामिल हो तो कोई भी आदमी वामपंथ की तरफ आकर्षित होगा। वहीं यदि चेतना में वर्चस्ववाद हो तो उसका झुकाव दक्षिणपंथ की तरफ होगा। मेरे हिसाब से यही वह विभाजक है, जो यह तय करता है कि वह वामपंथी है या दक्षिणपंथी। कम से कम मैं अपने लिए यही मानता हूं।
दरअसल, कल एक घटना घटित हुई है, जिसने मुझे यह सोचने पर बाध्य किया है कि इस देश में ये दोनों विचारधाराएं किस रूप में समाज में हैं। घटना में दो लोगों की मौत हो गई और एक अन्य व्यक्ति गंभीर रूप से घायल है। मैं इसे दुर्घटना नहीं मानता, यह लापरवाही भी नहीं है, यह सीधे-सीधे हत्या के समान है। इस बारे में आगे चर्चा करूं, पहले यह दर्ज करूं कि घटना क्या हुई। कल ग्रेटर नाेएडा के एक इलाके में नाले (सीवर )की सफाई करने तीन मजदूर उतरे। इसी दौरान नाले (सीवर ) का लिंटर ध्वस्त हो गया और तीनों मजदूर दब गए। हालांकि मौके पर मौजूद लोगों ने तीनों को बाहर निकाला और अस्पताल पहुंचाया। लेकिन अस्पताल में चिकित्सकों ने दिलशाद (20 वर्ष) और रिहान (18 वर्ष) को मृत घोषित कर दिया। वही साजिद नामक मजदूर गंभीर रूप से घायल है। उसकी रीढ़ की हड्डी टूट गई है।

देश में श्रमिक संगठनों ने दम तोड़ दिया है। न केवल दिलशाद और रिहान की मौत के मामले में, बल्कि अनेक ऐसे मामलों में श्रमिक संगठनों ने आवाज उठाना बंद कर दिया है। यह स्थिति तब है जबकि अधिकांश श्रमिक संगठनों के लोग स्वयं को वामपंथी बताते फिरते हैं।

अब इस मामले में हालांकि ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण ने उस ठेकेदार के खिलाफ मामला दर्ज करने का आदेश दिया है, जिसने उस नाले (सीवर )का निर्माण कराया था। स्थानीय लोगों का कहना है कि प्राधिकरण के अधिकारी इस बात को पहले से जानते थे कि नाले के निर्माण में घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। नाला (सीवर )पहले से ही जर्जर था और ऐसे में मजदूरों को नाले में उतारना खतरे से खाली नहीं था। लेकिन मजदूरों को ऐसा करने के लिए कहा गया।
तो अब इस मामले में कई आयाम हैं। पहला तो यही कि तीनों मजदूर 18-20 वर्ष के रहे। हो सकता है कि उनकी उम्र कम हो और उनमें से एक रिहान, जिसकी उम्र 18 साल बतायी जा रही है, वह नाबालिग हो। लेकिन ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण यह दोष अपने माथे पर नहीं लेना चाहता है कि उसने बाल श्रम उन्मूलन अधिनियम का उल्लंघन किया। दूसरा आयाम यह कि तीनों पश्चिम बंगाल के एक ही गांव के निवासी थे और हाल ही में करीब डेढ़ महीने पहले दिल्ली रोजी-रोजगार के लिए आए थे। तीसरा आयाम यह कि तीनों मुसलमान थे। यह अहम आयाम है। नाले (सीवर ) की साफ-सफाई के काम में अब सभी गरीब तबके के लोग उतरने लगे हैं। पहले यह काम केवल स्वच्छकार जातियों के लोगों के माथे पर था। लेकिन अब उनके अंदर चेतना का प्रसार हुआ है तो वह धीरे-धीरे इस तरह के काम से मुक्त हो रहे हैं। लेकिन यह गति अभी भी अत्यंत ही धीमी है। नतीजा यह हुआ है कि वंचित समाज के अन्य तबके के लोग अब यह काम करने लगे हैं।
देखिये – 

चौथा पक्ष यह है कि जो दो लोग मारे गए और एक तीसरा जो अस्पताल में जीवन और मौत के बीच संघर्ष कर रहा है, उनके परिजनों ने कोई शिकायत दर्ज नहीं करायी है। गोया उनके परिजनों ने यह मान लिया है कि यही नियति थी। यह मुझ जैसे व्यक्ति को विचलित करनेवाली स्थिति है। प्राधिकरण की ओर से मृतकों के आश्रितों के लिए कोई मुआवजा की घोषणा नहीं की गई है और ना ही किसी ने उसे ऐसा करने को कहा है। वजह यह कि तीनों केवल कहने को मजदूर थे। उन्हें एक ठेकेदार लेकर आया था और यही उनकी एकमात्र पहचान थी।

यदि चेतना में करुणा और न्याय शामिल हो तो कोई भी आदमी वामपंथ की तरफ आकर्षित होगा। वहीं यदि चेतना में वर्चस्ववाद हो तो उसका झुकाव दक्षिणपंथ की तरफ होगा। मेरे हिसाब से यही वह विभाजक है, जो यह तय करता है कि वह वामपंथी है या दक्षिणपंथी। कम से कम मैं अपने लिए यही मानता हूं।

पांचवां पक्ष यह कि देश में श्रमिक संगठनों ने दम तोड़ दिया है। न केवल दिलशाद और रिहान की मौत के मामले में, बल्कि अनेक ऐसे मामलों में श्रमिक संगठनों ने आवाज उठाना बंद कर दिया है। यह स्थिति तब है जबकि अधिकांश श्रमिक संगठनों के लोग स्वयं को वामपंथी बताते फिरते हैं।
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तो अब मैं यह सोच रहा हूं कि चेतना का स्तर और इसकी दशा-दिशा क्या है? वामपंथी अब वामपंथ की बात करने से बचते नजर आ रहे हैं। और दक्षिणपंथी तो खैर हैं ही दक्षिणपंथी। उनके लिए तो किसी मजदूर के मर जाने का कोई मतलब ही नहीं है। अभी पिछले ही महीने अयोध्या में राम के नाम पर बन रहे मंदिर में काम करते समय दो मजदूरों की मौत हो गई थी। मंदिर का निर्माण कराने वालों ने उन्हें पहचानने से भी इंकार कर दिया था। पूरे मामले को दबा दिया गया।
जाहिर तौर पर दोनों मजदूर हिंदू ही रहे होंगे। हां, दोनों ऊंची जातियों के नहीं थे। यदि होते तो शायद मंदिर का निर्माण करानेवालों की नजर में वे मजदूर होते। वैसे यदि वे ऊंची जातियों के होते तो वे मजदूरी क्यों करते? यह भी विचारणीय प्रश्न है।

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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