Sunday, June 23, 2024
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यूपी : आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थी, 69000 शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में सरकार की गलत नीतियों का खामियाजा भुगत रहे हैं

 उत्तर प्रदेश में प्राथमिक शिक्षक भर्ती में आरक्षण घोटाले का आरोप लगाते हुए सैकड़ों अभ्यर्थी पिछले तीन साल से आंदोलनरत हैं। पांच अभ्यर्थी 38 दिन से भूख हड़ताल पर हैं, लेकिन प्रदेश सरकार इनके ऊपर ध्यान नहीं दे रही है। राजधानी लखनऊ की सड़कों से लेकर इको गार्डन तक प्रदर्शन कर रहे ओबीसी-एससी अभ्यर्थियों का […]

 उत्तर प्रदेश में प्राथमिक शिक्षक भर्ती में आरक्षण घोटाले का आरोप लगाते हुए सैकड़ों अभ्यर्थी पिछले तीन साल से आंदोलनरत हैं। पांच अभ्यर्थी 38 दिन से भूख हड़ताल पर हैं, लेकिन प्रदेश सरकार इनके ऊपर ध्यान नहीं दे रही है।

राजधानी लखनऊ की सड़कों से लेकर इको गार्डन तक प्रदर्शन कर रहे ओबीसी-एससी अभ्यर्थियों का आरोप है कि, 69,000 शिक्षक भर्ती में 6,800 सीटों के आरक्षण में धांधली की गई है। इसकी शिकायत अभ्यर्थियों ने बेसिक शिक्षा मंत्री से लेकर राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित आयोग तक में की, लेकिन अभी तक अभ्यर्थियों को संतोषजनक उत्तर नहीं मिल पाया।

तीन सालों से चल रही इस लड़ाई की शुरुआत तब हुई जब उत्तर प्रदेश सरकार ने दो चरणों में बेसिक शिक्षक भर्ती की शुरुआत की। पहले चरण में 68,500 और दूसरे चरण में 69,000 पदों पर भर्ती प्रक्रिया की शुरुआत की। पहले चरण की भर्ती प्रक्रिया फाइनल करने में सरकार सफल रही, जबकि दूसरे चरण की भर्ती में कई तरह की अड़चनें सामने आईं।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले तत्कालीन बेसिक शिक्षा मंत्री द्वारा 6,800 अभ्यर्थियों की एक सूची जारी की गई लेकिन चुनाव बाद इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या सरकार की ओर से चुनाव से पूर्व चयनित अभ्यर्थियों की जारी सूची एक छलावा था? क्या सरकार ओबीसी और एससी वर्ग को गुमराह करने के लिए 6,800 अभ्यर्थियों की चयन सूची जारी की?

प्रदर्शनकारी अमरेंद्र सिंह सरकार पर गुमराह करने का आरोप लगाते हुए कहते हैं, ‘यदि नियुक्ति की यह लड़ाई दलित-पिछड़े समुदाय की न होती तो अब तक नियुक्ति हो भी चुकी होती। क्योंकि हमारे वर्ग के जो नेता मंत्री हैं वो वोट लेने के बाद सब भूल जाते हैं। पुलिस भर्ती में रिलेक्सेशन का मामला था सवर्ण विधायक सलभमणि त्रिपाठी मुख्यमंत्री से मिले और आदेश जारी कर दिया गया। हमारे वर्ग के कई केबिनेट मंत्री हैं, उपमुख्यमंत्री हैं लेकिन सब पपेट हैं।’

आरक्षण घोटाला का क्या है पूरा मामला?

