कहाँ है ऐसा गाँव जहाँ न स्कूल है न पीने को पानी

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अगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मानें तो अगले हफ्ते आने वाले आज़ादी के अमृत महोत्सव तक भारत के हर आदमी को पक्का घर, घर में नल, नल में जल, शौचालय, बिजली, एलइडी बल्ब, बल्ब में रोशनी, सिलेंडर और सिलेंडर में गैस का जो सपना उन्होंने देखा था वह पूरा होनेवाला है। लेकिन उन्हीं के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से सटे (बल्कि कुछ साल पहले उसी का हिस्सा रहे) जिला चंदौली के नौगढ़ तहसील के अनेक गाँवों में उनका यह सपना अभी झूठ और छलावा मात्र है। वाराणसी मुख्यालय से महज़ सौ किलोमीटर दूर पड़नेवाले एक गाँव केल्हडिहा में इक्कीसवीं सदी के बाइस साल बीत जाने के बावजूद न सड़क है, न स्कूल, न आंगनबाड़ी। यहाँ तक कि पीने का पानी भी मयस्सर नहीं है। गज़ब तो यह है कि चंदौली जिले के रहनेवाले दो लोग केन्द्रीय मंत्री हैं। महेन्द्रनाथ पाण्डेय चंदौली के सांसद और भारी उद्योग मंत्री हैं तो चकिया के रहने वाले राजनाथ सिंह फ़िलहाल रक्षामंत्री हैं। वे सूबा-ए-उत्तर प्रदेश के वज़ीर-ए-आला भी रह चुके हैं। इसके बावजूद चंदौली के विकास की यह बानगी बहुत कुछ कह डालती है।
यह वह समय है जब अकेले प्रधानमंत्री मोदी जैसे महापुरुष ही हर जगह फोटो में दिखाई पड़ते हैं। लोग उनको जादूगर मानते हैं जो देश के लिए इतना कुछ कर रहा है जितना किसी के बूते का नहीं था। न भूतो न भविष्यति। यह वह समय है जब बैंकों से जनता का लाखों-करोड़ लूटकर ललित मोदी, विजय माल्या, मेहुल चौकसी, नीरव मोदी जैसे न जाने कितने लोग भारत की राजनीतिक सीमा से चम्पत हो चुके हैं। यह वह समय है जब युवा पीढ़ी इस उम्मीद में बेचैन है कि 5जी आ जाने से पलक झपकते ही सबकुछ डाउनलोड किया सकेगा। यह वह समय जब हर तरह की परीक्षाओं का परचा अनिवार्यतः लीक हो जा रहा है। बरसों तक रिजल्ट ही नहीं आ रहे हैं। बेरोजगारों के वास्तविक आँकड़े पर लीपापोती की जा रही है। यह वह समय है जब हमारे देश के प्रधानमंत्री साढ़े आठ हज़ार करोड़ के हवाई जहाज़ में सफ़र करते हैं और यही वह समय भी है जब चंदौली जिले का गाँव केल्हडिहा तक कोई कच्ची सड़क भी नहीं जाती और यह गाँव शुद्ध पानी के लिए तरस रहा है। आइये चलते हैं केल्हडिहा।

अभी बरसात के मौसम में पीने के लिए झरने से पानी लाते हैं। कभी-कभी पानी का टैंकर आता है लेकिन उसमें मछली और मेढक भी आ जाते हैं।’ वे बहुत दुखी होकर कहती हैं कि कभी-कभी तो पशुओं के पेशाब और गोबर से सना पानी भी छानकर पीना पड़ता है। देखकर मन गिनगिना जाता है लेकिन पीना पड़ता है।

 