25 जुलाई, 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में यूपी के 1.37 लाख शिक्षामित्रों की सहायक शिक्षकों के तौर पर नियुक्ति को अवैध घोषित कर दिया था और इन पदों पर भर्ती के निर्देश दिए। सरकार ने दो चरणों में इन पदों पर भर्ती करवाने का फैसला किया। पहले चरण में 68,500 पदों पर भर्ती प्रक्रिया आयोजित की गई।

आन्दोलनरत अरक्षित वर्ग की महिला अभ्यर्थी

दिसंबर, 2018 में दूसरे चरण के 69,000 पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन निकाला गया। पहले चरण के मुकाबले दूसरे चरण में किए गए कुछ बदलाव ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि भर्ती के हर चरण को आरोपों और अदालतों के कठघरे से गुजरना पड़ा। 67,000 से अधिक पद भरे जाने के बाद भी गलत सवाल और आरक्षण का विवाद अब भी विभाग और सरकार के सामने मौजूद है।

विज्ञापन जारी करने के बाद जिस भर्ती को छह महीने में पूरा करने की तैयारी थी, वह पहले डेढ़ साल तक कटऑफ के विवाद में अटकी रही। दरअसल, पहले चरण में अनारक्षित वर्ग के लिए 45% और आरक्षित वर्ग के लिए 40% अंक का न्यूनतम पासिंग मार्क तय किया गया था।

दूसरे चरण में पासिंग मार्क बढ़ाकर क्रमश: 65% और 60% कर दिया गया। लेकिन, यह आदेश 6 जनवरी, 2020 को हुई भर्ती परीक्षा के अगले दिन जारी किया गया। इसका असर यह रहा कि हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमेबाजी के चलते नतीजे परीक्षा के 16 महीने बाद घोषित हो सके। जानकारों की मानें तो विज्ञापन जारी करते समय ही पासिंग मार्क तय कर दिया गया होता तो इतनी लंबी कानूनी लड़ाई से बचा जा सकता था।

क्या है उत्तर माला प्रकरण

न्यायालय ने अपने एक आदेश में 69,000 भर्ती में मनोविज्ञान के एक गलत प्रश्न पर समस्त अभ्यर्थियों को एक प्रश्न का अंक ‘कॉमन’ देने का फैसला सुनाया, जिसके बाद सरकार ने प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए लगभग एक हजार से अधिक अभ्यर्थियों को पुनः फॉर्म भरने का मौका दिया, लेकिन कुछ समय बाद ही सरकार ने विभाग से पहले जारी 6,800 अभ्यर्थियों की लिस्ट का हवाला देते हुए इस प्रक्रिया को ठंडे बस्ते में डाल दिया।

सवाल उठता है कि विभाग द्वारा लगभग सभी पदों पर नियुक्ति पत्र देने के बाद विज्ञापित सीटों के सापेक्ष सरकार अधिक सीटों पर नियुक्ति कैसे कर सकती है? यदि सरकार ऐसा करती है तो नई भर्ती का इंतज़ार कर रहे उन अभ्यर्थियों के अधिकारों का उल्लंघन होगा, जिसमें किसी भी सरकारी नौकरी के लिए खुला विज्ञापन जारी करने का प्रावधान है।

यदि सरकार पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, 6,800 अभ्यर्थियों और न्यायालय के उत्तरमाला प्रकरण के निर्णय को लागू करती है तो उसे अपने ही जारी किए गए लिस्ट में परिवर्तन करना होगा और सरकार द्वारा नियुक्त सामान्य वर्ग के हजारों शिक्षकों को पदमुक्त करना होगा।

यदि सरकार इस प्रक्रिया से गुजरती है तो उसे लगभग तीन वर्षों से नियुक्त सामान्य वर्ग के शिक्षकों की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है। संभवतः पद मुक्त होने वाले शिक्षक न्यायालय की राह देख सकते हैं।

योगी सरकार ने की आरक्षण की अनदेखी?

शिक्षामित्रों का समायोजन रद्द होने के बाद पहली बार योगी सरकार द्वारा लिखित परीक्षा के माध्यम से प्रदेश स्तरीय मेरिट बनाकर चयन प्रक्रिया को पूरा किया गया, जिसमें दूसरी भर्ती 69,000 में लगभग पांच लाख अभ्यर्थियों के सापेक्ष 60/ 65% पासिंग मार्क्स पर 146060 कैंडिडेट सफल घोषित हुए। इसमें सामान्य वर्ग के 36614, ओबीसी वर्ग के 84868, एससी वर्ग के 24308 तथा एसटी वर्ग के 270 अभ्यर्थियों को पास किया गया, लेकिन सीट के सापेक्ष अधिक अभ्यर्थियों के पास होने से सरकार को अपने नियमावली के हिसाब से गुणांक की फाइनल मेरिट बनानी पड़ी।

हड़ताल स्थल पर आयोजित सभा को सम्बोधित करते हुए

सरकार द्वारा प्रत्येक अभ्यर्थियों के जिला वरीयता की प्राथमिकता के आधार पर जिला एलॉट किया गया। यदि किसी व्यक्ति के स्टेट मेरिट में सामान्य वर्ग में सिलेक्शन हुआ लेकिन उसकी प्राथमिकता वाले जिले में उसकी मेरिट सामान्य के बराबर नहीं है, तो उस अभ्यर्थी को आरक्षित श्रेणी में नियुक्ति पत्र देकर आरक्षित सीट की गणना कर ली गई, जिससे आरक्षित सीटों का गुणा-गणित गड़बड़ हो गया और ओबीसी के ऐसे अभ्यर्थियों में रोष पैदा हो गया, जो लिखित भर्ती की परीक्षा में सफल होने में कामयाब थे, लेकिन फाइनल लिस्ट में अपनी जगह नहीं बना पाए।

ओबीसी अभ्यर्थियों द्वारा यह भी आरोप लगाया गया कि सामान्य और ओबीसी की फाइनल मेरिट में 18630 ओबीसी सीटों में कैसे 0.40 अंक का ही अंतर हो सकता है?

उत्तर प्रदेश में किसी भी सरकारी नौकरी के विज्ञापन में पिछड़ा वर्ग को 27% अनुसूचित जाति को 21% तथा अनुसूचित जनजाति को 2% आरक्षण देने का प्रावधान है। इस हिसाब से यदि 69,000 शिक्षक भर्ती के विज्ञापित पदों पर बात की जाए तो मेरिट लिस्ट में 34,500 रैंक से अधिक सामान्य अभ्यर्थियों का सेलेक्शन नहीं हो सकता, लेकिन आरक्षित अभ्यर्थियों के द्वारा यही सवाल बार-बार उठाया जाता है कि यदि सरकार लिस्ट को जारी करते समय इस बात का ध्यान रखी होती तो आरक्षण में धांधली न होती।

बेसिक शिक्षा भर्ती में शामिल अभ्यर्थी

अभ्यर्थी यशवन्त कुमार आरक्षण घोटाला का आरोप लगाते हुए कहते हैं, ‘2018 में 69,000 शिक्षक भर्ती आई, 2019 में इसका पेपर हुआ। पासिंग मार्क को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। सरकार 23 जून, 2020 को 67,867 की चयन लिस्ट जारी करती है। हम लोगों ने खोजा नाम नहीं था। जनरल का कटऑफ 67.10 और ओबीसी का कटऑफ 67.73 था। दोनों वर्गों का कटऑफ का अंतर सिर्फ 0.40 था। ओबीसी को 27 प्रतिशत में सिर्फ 3000 सेलेक्शन हुआ ओबीसी का।’

वे आगे कहते हैं, ‘सभी अभ्यर्थी राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग में गए। वहां एक साल बाद 13 मार्च 2021 को दस पन्नों की रिपोर्ट सरकार को सौंपी। इसमें कहा गया कि ओबीसी वर्ग का 14,000 सीटों का नुकसान हुआ और एससी के लगभग 4000 सीटों का नुकसान हुआ। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पांच सदस्यी टीम का गठन अतुल सहगल के नेतृत्व में गठित की। फिर टीम ने जांच की उन्होंने भी पाया कि आरक्षण की विसंगति हुई है। हम 13 मार्च, 2021 से लगातार धरना दे रहे हैं। पांच पन्नों की रिपोर्ट सौंपी घोटाले को उन्होंने विसंगति कहते हुए रिपोर्ट सौंप दी।’

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यशवन्त कुमार ने बताया, ‘मुख्यमंत्री ने 23 दिसम्बर, 2021 को हमारे डेलिगेशन को बुलाया, जांच कराई है आपका आरोप सही पाया गया है। आपका जो नुकसान हुआ उसकी भरपाई कराई जाएगी। योगी जी के ट्विटर से अभ्यर्थियों की समाधान की बात करते हुए नियुक्त करने की बात की गई। तत्कालीन शिक्षा मंत्री सतीश चंद्र द्विवेदी ने भी प्रेस कांफ्रेंस किया और गलती स्वीकार करते हुए कहा कि साफ्टवेयर में त्रुटि की वजह से यह समस्या पैदा हुई लेकिन चुनाव के बाद सब ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।’