नौगढ़ से लौटकर अपर्णा

केल्हरिया (खतौनी में केल्हडिहा) जाने के लिए निकलिए तो नौगढ़ बाँध को जानेवाली सड़क मनमोहक जंगलों से होकर गुजरती है। ऊंचाई और ढलान से उतरती-चढ़ती सड़क पर कहीं-कहीं लंगूरों के कई परिवार भागते-दौड़ते, पेड़ों पर चढ़ते दिख जाते हैं। सड़क पर बने छलके दूर से ऐसे लगते हैं कि कोई सीमेंट का मोटा पाइप पड़ा हो। लेकिन इस मोहक इलाके से गुजरने वाले अँगुलियों पर गिने जा सकते हैं। जहाँ आकर्षण होता है वहीं भय भी होता है। ग्राम्या संस्थान के सामाजिक कार्यकर्ता सुरेन्द्र ने बताया कि इस जंगल में बाघ के बारे में सुना जाता है लेकिन बहुत कम दिखता है। हाँ भालुओं की कमी नहीं, जो प्रायः शाम सात बजे के बाद सड़क पार करते देखे जा सकते हैं लेकिन सियार और खरहे तो कभी भी कहीं से प्रकट हो सकते हैं। इन्हीं बातों के बीच हम नुनवट (खतौनी में नोनवट) गाँव पहुँच गए, जिसमें सड़क के दाँयें-बाएँ दोनों किनारों पर बस्तियाँ हैं। यहाँ मुख्यमार्ग से बायीं ओर एक पतली पक्की सड़क पंडी गाँव को जाती है। एक किलोमीटर आगे जाने पर सुरेन्द्र ने कल्याण यादव को फोन लगाया लेकिन दो घंटी जाने के बाद फोन कट गया। दोबारा मिलाने के बाद आउट ऑफ़ नेटवर्क हो गया। अब क्या होगा? सुरेन्द्र को इतना तो पता था कि सड़क पंडी जा रही है लेकिन केल्हरिया गाँव के लोगों से संपर्क तो कल्याण का ही था। पीछे रामविलास और त्रिभुवन बाइक से आ रहे थे। कल्याण उनके साथ आ सकता था। यही सोचते हुए सुरेन्द्र आगे बढ़ते रहे कि सड़क से सटे झुरमुटों के बीच कल्याण दिख गया। सुरेन्द्र ने पूछा- ‘अरे यहाँ आ गए?’

कल्याण ने कहा- ‘मैं ऐसे ही ‘शॉटकॉट’ आ गया।’ दाईं तरफ कल्याण का गाँव देवरी है। देवरी ग्राम पंचायत है जिसके अंतर्गत पंडी और केल्हरिया गाँव भी पड़ते हैं।

गाड़ी में बैठते हुए भालुओं की चर्चा चल पड़ी जिन्होंने पिछले साल महुआ बीनने गए एक आदिवासी को चिथड़े-चिथड़े कर दिया था। हर साल एक दो लोग उनके शिकार होते ही हैं। सुरेन्द्र का कहना था कि भालू कभी अकेले रहने पर हमला नहीं करता। वह बहुत डरपोक होता है लेकिन अपने परिवार के साथ रहता है तो उसे लगता है ये लोग मेरे बच्चों को पकड़ने आ रहे हैं। इसलिए ऐसे में वह हिंसक हो जाता है।

बकरी चराते ग्रामवासी

स्कूल बंद हैं टावर चालू है

लगभग पंद्रह किलोमीटर घुमावदार और उतार-चढ़ाव वाली सड़क से चलने पर पंडी गाँव आया। वहां सबसे नई चीज रिलायंस जिओ का टावर है। उसके बगल में गाँव की एकमात्र पक्की इमारत प्रायमरी पाठशाला की है जो 2011-12 में बनी है। बाकी सभी घर मिट्टी के हैं लेकिन सलीके से लिपे-पुते हैं। सामने खेतों में महिलाएं धान रोप रही थीं। उत्तर प्रदेश में बैलों से खेती होते केवल सोनभद्र और चंदौली में ही दिखाई पड़ता है। यहाँ गाँव में भी एक आदमी बैलों के साथ खेत हेंगाता नज़र आया।