प्रदर्शनकारी अभ्यर्थी निशा मौर्य सुल्तानपुर की रहने वाली हैं। लखनऊ के इको गार्डन में नियुक्ति प्रकरण को लेकर प्रदर्शन में शामिल हैं। निशा कहती हैं, ‘चुनाव से पहले हम लोग योगीजी से उनके आवास पर मिले। पंद्रह दिनों के अंदर नियुक्ति करने का वादा मुख्यमंत्री जी ने किया था। अधिकारियों ने जानबूझकर नियुक्ति प्रकरण को आचारसंहिता तक खींचा। यदि नियुक्ति नहीं करनी थी तो लिस्ट क्यों जारी की गई?’

वे आगे कहती हैं, ‘हम लोग उम्मीद कर रहे थे कि योगी सरकार दोबारा चुनाव के बाद आएगी तब हमारी नियुक्ति की जाएगी लेकिन सरकार बनने के बाद योगी सरकार ने हमारी ओर उलट कर भी नहीं देखा। घर पर अपने छीटे-छोटे बच्चों, बीमार मां और पिता को छोड़ कर आंदोलन में आई हूँ। आखिर मैं कबतक ऐसे आंदोलन कर सकती हूँ? हम चाहते हैं हमारी नियुक्ति कर सरकार इस आंदोलन से मुक्ति दिलाये। हम लोगों की आर्थिक, सामाजिक स्थिति बिगड़ चुकी है। अब हम कितना बर्दाश्त करें?’

चुनाव से पहले दलित-पिछड़ा वर्ग को गुमराह किया?

उत्तर प्रदेश का इतिहास रहा है कि यहां पर कोई भी भर्ती बिना न्यायालय तक पहुंचे कम्प्लीट नहीं हो पाती है। उसी तरह प्रदेश बेसिक शिक्षकों की 1,37,500 शिक्षकों की नियुक्ति का मामला अदालत तक पहुंच चुका है। सवाल उठता है कि यदि दूसरे चरण की भर्ती में पारदर्शिता थी तो 6,800 आरक्षित अभ्यर्थियों की सूची क्यों जारी की गई? यदि सूची जारी की गई तो फाइनली नियुक्ति पत्र क्यों नहीं दिया गया?

अयोध्या निवासी अर्चना शर्मा लखनऊ के इको गार्डन में अपनी नियुक्ति को लेकर प्रदर्शनरत हैं। अर्चना कहती हैं, “पहले आरक्षण घोटाला हुआ फिर हम लोगों ने आंदोलन किया तो मुख्यमंत्री से मुलाकात हुई मुख्यमंत्री महोदय ने माना कि हमारे साथ गलत हुआ है। राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग ने भी माना कि 69,000 भर्ती प्रक्रिया में आरक्षण नियम को फॉलो नहीं किया गया है। अभी तक हम उम्मीद लगाकर बैठे हैं कि मुख्यमंत्री हमारे साथ न्याय करेंगे लेकिन यदि हमें न्याय नहीं मिलता तो इसके नकारात्मक परिणाम होंगे।

विजय यादव कहते हैं, ‘प्रकृति की कोई ऐसी समस्या नहीं है जो हम झेल नहीं रहे हैं। दो साल से हम मानसिक से लेकर पारिवारिक समस्याओं का सामना कर रहे हैं। माननीय मुख्यमंत्री जी द्वारा ही चयनित अभ्यर्थियों की सूची जारी की गई थी और अब हमें उम्मीद है कि वे जारी लिस्ट में लोगों को नियुक्ति देंगे। यदि मुख्यमंत्री जी ऐसा नहीं करते हैं तो हम लोकसभा में हर घर हर द्वार जाकर हर स्तर पर विरोध करेंगे।’

उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा राज्य मंत्री संदीप सिंह से ‘गांव के लोग’ ने बात करने की कोशिश की लेकिन संपर्क नहीं हो सका।

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