बैलों के साथ खेत हेंगाता एक ग्रामीण

केल्हरिया तक गाड़ी जाने का कोई रास्ता नहीं है। इसलिए तय था कि पंडी गाँव से कल्याण किसी से बाइक का इंतजाम करेगा ताकि गाड़ी जंगल में खड़ी करके हमलोग कच्चे रास्ते पर बाइक से गाँव के करीब पहुँच सकें। पंडी में बीमा एजेंट मनोज का घर है जिसकी बाइक मिलने की संभावना थी लेकिन कल्याण ने थोड़ी देर में लौटकर बताया कि मनोज गाँव में नहीं है। किसी और से बाइक भी नहीं मिली।

पंडी गाँव की एकमात्र पक्की इमारत प्रायमरी पाठशाला,जो केल्हरिया गाँव से 5 किलोमीटर दूर है

गाँव में सन्नाटा था। वहां स्कूल के पास मचान पर गहरी नींद में सोते हुए एक आदमी के सिवा और कोई नहीं था। स्कूल के बारे में कल्याण ने बताया कि यह ज्यादातर बंद ही रहता है क्योंकि अध्यापक यहाँ अक्सर नहीं आते। जिस घने जंगल से गुजरते हुए हम आ रहे थे उसका सन्दर्भ देते हुए बिंदु सिंह बोलीं कि यहाँ भला कौन अध्यापक आएगा। इतनी दूर नौगढ़ से चलकर आना और फिर वापस जाना वास्तव में सज़ा है। और जो भी यहाँ आएगा वह पनिशमेंट पोस्टिंग के चलते ही आएगा।

अखिलेश यादव के शासनकाल में 4 लाख पंद्रह हज़ार की लागत से बने आंगनबाड़ी केंद्र का बोर्ड जंग से धूसर हो चुका है और आंगनबाड़ी केंद्र शायद ही कभी खुलता हो। दरवाजे पर जाले लटक रहे थे। पचीस-तीस घरों का यह गाँव कोल समुदाय  की आबादी वाला है। उत्तर प्रदेश में कोलों की आबादी सात लाख से ऊपर है। चंदौली, मिर्ज़ापुर, सोनभद्र, चित्रकूट और बाँदा जिलों में अनेक गाँव कोलों के हैं। यहाँ वे अनुसूचित जाति में शामिल हैं जबकि मध्य प्रदेश में वे अनुसूचित जनजाति में आते हैं। उनकी इस विडम्बना ने भागीदारी और आरक्षण से उनको काफी दूर कर दिया है। दो सगे भाइयों में अगर एक मध्य प्रदेश में बस गया तो वह आदिवासी और दूसरा उत्तर प्रदेश में रहे तो दलित माना जाता है। दो राज्यों की सीमाओं पर रहनेवाले कोल परिवार बड़ी संख्या में इस विडम्बना के शिकार हैं।

पंडी गाँव में सभी छोटी जोत के किसान हैं। बकरियां चराते एक बुजुर्ग से मैंने हालचाल पूछा। उन्होंने बताया कि ‘बड़ी मुश्किल से गुजारा होता है। बीमार हो जाएँ तो नौगढ़ गए बिना दवा नहीं मिलती। राशन लेने के लिए पांच कोस (15 किलोमीटर) ऊपर देवरी जाना पड़ता है।’

4 लाख पंद्रह हज़ार की लागत से बने आंगनबाड़ी केंद्र का जंग लगा बोर्ड और विकास के नाम पर सिर्फ जियो कंपनी का टावर ही दिखा

हरियाली का वैभव और सूखे की मार

केल्हरिया के लिए अभी सात किलोमीटर चलना था। जंगल का अपना वैभव होता है तो उसकी अपनी तकलीफें भी होती हैं. जंगल में कहीं-कहीं गाय और भैंस का झुण्ड चरता नज़र आ रहा था। कल्याण ने बताया कि जब मैदानों में चारे की कमी हो जाती है तो वहां से चरवाहे अपने मवेशी लेकर इन जंगलों में आ जाते हैं। लेकिन इस साल तो सारा इलाका ही सूखे की मार झेल रहा है। नौगढ़ बांध के बावजूद नौगढ़ का पानी उसे नहीं मिल पाता। सारा पानी बहकर नीचे चला जाता है। लिफ्ट इरिगेशन के अलावा सिंचाई का कोई साधन नहीं है। लिहाज़ा नौगढ़ में धान अब जाकर किसी तरह लगाये जा रहे हैं।

घने जंगल में अचानक सड़क ख़त्म हो गई। आगे एक पथरीली पगडंडी थी। सुरेन्द्र ने दस-बीस कदम तो अपने चालन-कौशल का परिचय दिया लेकिन जब लगा कि आगे बढ़ना खतरे से खाली नहीं है तो अंततः कार मोड़कर एक जगह खड़ी कर दिया और पैदल आगे बढ़े।

कच्चे घरों और झोंपड़ियों का केल्हरिया गाँव

एक ही बाइक थी और तीन लोग एक साथ नहीं जा सकते थे इसलिए तय किया गया कि एक एक आदमी को छोड़कर आया जाय। उम्र और स्वास्थ्य को देखते हुए बिंदु सिंह से कहा गया कि पहले आप जाएँ। वे बाइक पर बैठीं तो जरूर लेकिन दस कदम के बाद ही रुकवाकर उतर पड़ीं और पैदल चलने लगीं। पैदल चलना ज्यादा सुरक्षित था। झाड़ियों से घिरी पगडंडी पर आधा किलोमीटर चलने के बाद एक पोखरी दिखाई पड़ी जिसमें दर्जनों भैसें बैठी हुई थीं। सामने कच्चे घरों और झोंपड़ियों का एक गाँव दिखाई पड़ा। यह केल्हडिहा गाँव है। एक तरफ घने जंगल और दूसरी तरफ पहाड़ों से घिरा हुआ यह गाँव नौगढ़ का लगभग अंतिम गाँव है। कल्याण ने बताया कि पहाड़ों के उस पार बिहार शुरू हो जाता है। इस छोटी आबादी वाले गाँव में आने और यहाँ से जाने में दिन में भी डर लगता है। शाम के बाद तो शायद ही कोई इस रस्ते से गुजरे। मैंने बड़े बुझे मन से सोचा- लेबर पेन शुरू होने पर महिला को कैसे अस्पताल ले जाते होंगे। किसी की तबियत रात में ख़राब होती होगी तब क्या होता होगा?

यह भी देखिये –

वीडिओ  साभार – बिन्दु सिंह, ग्राम्या 

आज़ादी का अमृत महोत्सव और दूषित पानी पीने को मजबूर लोग

नौगढ़ में भी तिरंगा फहराने का जूनून जोर पर है। कल हम लोग नौगढ़ बांध देखने गए तो रास्ते में औरवाटांड और नुनहट जैसे सुदूर गाँवों में भी कई घरों पर तिरंगा टंगा था। लेकिन पंडी में कहीं झंडा न दिखा और न ही केल्हरिया में किसी घर पर था। दस साल पहले बिजली यहाँ पहुँच गई और हाल ही में रिलायंस जिओ का टावर भी लग गया है। गाँव में कोल समुदाय के कुल सात परिवार रहते हैं और कुल आबादी साठ लोगों की है। केवल एक घर ईंट का है। बाकी सभी मकान मिट्टी के हैं और झोंपड़ियाँ हैं। पहाड़ और जंगल से घिरा यह स्थान किसी नखलिस्तान की तरह है। केल्हडिहा राजस्व ग्राम है। खतौनी में खाता संख्या 00002 पर कुल आठ लोगों के नाम हैं। पता चलता है कि सरजू और नंदू दो भाइयों के परिवार की ज़मीन इस गाँव में है। बताया गया कि नंदू का परिवार अब यहाँ नहीं बल्कि कहीं और रहता है। सरजू के सात बेटों का परिवार ही यहाँ रहता है। कुल काश्त साढ़े आठ बीघे से भी कम है जिसमें फ़िलहाल धान लगाया जा रहा था।

खतौनी में खाता संख्या 00002 पर कुल आठ लोगों के नाम दर्ज हैं

सबसे पहले भोला कोल मिले जो भींगे कपड़ों में खेत से काम करके आ रहे थे। मैंने हालचाल पूछा तो ‘बोले कि न यहाँ पानी है न स्कूल है। आवास का कोई पता नहीं। बस किसी तरह काट रहे हैं जीवन।’

भोला के चार बच्चे हैं। दो लडकियाँ और दो लड़के। उनके भी बच्चे हैं। वे बताते हैं कि ‘हम लोग सात भाई हैं। कई पुस्त से यहाँ रह रहे हैं। लेकिन समस्याएँ बहुत हैं। बीस किलोमीटर दूर से राशन लाते हैं। लेकिन पानी का कोई साधन नहीं है। चुआड़ से पानी लेते हैं। गर्मी के मौसम में दो कोस दूर पशुओं को पानी पिलाने ले जाते हैं। एक बोरिंग है लेकिन चार सौ फुट पर भी पानी नहीं है। एक हज़ार फुट पर पानी आ सकता है लेकिन बहुत कहने पर भी प्रधानजी ने नहीं करवाया।’

 

गाँव में मात्र यही एक बोरिंग हैं जो लगभग 400 फुट गहरा है लेकिन इसमें भी पानी नहीं है

 

गाँव में पूर्वी छोर पर हज़ार लीटर क्षमतावाली एक टंकी रखी थी जिसमें गर्मी के दिनों में टैंकर से आया पानी रखा जाता है। पीपल के पेड़ के पास गड़े बोरवेल के पाइप के मुंह पर पत्थर रखा हुआ था।

पास ही बैठीं भोला कि पत्नी ने बताया कि ‘अभी बरसात के मौसम में पीने के लिए झरने से पानी लाते हैं। कभी-कभी पानी का टैंकर आता है लेकिन उसमें मछली और मेढक भी आ जाते हैं।’ वे बहुत दुखी होकर कहती हैं कि कभी-कभी तो पशुओं के पेशाब और गोबर से सना पानी भी छानकर पीना पड़ता है। देखकर मन गिनगिना जाता है लेकिन पीना पड़ता है।’

लेकिन नौगढ़ की वर्तमान ब्लॉक प्रमुख प्रेमा देवी के प्रतिनिधि सिड्डू सिंह इस बात का विरोध करते हैं – ‘ ऐसे कैसे होगा कि पानी में गोबर-मूत, मेढक-मछली होगी। बोरिंग का पानी जाता है टैंकर में। झूठ बोलते हैं सब।’

देवरी के ग्राम प्रधान लालसाहब खरवार

हालांकि इससे पहले हम नुनवट जाकर देवरी के वर्तमान ग्राम प्रधान लालसाहब खरवार से मिले। ग्राम्या संस्थान की अध्यक्ष बिन्दु सिंह ने पूछा कि ‘प्रधान जी वहाँ पानी की क्या व्यवस्था होगी? बोरिंग सूखी हुई है और टैंकर के पानी में गोबर घुला रहता है।’

लालसाहब खरवार ने गंभीरता से कहा -‘वो तो होइबे करी। पानी गड्ढे से तो जाता ही है।’ बिन्दू सिंह ने देर तक लालसाहब खरवार से उस गाँव में सड़क, पानी और स्कूल के बारे में दरियाफ्त किया। जो तथ्य छनकर निकले उनमें यह था कि उस बीहड़ में जांच के लिए कोई आता-जाता नहीं इसलिए ठेकेदार ने उतना पैसा बचा लिया। एक ही परिवार के केवल सात घर होने से वहाँ स्कूल नहीं हो सकता और जहां तक पानी का सवाल है तो फिलहाल बोरिंग और नहीं बढ़ाई जा सकती। बिन्दू सिंह ग्राम्या की ओर से एक स्कूल खोलना चाहती हैं। खरवार ने सहयोग का वादा किया।

केल्हडीहा की समस्याओं पर बातचीत करती हुई बिंदू सिंह

ऐसा नहीं है कि इस गाँव की पानी की समस्या चंदौली जिला प्रशासन से छिपी हो। बल्कि इस पर प्रशासनिक स्तर पर कई बार चर्चा हुई लेकिन स्थिति वही ढाक के तीन पात की रह गई।

नौगढ़ के वर्तमान खंड विकास अधिकारी सुदामा सिंह यादव ने बताया कि उस गाँव में वे गए हैं और वहाँ के हालात से वाकिफ हैं। लेकिन बोरिंग बढ़वाने के सवाल पर तुरंत बोले कि ‘बोरिंग में पैसे की बरबादी ही है। इसके बजाय पाइप के जरिये वहाँ सप्लाई देना आसान होगा। अभी उन्हें फरवरी से टैंकर का पानी दिया जा रहा है। सड़क को लेकर भी उन्होंने कहा कि यह एक रहस्य ही है कि बीच जंगल में यह अधूरी क्यों छोड़ी गई जबकि गाँव वहाँ से डेढ़ किलोमीटर मात्र रह जाता है।’ उन्होंने संजीदगी से कहा कि मैं समझता हूँ कि इस साल वहाँ पानी और सड़क की समस्या हल हो जाएगी।

कब से बसा है यह गाँव

गाँव के सबसे बुजुर्गवार घुरहू कोल पचासी साल की उम्र में भी सक्रिय और स्मृति संपन्न हैं। उनकी आवाज भी दमदार है। मैंने पूछा कि क्या यह गाँव वन विभाग की ज़मीन पर बसा है? उन्होंने छूटते ही जवाब दिया- ‘बिलकुल नहीं। हम मालगुजार किसान हैं। खतौनी में हम सबके नाम हैं। अगर यह जंगल विभाग की ज़मीन होती तो वह हमको कब का भगा देता।’

सरजू ने बताया कि हमारे पूर्वज सात पीढ़ी पहले यहाँ आकर बसे थे। उन्होंने सात पीढ़ियों के प्रतिनिधियों के नाम बताये- खेदू, रघुबर, गुदरी, सरजू, घुरहू, अशोक और इन्दलेश।

गाँव के सबसे बुजुर्गवार घुरहू कोल पचासी साल की उम्र में भी सक्रिय और स्मृति संपन्न

तक़रीबन सौ साल पहले बसे इस गाँव के बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं मिलती लेकिन अनुमान लगाया जाता है कि 1831 में छोटानागपुर के पठारों में सामंतों, बनियों और अंग्रेज शासकों की लूट और शोषण के विरुद्ध हुए कोल विद्रोह के दमन के दौरान हजारों लोग सुरक्षित ठिकानों की तलाश में और घने जंगलों में आकर बस गए।

कोल एक बहादुर और कर्मठ किसान जाति रही है और उसकी जीविका का मुख्य आधार खेती और जंगल हैं। वे जंगलों की सफाई करके जमीन को खेती लायक बनाकर उस पर खेती करते थे। इसलिए वे जमीन पर अपना नैसर्गिक अधिकार मानते थे। लेकिन बंगाल में अंग्रेजी शासन की स्थापना के साथ ही कोल जाति के लोगों के आर्थिक जीवन में भी बदलाव आने लगा। स्थायी भू-बंदोबस्ती के कारण इस क्षेत्र में जमींदारों एवं महाजनों की ताकत बढ़ती गई। इनके कर्मचारी भी सत्ता की ताकत पाकर निरंकुश हो गए। इन सबने मिलकर कोलों का शारीरिक एवं आर्थिक शोषण शुरू कर दिया। लगान की रकम अदा न करने पर उनकी जमीन नीलाम करवा दी जाती थी। ये बाहरी लोग कोलों की बहू-बेटियों की इज्जत भी लूट लेते। कोलों को बेगारी भी करना पड़ती थी एवं उनकी स्त्रियों को जमींदारों-महाजनों के यहाँ काम करने को मजबूर किया जाता था। इन अत्याचारों से इनकी सुरक्षा करने वाला कोई नहीं था। थाना और न्यायालय भी जमींदारों एवं महाजनों का ही साथ देते थे।

चारों ओर से घिरते हुए कोल असहाय और लाचार होते जा रहे थे। उनका जीवन दूभर हो गया था। लेकिन वे अत्याचार के विरुद्ध झुकनेवाले नहीं थे। उनका आक्रोश जमींदार, महाजन, पुलिस के विरुद्ध बढ़ता गया। ईस्ट इंडिया कंपनी ने उनकी ज़मीनें छीनकर  गैर आदिवायों को दे दिया। इसलिए उन पर जमींदारों, महाजनों और सूदखोरों का अत्याचार दिन प्रतिदिन बढ़ने लगा।

सन 1831 ईसवी में कोलों ने अपने शोषकों और अत्याचारियों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह के नेता बुद्धू भगत और जोआ भगत ने किया था। कोलों ने बाहरी जमींदारों, महाजनों और सूदखोरों की संपत्ति को नष्ट कर दिया। सरकारी खजाने को लूट लिया और कचहरियों और थानों पर आक्रमण करके उसे आग के हवाले कर दिया। तमाम कोशिशों के बावजूद विद्रोह थमने का नाम नहीं ले रहा था इसलिए ईस्ट इण्डिया कंपनी ने सेना की एक विशाल टुकड़ी भेजी और बड़ी निर्दयता से इस विद्रोह को दबा दिया। बड़ी संख्या में कोल मारे गए। वे अपने पारंपरिक हथियारों से अंग्रेजों की सेना का सामना करने में अक्षम साबित हुए।

घुरहू कहते हैं कि उनके पिता सरजू इस गाँव में अपने परिवार की चौथी पीढ़ी के थे। तब लोग प्रकृति के नज़दीक गुजर-बसर करते थे और खेती और वनोपजों पर निर्भर रहते थे। उन दिनों आज के मुकाबले जंगल अधिक चीजें मुहैया कराते थे लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। जीने की ज़रूरतें और शर्तें बदल चुकी हैं। रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी ज़रूरी मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति आसान नहीं रही जबकि रोजगार के अवसर लगातार घट रहे हैं। मेहनत-मशक्कत के काम भी नियमित रूप से नहीं मिलते जबकि महंगाई और पूँजी का दबाव लगातार बढ़ रहा है।

माना यह जा रहा है कि यह गाँव सत्तर-अस्सी साल पहले आबाद हुआ होगा इसलिए यह सोचना लाजिम है कि यहाँ बुनियादी साधन और सुविधाएं हों। लेकिन इस मामले में किसी तरह की स्पष्ट परियोजना आज तक नहीं बनी है। कुछ लोग कहते हैं कि स्कूल का मानक छह सौ की आबादी है जबकि यहाँ मात्र तेईस बच्चे हैं। इसलिए पढ़ाई के लिए उन्हें दूसरी जगह जाना ही पड़ेगा। लेकिन सड़क और सबसे जरूरी पेयजल की समस्या का क्या होगा? फिलहाल इसका कोई माकूल जवाब नहीं है।

 

ऐसे आती हैं यहाँ सुविधाएँ

सात भाइयों के इस गाँव में कई घरों के बगल में शौचालय बने दिखते हैं। लगता है कई साल पहले बने हैं। किसी में भी दरवाजा नहीं है। झाड़-झंखाड़ उगी हैं। पूछने पर एक युवक ने उलटे मुझसे ही पूछा कि जब पानी ही नहीं है तो क्या मतलब है शौचालय का?’

सरकारी शौचालय के नाम पर खड़ी दीवारें ..

पानी न होने से शौचालय का कोई उपयोग नहीं। सब के सब या तो जर्जर हो चुके हैं या भहरा पड़े हैं। भोला के सबसे बड़े भाई घुरहू कहते हैं कि सरकारी पैसा आया था लेकिन हमको केवल बता दिया और साइन करा लिया। खेत का बालू लिए और थोड़ा-बहुत सीमेंट से उल्टा-सीधा जोड़ दिया और हो गया कोरम पूरा। थोड़े दिनों में भहरा गया।’

घुरहू यह भी बताते हैं कि ‘कई साल से आवास की मंजूरी हुई लेकिन आज तक कुछ नहीं हुआ। दस-पंद्रह साल हो गए।’ उनकी आवाज में एक मार्मिक अपील है जो बहुत बेधक है।

गाँव की महिलाएं

यहाँ छोटे बड़े कुल सत्ताइस बच्चे हैं लेकिन एक भी स्कूल नहीं जाता। पहले की पीढ़ियों में शिक्षा का ख़ास प्रसार न था लेकिन अब तो हर आदमी इसके महत्त्व को समझ रहा है। भोला की पत्नी बताती हैं कि पहले बच्चे सात किलोमीटर दूर पंडी के स्कूल में जाते थे लेकिन एक दिन भालू दिख गया तो फिर डर के मारे वे स्कूल नहीं गए। जंगल का रास्ता असुरक्षित होने से लडकियाँ स्कूल नहीं जातीं।’

इस गाँव में न तो आंगनबाड़ी केंद्र है और न ही कभी किसी डॉक्टर के चरण पड़े। गर्भवती महिलाओं या गंभीर रूप से बीमार मरीजों को खटिया पर लादकर ले जाना भी अत्यंत कठिन है लेकिन बिना नौगढ़ गए कोई इलाज मिलना संभव नहीं है।

यह समझ से परे है कि नुनवट से आनेवाली पिच रोड को बीच जंगल में क्यों रोक दिया गया जबकि उसे केल्हरिया गाँव तक ले जाना असंभव बिलकुल नहीं है।

लोगों से बात करने पर यह समझ में आता है कि उन्हें सरकारी सुविधाओं की न केवल जानकारी है बल्कि उन्हें पाने की उम्मीद भी है। घुरहू को वृद्ध पेंशन मिलती है लेकिन पिछली जनवरी से नहीं मिली है। महिलाएं हमारे जाने से इस उम्मीद में थीं कि हम किसी सरकारी योजना के तहत यहाँ आये हैं इसलिए सबसे पहले उन्होंने पानी की समस्या पर बात की और फिर बच्चों के भविष्य को लेकर चिंता जताई। एक स्त्री अपनी बकरियों के चोरी चले जाने की बात बताते-बताते रोने लगी।

हममें से किसी के लिए इस गाँव का पानी शायद मजबूरी में भी पीना बहुत कठिन हो लेकिन इन लोगों का कष्ट समझना तो और भी कठिन है। संवेदनाएं ठस हो जाती हैं। इन लोगों को इस सत्ता और व्यवस्था ने इनका कोई अधिकार नहीं दिया। चुनाव के मौके पर इनके वोट खरीदने के लिए पैसा या साड़ी बाँटने वाले राजनेता इनके घर, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य के मसले पर कुछ भी नहीं सोचते।

लगातार राजनीतिक छलावे के शिकार होकर बरसों से सड़क, पानी और स्कूल जैसी बुनियादी चीजों का इंतजार करना ही यहाँ के लोगों की त्रासदी है।

अपर्णा गाँव के लोग की कार्यकारी संपादक हैं।

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